नेस्ले के तीन शिशु उत्पादों पर एफ़एसएसएआई के तीन न्यायनिर्णयन मामले, आदेश अभी सार्वजनिक नहीं
शुक्रवार, 18 सितंबर को भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने नेस्ले इंडिया के तीन शिशु उत्पादों पर कार्रवाई की जानकारी अपने सोशल मीडिया खातों पर दी। नेस्ले इंडिया ने उसी शाम बीएसई और एनएसई को चिट्ठी भेजकर ख़बर को 'factually incorrect' बताया। दोनों के बीच जो प्रक्रिया है, उसे खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम का दसवाँ अध्याय न्यायनिर्णयन कहता है, और उसका एक भी काग़ज़ अभी सामने नहीं है।

शुक्रवार, 18 सितंबर को मनीकंट्रोल ने ख़बर लगाई कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने नेस्ले इंडिया के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई शुरू की है। उस पन्ने पर दो समय दर्ज हैं: बाइलाइन के साथ शाम 4 बजकर 14 मिनट, और पन्ने के पाँव में "first published" के आगे दोपहर 1 बजकर 14 मिनट। दोपहर 1 बजकर 18 मिनट पर, यानी पहले प्रकाशन के चार मिनट बाद, बीएसई के अपने चार्ट फ़ीड में कंपनी का भाव दिन के सबसे नीचे के दर्ज स्तर 1,333.70 रुपये पर पहुँचा। पिछले दिन का बंद भाव 1,372 रुपये था, यानी 2.79 फ़ीसदी की गिरावट। शाम 4 बजकर 17 मिनट 58 सेकंड पर बीएसई ने कंपनी से स्पष्टीकरण माँगा। जवाब 6 बजकर 41 मिनट 23 सेकंड पर आया।
उन घंटों का कोई काग़ज़ सार्वजनिक नहीं है।
एफ़एसएसएआई ने अपनी कार्रवाई की जानकारी उसी दिन इंस्टाग्राम और एक्स पर दी। इंडियन एक्सप्रेस की 19 सितंबर की रिपोर्ट में वह पोस्ट जड़ा हुआ है, और उसमें इतना ही लिखा है: "Legal action initiated against Nestle India Ltd over several non-compliances pertaining to the FSS Act." उसके साथ दो हैशटैग हैं, #FSSAINotice और #FSSAIAction। कोई आदेश संख्या नहीं, कोई तारीख़ नहीं, कोई धारा नहीं।
मनीकंट्रोल ने उसी दिन प्राधिकरण का विस्तृत बयान छापा। उसके मुताबिक़ यह "क़ानूनी कार्रवाई" तीन न्यायनिर्णयन मामले हैं, तीन अलग उत्पादों पर। दो मामले NAN Excella Pro Stage 1 और Lactogen Pro 1 के लेबल और ई-कॉमर्स पर मौजूद प्रचार सामग्री के दावों से जुड़े हैं। तीसरा मामला नेस्ले के बनाए फ़ॉलो-अप फ़ॉर्मूला के नमूने का है, जिसमें बायोटिन की मात्रा को अवमानक पाया गया।
न्यायनिर्णयन अदालत नहीं है। यह जुर्माना तय करने का अलग रास्ता है, और उसका पूरा ढाँचा अधिनियम में लिखा हुआ है। कौन तय करेगा, किस हद तक तय कर सकता है, कहाँ अपील होगी, और सूचीबद्ध कंपनी को बाज़ार को कब बताना पड़ेगा। यह पूरा ढाँचा पढ़ा जा सकता है। इस मामले का आदेश नहीं।
अधिनियम में सज़ा के दो रास्ते हैं, और यह दूसरा वाला है
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 में अपराध और जुर्माने नौवें अध्याय में हैं और उन्हें लागू करने के दो अलग रास्ते हैं। पहला रास्ता अभियोजन का है। धारा 42 उसकी प्रक्रिया बताती है: खाद्य सुरक्षा अधिकारी नमूना लेता है, खाद्य विश्लेषक चौदह दिन में रिपोर्ट भेजता है, नामित अधिकारी रिपोर्ट देखकर तय करता है कि उल्लंघन क़ैद से दंडनीय है या सिर्फ़ जुर्माने से, और क़ैद वाले मामलों में चौदह दिन के भीतर खाद्य सुरक्षा आयुक्त को अभियोजन की मंज़ूरी के लिए सिफ़ारिश भेजता है।
यह रास्ता अदालत में ख़त्म होता है। धारा 59 के तहत असुरक्षित खाद्य बेचने पर सज़ा चोट न पहुँचने की सूरत में छह महीने तक की क़ैद है, और उपभोक्ता की मौत होने पर कम से कम सात साल से आजीवन कारावास तक। वह सज़ा मजिस्ट्रेट या विशेष अदालत देती है।
