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चुनाव आयुक्त नियुक्ति क़ानून पर पीठ बँटी, फ़ैसला अब मुख्य न्यायाधीश पर

बुधवार को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले 2023 के क़ानून को चुनौती देने वाली छह याचिकाओं पर बँटा हुआ आदेश दिया। सवाल क़ानून के सही या ग़लत होने का नहीं था, सवाल यह था कि फ़ैसला मौजूदा दो जजों की पीठ करे या पांच जजों की संविधान पीठ। दोनों जज असहमत रहे, इसलिए कितनी बड़ी पीठ बनानी है, यह तय करने के लिए मामला अब मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के पास जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की इमारत का मध्य खंड, जहाँ मुख्य न्यायाधीश की अदालत बैठती है, दिसंबर 2019 की तस्वीर; आज का मामला अब इसी अदालत के पास तय होने जाएगा कि कितने जजों की पीठ बने
तस्वीर: Subhashish Panigrahi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

"अकेले स्वर में बोलना संस्थागत तालमेल के लिहाज़ से बेहतर होता। दुर्भाग्य से अदालत की राय बँट गई है।" सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने बुधवार, 23 सितंबर के अपने साझा आदेश में यही लिखा। दोनों जज मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले 2023 के क़ानून को चुनौती देने वाली छह याचिकाओं पर फ़ैसला सुना रहे थे। असहमति इस पर थी। फ़ैसला यही दो जज करें, या पांच जजों की एक संविधान पीठ। क़ानून सही है या ग़लत, यह सवाल अलग रखा गया।

दोनों जज एक राय नहीं बना पाए। इसलिए आदेश में उन्होंने लिखा कि काग़ज़ात मुख्य न्यायाधीश के पास भेजे जाएँ। वे तय करेंगे कि कितनी बड़ी पीठ चाहिए। भारत में चुनाव आयुक्त कैसे नियुक्त होंगे, इसका आख़िरी फ़ैसला अभी नहीं हुआ। तय बस इतना हुआ है कि फ़ैसला कौन करेगा।

भारत में हर पांच साल में जो सबसे बड़ा प्रशासनिक काम होता है, चुनाव करवाना, उसकी अगुवाई कौन करेगा, यही सवाल इस मुक़दमे की जड़ में है।

असहमति पीठ भेजने पर है, क़ानून की वैधता पर नहीं

यह भेद समझे बिना आज का आदेश ग़लत पढ़ा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में जब दो जजों की पीठ असहमत होती है, तो सामान्य नियम यह है: मामला तीन जजों की पीठ के पास जाता है। वह पीठ तय करती है कि दोनों में कौन सही है। आज के आदेश में जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा ने ख़ुद यह नियम गिनाया, फिर लिखा कि उनका मतभेद ख़ुद इस बात पर है कि क्या याचिकाएँ पांच जजों की संविधान पीठ के सामने जानी चाहिए। ऐसे मतभेद पर तीन जजों की पीठ का फ़ैसला बेकार जाएगा। वह सिर्फ़ देरी करेगा। इसलिए दोनों जजों ने सीधे मुख्य न्यायाधीश से पांच जजों, या उससे ज़्यादा, की पीठ बनाने पर विचार करने को कहा।

यहाँ जो नहीं हुआ, वह उतना ही ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के क़ानून को न अवैध ठहराया, न वैध। जस्टिस दत्ता ने अपनी राय के अंत में साफ़ लिखा: यह राय सिर्फ़ पीठ भेजने के सवाल तक सीमित है। याचिकाओं के मूल मुद्दे पर कोई राय नहीं दी गई। आज की सुनवाई का विषय था कि फ़ैसला कौन करे। फ़ैसला क्या हो, यह सवाल जस का तस है।

