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काम की बात

पीजी का अपना कोई लाइसेंस नहीं होता, इसलिए कमरा लेने से पहले जो काग़ज़ माँगने हैं वे इमारत के हैं, और माँगने का एक क्रम है

दिल्ली नगर निगम पीजी का लाइसेंस जारी नहीं करता, इसलिए पूछताछ इमारत से शुरू होती है: मंज़ूर नक़्शा, फ़ॉर्म H का अग्नि-सुरक्षा प्रमाणपत्र और उसके साथ हर साल का फ़ॉर्म K। बेंगलुरु और गुरुग्राम के नियम बताते हैं कि और क्या माँगा जा सकता है। हर क़दम के साथ वह क़ानून, जिससे वह क़दम निकलता है, और वह जगह भी जहाँ कोई क़ानून नहीं है।

आईआईटी बॉम्बे के एक छात्रावास का कमरा। यह विश्वविद्यालय का हॉस्टल है, पीजी नहीं; पीजी का ऐसा ही कमरा किस काग़ज़ के भरोसे लिया जाए, यही इस लेख का सवाल है।
तस्वीर: Prateek Karandikar, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

दिल्ली में पीजी चलाने का कोई लाइसेंस बनता ही नहीं।

नगर निगम इसे जारी नहीं करता, और शहर में कोई ऐसा रजिस्टर नहीं है जिसमें देखा जा सके कि कोई पीजी दर्ज है या नहीं। इसलिए कमरा लेने से पहले आप जो काग़ज़ माँगेंगे, वे पीजी के नहीं, इमारत के होंगे: पहले मंज़ूर नक़्शा, फिर अग्नि-सुरक्षा प्रमाणपत्र। उसके बाद अपना लिखित करार।

सितंबर 2026 में दिल्ली के सत्य निकेतन में एक पीजी इमारत गिरी और सात लोग मारे गए (उस हादसे पर हमारा लेख)। उसके बाद अदालतों और सरकार ने जो कुछ कहा, उसमें छात्र और अभिभावक के काम की चीज़ एक है: किस काग़ज़ के पीछे कौन-सा क़ानून खड़ा है, और कहाँ कोई क़ानून है ही नहीं। नीचे का क्रम वही है जिस क्रम में आपको पूछना है।

पूछने का क्रम

1. इमारत का मंज़ूर नक़्शा: कितनी मंज़िलें मंज़ूर हैं, कितनी बनी हैं। 2. अग्नि-सुरक्षा प्रमाणपत्र, फ़ॉर्म H में, और उसके साथ इस साल का फ़ॉर्म K; यह तब जब इमारत नियम 27 की सीमा में आती हो। 3. सीढ़ियाँ और निकास, अपनी आँखों से। 4. कमरे में एक व्यक्ति के हिस्से कितनी जगह; रसोई का लाइसेंस, कैमरे, गार्ड। 5. गुरुग्राम में: 2021 की गेस्टहाउस नीति के तहत अनुमति है या नहीं। 6. लिखित करार: जमानत, किराया, प्रवेश का नोटिस, छोड़ने की शर्तें। 7. कुछ ग़लत हो तो निगम, अग्निशमन सेवा या पुलिस, जिसका जो काम है। 8. दिल्ली की घोषित पीजी नीति: घोषित है, लागू नहीं।

हर क़दम के साथ नीचे वह क़ानून है जिससे वह क़दम निकलता है। जहाँ क़ानून चुप है, वहाँ यह भी लिखा है कि वह चुप है।

पहला काग़ज़: मंज़ूर नक़्शा

मंज़ूर नक़्शा वह काग़ज़ है जिस पर नगर निगम की मुहर बताती है कि इस ज़मीन पर कितनी मंज़िलें बन सकती थीं। मकान-मालिक के पास इसकी प्रति होती है; पीजी चलाने वाला अगर ख़ुद किरायेदार है तो मालिक से मँगवा सकता है। आपको इसमें एक ही चीज़ मिलानी है: नक़्शे में जितनी मंज़िलें हैं, खड़ी इमारत में उतनी ही हैं या ज़्यादा।

