बीमा की नई बिक्री अगस्त में एक-तिहाई बढ़ी, उसी हफ़्ते नियामक ने 2019 की एक जाँच पर एक करोड़ का जुर्माना तय किया
इरडा ने आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। आदेश सितंबर 2019 की एक जाँच से निकला है और उसके केंद्र में 709.57 करोड़ रुपये का एक ख़र्च मद है। उसी हफ़्ते जीवन बीमा परिषद के आँकड़े आए, जिनमें अगस्त का नया कारोबार प्रीमियम 33.07 फ़ीसदी बढ़ा दिखा। बढ़त जिस महीने पर से नापी गई है, वह महीना ख़ुद 5.2 फ़ीसदी गिरा था।

709.57 करोड़ रुपये, एक साल में, एक ही ख़र्च मद में। आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2018-19 में इतनी रक़म 'सेल्स मार्केटिंग एंड बिज़नेस सपोर्ट' के नाम पर किताबों में दर्ज की। नियामक के सामने सुनवाई में कंपनी ने माना कि इसमें से लगभग 35 से 37 करोड़ रुपये दूसरी बीमा कंपनियों के व्यक्तिगत एजेंटों को इवेंट मैनेजमेंट की सेवाओं के बदले गए थे। बाक़ी 672.57 से 674.57 करोड़ रुपये का ब्योरा नियामक को नहीं मिला।
7 सितंबर 2026 को भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण ने इसी पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।
उसी हफ़्ते एक दूसरा आँकड़ा आया। जीवन बीमा परिषद के मासिक आँकड़ों में अगस्त 2026 का नया कारोबार प्रीमियम 41,197.78 करोड़ रुपये दर्ज हुआ, पिछले अगस्त से 33.07 फ़ीसदी ऊपर। दोनों ख़बरें अलग-अलग छपीं। साथ रखने पर बेचने और हिसाब माँगने की दो अलग रफ़्तारें दिखती हैं।
एक मद, दो लाख से ज़्यादा लेन-देन
आदेश के पैराग्राफ़ 3.4.5 में एक ब्योरा है जिसे ख़बरों ने नहीं उठाया। जाँच रिपोर्ट के अनुलग्नक A46 से A48 तक जो बहीखाता है, उसमें दो लाख से अधिक लेन-देन दर्ज मिले, जिनमें कुछ ऋणात्मक प्रविष्टियाँ भी थीं। नमूने की जाँच में यह भी तय हुआ कि दूसरी कंपनियों के एजेंटों को कार्यक्रम कराने के बदले वित्त वर्ष 2017-18 में भी कम से कम 2.35 करोड़ रुपये गए। जिसे कंपनी एक साल का मामला बताती रही, आदेश उसे पिछले साल तक फैलाता है।
जाँच 2019 में, आदेश 2026 में
तारीख़ों की क़तार अपने आप में एक तथ्य है। ऑनसाइट निरीक्षण 16 से 27 सितंबर 2019 के बीच हुआ। निरीक्षण रिपोर्ट 29 नवंबर 2019 को कंपनी को भेजी गई, जवाब 21 जनवरी 2020 को आया। इसके बाद कारण बताओ नोटिस चार साल से ज़्यादा रुका रहा और 8 जुलाई 2024 को जारी हुआ। पहली व्यक्तिगत सुनवाई 9 अक्टूबर 2024, पूरक नोटिस 17 दिसंबर 2024, दूसरी सुनवाई 25 मार्च 2025, आख़िरी लिखित जवाब 25 अप्रैल 2025। आदेश उसके सोलह महीने बाद आया।
मूल आदेश इस डेस्क ने नहीं देखा
एक बात साफ़ दर्ज होनी चाहिए। इरडा की वेबसाइट irdai.gov.in इस मशीन से खुलती नहीं, हर अनुरोध पर 403 लौटता है। आदेश का जो पाठ यहाँ पढ़ा गया, वह टैक्सगुरु नाम के कर और कॉरपोरेट क़ानून पोर्टल पर 8 सितंबर 2026 को छपी पूरी नक़ल है, जिसमें इरडा की प्रेस विज्ञप्ति और आदेश दोनों हैं। विज्ञप्ति ख़ुद कहती है कि विस्तृत आदेश इरडा की साइट पर दस्तावेज़ संख्या 9819555 के तहत रखा है। यहाँ के सभी उद्धरण उसी नक़ल से हैं, मूल पीडीएफ़ से मिलान नहीं हो सका।