आज का आदेश छह जुड़ी याचिकाओं पर आया। डॉ. जया ठाकुर की रिट याचिका 14/2024, गोपाल सिंह की 13/2024, नमन शेरस्त्रा की 11/2024, एडीआर की 87/2024, पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ की 191/2024 और लोक प्रहरी की 272/2024। सबकी चुनौती एक जैसी है: मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तय करने वाले 2023 के क़ानून की धारा 7 की सांविधानिकता। धारा 6 और धारा 8(2) पर भी चुनौती है। पर मुख्य निशाना धारा 7 ही है। मामला संविधान के अनुच्छेद 14 और 324, दोनों के आधार पर उठाया गया है।

जस्टिस दत्ता की दलील: सवाल पहले से तय है, बस नए क़ानून पर लागू करना है

जस्टिस दत्ता की अलग राय 89 पैराग्राफ़ की है। यह उनके साथी जज की राय से कहीं बड़ी है। उनका तर्क चार बिंदुओं में सिमटता है। पहला, अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में पहले ही तय हो चुका है कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा हैं, और चुनाव आयोग को कार्यपालिका के पूरे नियंत्रण से बाहर रहना चाहिए। दूसरा, यह सिद्धांत तय है। अब सवाल सिर्फ़ इतना बचता है कि 2023 का नया क़ानून इस पर खरा उतरता है या नहीं। तीसरा, ऐसी जाँच के लिए संविधान की नई व्याख्या नहीं चाहिए। सिर्फ़ तय सिद्धांत का पालन चाहिए। चौथा, इसलिए न कोई संवैधानिक रोक है, न कोई मिसाल, जो मौजूदा दो जजों की पीठ को रोके।

अपनी बात के समर्थन में जस्टिस दत्ता ने तीन पुराने फ़ैसलों का हवाला दिया: पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत संघ (2003), अब्दुल रहीम इस्माइल सी. रहीमतूला बनाम बॉम्बे राज्य (1959), और श्रीमंत बालासाहेब पाटिल बनाम कर्नाटक विधानसभा (2020)। तीनों में यही कहा गया था: सिर्फ़ मामला संविधान से जुड़ा होने भर से पांच जजों की पीठ नहीं बनती। पांच जजों की ज़रूरत तभी है जब संविधान की व्याख्या का कोई सवाल सच में अनसुलझा हो।

इसी हिस्से में जस्टिस दत्ता ने याचिकाकर्ताओं की एक दलील को "बहुत असरदार" बताया। दलील यह थी। क्रिकेट में अगर अंपायर को जिताने वाली टीम का कप्तान ख़ुद चुने, तो अंपायर के सही फ़ैसले भी शक के घेरे में आते हैं। चुनाव आयुक्तों की नई चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री के ही चुने एक कैबिनेट मंत्री बैठते हैं। सामूहिक ज़िम्मेदारी के सिद्धांत के चलते वह मंत्री अपने ही नेता के ख़िलाफ़ खड़ा नहीं हो सकता, जस्टिस दत्ता ने लिखा। इस वजह से समिति में विपक्ष के नेता की मौजूदगी दिखावटी रह जाती है। कार्यपालिका को मिली यह ताक़त बड़ी है, ऐसी दलील में वज़न है, उन्होंने माना।

एक क्रिकेट अंपायर संकेत देते हुए। यह तस्वीर भारत की नहीं, इंग्लैंड के एक स्थानीय मैच की है, पर याचिकाकर्ताओं की दलील ऐसे ही अंपायर की मिसाल देती है, जिसे जिताने वाली टीम का कप्तान ख़ुद चुने
तस्वीर: Dion Gillard, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

अदालत ने महान्यायवादी से एक सीधा सवाल पूछा। अगर प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता की राय अलग हो, तो प्रधानमंत्री का नामित मंत्री क्या उनके ख़िलाफ़ खड़ा होगा? महान्यायवादी का जवाब था: शायद नहीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था: पक्का नहीं। जस्टिस दत्ता ने दोनों जवाब दर्ज किए, यह बताए बिना कि सही कौन है।