दिल्ली हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने एक पीजी इमारत गिरने के बाद की सुनवाई में इस फ़र्क़ को एक वाक्य में रखा: "अगर अनुमति दो मंज़िल की इमारत की है, तो निर्माण छह का कर दिया जाता है, नींव वही रहती है" (पीटीआई की रिपोर्ट; मूल अंग्रेज़ी में "If the permission is for two-storey building, the construction is made for six, foundation remains the same")। नींव नक़्शे में दर्ज होती है। बाहर से वह दिखती नहीं।

नक़्शे में क्या-क्या गिना जाता है

मंज़िलों की गिनती में दो चीज़ें छूट जाती हैं। पहली, मेज़ानीन: दो मंज़िलों के बीच बनी आधी मंज़िल, जो अक्सर दुकान या स्टोर के ऊपर होती है। दिल्ली अग्निशमन सेवा नियम 2010 का नियम 27 मंज़िलें गिनते समय मेज़ानीन को साफ़ शब्दों में शामिल करता है। दूसरी, बेसमेंट। जुलाई 2024 में राजेंद्र नगर के एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भर गया था और तीन छात्र मारे गए थे। बेसमेंट में बिस्तर, रसोई या पढ़ने की जगह हो तो पूछिए कि नक़्शे में उसका उपयोग क्या लिखा है। ऊपर की गिनती और नीचे की गिनती, दोनों नक़्शे से मिलनी चाहिए, और जो न मिले उसे फ़ोन में फ़ोटो खींचकर रख लीजिए।

पीजी का लाइसेंस क्यों नहीं माँग सकते

द पायनियर ने नगर निगम के हवाले से लिखा है कि रिहायशी इलाक़े में पीजी चलाने के लिए कोई विशिष्ट मानदंड नहीं हैं और निगम पीजी का लाइसेंस जारी नहीं करता। जो नियम लागू होते हैं, वे इमारत पर लागू होते हैं: भवन उपनियम, भू-उपयोग और अग्नि-सुरक्षा। पीजी के लिए कोई वैधानिक निकाय नहीं है। इसका सीधा नतीजा यह है कि "आपका पीजी पंजीकृत है?" का कोई जवाब नहीं होता, क्योंकि पंजीकरण की खिड़की ही नहीं है। सवाल बदलना पड़ता है: "इमारत के काग़ज़ दिखाइए।" संचालक अगर कहे कि सब मंज़ूर है, तो पूछिए किसने मंज़ूर किया, और किस काग़ज़ पर।

1993 से 2023: योजनाएँ बनीं, खिड़की नहीं खुली

पायनियर ने यह इतिहास गिनाया है। 1993 में केंद्र सरकार ने पर्यटकों के ठहरने के लिए "पेइंग गेस्ट रेज़िडेंशियल एकोमोडेशन" योजना बनाई। 2000 में शीला दीक्षित सरकार ने दिल्ली की अपनी योजना मंज़ूर की, जिसमें पंजीकरण चार कमरों और आठ बिस्तरों तक सीमित था और शर्त थी कि मालिक उसी घर में रहे; पीजी का मूल विचार यही था, एक परिवार जो अपने घर में दो-चार मेहमान रखता है। 2019 में विधानसभा की एक समिति ने पीजी नियमों और उनकी कमियों के दस्तावेज़ माँगे; रिपोर्ट के मुताबिक़ वे दस्तावेज़ मिले ही नहीं। 2021 में उत्तरी नगर निगम ने नॉर्थ कैंपस के आसपास व्यावसायिक पीजी के सर्वे और पंजीकरण का प्रस्ताव रखा। 2022 में क़रीब 700 निजी छात्रावासों और पीजी को दिल्ली पुलिस के लाइसेंस के तहत लाने का प्रस्ताव आया, जिसमें क्षमता, रसोई, लिफ़्ट और अग्नि-मंज़ूरी की शर्तें थीं। 2023 में मुखर्जी नगर की आग के बाद निगम के सर्वे में 100 से ज़्यादा पीजी भवन उपनियम तोड़ते मिले। इन तीस सालों में किसी साल कोई ऐसी खिड़की नहीं खुली जहाँ पीजी का लाइसेंस बनता हो।