परिभाषा जिस पर पूरा आरोप टिका है
पूरा विवाद एक वाक्य पर घूमता है। इरडा (भारतीय बीमाकर्ताओं द्वारा गतिविधियों की आउटसोर्सिंग) विनियम, 2017 का नियम 4(i)(e) आउटसोर्सिंग को इस तरह परिभाषित करता है: किसी तीसरे पक्ष का उपयोग ऐसी गतिविधियाँ करने के लिए जो सामान्यतः बीमाकर्ता ख़ुद करता, अभी या आगे। कंपनी का तर्क था कि सम्मेलन, संगोष्ठी और ग्राहक-संपर्क कार्यक्रम बीमा कंपनी का काम ही नहीं, इसलिए यह परिभाषा लागू नहीं होती। आदेश ने इसे ख़ारिज करते हुए लिखा कि ऐसे कार्यक्रम ग्राहक-जुड़ाव, ब्रांड की साख और अनुपालन-संवाद को सीधे छूते हैं।
दूसरी कंपनियों के एजेंट, और जुर्माने से ग़ायब प्रावधान
कारण बताओ नोटिस में पाँच सिरे थे: बीमा अधिनियम 1938 की धारा 40(1), कमीशन विनियम 2016 का नियम 6(a), आउटसोर्सिंग विनियम 2017 के छह नियम, कॉरपोरेट गवर्नेंस दिशानिर्देश 2016 का खंड 6, और 19 सितंबर 2018 के इरडा परिपत्र का खंड 4(b)। जुर्माना लगाने वाला पैराग्राफ़ 3.4.19 और फ़ैसले की सारणी सिर्फ़ दो का नाम लेती है: आउटसोर्सिंग विनियम और गवर्नेंस दिशानिर्देश। धारा 40(1), नियम 6(a), 2018 का परिपत्र और आउटसोर्सिंग विनियम का नियम 9, चारों जुर्माने के आधार में दर्ज नहीं हैं।
सौ की जगह 560, हज़ार की जगह पाँच हज़ार

आदेश में दो आँकड़े बहस को ठोस बना देते हैं। एक कार्यक्रम में उपस्थिति सौ से बढ़कर 560 हो गई, यानी पाँच गुना। एक जगह अनुबंध में तय दर एक हज़ार रुपये थी और बिल पाँच हज़ार का बना। कंपनी ने कहा कि आयोजनों में भीड़ अनुमान से ज़्यादा हो जाती है और कार्यक्रम खिंच जाए तो जगह का किराया बढ़ता है। नियामक ने जवाब दिया कि ख़र्च की ऊपरी सीमा बाँधने या पहले से मंज़ूरी लेने की व्यवस्था कंपनी के पास नहीं थी।
पाँच साल काग़ज़ रखने की शर्त
2016 से 2018 के बीच के बिलों में जो अंतर मिले, उनकी वजह कंपनी बता नहीं सकी। उसने कहा कि कर्मचारी छोड़कर चले गए, प्रबंधन बदल गया और आईटी उपकरण नहीं बचे। आदेश ने यह तर्क नहीं माना और आउटसोर्सिंग विनियम 2017 के नियम 17(iv) का हवाला दिया, जिसके तहत बीमाकर्ता को अनुबंध की अवधि ख़त्म होने के बाद पाँच साल तक दस्तावेज़ सुरक्षित रखने होते हैं। नियामक ने जोड़ा कि 2019 के निरीक्षण में जिन लेन-देन पर सवाल उठा, उनके काग़ज़ रखे जाने चाहिए थे।
443 करोड़ जो किसी पॉलिसी से नहीं जुड़े
दूसरा आरोप प्रीमियम के आवंटन से जुड़ा है। 31 मार्च 2019 को कंपनी के पास कॉरपोरेट डिपॉज़िट के रूप में 443 करोड़ रुपये ऐसे पड़े थे जो 23 सितंबर 2019 तक किसी पॉलिसी से नहीं जोड़े गए थे। एक साल पहले यह रक़म 277 करोड़ रुपये थी। नमूने की जाँच में लगभग दस करोड़ बिना आवंटन के मिले। आदेश का निष्कर्ष है कि प्रीमियम को सही जोखिम या पॉलिसी से जोड़ने, या प्रस्ताव जमा राशि लौटाने की लेखांकन और नियंत्रण व्यवस्था ठीक नहीं थी।
