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दिल्ली का पीजी लाइसेंस 90 दिन में बनना है, पर 'लॉजिंग हाउस' का लाइसेंस 1957 के क़ानून में पहले से लिखा है

सत्य निकेतन में एक निजी छात्रावास गिरने के बाद दिल्ली सरकार का मसौदा विधेयक हर पीजी इमारत से 90 दिन में नगर निगम के ज़ोनल अधिकारी का लाइसेंस माँगता है। दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की ग्यारहवीं अनुसूची में 'लॉजिंग हाउस रखना' उन्हीं कामों में गिना गया है जो बिना लाइसेंस नहीं हो सकते। पीजी को नियम के दायरे में लाने की कोशिशें 1993 से चल रही हैं।

दिल्ली के करावल नगर की एक गली, दोनों तरफ़ सटी हुई इमारतें और ऊपर से गुज़रते तार (यह तस्वीर 2016 की है)। मसौदे के हिसाब से ऐसी ही इमारतों में चलने वाले हर पीजी को 90 दिन में लाइसेंस लेना होगा
तस्वीर: urbzoo, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की ग्यारहवीं अनुसूची के पहले हिस्से में क्रम संख्या 15 पर एक पंक्ति दर्ज है: "Lodging house. Keeping a"। यह उन कामों की सूची है जिनके लिए कोई परिसर आयुक्त के लाइसेंस बिना इस्तेमाल नहीं हो सकता। अधिनियम की धारा 417 उस सूची को लागू करती है।

उनहत्तर साल से यह प्रावधान क़ानून की किताब में है।

अब दिल्ली सरकार एक मसौदा विधेयक तैयार कर रही है, जिसका नाम रिपोर्टों में "पेइंग गेस्ट अकोमोडेशन रेगुलेशन एंड वेलफ़ेयर बिल" बताया गया है। इसका सबसे प्रचारित प्रावधान यह है कि हर पीजी इमारत को 90 दिन के भीतर नगर निगम के ज़ोनल अधिकारी से लाइसेंस, स्थानीय पुलिस से मंज़ूरी, और ढाँचे तथा आग की सुरक्षा का एनओसी लेना होगा। हर प्रतिष्ठान को PGRN नाम की पंजीकरण संख्या मिलेगी और उसका नाम एक सार्वजनिक पोर्टल पर होगा।

यानी जो अधिकार 1957 से मौजूद है, उसे 2026 में एक नए विधेयक से दोबारा गढ़ा जा रहा है।

लाइसेंस किसके दफ़्तर से आएगा

नई दिल्ली के मिंटो रोड पर दिल्ली नगर निगम का मुख्यालय, सिविक सेंटर। लाइसेंस यहाँ से नहीं, निगम के बारह ज़ोन में से किसी एक के दफ़्तर से आना है
तस्वीर: Harrasis, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

"नगर निगम का ज़ोनल अधिकारी" कोई नया पद नहीं है। दिल्ली नगर निगम 12 ज़ोन में बँटा है और हर ज़ोन का प्रशासन एक उपायुक्त के हाथ में रहता है। इन ज़ोन के नाम इसी साल बदले गए। 9 अप्रैल 2026 को निगम की स्थायी समिति ने उन्हें राजस्व ज़िलों से मिलाने का प्रस्ताव पास किया: नरेला अब आउटर नॉर्थ, सिविल लाइंस अब नॉर्थ, करोल बाग अब सिटी सदर पहाड़गंज, नजफ़गढ़ अब साउथ वेस्ट। साउथ और वेस्ट के नाम वही रहे। समिति की अध्यक्ष सत्या शर्मा ने इसे प्रशासनिक उलझन घटाने का क़दम बताया।

जिस ज़ोन का उपायुक्त निलंबित हुआ, लाइसेंस उसी ज़ोन से

7 सितंबर को मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने निगम के पाँच अधिकारियों के निलंबन का आदेश दिया। सभी साउथ ज़ोन के थे: उपायुक्त राकेश कुमार, अधीक्षण अभियंता रणवीर सिंह, कार्यपालक अभियंता ललित कुमार गोयल, सहायक अभियंता सुनील चौहान और कनिष्ठ अभियंता आशीष कुमार। मसौदे में लाइसेंस देने की ज़िम्मेदारी उसी दफ़्तर पर डाली जा रही है जिसका मुखिया हादसे के बाद निलंबित हुआ। उसी दिन दिल्ली भर में अनधिकृत पाँचवीं मंज़िल वाली इमारतों को सील करने का आदेश भी हुआ।