आग: किस इमारत को प्रमाणपत्र चाहिए

दिल्ली अग्निशमन सेवा नियम 2010 का नियम 27 उन इमारतों की सूची है जिन्हें अग्नि-सुरक्षा प्रमाणपत्र लेना होता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के एक फ़ैसले (विकास सिंह बनाम दिल्ली सरकार) में यह सूची शब्दशः उद्धृत की है। रिहायशी इमारत, होटल और गेस्टहाउस को छोड़कर: ऊँचाई 15 मीटर से ज़्यादा, या भूतल के ऊपर चार मंज़िलें, मेज़ानीन मिलाकर। होटल और गेस्टहाउस: ऊँचाई 12 मीटर से ज़्यादा, या भूतल के ऊपर तीन मंज़िलें। शिक्षा संस्थान की इमारत: 9 मीटर या तीन मंज़िल से ऊपर। सीमा इस बात से तय होती है कि इमारत किस श्रेणी में गिनी गई, और पीजी की कोई श्रेणी क़ानून में है ही नहीं।

पीजी घर है या गेस्टहाउस?

इसी सवाल पर प्रमाणपत्र की ज़रूरत टिकी है। भूतल के ऊपर तीन मंज़िलों वाली इमारत अगर "गेस्टहाउस" गिनी जाए तो उसे प्रमाणपत्र चाहिए; "रिहायशी" गिनी जाए तो नहीं। संचालक के लिए इमारत को घर कहना सुविधाजनक है: सीमा एक मंज़िल ऊपर खिसक जाती है। आपके लिए पूछने की बात यह है कि दमकल विभाग के काग़ज़ में इमारत की श्रेणी क्या दर्ज है, या यह कि उसके लिए कभी कोई काग़ज़ बना ही नहीं। जवाब जो भी हो, उसे लिखवा लीजिए; अगले दो अनुभागों में दोनों स्थितियों का रास्ता है।

फ़ॉर्म H, और उसके बाद हर साल फ़ॉर्म K

दिल्ली अग्निशमन सेवा की दमकल गाड़ी। नियम 27 में आने वाली इमारत का अग्नि-सुरक्षा प्रमाणपत्र इसी सेवा का निदेशक फ़ॉर्म H में जारी करता है, और 2025 के संशोधन के बाद उसे बनाए रखने के लिए हर साल फ़ॉर्म K जमा होता है।
तस्वीर: DiplomatTesterMan, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

नियम 35 के तहत दिल्ली अग्निशमन सेवा का निदेशक, या उसका अधिकृत अधिकारी, अग्नि-सुरक्षा उपायों की जाँच के बाद फ़ॉर्म H में अग्नि-सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी करता है। आपको यही फ़ॉर्म देखना है। एक बदलाव जान लीजिए: दिल्ली अग्निशमन सेवा (संशोधन) नियम 2025 ने प्रमाणपत्र के नवीनीकरण की ज़रूरत ख़त्म कर दी है। अब प्रमाणपत्र तब तक वैध रहता है जब तक अग्निशमन सेवा उसे निलंबित या रद्द न करे, शर्त यह कि हर साल फ़ॉर्म K जमा होता रहे। घोषणा फ़ॉर्म I में और निरीक्षण रिपोर्ट फ़ॉर्म J में ऑनलाइन जमा होती है। सो पुराना फ़ॉर्म H अकेला पर्याप्त नहीं; उसके साथ इस साल का फ़ॉर्म K माँगिए। वह न हो, तो वैधता की शर्त ही पूरी नहीं हो रही।