सौ रुपये से कम की वापसी, और एक जोड़ जो नहीं मिलता
इसी आरोप के जवाब में कंपनी ने बताया कि दस करोड़ रुपये में से 5.25 करोड़ सरकारी कारोबार से थे और 6.40 करोड़ ग़ैर-सरकारी कारोबार से। दोनों का योग 11.65 करोड़ बैठता है, यानी उस लगभग दस करोड़ से सवा करोड़ ज़्यादा जिसका वह जवाब दे रही थी। आदेश इस अंतर पर कुछ नहीं कहता। सौ रुपये से कम की वापसियों पर कंपनी ने कहा कि लौटाने की लागत रक़म से ऊपर चली जाती है, और साधारण बीमा परिषद ने सीमा सौ रुपये करने का प्रस्ताव दिया है।
फ़्री-लुक के पंद्रह दिन
तीसरा आरोप पॉलिसी लौटाने के अधिकार से जुड़ा है। पॉलिसीधारकों के हितों के संरक्षण विनियम 2017 के नियम 16(3) के तहत फ़्री-लुक रद्दीकरण की रक़म पंद्रह दिन में लौटानी होती है। जाँच में चौदह मामलों का नमूना लिया गया, सभी में देर मिली। कंपनी ने बताया कि ग्यारह में तकनीकी ख़राबी से भुगतान अटका रहा, जो मिलान के समय पकड़ा गया और 29 अक्टूबर 2018 को पूरा प्रीमियम लौटा दिया गया। इन दोनों आरोपों पर जुर्माना नहीं, सलाह जारी हुई।
कंपनी का जवाब और अपील का रास्ता
आदेश की सूचना कंपनी ने 7 सितंबर 2026 को ही शेयर बाज़ारों को दी। उसका कहना है कि आदेश का वित्तीय असर एक करोड़ रुपये तक सीमित है, कामकाज पर असर नहीं पड़ेगा, और वह आदेश का परीक्षण कर रही है। 8 सितंबर को शेयर 1,483 रुपये पर था, पिछले सत्र से 0.70 फ़ीसदी नीचे। जुर्माना 45 दिन में शेयरधारक कोष से चुकाना है, आदेश अगली बोर्ड बैठक में रखना है, 90 दिन में कार्रवाई रिपोर्ट देनी है। अपील धारा 110 के तहत प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण में हो सकती है।
अब दूसरा आँकड़ा
अगस्त 2026 में जीवन बीमा कंपनियों का नया कारोबार प्रीमियम 41,197.78 करोड़ रुपये रहा। इसमें भारतीय जीवन बीमा निगम का हिस्सा 23,275.43 करोड़ रुपये था, जो 45.26 फ़ीसदी की बढ़त है। निजी कंपनियों ने 17,922.25 करोड़ रुपये जुटाए, बढ़त लगभग 20 फ़ीसदी। आँकड़े जीवन बीमा परिषद ने जारी किए। अप्रैल से अगस्त तक की अवधि में उद्योग का नया कारोबार प्रीमियम 1.96 लाख करोड़ रुपये रहा, 20.4 फ़ीसदी ऊपर। इसमें निजी कंपनियों के 80,005.3 करोड़ रुपये हैं और निगम के 1.16 लाख करोड़ रुपये।
तैंतीस फ़ीसदी किस महीने पर से
अब उस महीने को देखिए जिस पर से यह बढ़त नापी गई है। अगस्त 2025 में जीवन बीमा कंपनियों का नया कारोबार प्रीमियम 30,959 करोड़ रुपये था, उससे पिछले अगस्त से 5.2 फ़ीसदी नीचे। गिरावट की वजह निगम था, जिसका प्रीमियम 17 फ़ीसदी गिरकर 16,023 करोड़ रुपये रह गया था। निगम के समूह एकल प्रीमियम में 26 फ़ीसदी की गिरावट आई थी और पूरा समूह बीमा खंड 21.3 फ़ीसदी नीचे था। जो 45.26 फ़ीसदी की छलाँग इस अगस्त में दिखी, वह उसी गिरे हुए आधार पर खड़ी है।
जुलाई का आँकड़ा अगस्त से बड़ा था