दूसरा रास्ता दसवें अध्याय का है। इसमें अदालत नहीं आती। धारा 68 में जिसे न्यायनिर्णयन कहा गया है, वह प्रशासनिक अधिकारी के सामने चलने वाली कार्यवाही है, जिसका नतीजा दीवानी जुर्माना होता है, क़ैद नहीं। अधिनियम की धारा 50 से 58 तक के जुर्माने इसी रास्ते से लगते हैं।
बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 18 सितंबर को अपनी रिपोर्ट के परिचय-वाक्य में इसे "adjudication sanction" कहा। अधिनियम में यह शब्द-युग्म नहीं है। "sanction" वहाँ धारा 42(3) में आता है और वह अभियोजन की मंज़ूरी है, यानी पहला रास्ता। "adjudication" दसवें अध्याय का शीर्षक है, यानी दूसरा। मनीकंट्रोल में छपे प्राधिकरण के अपने वाक्य में लिखा है कि उसने तीनों उत्पादों पर "three separate adjudication cases" दायर किए हैं। अभियोजन का ज़िक्र कहीं नहीं है। तीनों मामले दूसरे रास्ते के हैं।
न्यायनिर्णयन अधिकारी को राज्य सरकार अधिसूचित करती है, एफ़एसएसएआई नहीं
धारा 68(1) का वाक्य छोटा है और उसमें तीन शर्तें एक साथ बैठी हैं। न्यायनिर्णयन अधिकारी अपर ज़िलाधिकारी के दर्जे से नीचे का नहीं हो सकता। वह उस ज़िले का होगा जहाँ कथित अपराध हुआ है। और उसे राज्य सरकार अधिसूचित करेगी, केंद्र सरकार की तय की हुई रीति से।
इस एक वाक्य से तीन बातें निकलती हैं। एफ़एसएसएआई ख़ुद जुर्माना नहीं लगाती। मामला किसी एक ज़िले में बैठता है, पूरे देश में नहीं। और वह ज़िला इस पर निर्भर करता है कि कथित उल्लंघन कहाँ हुआ माना जाए, जो लेबल के मामले में छपाई की जगह भी हो सकती है और बिक्री की भी।
प्राधिकरण की पोस्ट में ज़िले का नाम नहीं है। अधिकारी का नाम नहीं है। दायर करने की तारीख़ नहीं है।
शक्तियाँ भी उसी धारा में हैं। धारा 68(2) के तहत वह व्यक्ति को अभ्यावेदन का उचित अवसर देगा, जाँच करेगा, और संतुष्ट होने पर ही जुर्माना लगाएगा। धारा 68(3) उसे दीवानी अदालत की शक्तियाँ देती है: उसके सामने की कार्यवाही भारतीय दंड संहिता की धाराओं 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही मानी जाएगी, और दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 345 व 346 के लिए वह अदालत माना जाएगा।
जुर्माने की रक़म वह मनमर्ज़ी से तय नहीं कर सकता। धारा 68(4) उसे धारा 49 की कसौटियों से बाँधती है, और धारा 49 में पाँच चीज़ें गिनाई गई हैं: उल्लंघन से हुआ लाभ या अनुचित फ़ायदा जहाँ तक नापा जा सके, किसी को हुआ या होने की आशंका वाला नुक़सान, उल्लंघन का बार-बार होना, क्या उल्लंघन जानकारी के बिना हुआ, और कोई अन्य प्रासंगिक बात।
जुर्माने की हद उस धारा पर टिकी है जिसका नाम अब तक नहीं आया
अधिनियम में जुर्माने की अलग-अलग धाराएँ हैं और हर धारा की अपनी छत है। धारा 51 अवमानक खाद्य पर 5 लाख रुपये तक। धारा 52 मिथ्याछाप खाद्य पर 3 लाख रुपये तक। धारा 53 भ्रामक विज्ञापन पर 10 लाख रुपये तक। धारा 58 उन उल्लंघनों पर 2 लाख रुपये तक, जिनके लिए कोई अलग जुर्माना तय नहीं है।
कौन-सी धारा लगेगी, यह इस पर निर्भर है कि लेबल पर छपे दावे को अधिनियम किस ख़ाने में रखता है। और यहाँ अधिनियम की अपनी परिभाषाएँ काम की हैं। धारा 3(1) में "advertisement" की परिभाषा में लेबल और रैपर दोनों शामिल हैं। उसी धारा में "claim" वह प्रस्तुति है जो कहे, सुझाए या ध्वनित करे कि खाद्य में मूल, पोषण, प्रकृति, प्रसंस्करण या संघटन से जुड़ा कोई ख़ास गुण है। और मिथ्याछाप खाद्य की परिभाषा की पहली ही उपश्रेणी वह है जिसे लेबल पर या विज्ञापन के ज़रिए झूठे, भ्रामक या छलपूर्ण दावों के साथ बिक्री के लिए पेश किया गया हो।