धारा 417 वह करती है जो विधेयक करने जा रहा है

धारा 417 की भाषा सीधी है। कोई व्यक्ति किसी परिसर का इस्तेमाल ग्यारहवीं अनुसूची के पहले हिस्से में गिनाए कामों के लिए नहीं करेगा, न ही ऐसे कामों के लिए जो जीवन, स्वास्थ्य या संपत्ति के लिए ख़तरनाक हों, जब तक आयुक्त का लाइसेंस न हो। उस सूची में ईटिंग हाउस, हेयर ड्रेसिंग सैलून, लॉन्ड्री और प्रिंटिंग प्रेस के साथ लॉजिंग हाउस भी है। उपधारा 3 निगम को लाइसेंस-शुल्क की दर तय करने का अधिकार देती है। यह धारा 2004 और 2011 में संशोधित हुई।

स्वास्थ्य व्यापार लाइसेंस में लॉजिंग पहले से दर्ज है

निगम इस अधिकार को स्वास्थ्य व्यापार लाइसेंस के रूप में चलाता है। निगम के नागरिक चार्टर में लाइसेंस की श्रेणी C में खाने-पीने के प्रतिष्ठानों के साथ लॉजिंग, बोर्डिंग, गेस्ट हाउस, स्पा, स्विमिंग पूल और सिनेमा गिनाए गए हैं। श्रेणी A और B में शुल्क जमा करते ही लाइसेंस जारी हो जाता है, श्रेणी C में नामित अधिकारी की मंज़ूरी ज़रूरी है। आवेदन शुल्क 1,000 रुपये है। छात्रावास या पीजी इस सूची में अलग से दर्ज नहीं है।

1993 की योजना पर्यटकों के लिए बनी थी

पीजी को व्यवस्था में लाने की पहली कोशिश 1993 की है। केंद्र सरकार ने "पेइंग गेस्ट रेज़िडेंशियल अकोमोडेशन" नाम की योजना बनाई थी, जिसका मक़सद विदेशी और घरेलू पर्यटकों को सस्ता और साफ़ ठिकाना देना था। शर्त यह थी कि जो व्यक्ति योजना का लाभ ले, वह उसी इमारत में रहता हो। दिसंबर 1993 में साउथ एक्सटेंशन पार्ट-1 की एक संपत्ति को इसके तहत पेइंग गेस्ट रखने की अनुमति मिली। यह ब्योरा 2006 के एक उच्च न्यायालय के फ़ैसले में दर्ज है।

2000 में दिल्ली सरकार ने अपनी योजना बनाई

योजना की ज़िम्मेदारी बाद में दिल्ली सरकार को मिली और 2000 में शीला दीक्षित की सरकार ने अपनी "पेइंग गेस्ट रेज़िडेंशियल अकोमोडेशन स्कीम" मंज़ूर की। मकान मालिक दिल्ली पर्यटन में पंजीकरण करा सकते थे। ऊपरी सीमा चार कमरे या आठ बिस्तर थी, और घर के आधे से ज़्यादा शयनकक्ष इस काम में नहीं लगाए जा सकते थे। यह ढाँचा उस शहर के लिए बना था जहाँ मालिक अपने ही घर में दो-चार मेहमान रखता हो। सत्य निकेतन में जो इमारत गिरी, उसमें मालिक नहीं रहता था।

पर्यटन विभाग की सूची आज क्या दिखाती है

पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर आज भी दो चीज़ें टँगी हैं। एक, "गेस्ट हाउस अनुमोदन के दिशानिर्देश", जिन पर तारीख़ लिखी है "Revised – December 2009"। इनमें कम से कम छह किराए पर देने योग्य कमरे, दोहरे कमरे के लिए कम से कम 120 वर्ग फ़ुट, सार्वजनिक क्षेत्रों में अनिवार्य सीसीटीवी और स्थानीय निकाय, पुलिस, बिजली, पानी तथा दमकल के पास पंजीकरण की शर्त है। आवेदन के साथ प्रधान सचिव (पर्यटन) के नाम 5,000 रुपये का डिमांड ड्राफ़्ट लगता है। दस्तावेज़ ख़ुद इसे स्वैच्छिक योजना कहता है।