जस्टिस दत्ता ने अपनी राय के एक बड़े हिस्से में "जज ही जजों को नियुक्त करते हैं" वाली धारणा को भी एक मिथक बताया, टाइम्स ऑफ़ इंडिया की सुर्ख़ी में यही पंक्ति उभरी। उनका तर्क विस्तार से है। कॉलेजियम की सिफ़ारिश सिर्फ़ सिफ़ारिश है, अंतिम मंज़ूरी कार्यपालिका के हाथ में रहती है, और नामों की जाँच में सरकार और खुफ़िया एजेंसियाँ भी शामिल रहती हैं। जस्टिस दत्ता ने यह भी लिखा कि बरसों तक कुछ सिफ़ारिशें बिना कोई वजह बताए सरकार दबाए रखती है, दोहराए जाने के बाद भी। यानी उनकी दलील सिर्फ़ कॉलेजियम का बचाव नहीं है। वे यह भी मान रहे हैं कि कार्यपालिका का असर वहाँ भी कम नहीं है, जहाँ काग़ज़ पर जज ही आख़िरी फ़ैसला लेते दिखते हैं।

पर यह आख़िरी फ़ैसला नहीं है। जस्टिस दत्ता ने बार-बार लिखा कि ये टिप्पणियाँ प्रथम दृष्टया हैं। ये सिर्फ़ पीठ भेजने के सवाल के लिए हैं। क़ानून टिकेगा या नहीं, यह फ़ैसला अभी बाक़ी है।

जस्टिस शर्मा की दलील: इस क़ानून की सांविधानिकता पर अब तक कोई पीठ नहीं बोली

जस्टिस शर्मा ने राय की शुरुआत में ही विनम्रता से असहमति जताई। अपने साथी जज का फ़ैसला उन्होंने "बार-बार पढ़ा", उन्होंने लिखा। पर वे उनकी दलील से सहमत नहीं हो पाए। उनका जवाब सिर्फ़ 20 पैराग्राफ़ में है, दत्ता की राय से कहीं छोटा।

शर्मा का मुख्य फ़र्क़ यह है। अनूप बरनवाल में सुप्रीम कोर्ट ने संसद के क़ानून न बनाने से बने ख़ालीपन पर फ़ैसला दिया था। तब तक के लिए पीठ ने प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की एक अस्थायी समिति बना दी थी। उस फ़ैसले ने यह तय नहीं किया कि संसद जब क़ानून बनाए, तो उसमें एक तटस्थ सदस्य रहना ही चाहिए। संसद ऐसे सदस्य के बिना क़ानून बना सकती थी या नहीं, यह सवाल पहली बार अदालत के सामने है, उन्होंने लिखा। यह सवाल किसी पुराने फ़ैसले में तय नहीं हुआ। इसलिए अनुच्छेद 145(3) के शब्द मौजूदा दो जजों की पीठ को इसे अंतिम रूप से तय करने की इजाज़त नहीं देते।

महान्यायवादी आर. वेंकटरमणी ने एक तुलना पेश की, जिसे जस्टिस शर्मा ने अपनी राय में दर्ज किया। जजों की नियुक्ति वाले एनजेएसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद कहा था कि कॉलेजियम में क़ानून मंत्री का होना शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है। वही तर्क पलटकर कार्यपालिका पर भी लागू होना चाहिए, वेंकटरमणी ने कहा। यानी सिर्फ़ कार्यपालिका का बहुमत होने से समिति अवैध नहीं हो जाती। जस्टिस शर्मा ने इसे कॉलेजियम की आलोचना नहीं माना। उन्होंने इसे एक सिद्धांत की संगति जाँचने की कोशिश बताया।

जस्टिस शर्मा ने याचिकाकर्ताओं की एक और दलील ख़ारिज की। दलील थी कि पांच जजों की पीठ माँगना महज़ देरी की चाल है, क्योंकि याचिकाएँ दो साल से लंबित हैं। यह माँग पहले काउंटर हलफ़नामे में नहीं थी, यह भी सच है। पर देर से उठाई गई माँग से अनुच्छेद 145(3) की अनिवार्य शर्त ख़त्म नहीं होती, उन्होंने लिखा। अंत में उनका निष्कर्ष साफ़ था। धारा 7, 6 और 8 पर मामला मुख्य न्यायाधीश के पास जाए, पांच से कम जजों की पीठ के लिए नहीं।