एक और तुलना सुर्ख़ी में नहीं आती। जुलाई 2026 में जीवन बीमा कंपनियों का नया कारोबार प्रीमियम 47,005 करोड़ रुपये था और बढ़त 20.7 फ़ीसदी। अगस्त में रक़म घटकर 41,197.78 करोड़ रुपये रह गई, पर बढ़त की दर 33.07 फ़ीसदी हो गई। यानी महीने-दर-महीने कारोबार लगभग छह हज़ार करोड़ रुपये सिकुड़ा और उसी समय सालाना बढ़त की दर तेरह अंक चढ़ गई। अप्रैल 2026 में यह दर 39 फ़ीसदी थी। एक ही श्रृंखला के भीतर दर और रक़म उलटी दिशाओं में चल रही हैं।
एक ही दिन, एक ही स्रोत, दो अलग आँकड़े
पिछले साल इसी विज्ञप्ति पर बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 9 सितंबर 2025 को दो रिपोर्टें छापीं। एक, पीटीआई की, कहती है कि अगस्त 2025 में नया कारोबार प्रीमियम 6.01 फ़ीसदी बढ़कर 1,63,461.52 करोड़ रुपये हो गया, पिछले साल इसी अवधि में यह 1,54,193.76 करोड़ था। दूसरी, अख़बार के अपने संवाददाता की, कहती है कि प्रीमियम 5.2 फ़ीसदी गिरकर 30,959 करोड़ रुपये रह गया। दोनों जीवन बीमा परिषद के आँकड़ों का हवाला देती हैं। यह टकराव यहाँ दर्ज है, सुलझाया नहीं गया।
जोड़ में दस लाख का फ़र्क़
7 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में तीन आँकड़े एक साथ छपे हैं: कुल 41,197.78 करोड़ रुपये, निगम 23,275.43 करोड़ और निजी कंपनियाँ 17,922.25 करोड़। दोनों हिस्सों को जोड़ने पर 41,197.68 करोड़ बनते हैं। कुल और जोड़ के बीच दस लाख रुपये का अंतर रह जाता है। प्रकाशित रूप में तीनों संख्याएँ आपस में नहीं मिलतीं। परिषद के मूल मासिक विवरण से मिलान इस डेस्क से नहीं हो सका, इसलिए यहाँ सिर्फ़ अंतर दर्ज किया जा रहा है।
प्रीमियम ऊपर, पॉलिसियाँ नीचे

अप्रैल से अगस्त तक जीवन बीमा कंपनियों ने 95 लाख पॉलिसियाँ जारी कीं, पिछले साल से 2.57 फ़ीसदी ज़्यादा। इसमें निगम की 58.1 लाख हैं, जो 1.67 फ़ीसदी कम हैं, और निजी कंपनियों की 36.8 लाख, जो 10.88 फ़ीसदी ज़्यादा। निगम का प्रीमियम इसी अवधि में 19.14 फ़ीसदी बढ़ा है और पॉलिसियों की गिनती घटी है। यह जोड़ी नई नहीं है। इरडा की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार उस साल व्यक्तिगत नई पॉलिसियाँ 7.39 फ़ीसदी घटकर 270.22 लाख रह गईं, निगम की 12.80 फ़ीसदी गिरकर 177.83 लाख।
एकल प्रीमियम का भार
मासिक आँकड़े इतना उछलते क्यों हैं, इसका जवाब उसी रिपोर्ट में है। 2024-25 में जीवन बीमा उद्योग का कुल नया कारोबार प्रीमियम 3,97,763.94 करोड़ रुपये था, जिसमें एकल प्रीमियम अकेले 2,72,726.68 करोड़ रुपये था। यानी नए कारोबार का लगभग दो-तिहाई हिस्सा एक बार में चुकाई जाने वाली रक़म से आता है, और उसका बड़ा भाग समूह बीमा से। समूह कारोबार में सीधी बिक्री का हिस्सा 84.52 फ़ीसदी है और निगम के मामले में 97.58 फ़ीसदी। एक बड़ा समूह सौदा किसी भी महीने की तस्वीर बदल देता है।
किस कंपनी ने कितना बढ़ाया
