जिस जज के सामने आपका मुक़दमा है, वह साठ पर रिटायर होता है, और यह उम्र 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद तय की थी
अब वही अदालत चाहती है कि यह बासठ हो। सात राज्य मान गए हैं, तेईस को दो हफ़्ते का समय मिला है। बीच में ज़िला अदालतों के 5.18 करोड़ मुक़दमे खड़े हैं।

पाँच करोड़ अठारह लाख।
यह उन मुक़दमों की संख्या है जो देश की ज़िला अदालतों में लंबित हैं, और यही वह आँकड़ा है जिसका हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने इस हफ़्ते तेईस राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों को दो हफ़्ते का समय दिया है।
सवाल एक ही है। ज़िला अदालत का जज साठ साल पर रिटायर हो या बासठ पर।
सात राज्य पहले ही हाँ कह चुके हैं: छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, सिक्किम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल। इन्हें दो महीने में अपने सेवा नियम बदलने को कहा गया है। बाक़ी को अपने हाईकोर्ट से सलाह करके दो हफ़्ते में जवाब देना है।
शर्त यह होगी कि साठ की उम्र पर संबंधित हाईकोर्ट उस अधिकारी की उपयुक्तता आँकेगा, और उसके बाद ही सेवा बासठ तक चलेगी।
यह ख़बर यहीं ख़त्म हो जाती है, ज़्यादातर जगह। पर इसका असली हिस्सा चौबीस साल पीछे है।
यह उम्र आई कहाँ से
साठ की उम्र किसी सरकारी अधिसूचना से नहीं आई। वह एक अदालती फ़ैसले से आई।
21 मार्च 2002 को न्यायमूर्ति बी. एन. कृपाल, न्यायमूर्ति जी. बी. पट्टनायक और न्यायमूर्ति वी. एन. खरे की पीठ ने ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन बनाम भारत संघ में फ़ैसला सुनाया।
उससे पहले न्यायमूर्ति के. जगन्नाथ शेट्टी की अध्यक्षता में बना पहला राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग अपनी रिपोर्ट दे चुका था। उस रिपोर्ट में सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 62 करने की सिफ़ारिश थी, और सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों पर भी सिफ़ारिशें थीं।
अदालत ने वह सिफ़ारिश स्वीकार नहीं की।
जो तर्क दिया गया, वह पढ़ने लायक़ है। फ़ैसले में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के जज की सेवानिवृत्ति की उम्र 65 वर्ष है, हाईकोर्ट के जज की 62 है, और तार्किक रूप से न्यायिक अधिकारी की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 वर्ष है।
पूरा तर्क एक शब्द पर टिका है: तार्किक रूप से।
तर्क में क्या था और क्या नहीं था
संविधान का अनुच्छेद 124 सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए 65 तय करता है। अनुच्छेद 217 हाईकोर्ट के जजों के लिए 62 तय करता है।
ज़िला न्यायपालिका के लिए संविधान में कोई उम्र नहीं है। वह राज्यों के सेवा नियमों में तय होती है, और राज्य वे नियम हाईकोर्ट के परामर्श से बनाते हैं।
तो 2002 की पीठ ने जो किया, वह यह था कि संविधान में लिखी दो संख्याओं से एक तीसरी संख्या निकाल ली। 65, फिर 62, तो उससे नीचे 60।
इस तर्क में जो नहीं है, उस पर ध्यान दीजिए। इसमें कहीं यह नहीं है कि साठ के बाद न्यायिक क्षमता घटती है। इसमें यह भी नहीं है कि साठ पर रिटायर करने से मुक़दमे तेज़ी से निपटते हैं। यह पूरी तरह श्रेणीक्रम का तर्क है, और श्रेणीक्रम का तर्क अपने-आप में काम की दक्षता के बारे में कुछ नहीं कहता।