पंजीकृत ठिकानों की गिनती छोटी है

दूसरी चीज़ बेड एंड ब्रेकफ़ास्ट प्रतिष्ठानों की ज़िलेवार सूची है, जिस पर तारीख़ 31 मई 2025 है। दक्षिण-पश्चिम दिल्ली की सूची में 199 प्रतिष्ठान दर्ज हैं। नई दिल्ली, उत्तर, उत्तर-पूर्व, शाहदरा और पश्चिम की सूचियाँ इससे कहीं छोटी हैं, कुछ में पाँच-सात नाम ही हैं। गेस्ट हाउस की ग्रेडिंग योजना की शर्तों में लिखा है कि यह "purely voluntary basis" पर है और इसमें सिर्फ़ वही गेस्ट हाउस आएँगे जिनके पास स्थानीय निकाय, पुलिस या दमकल का वैध लाइसेंस पहले से हो।

2019 में विधानसभा समिति ने पंद्रह दिन दिए थे

अगस्त 2019 में दिल्ली विधानसभा की याचिका समिति ने अधिकारियों से कहा कि वे विश्वविद्यालय के आसपास चल रहे पीजी की सूची बनाएँ और बताएँ कि आग की सुरक्षा, भवन नियमों और स्वास्थ्य लाइसेंस के मामले में कौन-से नियम लागू होते हैं और उन्हें लागू कौन कराता है। समिति ने पंद्रह दिन का समय दिया था। रिपोर्टों के मुताबिक़ वह दस्तावेज़ कभी नहीं आया। सात साल बाद वही सवाल फिर मंत्रियों की बैठकों में है।

2021 और 2022 के प्रस्ताव काग़ज़ पर रहे

2021 में उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने नॉर्थ कैंपस के आसपास पीजी का सर्वेक्षण कराने और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पंजीकरण का प्रस्ताव रखा। 2022 में एजेंसियों की बैठकों के बाद क़रीब 700 निजी छात्रावासों और पीजी को दिल्ली पुलिस के लाइसेंस के दायरे में लाने का प्रस्ताव बना, जिसमें ठहरने की क्षमता, रसोई और लिफ़्ट की मंज़ूरी तथा दमकल की छूट शामिल थी। उसी प्रस्ताव में दर्ज था कि ऐसे प्रतिष्ठानों को नियमित करने वाली कोई वैधानिक संस्था नहीं है।

2023 का सर्वेक्षण आग के बाद हुआ

सितंबर 2023 में मुखर्जी नगर के एक महिला पीजी में आग लगने के बाद निगम ने फिर सर्वेक्षण कराया। सौ से ज़्यादा प्रतिष्ठान भवन उपनियमों के कथित उल्लंघन में पाए गए। उसी समय यह भी दर्ज हुआ कि आवासीय इलाक़े में पीजी चलाने के लिए कोई विशिष्ट मानक मौजूद नहीं है। तीन दशक में यही क्रम लौटता रहा है: प्रस्ताव, सर्वेक्षण, समिति, और फिर अगली घटना।

मास्टर प्लान के अध्याय 15 में पीजी शब्द नहीं है

दिल्ली विकास प्राधिकरण के मास्टर प्लान 2021 का पंद्रहवाँ अध्याय मिश्रित उपयोग पर है। उसकी धारा 15.6 कहती है कि कुछ ख़ास गतिविधियाँ आवासीय परिसरों में तभी चल सकती हैं जब भूखंड कम से कम 209 वर्ग मीटर का हो और सामने की सड़क कम से कम 18 मीटर चौड़ी हो। कोष्ठक में छूट दर्ज है: "स्पेशल एरिया" में 9 मीटर और पुनर्वास कॉलोनी में 13.5 मीटर। जिन चार गतिविधियों को यहाँ गिनाया गया है वे हैं प्री-प्राइमरी स्कूल, नर्सिंग होम, गेस्ट हाउस और बैंक। पूरे अध्याय में "पेइंग गेस्ट" और "हॉस्टल" शब्द एक बार भी नहीं आते।

55 गज का भूखंड और 209 वर्ग मीटर की शर्त

दिल्ली के मदनपुर खादर की एक गली, जहाँ छोटे भूखंडों पर पतली इमारतें तीन-चार मंज़िल तक उठी हैं और ऊपर तारों का जाल है (यह तस्वीर 2021 की है)। सत्य निकेतन में गिरी इमारत का भूखंड 55 वर्ग गज का था
तस्वीर: Vikas Bidhuri, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