सीमा से नीचे की इमारत: तब काग़ज़ नहीं, आँखें

अगर इमारत नियम 27 की सीमा से नीचे है, तो क़ानून उससे प्रमाणपत्र माँगता ही नहीं, और आपके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं आएगा। भूतल के ऊपर तीन मंज़िल की रिहायशी इमारत इसी स्थिति में है। तब भी नियम 33 काम का है। उसमें "न्यूनतम अग्नि-सुरक्षा मानक" की बीस श्रेणियाँ हैं, जो बताती हैं कि दमकल विभाग किसी सुरक्षित इमारत में क्या देखता है: इमारत तक पहुँच, निकास, अग्निशामक यंत्र, स्वचालित आग-संसूचक, स्प्रिंकलर, भीतरी हाइड्रेंट, निकास के संकेत (सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में दर्ज सूची)। इनमें से जो चीज़ें बिना किसी उपकरण के दिखती हैं, वही अगले क़दम की सूची हैं।

सीढ़ियाँ और निकास: ख़ुद क्या देखें

नोएडा (उत्तर प्रदेश) में एक छात्रावास का प्रवेश-द्वार। निकास की जाँच यहीं से शुरू होती है: दरवाज़ा कितना चौड़ा है, रात में बाहर से बंद तो नहीं होता, और दूसरी सीढ़ी कहाँ है।
तस्वीर: Ashish Gupta from Noida, India, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

जून 2023 में मुखर्जी नगर के एक कोचिंग सेंटर में आग लगी थी और 200 से 250 छात्र रस्सियों के सहारे खिड़कियों से उतरे थे। रस्सी तब काम आती है जब सीढ़ी काम नहीं आती। इसलिए पीजी देखने जाएँ तो सीढ़ी पर चढ़कर देखिए। क्या दूसरी सीढ़ी है? क्या सीढ़ी छत तक खुली है, या ऊपर ताला लगा है? गलियारे में सिलेंडर, मोटरसाइकिल या सामान तो नहीं रखा? खिड़कियों और बालकनी पर ऐसी ग्रिल तो नहीं जो अंदर से खुलती ही न हो? मुख्य दरवाज़ा रात में बाहर से बंद तो नहीं होता? अग्निशामक यंत्र दिखते हैं या नहीं, और निकास का कोई संकेत? ये सब नियम 33 की उसी सूची के हिस्से हैं जिसे दमकल विभाग प्रमाणपत्र देने से पहले देखता है। फ़र्क़ बस इतना है कि सीमा से नीचे की इमारत में इसे देखने कोई नहीं आता। आप आते हैं।

सड़क से क्या दिखता है

प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) के जॉन्स्टन गंज की एक सड़क। इमारत की मंज़िलें गिनने का काम सड़क से ही शुरू होता है; नक़्शे से ज़्यादा मंज़िलें बाहर से गिनी जा सकती हैं, नींव नहीं।
तस्वीर: juggadery, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

सड़क पर खड़े होकर मंज़िलें गिनिए, मेज़ानीन और छत पर बने कमरे समेत, और नक़्शे की संख्या से मिलाइए। नीचे देखिए: बेसमेंट की खिड़कियाँ या नीचे उतरती सीढ़ी दिखे तो बेसमेंट उपयोग में है। दरवाज़े पर कैमरा है या नहीं; बेंगलुरु में बीबीएमपी हर प्रवेश और निकास पर सीसीटीवी और उसकी 90 दिन की रिकॉर्डिंग माँगता है, दिल्ली में ऐसा कोई नियम नहीं, पर माँगने से कोई रोकता भी नहीं। गेट पर गार्ड है या नहीं; बेंगलुरु की शर्त 24 घंटे की है। एक ही गेट है या दो। यह सब आप बिना किसी की इजाज़त के, अंदर गए बिना, दिन के उजाले में देख सकते हैं, और पीजी देखने अकेले नहीं, दिन में दो बार जाइए: एक बार जब संचालक साथ हो, एक बार जब न हो।