अनूप बरनवाल की अस्थायी समिति की जगह धारा 7 ने प्रधानमंत्री का मंत्री बिठाया

अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ का फ़ैसला जस्टिस के एम जोसेफ़ की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार, 2 मार्च 2023 को सुनाया। यह याचिका 2015 में दाख़िल हुई थी। पीठ ने लिखा कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को संसद के बनाए क़ानून के अधीन रखता है। पर दशकों तक संसद ने ऐसा कोई क़ानून नहीं बनाया। इस ख़ालीपन को भरने के लिए पीठ ने अंतिम आदेश दिया: जब तक संसद क़ानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे, प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर। यह व्यवस्था तब तक ही चलनी थी, जब तक संसद अपना क़ानून नहीं बना लेती।

संसद ने क़ानून बनाया। धारा 7 की तीन-सदस्यीय चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश की जगह नहीं है। धारा 7(1) के शब्द हैं: प्रधानमंत्री अध्यक्ष होंगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता सदस्य होंगे, और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री तीसरे सदस्य होंगे। यानी मुख्य न्यायाधीश की जगह अब प्रधानमंत्री के अपने चुने मंत्री की है। धारा 6 एक "सर्च कमेटी" बनाती है, जिसकी अगुवाई क़ानून मंत्री करते हैं। यह कमेटी पांच नामों का पैनल चयन समिति को भेजती है। धारा 8(2) चयन समिति को इस पैनल के बाहर के किसी नाम पर भी विचार करने की छूट देती है।

नए संसद भवन का बाहरी दृश्य, मई 2023 की तस्वीर; दिसंबर 2023 में यहीं यह क़ानून पास हुआ, जिसकी धारा 7 पर आज का पूरा विवाद टिका है
तस्वीर: Ministry of Parliamentary Affairs, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

जस्टिस शर्मा ने अपनी राय में एक बारीक़ फ़र्क़ रेखांकित किया। अनूप बरनवाल की व्यवस्था ख़ुद अस्थायी थी। इसलिए संसद का नया क़ानून उस फ़ैसले को पलटता नहीं, यह जस्टिस शर्मा का तर्क है। व्यवस्था अस्थायी न होती, तो नतीजा शायद कुछ और होता, यह भी उन्होंने जोड़ा। सवाल यह नहीं है कि संसद ने अदालत की बात मानी या नहीं। सवाल यह है कि संसद की नई व्यवस्था ख़ुद संविधान की कसौटी पर टिकती है या नहीं। यही सवाल आज अनसुलझा रह गया।

विधेयक में एक बदलाव अटक गया, दूसरा ख़ुद सरकार ने पलट दिया

संसद में क़ानून बनने से पहले जो हुआ, वह उतना ही बताता है जितना क़ानून का अंतिम रूप। राज्यसभा में सांसद मनोज कुमार झा ने धारा 7 में एक संशोधन का नोटिस दिया था। प्रस्ताव था: "प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री" शब्दों की जगह "मुख्य न्यायाधीश" शब्द रखे जाएँ। यानी अनूप बरनवाल की तीन-सदस्यीय व्यवस्था लौटा दी जाए। यह संशोधन सोमवार, 11 दिसंबर 2023 को राज्यसभा के काग़ज़ात में दर्ज हुआ। यह पास नहीं हुआ। धारा 7 अपने मूल रूप में ही क़ानून बनी।