गिरी हुई इमारत के बारे में एक रिपोर्ट में दर्ज है कि उसका भूखंड 55 वर्ग गज का था और वह एक पुनर्वास कॉलोनी में बनी जी प्लस चार इमारत थी, जिसके भवन नक़्शे मंज़ूर नहीं थे। 55 वर्ग गज लगभग 46 वर्ग मीटर होता है। मास्टर प्लान की धारा 15.6 गेस्ट हाउस के लिए 209 वर्ग मीटर माँगती है, यानी इस भूखंड से चार गुना से ज़्यादा। हमने 9 सितंबर को लिखा था कि उस इमारत पर कोई एक क़ानून पूरी तरह लागू नहीं होता था।

90 दिन की गिनती कहाँ से शुरू होगी

जितनी रिपोर्टें अब तक आई हैं, उनमें से किसी में यह नहीं लिखा कि 90 दिन किस तारीख़ से गिने जाएँगे। विधेयक के पारित होने से, अधिसूचना से, पोर्टल के शुरू होने से, या आवेदन खुलने से, इनमें से कुछ तय नहीं बताया गया। कोई रिपोर्ट यह भी नहीं बताती कि 90 दिन में लाइसेंस न मिलने पर क्या होगा और लाइसेंस देने वाले दफ़्तर पर कोई समय-सीमा है या नहीं। स्वास्थ्य व्यापार लाइसेंस में श्रेणी C की मंज़ूरी के लिए कोई समय-सीमा नागरिक चार्टर में दर्ज नहीं दिखती।

मसौदे का पाठ अब तक सार्वजनिक नहीं है

विधेयक का पूरा पाठ कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। कोई विधेयक संख्या, कोई अधिसूचना संख्या, कोई सार्वजनिक टिप्पणी की अवधि सामने नहीं आई। जो छपा है वह अधिकारियों की जानकारी और मंत्री के बयानों पर आधारित है, और अख़बारों ने प्रावधानों की अलग-अलग सूचियाँ छापी हैं। इस लेख में दर्ज हर प्रावधान उन्हीं रिपोर्टों से है, मसौदे से नहीं। समिति के अध्यक्ष और मंत्री आशीष सूद ने 9 सितंबर को कहा कि नीति एक से डेढ़ महीने में आएगी, जबकि एक और रिपोर्ट में दो महीने दर्ज हैं।

किराया, जमानत राशि और भेदभाव पर प्रस्ताव

मसौदे में एक किराया नियमन समिति का प्रस्ताव है जो इलाक़े के हिसाब से किराया बैंड तय करेगी। बैंड के आधार बताए गए हैं: भरे कमरों की संख्या, सुविधाएँ, बाज़ार दर, और कॉलेज तथा परिवहन से दूरी। जमानत राशि तीन महीने के किराए से ज़्यादा नहीं होगी और अग्रिम किराया भी तीन महीने पर रुकेगा। किराएदार को जाने से पहले तीस दिन का नोटिस देना होगा। लिंग, जाति, धर्म या मूल राज्य के आधार पर अलग किराया लेने पर रोक प्रस्तावित है।

सीसीटीवी, गार्ड और GovPG पोर्टल

हर प्रवेश द्वार और साझा जगह पर सीसीटीवी लगेगा और रिकॉर्डिंग तीस दिन रखनी होगी। जिन पीजी में 15 या उससे ज़्यादा छात्र हों, वहाँ रात 10 से सुबह 6 बजे तक लाइसेंसधारी गार्ड रहेगा। वार्डन परिसर में रहेगा या 500 मीटर के दायरे में दफ़्तर रखेगा और आपात स्थिति में पंद्रह मिनट में पहुँचेगा। GovPG पोर्टल पर हर महीने भरे हुए कमरों और किराए की जानकारी चढ़ानी होगी, और छात्र गुमनाम शिकायत दर्ज करा सकेंगे। कॉलेजों की संस्थागत आवास समितियाँ तिमाही निरीक्षण करेंगी। दंड की व्यवस्था पर किसी रिपोर्ट में ब्योरा नहीं है।

जो किराएदार बाहर होंगे, उनके बारे में मसौदा चुप है

मसौदे में यह नहीं बताया गया कि जो पीजी 90 दिन में लाइसेंस नहीं ले पाएँगे उनमें रह रहे छात्रों का क्या होगा। दिल्ली में क़रीब दो लाख कमरे निजी छात्रावास या पीजी के रूप में किराए पर हैं, और 2022 की एक रिपोर्ट में यही अनुमान मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर, लक्ष्मी नगर, मुनिरका और विश्वविद्यालय के दोनों परिसरों के आसपास के लिए दिया गया था। इनमें से बड़ी संख्या आवासीय दर्ज संपत्तियों पर चल रही है। किसी रिपोर्ट में यह दर्ज नहीं कि इन किराएदारों के लिए मसौदे में कोई संक्रमण-व्यवस्था है।