निजी कंपनियों के भीतर रफ़्तार एक जैसी नहीं। बजाज का प्रीमियम 31.6 फ़ीसदी बढ़कर 1,953.99 करोड़ रुपये हुआ, एचडीएफ़सी लाइफ़ का 17.8 फ़ीसदी बढ़कर 3,609.5 करोड़, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ़ का दस फ़ीसदी बढ़कर 1,952.8 करोड़ और ऐक्सिस मैक्स लाइफ़ का 8.11 फ़ीसदी बढ़कर 1,236.5 करोड़। सबसे बड़ी निजी जीवन बीमा कंपनी एसबीआई लाइफ़ की बढ़त 2.83 फ़ीसदी रही, रक़म 3,415.4 करोड़ रुपये। पिछले अगस्त में यही कंपनी 23 फ़ीसदी बढ़ी थी। बजाज को 2025 की रिपोर्ट बजाज आलियांज़ लाइफ़ लिखती है और 2026 की बजाज लाइफ़।
पैठ 2.8 से 2.7 फ़ीसदी
बिक्री के आँकड़ों के बग़ल में एक तीसरा आँकड़ा रखिए। इरडा की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2024-25 में जीवन बीमा की पैठ, यानी जीडीपी में प्रीमियम का अनुपात, 2.8 फ़ीसदी से घटकर 2.7 फ़ीसदी रह गई। साधारण बीमा की पैठ एक फ़ीसदी पर टिकी रही, कुल पैठ 3.7 फ़ीसदी पर। दुनिया का औसत उसी बरस जीवन बीमा में तीन फ़ीसदी था। प्रति व्यक्ति जीवन बीमा प्रीमियम भारत में 72 डॉलर रहा, दुनिया में 388 डॉलर। प्रीमियम की रक़म बढ़ी है, अर्थव्यवस्था के अनुपात में हिस्सा घटा है।
बीमा भरोसा पोर्टल पर 2,57,790 शिकायतें
2024-25 में इरडा के बीमा भरोसा पोर्टल पर 2,57,790 शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें 1,20,429 जीवन बीमा से जुड़ी थीं और 1,37,361 साधारण तथा स्वास्थ्य बीमा से। प्रति लाख पॉलिसियों और जीवनों पर शिकायत की दर जीवन बीमा में 15.72 रही और साधारण तथा स्वास्थ्य बीमा में 5.29। जीवन बीमा कंपनियों के ख़िलाफ़ कुल शिकायतें 1,20,726 से घटकर 1,20,429 हुईं, पर अनुचित व्यापार व्यवहार की शिकायतें 23,335 से बढ़कर 26,667 हो गईं, यानी कुल का 22.14 फ़ीसदी, जो पिछले साल 19.33 फ़ीसदी था।
ग़लत बिक्री की शिकायतों का फ़ैसला
इसी वर्ग की 26,495 शिकायतें साल भर में निपटीं। इनमें 9,613 पॉलिसीधारक के पक्ष में गईं, 1,797 आंशिक रूप से पक्ष में, और 15,085 पॉलिसीधारक के विरुद्ध। यानी अनुचित व्यापार व्यवहार की जितनी शिकायतें निपटाई गईं, उनमें से आधे से ज़्यादा में शिकायत करने वाले को कुछ नहीं मिला। साल के अंत में इस वर्ग की 172 शिकायतें लंबित थीं। इरडा की रिपोर्ट ग़लत बिक्री को क्षेत्र की एक बड़ी समस्या बताती है और बीमा कंपनियों को मूल कारण का विश्लेषण करने की सलाह दोहराती है।
मौत के दावे: गिनती और रक़म
एक और जगह गिनती और रक़म अलग कहानी कहती हैं। 2024-25 में व्यक्तिगत जीवन बीमा में कुल 10,34,455 मृत्यु दावे आए, जिनमें 10,11,880 यानी 97.82 फ़ीसदी चुकाए गए। रक़म के हिसाब से 34,995 करोड़ रुपये में से 33,697 करोड़ यानी 96.29 फ़ीसदी चुकाए गए। पर जो दावे बीमा अधिनियम की धारा 45 के तहत नामंज़ूर हुए, वे संख्या में 1.01 फ़ीसदी थे और रक़म में 2.74 फ़ीसदी। बड़ी रक़म वाले दावों के नामंज़ूर होने की दर छोटी रक़म वालों से ऊँची बैठती है।
314 कार्रवाइयाँ, 20 जुर्माने