अदालत ने एक रास्ता ज़रूर खुला रखा। फ़ैसले में कहा गया कि राज्यों के लिए यह उचित होगा कि वे सेवानिवृत्त हो रहे न्यायिक अधिकारियों की बासठ वर्ष तक पुनर्नियुक्ति की व्यवस्था करें, अगर ज़िला जज के संवर्ग में रिक्तियाँ हों।
यानी बासठ तक काम कराने की बात 2002 में भी थी। बस उसे सेवा नहीं, पुनर्नियुक्ति कहा गया।
अब 2026 में वही अदालत कह रही है कि इसे पुनर्नियुक्ति नहीं, सेवा ही मान लिया जाए।
उसी फ़ैसले में एक और संख्या थी
2002 का वही फ़ैसला एक दूसरा आँकड़ा भी दर्ज करता है, और वह आँकड़ा उम्र वाले हिस्से से कहीं भारी है।
फ़ैसले में संसद की स्थायी समिति का यह निष्कर्ष उद्धृत है कि भारत में दस लाख लोगों पर 10.5 जज हैं। और अदालत ने सिफ़ारिश की कि इसे पाँच साल के भीतर बढ़ाकर दस लाख पर 50 किया जाए।
पाँच साल का मतलब 2007 था।
आज 2026 है। स्वीकृत पदों के हिसाब से यह आँकड़ा दस लाख पर पंद्रह के आसपास बताया जाता है, और कार्यरत जजों के हिसाब से बीस के आसपास। कुछ रिपोर्टों में बाईस का आँकड़ा भी छपा है।
यह अंतर ख़ुद बताता है कि यहाँ हिसाब कैसे लगाया जाता है। स्वीकृत पद अलग संख्या देते हैं, भरे हुए पद अलग, और जनसंख्या का कौन-सा अनुमान लिया गया, इससे भी संख्या बदल जाती है। तीनों आँकड़े छपते रहते हैं और तीनों को एक ही चीज़ बताकर पेश किया जाता है।
जो भी संख्या ली जाए, पचास से दूरी बड़ी है। और वह लक्ष्य उन्नीस साल पहले पूरा हो जाना था।


ख़ाली कुर्सियों का हिसाब
उम्र बढ़ाने की बहस का असली संदर्भ यही है।
ज़िला न्यायपालिका में स्वीकृत पद 30,868 हैं और कार्यरत अधिकारी 23,558। यानी 7,310 पद ख़ाली हैं, रिक्ति की दर लगभग 23.68 फ़ीसदी।
हाईकोर्ट में हालत इससे ख़राब है। 1 जुलाई 2026 की स्थिति में सभी हाईकोर्टों की स्वीकृत संख्या 1,122 है और कार्यरत 781। रिक्तियाँ 341, यानी 30.39 फ़ीसदी।
देश में लंबित मुक़दमे लगभग 4.7 करोड़ बताए जाते हैं, और उनमें से क़रीब नब्बे फ़ीसदी ज़िला और अधीनस्थ अदालतों में हैं।
यहाँ एक विसंगति है जिसे छिपाना नहीं चाहिए। अदालत ने इस सुनवाई में ज़िला अदालतों के 5.18 करोड़ मुक़दमों का हवाला दिया है, जबकि पूरे देश का आँकड़ा 4.7 करोड़ के आसपास बताया जाता है। ये दोनों संख्याएँ अलग-अलग समय की हैं और लंबित मामलों की गिनती के तरीक़े भी एक जैसे नहीं होते, क्योंकि राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड की संख्या रोज़ बदलती है। इस लेख में दोनों वैसे ही रखे गए हैं जैसे स्रोतों में हैं, और इनमें से कौन-सा सही है, यह मूल आँकड़ा देखे बिना तय नहीं किया जा सकता।
जो दोनों में साझा है, वह यह है कि बोझ का बड़ा हिस्सा ज़िला अदालत पर है और ख़ाली कुर्सियाँ भी वहीं सबसे ज़्यादा हैं।
दो साल जोड़ने से क्या बदलता है
अंकगणित सीधा है। लगभग 23,500 न्यायिक अधिकारी काम कर रहे हैं। हर साल उनमें से कुछ साठ के होते हैं और चले जाते हैं।
अगर उम्र दो साल बढ़ती है, तो दो साल तक कोई सेवानिवृत्ति नहीं होगी, और उसके बाद हर साल वही संख्या फिर से रिटायर होने लगेगी। यानी यह क़दम स्थायी रूप से जजों की संख्या नहीं बढ़ाता। वह एक बार में एक अंतराल पैदा करता है, जिसमें दो साल की सेवानिवृत्तियाँ रुक जाती हैं।
इस अंतराल की अपनी क़ीमत है। जिन जगहों पर पदोन्नति सेवानिवृत्ति से खुलती है, वहाँ नीचे बैठे अधिकारियों की पदोन्नति दो साल खिसक जाती है। नए चयन भी उतने ही खिसकते हैं।