मालिक कोई और, चलाने वाला कोई और

सत्य निकेतन का मामला यही उलझन दिखाता है। पुलिस के अनुसार मालिक परिवार के तीन लोग गिरफ़्तार हुए, और आरोपी महेश गुप्ता ने पूछताछ में बताया कि इमारत अगस्त 2025 में दो साझेदारों को पट्टे पर दी गई थी। एक साझेदार बुधवार को गिरफ़्तार हुआ। पुलिस का कहना है कि वही किराएदारों से किराया समझौते पर दस्तख़त कराता था और उन समझौतों में मालिक को हताहत की ज़िम्मेदारी से अलग रखने की शर्त कथित रूप से लिखी थी। मंत्री ने 9 सितंबर को कहा कि सरकार मकान मालिक और छात्र के बीच के समझौते को क़ानूनन बाध्यकारी बनाने का रास्ता देख रही है। लाइसेंस किसके नाम बनेगा, यह किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं है।

कोचिंग का मसौदा अभी तक क़ानून नहीं बना

यही सरकार और यही मंत्री दो साल से एक और मसौदे पर काम कर रहे हैं। पुराने राजेंद्र नगर की एक कोचिंग में तीन छात्रों की मौत के बाद उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति गौबा की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति बनाई थी। 12 जून 2026 की एक रिपोर्ट में दर्ज है कि सरकार ने कोचिंग संस्थानों के लिए व्यापक दिशानिर्देश बनाने का फ़ैसला किया और उच्च शिक्षा निदेशक को नोडल अधिकारी बनाया। एक अन्य रिपोर्ट में 924 कोचिंग केंद्रों की जाँच का ज़िक्र है। सूद ने 9 सितंबर को कहा कि इस हादसे ने गौबा समिति की रिपोर्ट लागू करने की रफ़्तार तेज़ करने पर मजबूर किया।

विधानसभा कितनी दूर तक जा सकती है

अनुच्छेद 239एए दिल्ली विधानसभा को राज्य सूची और समवर्ती सूची पर क़ानून बनाने का अधिकार देता है, पर राज्य सूची की प्रविष्टि 1, 2 और 18 को इससे बाहर रखता है। ये हैं लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि। मसौदे का बड़ा हिस्सा पुलिस सत्यापन और भवन-भूमि के इस्तेमाल पर टिका है। निगम ख़ुद संसद के बनाए 1957 के अधिनियम से चलता है। आठवीं विधानसभा का छठा सत्र 7, 10 और 11 अगस्त 2026 को बैठा था।

अदालत ने 25 सितंबर की तारीख़ दी है

9 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने एनएसयूआई अध्यक्ष विनोद जाखड़ की याचिका पर केंद्र, दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया। याचिका में कॉलेजवार छात्रावास क्षमता का आकलन और कॉलेजों के आसपास चल रहे निजी आवासों की ढाँचागत तथा अग्नि सुरक्षा जाँच माँगी गई है। पीठ ने 7 सितंबर को निगम की उच्चस्तरीय जाँच का आदेश देते हुए कहा था कि पीजी सुविधाओं को नियमित करने के लिए निगम और दूसरी एजेंसियों के उपाय पर्याप्त नहीं हैं। मामला 25 सितंबर को सूचीबद्ध है।

हॉस्टल की गिनती

धौला कुआँ में आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज (यह तस्वीर 2012 की है)। इस कॉलेज में 5,300 से ज़्यादा छात्र हैं और कोई छात्रावास नहीं
तस्वीर: Janendra, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

विश्वविद्यालय के 91 कॉलेजों में से 71 में कोई छात्रावास नहीं है। श्री वेंकटेश्वर कॉलेज में 21 पाठ्यक्रमों के लगभग 4,346 छात्र हैं और छात्रावास में कुल 150 सीटें, 75 लड़कियों और 75 लड़कों के लिए। पहले साल में लगभग 2,000 दाख़िले हुए, जिनमें से क़रीब 35 को छात्रावास मिला। आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज में 5,300 से ज़्यादा छात्र हैं और कोई छात्रावास नहीं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली के मुख्य सचिव और यूजीसी अध्यक्ष से छात्रावास बढ़ाने की कार्ययोजना 15 अक्टूबर 2026 तक माँगी है।