नियामक की कार्रवाई का अनुपात भी रिपोर्ट में है। 2024-25 में इरडा ने 15 ऑनसाइट निरीक्षण किए, जिनमें एक केंद्रित, छह सामान्य और आठ विषय-आधारित थे। इनमें कोई जीवन बीमा कंपनी नहीं थी: पाँच साधारण बीमाकर्ता, चार स्वास्थ्य बीमाकर्ता, तीन ब्रोकर, तीन कॉरपोरेट एजेंट। साल भर में 38 निरीक्षण रिपोर्टें पूरी हुईं और उन पर 314 नियामकीय कार्रवाइयाँ हुईं। इनमें 169 सलाह, 98 चेतावनी-पत्र, 25 निर्देश, दो वॉर्निंग और सिर्फ़ 20 जुर्माने थे। लोम्बार्ड का आदेश उसी साँचे में बैठता है: तीन आरोप, एक जुर्माना, दो सलाह।
पिछले बरस किन पर, कितना
अनुलग्नक 9 में 2024-25 के दस जुर्माने नाम और तारीख़ के साथ दर्ज हैं। गो डिजिट जनरल इंश्योरेंस पर एक करोड़ रुपये, 2 मई 2024। एगॉन (बंधन) लाइफ़ पर एक करोड़, 15 जुलाई 2024। बजाज फ़ाइनेंस पर दो करोड़ उसी दिन। एचडीएफ़सी लाइफ़ पर दो करोड़, 1 अगस्त 2024। एसबीआई लाइफ़ पर एक करोड़, 6 सितंबर 2024। मार्श इंडिया ब्रोकर्स पर एक करोड़, 14 अक्टूबर 2024, जिस पर मामला अपीलीय अधिकरण में है। रॉयल सुंदरम पर एक करोड़, 23 जनवरी 2025। यूआईबी ब्रोकर्स पर एक करोड़, 19 फ़रवरी 2025। कुल जोड़ 10.42 करोड़ रुपये।
वही नियम, तीसरी बार
इन प्रविष्टियों में एक दोहराव है। एचडीएफ़सी लाइफ़, एसबीआई लाइफ़ और रॉयल सुंदरम, तीनों पर जो उल्लंघन दर्ज है उसमें आउटसोर्सिंग विनियम 2017 का नियम 21 शामिल है, यानी आउटसोर्सिंग रिटर्न में गतिविधियाँ न बताना। लोम्बार्ड के इस आदेश में भी वही नियम 21 जुर्माने के आधार में है। एक ही चूक चार कंपनियों में लगातार दो वर्षों में पकड़ी गई। रिपोर्ट यह नहीं बताती कि रिटर्न का प्रारूप बदला गया या नहीं।
लोकपाल की सीमा और उसकी हद

जुर्माना सरकार के खाते में जाता है, पॉलिसीधारक के खाते में नहीं। शिकायत लेकर जाने की जगह बीमा लोकपाल है, जिसके देश भर में अठारह केंद्र हैं। बीमा लोकपाल नियम 2017 में संशोधन के बाद लोकपाल के फ़ैसले से मिलने वाले मुआवज़े की अधिकतम सीमा तीस लाख रुपये से बढ़ाकर पचास लाख कर दी गई है। लोकपाल को शिकायत मिलने के तीन महीने के भीतर फ़ैसला देना होता है, बीमा कंपनी को तीस दिन में पालन करना होता है। पालन न करने पर पाँच हज़ार रुपये प्रतिदिन का जुर्माना लगता है।
स्रोतटैक्सगुरु, 8 सितंबर 2026: इरडा के आदेश संख्या IRDAI/E&C/ORD/MISC/116/9/2026 (दिनांक 7 सितंबर 2026) और उससे जुड़ी प्रेस विज्ञप्ति का पूरा पाठ, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 7 सितंबर 2026, आथिरा वारियर: जीवन बीमा परिषद के अगस्त 2026 के आँकड़ों पर रिपोर्ट, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 9 सितंबर 2025, आथिरा वारियर: अगस्त 2025 में नए कारोबार प्रीमियम में 5.2 फ़ीसदी गिरावट पर रिपोर्ट, बिज़नेस स्टैंडर्ड / पीटीआई, 9 सितंबर 2025: उसी दिन उसी विज्ञप्ति पर 6.01 फ़ीसदी बढ़त बताती दूसरी रिपोर्ट, इरडा की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 (जीवन बीमा परिषद की वेबसाइट पर रखी पीडीएफ़), एंजेल वन, 8 सितंबर 2026: आईसीआईसीआई लोम्बार्ड की शेयर बाज़ार सूचना और कंपनी का बयान, द हिंदू बिज़नेसलाइन, 8 सितंबर 2026: जुर्माने और सलाह-पत्रों की ख़बर