एक दूसरा बदलाव भी हुआ, और वह सरकार की अपनी तरफ़ से आया। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के पेश किए विधेयक में चुनाव आयुक्तों का वेतन कैबिनेट सचिव के बराबर रखने का प्रस्ताव था। 1991 के पुराने क़ानून में यह वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर था। मेघवाल ने ख़ुद राज्यसभा में एक संशोधन का नोटिस दिया। इसमें "कैबिनेट सचिव" की जगह "सुप्रीम कोर्ट के जज" शब्द वापस रखने का प्रस्ताव था। यह संशोधन पास हुआ। आज भी धारा 10 में आयुक्तों का वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर दर्ज है, वही जो 1991 से चला आ रहा था।

दोनों तथ्य साथ रखने पर तस्वीर पूरी बनती है। चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव जस का तस पास हुआ। आयुक्तों के दर्जे और वेतन को घटाने का प्रस्ताव संसद में ही पलट दिया गया। एक बदलाव अटका, दूसरा ख़ुद सरकार ने वापस लिया। दोनों साथ न रखें, तो कहानी अधूरी रह जाती है।

पांच जजों की शर्त अनुच्छेद 145(3) में है, आज के आदेश में तादाद तय नहीं हुई

संविधान का अनुच्छेद 145(3) कहता है: संविधान की व्याख्या से जुड़ा कोई गंभीर सवाल तय करने के लिए, या अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति संदर्भ पर राय देने के लिए, कम से कम पांच जज बैठने चाहिए। यह संख्या संविधान में तय है। इससे कम नहीं हो सकती। पर इससे ज़्यादा हो सकती है, और अक्सर होती भी है।

दिलचस्प यह है: याचिकाकर्ता और सरकार, दोनों ने अपनी दलील के लिए एक जैसे पुराने फ़ैसलों का सहारा लिया। दोनों ने पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ (2003), रहीमतूला (1959) और श्रीमंत बालासाहेब पाटिल (2020) का हवाला दिया। याचिकाकर्ताओं ने कहा: इन फ़ैसलों के मुताबिक़ सिर्फ़ मामला संवैधानिक होने से पांच जजों की पीठ नहीं बनती। सरकार के वकीलों ने कहा: इन्हीं फ़ैसलों में यह शर्त भी है कि सवाल पहले से तय न हो तो पांच जजों की पीठ ज़रूरी है, और यहाँ ठीक वही स्थिति है। एक ही मिसाल से दोनों पक्षों ने अपनी बात निकाली। इससे विवाद की असली प्रकृति पता चलती है: दोनों पक्ष क़ानून के शब्दों को एक जैसा पढ़ते हैं, बहस सिर्फ़ इस पर है कि आज के तथ्य उन पर कैसे बैठते हैं।

आज के आदेश में एक बात ध्यान देने लायक़ है। दोनों जजों ने मुख्य न्यायाधीश से "पांच जजों की पीठ" बनाने को नहीं कहा। आदेश के शब्द अलग हैं: उतने जजों की संविधान पीठ, जितनी ज़रूरी समझी जाए। यानी संख्या तय करना मुख्य न्यायाधीश पर छोड़ा गया है। सुप्रीम कोर्ट हाल में एक मामले में सात जजों की पीठ से नौ जजों की पीठ तक जा चुकी है। तो पांच का आंकड़ा फ़िलहाल सिर्फ़ न्यूनतम है, तय संख्या नहीं।

ढाई साल में यह मामला सात पीठों के सामने गया, दो मुख्य न्यायाधीशों ने ख़ुद को अलग रखा

डॉ. जया ठाकुर ने अपनी याचिका 2 जनवरी 2024 को दाख़िल की, क़ानून बनने के पाँच दिन के भीतर। एडीआर और बाक़ी याचिकाकर्ता जल्दी जुड़ गए। पहली सुनवाइयों में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने क़ानून पर रोक लगाने से इनकार किया। यह इनकार लिखित आदेश में शुक्रवार, 22 मार्च 2024 को दर्ज हुआ। पीठ ने लिखा कि क़ानून की सांविधानिकता की जाँच के दौरान अदालतें सावधानी बरतती हैं। रोक अपवाद है, नियम नहीं, जब तक क़ानून ऊपर से ही साफ़ असंवैधानिक न दिखे। पीठ ने यह भी लिखा: उस साल अप्रैल-जून में होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए रोक लगाना भ्रम पैदा करेगा।