जिन आँकड़ों पर स्रोत आपस में नहीं मिलते

इमारत गिरने की तारीख़ पर रिपोर्टें एक नहीं हैं। कई रिपोर्टों और उच्च न्यायालय की सुनवाई के विवरण में 6 सितंबर दर्ज है, कुछ में 7 सितंबर, और एक रिपोर्ट में 8 सितंबर। मालिक का नाम एक जगह हरिराम गुप्ता है, दूसरी जगह हरिराम बंसल। पट्टे की रक़म एक रिपोर्ट में एक लाख रुपये महीना है, दूसरी में 1,05,000 रुपये। कमरों की गिनती पर भी फ़र्क़ है: एक विवरण में 15 कमरे और हर कमरे में दो से तीन छात्र, दूसरे में चार मंज़िलों पर आठ कमरे और 16 बिस्तर। इमारत की उम्र एक ही रिपोर्ट में 1990 के दशक की बताई गई है और स्थानीय लोगों के हवाले से 1970 का दशक भी। ख़तरनाक इमारतों की संख्या 8 सितंबर की एक रिपोर्ट में 62 है, 9 सितंबर की दूसरी में 51। समिति के अध्यक्ष का नाम एक जगह आरसी गौबा और दूसरी जगह आरके गौबा छपा है।

जून के सर्वेक्षण का अनुपात

एक रिपोर्ट में दर्ज है कि जून के सर्वेक्षण में 189 इमारतें "ख़तरनाक" पाई गईं और शहर भर में 28 लाख ढाँचों की जाँच हुई। यानी हर एक लाख ढाँचों में से लगभग सात ख़तरनाक क़रार दिए गए। 1 जून से 31 अगस्त के बीच 959 संपत्तियाँ गिराई गईं और 8 सितंबर तक 471 सील हुईं। हादसे के बाद 27 इमारतों पर तोड़फोड़ का आदेश हुआ, सात सील हुईं और 35 मालिकों को नोटिस गए। उपराज्यपाल तरणजीत सिंह संधू ने एक हफ़्ते में ढाँचागत जाँच का आदेश देते हुए बिना सोचे सील करने की मुहिम के ख़िलाफ़ चेताया था।

स्रोतद हंस इंडिया, दिल्ली के प्रस्तावित पीजी विधेयक पर रिपोर्ट, 9 सितंबर 2026, फ़्री प्रेस जर्नल, मसौदा विधेयक के प्रावधानों का ब्योरा, 9 सितंबर 2026, बिज़नेस टुडे, विधेयक का नाम और प्रावधान, 9 सितंबर 2026, द पायनियर, 1993 से अब तक पीजी नियमन की कोशिशों का ब्योरा, 8 सितंबर 2026, दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की ग्यारहवीं अनुसूची का पहला हिस्सा, बेयर एक्ट पाठ, दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 417 का पाठ, इंडियन कानून, दिल्ली विकास प्राधिकरण, मास्टर प्लान फ़ॉर दिल्ली 2021 का अध्याय 15 (मिश्रित उपयोग), पीडीएफ़, दिल्ली सरकार पर्यटन विभाग, गेस्ट हाउस अनुमोदन के दिशानिर्देश, दिसंबर 2009 में संशोधित, दिल्ली सरकार पर्यटन विभाग, पंजीकृत बेड एंड ब्रेकफ़ास्ट प्रतिष्ठानों की ज़िलेवार सूची, 31 मई 2025, दिल्ली नगर निगम, नागरिक चार्टर, स्वास्थ्य व्यापार लाइसेंस की श्रेणियाँ और शुल्क, द वीक, सत्य निकेतन के बाद निगम की कार्रवाई और गिरी इमारत का ब्योरा, 8 सितंबर 2026, इंडिया टीवी, निगम के सर्वेक्षण और तोड़फोड़ के आँकड़े, 9 सितंबर 2026, द ट्रिब्यून, दिल्ली उच्च न्यायालय में एनएसयूआई की याचिका पर सुनवाई, 9 सितंबर 2026, द ट्रिब्यून, मंत्री आशीष सूद के बयान, 9 सितंबर 2026, द ट्रिब्यून, कोचिंग संस्थानों की नीति और गौबा समिति पर रिपोर्ट, 12 जून 2026, विकिपीडिया, सत्य निकेतन इमारत हादसे का विवरण पृष्ठ

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।