भारत पन्ना
हिसाब-किताब

जेएनयू अपने आधे से ज़्यादा छात्रों को कमरा देता है, डीयू सौ में एक को

दिल्ली विश्वविद्यालय के अपने दाख़िले के मुताबिक़ उसके यहाँ सात लाख छात्र हैं और साढ़े तीन लाख बाहर से आए हैं। उसके हॉस्टलों में सात हज़ार बिस्तर हैं। जिन्हें बिस्तर मिलता है वे साल का तेरह हज़ार देते हैं, जिन्हें नहीं मिलता वे महीने का चौदह हज़ार।

दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर का एक कॉलेज। सत्य निकेतन इसी परिसर के पास का मोहल्ला है
तस्वीर: Direct M, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

दिल्ली विश्वविद्यालय अपने आवेदन में लिखता है कि उसके यहाँ सात लाख छात्र पढ़ते हैं।

यह संख्या विश्वविद्यालय ने ख़ुद दी है, राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढाँचे को भेजे गए दाख़िले में। उसी दाख़िले में एक दूसरी संख्या है: इनमें से साढ़े तीन लाख छात्र दिल्ली के बाहर से आते हैं। यानी हर दूसरा छात्र किसी और शहर, किसी और राज्य से आकर यहाँ पढ़ रहा है।

विश्वविद्यालय के अपने हॉस्टलों में सात हज़ार बिस्तर हैं।

बाक़ी सब कहीं और रहते हैं।

दो संख्याओं के बीच की जगह

सात हज़ार को साढ़े तीन लाख से भाग दीजिए तो दो फ़ीसदी आता है। कॉलेजों के अपने हॉस्टल जोड़ लें तो कुल बिस्तर नौ हज़ार के आसपास पहुँचते हैं और अनुपात ढाई फ़ीसदी हो जाता है। कुल छात्र संख्या के मुक़ाबले देखें तो यह एक फ़ीसदी से थोड़ा ऊपर बैठता है।

तीनों गिनतियाँ अलग-अलग जगह छपी हैं और तीनों में मामूली फ़र्क़ है। जो फ़र्क़ नहीं है वह पैमाना है। किसी भी हिसाब से, सौ में से सत्तानवे छात्र विश्वविद्यालय की छत के नीचे नहीं सोते।

इस संख्या का मतलब तब खुलता है जब इसे किसी और के साथ रखकर देखें।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में क़रीब दस हज़ार छात्र हैं और साढ़े पाँच हज़ार हॉस्टल बिस्तर। यानी वहाँ आधे से ज़्यादा छात्र परिसर के भीतर रहते हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में यह अनुपात पंद्रह फ़ीसदी है।

तीनों दिल्ली में हैं। तीनों केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। तीनों को एक ही आयोग से पैसा मिलता है।

कॉलेजों के हॉस्टल कितने बड़े हैं

दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज अपने-अपने हॉस्टल चलाते हैं, और उनकी क्षमता सार्वजनिक है।

मिरांडा हाउस में 370 सीटें हैं। सेंट स्टीफ़ंस में 400। लेडी श्री राम में 300। हिंदू कॉलेज, हंसराज और दौलत राम में दो-दो सौ। गार्गी, श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स और किरोड़ीमल में डेढ़-डेढ़ सौ।

ये विश्वविद्यालय के सबसे बड़े कॉलेज हॉस्टल हैं। इन नौ को जोड़िए तो 2,120 बिस्तर बनते हैं।

सत्य निकेतन में रविवार को जो पाँच मंज़िला इमारत गिरी, उसमें क़रीब पचहत्तर छात्र रहते थे।

यानी दिल्ली विश्वविद्यालय के सबसे बड़े नौ कॉलेज हॉस्टल मिलकर उतने छात्रों को जगह देते हैं जितने अट्ठाईस ऐसी इमारतों में रहते हैं।