भीड़: एक व्यक्ति के हिस्से कितनी जगह

दिल्ली में इसका कोई अंक नहीं है। बेंगलुरु में है: बीबीएमपी के दिशा-निर्देश हर रहने वाले के लिए 70 वर्ग फ़ुट माँगते हैं। हिसाब लगाकर देखिए, यह सिर्फ़ एक उदाहरण है: तीन बिस्तरों वाले कमरे में कम से कम 210 वर्ग फ़ुट चाहिए, यानी क़रीब 14 गुणा 15 फ़ुट का कमरा; दो बिस्तरों के लिए 140 वर्ग फ़ुट, यानी 10 गुणा 14। जो कमरा दिखाया जाए, उसकी लंबाई-चौड़ाई क़दमों से नाप लीजिए और बिस्तर गिन लीजिए। दिल्ली में यह अंक आपका क़ानूनी हक़ नहीं है। यह एक कसौटी है जिस पर आप कमरा और किराया तौल सकते हैं, और करार में यह लिखवाया जा सकता है कि इस कमरे में कितने लोग रहेंगे।

बेंगलुरु की सूची: ट्रेड लाइसेंस से आगंतुक रजिस्टर तक

बेंगलुरु में पीजी को बीबीएमपी का ट्रेड लाइसेंस चाहिए। लाइसेंस के साथ शर्तें हैं: हर प्रवेश और निकास पर सीसीटीवी, जिसकी रिकॉर्डिंग 90 दिन रखी जाए; रसोई के लिए एफ़एसएसएआई का लाइसेंस; 24 घंटे गार्ड। पुलिस की अपनी सूची है: हर रहने वाले का पहचान-पत्र और फ़ोटो, किसी रक्त-संबंधी का फ़ोन नंबर, और आने-जाने वालों का लॉग। इस सूची का हर मद ऐसा है जिसे आप किसी भी शहर में पूछ सकते हैं। फ़र्क़ यह है कि बेंगलुरु में इनकार लाइसेंस की शर्त तोड़ता है, और दिल्ली में इनकार कुछ नहीं तोड़ता, क्योंकि कोई शर्त है ही नहीं। रसोई का लाइसेंस पूछने का एक कारण और है: पीजी का किराया अक्सर खाने समेत होता है, और खाना बनाने वाली जगह की जाँच उसी लाइसेंस से जुड़ी है।

2,320 नोटिस: लाइसेंस माँगने का असर

बीबीएमपी ने बिना लाइसेंस चल रहे 2,320 पीजी को बंद करने के नोटिस दिए और 856 की जाँच की। यह संख्या बताती है कि बेंगलुरु में ट्रेड लाइसेंस माँगना औपचारिकता नहीं है; जिसके पास नहीं है, वह उसी श्रेणी में है जिसे निगम बंद करने के नोटिस दे चुका है। यह भी कि नोटिस पीजी को मिलता है, रहने वाले को नहीं; पीजी बंद हुआ तो कमरा भी गया, और जमानत की रक़म वापस माँगने के लिए आपके पास वही काग़ज़ बचेगा जिस पर आपने दस्तख़त किए थे। बेंगलुरु में कमरा लेने से पहले लाइसेंस की प्रति देखना इसलिए किराये की रसीद जितना ही ज़रूरी है, और उसकी फ़ोटो अपने पास रखना भी।