पर एक बात इस क़दम के पक्ष में है, और वह अनुभव की है। ज़िला जज का काम सबूत परखने, गवाही सुनने और सज़ा तय करने का काम है, जिसमें अभ्यास का मूल्य सीधा है। जो अधिकारी पैंतीस साल की उम्र में सेवा में आया, वह साठ पर पच्चीस साल का अभ्यास लेकर बैठा होता है।
अदालत ने यह भी साफ़ किया है कि राज्य वित्तीय बोझ के आधार पर इनकार नहीं कर सकते, और यह भी कि राज्य के दूसरे कर्मचारी न्यायिक अधिकारियों के साथ समानता का दावा नहीं कर सकते।
दूसरी बात पहली से ज़्यादा दूर तक जाती है। अगर न्यायिक अधिकारी की सेवा शर्तें बाक़ी सरकारी कर्मचारियों से अलग हैं, तो उनका आधार क्या है। इसका जवाब न्यायपालिका की स्वतंत्रता में है, और यही वजह है कि यह मामला 1993 से एक ही याचिका के तहत अदालत में चलता आ रहा है।
एक याचिका जो तैंतीस साल से चल रही है
ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन का मामला भारतीय अदालतों की उन गिनी-चुनी याचिकाओं में है जो दशकों से जीवित हैं।
पहला बड़ा फ़ैसला 1993 में आया। दूसरा 2002 में, जिसने शेट्टी आयोग की सिफ़ारिशों पर काम किया। उसके बाद वेतन, भत्ते, आवास, पदोन्नति और भर्ती पर बार-बार आदेश आते रहे।
एक याचिका का इतने साल चलना दो बातें बताता है। एक यह कि जिस चीज़ के लिए वह दायर हुई थी, वह अब तक हुई नहीं। दूसरी यह कि उसे बंद करने की जगह अदालत ने उसे खुला रखकर उसमें नए-नए आदेश जोड़ना बेहतर समझा।
इसका नतीजा यह है कि ज़िला न्यायपालिका की सेवा शर्तें अब बड़ी हद तक विधायिका के बजाय अदालत के आदेशों से तय होती हैं। उम्र भी उन्हीं में से एक है, और यही कारण है कि उसे बदलने के लिए भी अदालत के पास ही आना पड़ रहा है।

ज़िला जज बनता कैसे है
इस पूरी बहस को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि जिस कुर्सी की उम्र पर झगड़ा है, उस तक पहुँचा कैसे जाता है।
संविधान का अनुच्छेद 233 कहता है कि किसी राज्य में ज़िला जजों की नियुक्ति, तैनाती और पदोन्नति राज्यपाल उस राज्य पर अधिकार रखने वाले हाईकोर्ट के परामर्श से करेंगे।
उसी अनुच्छेद में सीधी भर्ती का रास्ता है। जो व्यक्ति पहले से संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, वह ज़िला जज नियुक्त होने का पात्र तभी है जब वह कम से कम सात साल अधिवक्ता या प्लीडर रहा हो और हाईकोर्ट ने उसकी सिफ़ारिश की हो।
अनुच्छेद 234 उन पदों के लिए है जो ज़िला जज से नीचे हैं। इनकी नियुक्ति राज्यपाल उन नियमों के अनुसार करते हैं जो राज्य लोक सेवा आयोग और हाईकोर्ट, दोनों से परामर्श के बाद बनाए जाते हैं।
अनुच्छेद 235 सबसे अहम है। वह अधीनस्थ अदालतों पर नियंत्रण हाईकोर्ट को देता है, जिसमें अनुशासन और पदोन्नति दोनों आते हैं।
इन तीन अनुच्छेदों को साथ रखिए और एक बात साफ़ हो जाती है। ज़िला न्यायपालिका पर रोज़ का नियंत्रण राज्य सरकार का नहीं, हाईकोर्ट का है। पर सेवा नियम, जिनमें सेवानिवृत्ति की उम्र लिखी होती है, राज्य सरकार बनाती है।
इसीलिए अदालत के इस निर्देश की भाषा में दोनों हैं। राज्यों को कहा गया है कि वे अपने हाईकोर्ट से परामर्श करके जवाब दें। एक के पास नियम बदलने का अधिकार है, दूसरे के पास यह जानने का कि ज़मीन पर क्या चाहिए।
एक और बात, जो सात साल वाली शर्त से निकलती है। सीधी भर्ती से आने वाला ज़िला जज पहले वकील रह चुका होता है, और आमतौर पर पैंतीस के आसपास सेवा में आता है। उसके लिए साठ की उम्र का मतलब है पच्चीस साल की न्यायिक सेवा। जो अधिकारी सबसे नीचे की श्रेणी से शुरू होकर पदोन्नति से ऊपर आता है, वह सेवा में जल्दी आता है और उसके लिए यही उम्र पैंतीस साल की सेवा होती है।