और अब क़ीमत देखिए

श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स का परिसर। इसके हॉस्टल में डेढ़ सौ सीटें हैं
तस्वीर: जगन्नाथ महाप्रभु 2006, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अब तक की बात जगह की थी। असल फ़र्क़ पैसे में है, और उस पर बात कम होती है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टल का शुल्क बारह से साढ़े तेरह हज़ार रुपये साल का है। कुछ हॉस्टलों में यह इससे ऊपर जाता है और भोजन शुल्क मिलाकर महीने का चार से दस हज़ार तक पहुँचता है, पर बड़े हिस्से में यह सालाना आँकड़ा ही चलता है, और उसका एक हिस्सा जमानत राशि के तौर पर लौट भी आता है।

सत्य निकेतन में दो लोगों के साझा कमरे का किराया चौदह हज़ार रुपये महीना है। बिजली और पानी अलग। खाना अपने इंतज़ाम से।

मुखर्जी नगर में अकेले कमरे का किराया तीस से चालीस हज़ार महीना है और साझा कमरे का दस से बीस हज़ार।

एक साल का हिसाब लगाइए। हॉस्टल में रहने वाला छात्र तेरह हज़ार के आसपास देता है। सत्य निकेतन में रहने वाला एक लाख अड़सठ हज़ार।

फ़र्क़ बारह गुना से ज़्यादा का है।

जो बिस्तर मिलता है वह सिर्फ़ छत नहीं है

इसका मतलब यह है कि हॉस्टल की सीट सिर्फ़ रहने की जगह नहीं, एक बड़ी आर्थिक रियायत है। जिस छात्र को वह मिल जाती है, उसकी पढ़ाई की कुल लागत उस छात्र से बहुत कम रह जाती है जिसे नहीं मिलती, चाहे दोनों एक ही कक्षा में बैठते हों।

और सीटें ज़्यादातर मेरिट पर बँटती हैं। यानी जिसके नंबर ज़्यादा हैं उसे सस्ता रहना मिलता है, और जिसके कम हैं उसे महँगा। यह उलटा है उस चीज़ से जो एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय से उम्मीद की जाती है, जहाँ रियायत ज़रूरत से जुड़नी चाहिए।

मुखर्जी नगर में एक और शर्त है जो इस फ़र्क़ को और गहरा करती है। कमरा लेते वक़्त छह महीने का किराया अग्रिम जमा कराना पड़ता है, जो एक से डेढ़ लाख रुपये बैठता है।

यह रक़म दाख़िले से पहले चाहिए, पढ़ाई शुरू होने से पहले, किसी छात्रवृत्ति के आने से बहुत पहले।

जिस परिवार के पास वह डेढ़ लाख नहीं है, उसके बच्चे के लिए दिल्ली में दाख़िला मिल जाना पूरा नहीं पड़ता।

बाक़ी साढ़े तीन लाख कहाँ हैं

उत्तरी परिसर के छात्र मुखर्जी नगर, विजय नगर और कमला नगर में रहते हैं। दक्षिणी परिसर के छात्र सत्य निकेतन, मुनिरका और बेर सराय में।

ये मोहल्ले पेइंग गेस्ट के मोहल्ले हैं। एक कमरे में दो या तीन छात्र, एक इमारत में दस से बीस कमरे, और पूरी इमारत एक मकान मालिक की।

किराया नक़द लिया जाता है और रसीद नहीं दी जाती।

यह आख़िरी बात इस पूरे लेख की धुरी है।

जिसकी रसीद नहीं, उसका रजिस्टर भी नहीं

अगर किराया नक़द है और रसीद नहीं है, तो कहीं कोई काग़ज़ नहीं बनता।

किरायेदारी का अनुबंध नहीं होता, इसलिए छात्र का नाम किसी सूची में नहीं चढ़ता। मकान मालिक किराये को आमदनी नहीं दिखाता, इसलिए आयकर विभाग के पास इमारत का कोई ब्योरा नहीं जाता। इमारत को व्यावसायिक इस्तेमाल में दर्ज नहीं कराया जाता, इसलिए नगर निगम के रिकॉर्ड में वह अब भी रिहायशी मकान है।