इसके बाद मामला कई हाथों से गुज़रा। दिसंबर 2024 में यह मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस पी. वी. संजय कुमार की पीठ के सामने आया। पर ख़ुद मुख्य न्यायाधीश खन्ना ने ख़ुद को इससे अलग कर लिया। मार्च 2026 में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने भी ख़ुद को अलग रखा। आख़िरकार मामला जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा के पास पहुँचा। इस पीठ ने पाँच दिन दलीलें सुनीं: 6, 7, 14, 27 मई और 30 जुलाई 2026। फ़ैसला बुधवार को आया।

दोनों जजों ने आदेश में ख़ुद इस देरी पर सवाल उठाया। उन्होंने याद दिलाया कि अनूप बरनवाल का मामला 2015 में दाख़िल हुआ, 2018 में बड़ी पीठ के पास भेजा गया, और फ़ैसला 2023 में आया। कुल आठ साल लगे। उन्होंने अपने ही एक और मामले का ज़िक्र किया, उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह। उसमें एक सवाल 2002 से लंबित था। सात जजों की पीठ से नौ जजों की पीठ तक पहुँचने में नौ साल लगे। वहाँ से फ़ैसला आने में पाँच महीने और लगे। इतनी देरी संस्था के लिए शर्मिंदगी का विषय है, दोनों जजों ने लिखा। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से एक स्थायी संविधान पीठ बनाने पर विचार करने को कहा, ताकि आगे ऐसे मामले बरसों न अटकें।

यही समिति मार्च 2024 में एक बार असल में काम करके दिखा चुकी है

चयन समिति में विपक्ष के नेता की भूमिका दिखावटी रह जाने की दलील आज दर्ज हुई। इसका एक असली उदाहरण इसी मुक़दमे की फ़ाइल में है। मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने अचानक इस्तीफ़ा दे दिया। एक अन्य आयुक्त, सतीश चंद्र पांडे, फ़रवरी में ही रिटायर हो चुके थे। तीन सदस्यों वाला चुनाव आयोग सिमटकर सिर्फ़ मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार तक रह गया। यह ठीक उसी हफ़्ते हुआ। उसी हफ़्ते लोकसभा चुनाव की तारीख़ें भी तय होनी थीं।

डॉ. ठाकुर और एडीआर को आशंका थी: सरकार इस ख़ाली जगह का फ़ायदा उठाकर जल्दबाज़ी में नियुक्ति कर देगी। दोनों ने 11 और 12 मार्च को नई अर्ज़ियाँ दाख़िल कीं। 13 मार्च को जस्टिस खन्ना की पीठ ने 15 मार्च को तुरंत सुनवाई पर सहमति दी। पर उस सुनवाई से एक दिन पहले, 14 मार्च को, राष्ट्रपति ने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को नए चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया। दोनों नाम उसी नई समिति ने चुने थे: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह प्रधानमंत्री के नामित सदस्य के तौर पर, और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी।

राष्ट्रपति भवन का अग्रभाग, जून 2022 की तस्वीर; मार्च 2024 में इसी दफ़्तर से ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति की अधिसूचना जारी हुई थी
तस्वीर: President's Secretariat, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

चौधरी ने बैठक के बाद एक असहमति नोट दर्ज कराया। पैनल के नामों की सूची उन्हें बैठक से सिर्फ़ दस मिनट पहले मिली, उनका कहना था। दस मिनट में तीन नामों पर राय बनानी थी। यह वाक़या आज के आदेश का हिस्सा नहीं है। पर यह ठीक वही जोखिम दिखाता है जिसकी बात जस्टिस दत्ता ने की। समिति का बहुमत एक ही पक्ष के पास हो, तो तीसरे सदस्य की मौजूदगी काग़ज़ पर रहती है। फ़ैसले में नहीं।