दो साल जोड़ने का असर इन दोनों पर एक जैसा नहीं पड़ता, और यही वजह है कि हाईकोर्ट की उपयुक्तता वाली शर्त इस प्रस्ताव में डाली गई है।
जो इस बहस में नहीं आ रहा
दो साल की उम्र पर सारा ध्यान है। कुछ चीज़ें उसके नीचे दब जाती हैं।
पहली, 7,310 ख़ाली पद। उम्र बढ़ाने से ये पद नहीं भरते। ये पद भर्ती से भरते हैं, और भर्ती राज्य लोक सेवा आयोगों और हाईकोर्टों के ज़िम्मे है। जिस साल भर्ती नहीं होती, उस साल कुर्सी ख़ाली रहती है चाहे उम्र जो भी हो।
दूसरी, हाईकोर्ट की 30 फ़ीसदी रिक्ति। हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम और सरकार के बीच चलती है, और उसमें उम्र का यह विवाद लागू ही नहीं होता।
तीसरी, इस बार सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित मुक़दमे अपने सबसे ऊँचे स्तर पर बताए गए हैं, लगभग नब्बे हज़ार, और वह भी तब जब वहाँ स्वीकृत संख्या पूरी भरी हुई है। इससे एक असहज बात निकलती है: कुर्सियाँ भर जाना अकेले लंबित मामलों का इलाज नहीं है।
चौथी, और यह इस पूरी बहस का सबसे सीधा सिरा है: जज बदलने से मुक़दमे का क्या होता है।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 326 इसी सवाल का जवाब है। जब कोई जज या मजिस्ट्रेट गवाही सुनकर और दर्ज करके हट जाए और उनकी जगह दूसरे आएँ, तो उत्तराधिकारी पहले वाले की दर्ज की हुई गवाही पर आगे बढ़ सकते हैं। ज़रूरत लगे तो गवाहों को दोबारा बुला सकते हैं।
पर इसका एक अपवाद है, और वह भारी है। यह छूट संक्षिप्त विचारण पर लागू नहीं होती। नितिनभाई सेवंतीलाल शाह बनाम मनुभाई मंजीभाई (2011) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संक्षिप्त विचारण में अदालत गवाही का सार दर्ज करती है, शब्दशः नहीं, इसलिए उत्तराधिकारी उन नोटों पर भरोसा नहीं कर सकते और मुक़दमा नए सिरे से चलाना पड़ता है।
नए सिरे से मतलब शुरू से। वही गवाह, वही जिरह, वही तारीख़ें।
यही वह जगह है जहाँ जजों का आना-जाना सीधे मुक़दमे की उम्र में जुड़ जाता है। और यही वह चीज़ है जो दो साल के अंतराल से थोड़ी देर के लिए धीमी पड़ती है।
आख़िर में
एक न्यायिक अधिकारी की सेवानिवृत्ति की उम्र 1999 में एक आयोग ने 62 सुझाई थी।
2002 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे मना करके 60 कर दी, इस आधार पर कि ऊपर की दो अदालतों की उम्रें 65 और 62 हैं।
2026 में सुप्रीम कोर्ट राज्यों से कह रहा है कि उसे 62 कर दें।
बीच के इन चौबीस सालों में जो नहीं बदला, वह वही है जिसके लिए यह सब हो रहा है। 2002 के फ़ैसले में लिखा लक्ष्य दस लाख पर पचास जजों का था, पाँच साल में। वह तारीख़ उन्नीस साल पहले निकल गई और आँकड़ा आधे रास्ते से भी पीछे है।
दो साल जोड़ने से वह दूरी नहीं भरती। पर तेईस राज्यों के पास अब दो हफ़्ते हैं, और इस बार सवाल पैसे का नहीं माना जाएगा।
स्रोतऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन बनाम भारत संघ, 21 मार्च 2002, बार एंड बेंच, सात राज्यों की सहमति और अदालत के निर्देश, न्याय विभाग, न्यायिक जनशक्ति के आँकड़े, द प्रिंट, ज़िला और हाईकोर्ट की रिक्तियों का विश्लेषण, भारत का संविधान, अनुच्छेद 233, 234 और 235, दंड प्रक्रिया संहिता 1973, धारा 326