नतीजा यह कि दिल्ली में कितनी इमारतों में छात्र पेइंग गेस्ट के तौर पर रहते हैं, इसका कोई आँकड़ा किसी के पास नहीं है।

नगर निगम के पास नहीं, क्योंकि उसके काग़ज़ में वे घर हैं। विश्वविद्यालय के पास नहीं, क्योंकि वे उसके परिसर से बाहर हैं। पुलिस के पास नहीं, क्योंकि किरायेदार सत्यापन इन इमारतों में नियम से नहीं होता।

जिस चीज़ की गिनती नहीं होती, उसका निरीक्षण भी नहीं होता। और जिस इमारत में एक मकान की मंज़ूरी पर बीस कमरे चल रहे हों, उसका ढाँचा उस भार के लिए कभी जाँचा ही नहीं गया।

पेइंग गेस्ट पर क़ानून कौन सा लगता है

यहाँ एक सीधा सवाल है जिसका जवाब असहज करता है। दिल्ली में पेइंग गेस्ट चलाने के लिए कौन सा लाइसेंस चाहिए।

कोई नहीं।

दिल्ली में पेइंग गेस्ट आवास के लिए कोई अलग क़ानून नहीं है। न पंजीकरण अनिवार्य है, न कमरे में कितने लोग रह सकते हैं इसकी कोई सीमा, न आग से बचाव के उपकरणों की कोई शर्त जो होटल या छात्रावास पर लगती है। एक मकान मालिक अपने रिहायशी मकान में बीस छात्र रख सकता है और क़ानून की नज़र में वह अब भी मकान मालिक है, कारोबारी नहीं।

होटल के लिए लाइसेंस चाहिए। धर्मशाला के लिए चाहिए। छात्रावास के लिए चाहिए। पेइंग गेस्ट के लिए नहीं चाहिए, क्योंकि क़ानून में वह श्रेणी ही नहीं है।

कुछ राज्यों ने यह ख़ाली जगह भरने की कोशिश की है। कर्नाटक और तेलंगाना में पेइंग गेस्ट के पंजीकरण और न्यूनतम शर्तों पर नियम बनाने की कोशिशें हुई हैं, ज़्यादातर किसी हादसे के बाद। दिल्ली में वह भी नहीं है।

अदालत ने विश्वविद्यालय का नाम लिया

हादसे के अगले दिन दिल्ली हाईकोर्ट ने जो कहा, उसमें एक बात ग़ौर करने लायक़ है।

अदालत ने ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मकान मालिक और नगर निगम पर नहीं डाली। उसने दिल्ली विश्वविद्यालय का नाम भी लिया।

यह असामान्य है। विश्वविद्यालय ने वह इमारत न बनाई थी, न किराये पर दी थी, न उसका निरीक्षण करना उसका काम था। अदालत की बात का मतलब उससे आगे का है, और वही इस लेख का विषय है। जो संस्था हर साल साढ़े तीन लाख बच्चों को दूसरे शहरों से बुलाती है और उनमें से सत्तानवे फ़ीसदी के लिए कोई इंतज़ाम नहीं रखती, वह उस इंतज़ाम से पूरी तरह अलग नहीं हो सकती जो उसकी जगह बाज़ार ने कर दिया।

अंकगणित को उलटकर देखिए

मान लीजिए हर इमारत में पचहत्तर छात्र रहते हैं, जितने उस गिरी हुई इमारत में थे।

साढ़े तीन लाख बाहरी छात्रों में से नौ हज़ार हॉस्टल में हैं। बाक़ी तीन लाख इकतालीस हज़ार बचते हैं। इन्हें पचहत्तर से भाग दीजिए।