आगे की कोई तारीख़ अभी तय नहीं

फ़िलहाल कोई समयसीमा तय नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत को तय करना है कि संविधान पीठ बने या नहीं, और बने तो कितने जजों की। दिलचस्प यह भी है: वे ख़ुद इसी मामले से पहले अलग हो चुके हैं। प्रशासनिक आदेश किसके हाथ से निकलेगा, यह भी देखने की बात होगी। जो भी पीठ बने, उसे धारा 7, 6 और 8 पर दलीलें नए सिरे से सुननी होंगी। आज सिर्फ़ इतना तय हुआ कि सुनवाई कौन करेगा। दलीलें क्या हैं, यह तय नहीं हुआ। दोनों जजों ने स्थायी संविधान पीठ का जो सुझाव दिया, वह बाध्यकारी निर्देश नहीं है। उसे मानना या न मानना मुख्य न्यायाधीश पर निर्भर है।

तब तक 2023 का क़ानून पूरी तरह लागू है। कोई रोक नहीं है। ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बने रहेंगे, और सुखबीर सिंह संधू आयुक्त। दोनों का कार्यकाल आज के आदेश से अप्रभावित है, भले ही जिस समिति ने उन्हें चुना उसी की सांविधानिकता अदालत में लंबित है। बदला है सिर्फ़ इतना कि ढाई साल पुराना यह सवाल अब एक पीढ़ी आगे बढ़ गया है, नए सिरे से, किसी और पीठ के सामने।

स्रोतसुप्रीम कोर्ट का आज का आदेश, रिट याचिका (सिविल) 14/2024 व जुड़े मामले, 2026 INSC 1040, 23 सितंबर 2026 को हस्ताक्षरित; सुप्रीम कोर्ट की अपनी वेबसाइट कैप्चा के पीछे है, यह प्रति सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर के दस्तावेज़ भंडार से पढ़ी गई, दोनों जजों की पूरी अलग राय और साझा आदेश सहित, सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर, मामले की समयरेखा: सुनवाइयों की तारीख़ें और दोनों मुख्य न्यायाधीशों के अलग होने का रिकॉर्ड, आज पढ़ी गई, सुप्रीम कोर्ट, जस्टिस संजीव खन्ना व जस्टिस दीपांकर दत्ता का आदेश, 2024 INSC 246, 22 मार्च 2024: रोक की सभी अर्ज़ियाँ ख़ारिज, अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ, (2023) 6 SCC 161, सुप्रीम कोर्ट, 2 मार्च 2023 का मूल फ़ैसला, इंडियन कानून पर पढ़ा गया, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग II खंड 1: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 (अधिनियम संख्या 49/2023), 28 दिसंबर 2023 का पूरा पाठ, राज्यसभा सचिवालय, संशोधनों की सूचना (लिस्ट 5 व 6), 11 दिसंबर 2023: सांसद मनोज कुमार झा का संशोधन 30, और मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के संशोधन 34-35, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, विधेयक पर टिप्पणी और चयन-समिति की तुलना तालिका, संविधान का अनुच्छेद 145(3), इंडियन कानून पर मूल पाठ, संविधान का अनुच्छेद 324(2), इंडियन कानून पर मूल पाठ, द इंडियन एक्सप्रेस, अनंतकृष्णन जी, 23 सितंबर 2026, दोपहर 3:27 बजे अपडेट: आदेश के अंशों समेत सुनवाई का ब्योरा, द इंडियन एक्सप्रेस, अमाल शेख़, 23 सितंबर 2026, रात 9:16 बजे अपडेट: फ़ैसले के मुख्य बिंदुओं की व्याख्या, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 23 सितंबर 2026: इसी रिपोर्ट में एक जगह 'फ़ैसला सुरक्षित रखा गया' और कुछ पंक्ति पहले 'जस्टिस दत्ता ने कहा कि पीठ भेजने की ज़रूरत नहीं' दोनों दर्ज हैं, यह विरोधाभास लेख में नोट किया गया है

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