गुरुग्राम: 453 पीजी, 218 अनुमतियाँ

हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) के सर्वे में गुरुग्राम के रिहायशी सेक्टरों में 453 पीजी और गेस्टहाउस मिले: एस्टेट ऑफ़िसर-I के इलाक़े में 121, एस्टेट ऑफ़िसर-II के इलाक़े में 332। शहर की 2021 की गेस्टहाउस नीति के तहत दी गई अनुमतियाँ सिर्फ़ 218 हैं (इंडियन एक्सप्रेस)। इसलिए गुरुग्राम में पहला सवाल दिल्ली से अलग है: यहाँ माँगने के लिए एक काग़ज़ है, 2021 की नीति के तहत मिली अनुमति। उसकी प्रति माँगिए। बिना अनुमति चल रहे पीजी को एचएसवीपी अधिनियम की धारा 17(3) के तहत नोटिस दिए गए हैं। अनुमति न हो और संचालक कहे कि "सब चलता है", तो 453 और 218 का फ़र्क़ याद रखिए: चलता ज़रूर है, पर नोटिस भी उसी को मिलता है।

गुरुग्राम में सील हुए कमरे

जनवरी 2026 में हरियाणा मानवाधिकार आयोग (जस्टिस ललित बत्रा) ने पीजी की सुरक्षा पर स्वतः संज्ञान लिया। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने नवंबर 2025 में कार्रवाई पर जो रोक लगाई थी, वह 29 मई 2026 को सीमित कर दी गई। उसके बाद 18 से 20 जून और 3 से 4 जुलाई 2026 को नगर एवं ग्राम आयोजना विभाग (डीटीसीपी) ने डीएलएफ़ फ़ेज़-3 में 15 पीजी और 3 गेस्टहाउस सील किए: 476 कमरे पीजी के, 87 गेस्टहाउस के। सील का अर्थ रहने वाले के लिए भी वही है जो संचालक के लिए: कमरा बंद। जिसने उन कमरों का किराया पहले से दे रखा था, उसके पास उस दिन से सिर्फ़ अपना करार बचा।

करार: मॉडल टेनेंसी एक्ट क्या देता है

2 जून 2021 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मॉडल टेनेंसी एक्ट मंज़ूर किया, इस शर्त के साथ कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश इसे अपनाएँ: नया क़ानून बनाकर या अपने किराया क़ानूनों में संशोधन करके (पीआईबी की विज्ञप्ति)। यह मॉडल है, राज्यों पर बाध्यकारी नहीं; जिस राज्य ने नहीं अपनाया, वहाँ लागू नहीं (लाइव लॉ)। जहाँ लागू है, वहाँ इसके प्रावधान ये हैं। किरायेदारी का करार लिखित होगा। मकान-मालिक और किरायेदार दोनों मिलकर दो महीने के भीतर किराया प्राधिकरण (रेंट अथॉरिटी) को उसकी सूचना देंगे। रिहायशी परिसर में जमानत दो महीने के किराये से ज़्यादा नहीं होगी, ग़ैर-रिहायशी में छह महीने से ज़्यादा नहीं। मकान-मालिक मरम्मत या निरीक्षण के लिए आने से 24 घंटे पहले लिखित या इलेक्ट्रॉनिक सूचना देगा। रेंट अथॉरिटी डिप्टी कलेक्टर से नीचे का अधिकारी नहीं होगा; उसके फ़ैसले की अपील रेंट कोर्ट में और फिर रेंट ट्रिब्यूनल में होगी।

पीजी का काग़ज़ किरायेदारी है या नहीं

क़ानून में पीजी की कोई श्रेणी नहीं है, और मॉडल टेनेंसी एक्ट "मकान-मालिक" और "किरायेदार" की बात करता है। पीजी में जो काग़ज़ आपके सामने रखा जाता है, वह किरायेदारी का करार है या नहीं, यह उसके शब्दों पर टिका है; अक्सर वह नहीं होता। इसलिए जो चीज़ें मॉडल क़ानून किरायेदार को देता है, उन्हें अपने काग़ज़ में लिखवाइए: जमानत की रक़म, उसकी वापसी की शर्त और समय; मासिक रक़म और उसमें क्या शामिल है, खाना, बिजली, इंटरनेट; कमरे में कितने लोग रहेंगे; संचालक या मालिक कमरे में कितनी सूचना पर आएगा; छोड़ने का नोटिस दोनों तरफ़ से कितना; और हर भुगतान की रसीद। दस्तख़त दोनों के हों, तारीख़ हो, और एक प्रति आपके पास रहे। जो लिखा नहीं गया, वह माँगा नहीं जा सकेगा।