क़रीब साढ़े चार हज़ार इमारतें।

यह अनुमान मोटा है और इसे मोटा ही रहने देना चाहिए, क्योंकि कुछ छात्र परिवार के साथ रहते हैं, कुछ अकेले फ़्लैट किराये पर लेते हैं, कुछ रोज़ आते-जाते हैं। पर पैमाने का अंदाज़ा इससे मिल जाता है। दिल्ली में हज़ारों ऐसी इमारतें हैं जिनमें छात्र रहते हैं और जिनका किसी सूची में नाम नहीं है।

विश्वविद्यालय क्या बना रहा है

दिल्ली विश्वविद्यालय ने मुखर्जी नगर के ढाका परिसर में एक नया हॉस्टल शुरू किया है। उसकी क्षमता 1,436 छात्रों की बताई गई है, और वह श्रेष्ठता संस्थान योजना के पैसे से बन रहा है।

यह अब तक बने किसी भी कॉलेज हॉस्टल से बड़ा है, सेंट स्टीफ़ंस से तीन गुना से ज़्यादा।

पूरा बन जाने पर विश्वविद्यालय के बिस्तर सात हज़ार से बढ़कर साढ़े आठ हज़ार हो जाएँगे। बाहरी छात्रों के मुक़ाबले अनुपात दो फ़ीसदी से बढ़कर ढाई फ़ीसदी हो जाएगा।

एक इमारत, जो अपनी श्रेणी में सबसे बड़ी है, इस अनुपात को आधा फ़ीसदी हिलाती है।

यह कमी कब से है

भारत का एक पुराना विश्वविद्यालय भवन। दिल्ली विश्वविद्यालय 1922 में तीन कॉलेजों और साढ़े सात सौ छात्रों के साथ शुरू हुआ था
तस्वीर: Biswarup Ganguly, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

दिल्ली विश्वविद्यालय 1922 में बना और तब उसमें तीन कॉलेज और सात सौ पचास छात्र थे। हॉस्टल उसी ढाँचे के हिसाब से बने, जिसमें विश्वविद्यालय एक आवासीय संस्था था और छात्र परिसर में रहते थे।

छात्र संख्या सौ साल में लगभग एक हज़ार गुना हुई है।

हॉस्टल उस रफ़्तार से नहीं बने। बनते भी तो कहाँ बनते, यह एक अलग सवाल है, क्योंकि दोनों परिसरों के आसपास की ज़मीन दिल्ली की सबसे महँगी ज़मीनों में है।

तो जो चीज़ नहीं बनी उसकी जगह बाज़ार ने भर दी। मुखर्जी नगर और सत्य निकेतन कोई योजना नहीं हैं। वे उस ख़ाली जगह का नतीजा हैं जो विश्वविद्यालय ने छोड़ी, और उस ख़ाली जगह में क़ीमत तय करने वाला कोई नियम नहीं है।

दो अलग समस्याएँ, जिन्हें एक मान लिया जाता है

इमारत का गिरना एक समस्या है। उसका जवाब निरीक्षण, ढाँचागत ऑडिट और निर्माण नियमों का पालन है।

छात्रों का वहाँ रहना दूसरी समस्या है। उसका जवाब बिस्तर हैं।

पहली समस्या पर कार्रवाई तेज़ होती है और दिखती है। हादसे के अगले दिन नगर निगम ने पाँच अधिकारी निलंबित किए और आसपास की चार इमारतों को नोटिस दिया।

दूसरी समस्या पर कार्रवाई का पैमाना अलग है। ढाई फ़ीसदी को पचास फ़ीसदी तक ले जाने का मतलब है लगभग पौने दो लाख नए बिस्तर। जेएनयू के पूरे हॉस्टल तंत्र का बत्तीस गुना।