जमानत: दो महीने की सीमा किस पर लागू है

यह सीमा उस राज्य में है जिसने मॉडल क़ानून अपनाया हो, और उस काग़ज़ पर जो रिहायशी किरायेदारी का करार हो। इनमें से एक भी न हो, तो दो महीने की सीमा क़ानूनी हक़ नहीं, बातचीत का आधार है। पर आधार मज़बूत है: केंद्र सरकार का अपना मॉडल क़ानून कहता है कि रिहायशी परिसर में जमानत दो महीने के किराये से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। ग़ैर-रिहायशी की सीमा भी याद रखिए: अगर संचालक कहे कि पीजी "व्यावसायिक" है, तो उसी क़ानून में ग़ैर-रिहायशी जमानत भी छह महीने पर रुकती है। और जहाँ यह क़ानून लागू है, वहाँ दो महीने के भीतर रेंट अथॉरिटी को दी गई सूचना से आपकी किरायेदारी का सरकारी रिकॉर्ड बनता है, जो किसी पीजी का कभी नहीं बनता।

कुछ ग़लत दिखे तो किसके पास जाएँ

दिल्ली में इमारत के उल्लंघन नगर निगम के पास जाते हैं: भवन उपनियम उसी के हैं, और हाई कोर्ट ने उसे अपने क्षेत्र के सभी पीजी और छात्रावासों का ऑडिट एक हफ़्ते में करने और पीजी पर लागू वैधानिक नियम स्पष्ट करने को कहा है। आग से जुड़ी शिकायत दिल्ली अग्निशमन सेवा के पास: प्रमाणपत्र वही देती है और वही उसे निलंबित या रद्द करती है। अपराध या धमकी पुलिस के पास। बेंगलुरु में लाइसेंस और बंदी के नोटिस बीबीएमपी के हैं, पहचान और आगंतुक के नियम पुलिस के। गुरुग्राम में सील करने की कार्रवाई डीटीसीपी की है, नोटिस एचएसवीपी के, और मानवाधिकार आयोग मामले की सुनवाई कर रहा है। शिकायत से पहले यह तय कर लीजिए कि आपकी शिकायत इमारत की है, आग की है या व्यवहार की; दफ़्तर उसी से तय होता है।

अदालतें: नियम बदल सकते हैं

हाई कोर्ट की पीठ ने सुनवाई में यह भी कहा: "यह छात्रावासों की नितांत अपर्याप्त संख्या के कारण है", और सरकार से: "आप अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते।" पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पूछा है कि बाहर से आए छात्र कितने हैं और छात्रावास की क्षमता कितनी। सितंबर 2026 में ही सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने, तमिलनाडु के भू-उपयोग के एक मामले (लोगनाथन बनाम तमिलनाडु राज्य) में, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का यह अनुरोध ठुकरा दिया कि हाई कोर्ट को अलग से चलने दिया जाए: "इसे अखिल भारतीय आधार पर होना होगा।" पीजी के नियम आगे किस अदालत से और किस रूप में आएँगे, यह वहीं तय होगा। जब तक नहीं आते, ऊपर लिखा क्रम ही है।

जो काग़ज़ आपको नहीं मिलेंगे

दिल्ली में पीजी का लाइसेंस, पीजी का रजिस्टर, प्रति व्यक्ति जगह का कोई अंक, किराये का कोई बैंड और शिकायत का कोई पीजी-विशेष पोर्टल: इनमें से कुछ भी अभी नहीं है। 2019 में विधानसभा की समिति को भी नियमों के काग़ज़ नहीं मिले थे; संचालक से उनकी उम्मीद रखने का कोई आधार नहीं है। जो मिल सकता है, उसकी प्रति फ़ोन में रखिए: नक़्शा, फ़ॉर्म H, फ़ॉर्म K, करार, रसीदें, और गुरुग्राम में 2021 की अनुमति या बेंगलुरु में ट्रेड लाइसेंस। कुछ हुआ तो पहला सवाल यही होगा कि इमारत का काग़ज़ किसके पास है, और दूसरा यह कि आपने किराया किसे, कब और किस काग़ज़ पर दिया।

दिल्ली की घोषित नीति: घोषित, लागू नहीं

सितंबर 2026 में दिल्ली के शहरी विकास मंत्री आशीष सूद ने कहा: "हम अगले एक से दो महीनों में एक व्यापक पीजी नीति लाएँगे।" घोषित रूपरेखा में पीजी का लाइसेंस, ज़ोन के हिसाब से किराये के बैंड, इमारत के ढाँचे और आग का ऑडिट, "GovPG" नाम का पोर्टल, और छात्रावासों के लिए ज़्यादा एफ़एआर (फ़्लोर एरिया रेशियो) शामिल हैं; पायनियर के मुताबिक़ मंत्री ने मौजूदा छात्रावासों के पुनर्विकास की बात भी कही। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सार्वजनिक गतिविधि वाली हर इमारत के आवधिक संरचना-ऑडिट की बात कही है। यह सब घोषणा है। जब तक नीति अधिसूचित होकर लागू नहीं होती, इनमें से कोई चीज़ माँगी नहीं जा सकती; लाइसेंस की जो खिड़की 1993 से नहीं खुली, वह इस घोषणा से भी अभी नहीं खुली है।

आख़िरी अपडेट: सितंबर 2026। दिल्ली की पीजी नीति अधिसूचित होने पर यह लेख संशोधित होगा।

स्रोतलेक्सप्लोज़न, दिल्ली अग्निशमन सेवा (संशोधन) नियम 2025 पर अनुपालन-नोट: नियम 27 की श्रेणियाँ, फ़ॉर्म H और सालाना फ़ॉर्म K, जून 2026, सुप्रीम कोर्ट, विकास सिंह बनाम दिल्ली सरकार, 11 अगस्त 2022 (इंडियन कानून पर पाठ), जिसमें दिल्ली अग्निशमन सेवा नियम 2010 के नियम 27, 33 और 35 उद्धृत हैं, द पायनियर, दिल्ली में पीजी नियमन का इतिहास और नगर निगम का रुख़, 8 सितंबर 2026, पीटीआई (तेलंगाना टुडे), दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई और निर्देश, 7 सितंबर 2026, पत्र सूचना कार्यालय, मॉडल टेनेंसी एक्ट को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंज़ूरी, 2 जून 2021, पत्र सूचना कार्यालय, वही विज्ञप्ति हिंदी में, 2 जून 2021, लाइव लॉ, मॉडल टेनेंसी एक्ट 2021 के प्रावधान: जमानत की सीमा, रेंट अथॉरिटी, अपील, 23 जून 2021, लाइव लॉ, मॉडल टेनेंसी एक्ट पर स्तंभ: लिखित करार, 24 घंटे का नोटिस, 16 जुलाई 2021, इंडियन एक्सप्रेस, गुरुग्राम के 453 पीजी, 2021 की गेस्टहाउस नीति और सीलिंग, 8 सितंबर 2026, लाइव लॉ, सुप्रीम कोर्ट में पीजी और छात्रावासों के निरीक्षण पर अमाइकस की रिपोर्ट, सितंबर 2026

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