इसीलिए पहली समस्या पर बात होती रहती है और दूसरी पर नहीं।

उस पैसे से क्या मिलता है

चौदह हज़ार महीना देकर छात्र को क्या मिलता है, इस पर मुखर्जी नगर से आई रिपोर्टें एक जैसी बात कहती हैं। कमरे छोटे हैं, अक्सर बिना खिड़की के। भोजन की गुणवत्ता पर शिकायतें लगातार हैं। एक कमरे में तय संख्या से ज़्यादा बिस्तर लगाना आम है, क्योंकि किराया प्रति बिस्तर लिया जाता है और कमरा जितना भरेगा उतनी आमदनी बढ़ेगी।

यह मकान मालिक की नीयत का सवाल नहीं है। यह उस बाज़ार की बनावट का सवाल है जिसमें माँग तय है, आपूर्ति सीमित है, और गुणवत्ता पर कोई न्यूनतम शर्त लागू नहीं होती। ऐसे बाज़ार में क़ीमत ऊपर जाती है और सुविधा नीचे, और दोनों एक साथ होते हैं।

छात्र दूसरी जगह नहीं जा सकता, क्योंकि दूसरी जगह भी यही है। और वह शिकायत नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास यह साबित करने का कोई काग़ज़ नहीं है कि वह वहाँ रहता भी है।

यह अकेले दिल्ली की बात नहीं है

हैदराबाद के नालसार विश्वविद्यालय का प्रवेश द्वार। हैदराबाद, पुणे और बेंगलुरु में भी छात्र इसी ढाँचे में रहते हैं
तस्वीर: अंजनेयदास, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

कोटा में कोचिंग के छात्र इसी ढाँचे में रहते हैं। पुणे, बेंगलुरु और हैदराबाद में इंजीनियरिंग और सूचना प्रौद्योगिकी के छात्र इसी में। इलाहाबाद और पटना में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले इसी में।

हर जगह वही तीन चीज़ें साथ मिलती हैं। संस्थान के पास अपने छात्रों के लिए जगह नहीं। आसपास के मोहल्लों में मकान मालिकों का एक अनौपचारिक बाज़ार। और उस बाज़ार का कोई सरकारी रजिस्टर नहीं।

तीसरी चीज़ पहली दो का नतीजा है, और वही सबसे ज़्यादा नुक़सान करती है। बिस्तर बनने में साल लगते हैं। रजिस्टर बनने में नहीं लगते।

जो संख्या अभी भी किसी के पास नहीं है

इस लेख की हर संख्या किसी न किसी के अपने दाख़िले से आई है। सात लाख और साढ़े तीन लाख विश्वविद्यालय ने ख़ुद बताए। सात हज़ार बिस्तर उसकी अपनी सूची से हैं। कॉलेजों की क्षमताएँ उनकी अपनी हैं। जेएनयू और जामिया के अनुपात उनके अपने आँकड़ों से। किराये उन मोहल्लों में छपी रिपोर्टों से।

एक संख्या ऐसी है जो किसी के पास नहीं है, और वही सबसे ज़रूरी है।

दिल्ली में कितनी इमारतों में छात्र पेइंग गेस्ट बनकर रहते हैं, और उनमें से कितनी पचास साल से पुरानी हैं।

वह संख्या इसलिए नहीं है कि उसे कभी माँगा नहीं गया। और उसे इसलिए नहीं माँगा गया कि जिस बाज़ार की वह गिनती होती, वह पूरा का पूरा रसीद के बिना चलता है।

स्रोतनेशनल हेराल्ड, डीयू के हॉस्टल आँकड़ों पर, 7 सितंबर 2026, मुखर्जी नगर के पेइंग गेस्ट किरायों पर रिपोर्ट, 7 सितंबर 2026, एनआईआरएफ़ रैंकिंग, विश्वविद्यालयों के अपने दाख़िले, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, हॉस्टल सूची, डीयू के नए हॉस्टल निर्माण पर रिपोर्ट

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