लेबल पर छपा दावा एक साथ धारा 52 के दायरे में भी आ सकता है और धारा 53 के भी। छत तीन लाख और दस लाख की है।

अवमानक की परिभाषा अलग है और उसमें सुरक्षा का सवाल नहीं है। धारा 3(1) कहती है कि खाद्य तब अवमानक माना जाएगा जब वह निर्दिष्ट मानकों पर खरा न उतरे, पर इस हद तक नहीं कि खाद्य असुरक्षित हो जाए। बायोटिन वाला तीसरा मामला इसी परिभाषा के इर्द-गिर्द है, और एफ़एसएसएआई के बयान में भी "sub-standard" शब्द ही आया है, "unsafe" नहीं।
धारा 53(2) में एक शर्त और है। लेबल या विज्ञापन पर खाद्य के संघटन का सही-सही विवरण छपा होना अपने आप बचाव नहीं बनता; अदालत फिर भी उल्लंघन पाया जाना मान सकती है। कंपनी का यह कहना कि लेबल के वाक्य तथ्यात्मक हैं, इस धारा के नीचे अपने आप मामला ख़त्म नहीं करता। इन चारों में से किस धारा में मामला दायर हुआ है, यह प्राधिकरण ने नहीं बताया, इसलिए असली जोखिम की रक़म अभी नहीं लिखी जा सकती।
बायोटिन की सीमा विनियम के छपे पाठ में कुछ और है, निदेशों में कुछ और
तीसरा मामला जिस मानक पर टिका है, उसका रास्ता पेचीदा निकला। खाद्य सुरक्षा और मानक (शिशु पोषण के लिए खाद्य) विनियम, 2020 राजपत्र में अधिसूचना फ़ा.सं. स्टैंडर्ड्स/03/अधिसूचना (आईएफ़आर)/एफ़एसएसएआई-2017 दिनांक 4 दिसंबर 2020 से आए। हर तरह के शिशु उत्पाद का अपना मानक है। विनियम 7 इन्फ़ैंट फ़ॉर्मूला का है, यानी पहले छह महीने के शिशु के लिए। विनियम 10 फ़ॉलो-अप फ़ॉर्मूला का है, जिसकी परिभाषा विनियम 2(ङ) में है: छह महीने के बाद से चौबीस महीने तक के शिशु का आहार, जो पूरक आहार के तरल हिस्से के तौर पर इस्तेमाल होता है।
एफ़एसएसएआई के अपने संकलन में, जिसका संस्करण 4 अक्टूबर 2022 का है, विनियम 10(1)(ज) की तालिका में क्रम संख्या 17 पर बायोटिन दर्ज है: प्रति 100 ग्राम 7.50 से 19.0 माइक्रोग्राम, और प्रति 100 किलो कैलोरी 1.60 से 4.00। इन्फ़ैंट फ़ॉर्मूला की तालिका में वही पोषक तत्व 7.50 से 50.00 माइक्रोग्राम है।
इंडियन एक्सप्रेस ने 19 सितंबर को लिखा कि कार्यवाही में जिन मानकों का हवाला है, उनके मुताबिक़ शिशु आहार में बायोटिन 7.5 से 50 माइक्रोग्राम होना चाहिए। छपे विनियम से मिलाने पर यह फ़ॉलो-अप फ़ॉर्मूला की तालिका नहीं है।
पर छपा विनियम पूरी कहानी नहीं है। 30 अगस्त 2022 को राजपत्र में खाद्य सुरक्षा और मानक (शिशु पोषण के लिए खाद्य) प्रथम संशोधन विनियम, 2022 अधिसूचित हुए और 1 अक्टूबर 2022 से लागू हुए। उन्होंने विटामिन बी12 की प्रविष्टि बदली, लेबलिंग विनियम का हवाला सुधारा, बिना वनस्पति तेल वाले पाउडर को "Infant Milk Food" नाम देने की छूट दी, और पैकेजिंग गैसों की प्रविष्टि जोड़ी। बायोटिन को उन्होंने छुआ ही नहीं।
बायोटिन की सीमा निदेश से बदली। 18 अक्टूबर 2022 को एफ़एसएसएआई ने फ़ाइल संख्या REG-11027/3/2022-Regulation-FSSAI पर निदेश जारी किया, धारा 18(2)(घ) के साथ धारा 16(5) के तहत, और उसके अनुलग्नक-1 में लिखा है कि विनियम 10 की उप-विनियम (1) के खंड (ज) की तालिका में क्रम संख्या 17 की जगह यह प्रविष्टि रखी जाएगी: "17. Biotin, mcg 7.50-50 1.60–10.60"। यह 1 अक्टूबर 2022 से प्रभावी हुआ।
उसके बाद वही सीमा दो बार और ज़िंदा रखनी पड़ी। 22 मई 2023 के निदेश में निदेशक डॉ. अमित शर्मा ने लिखा कि संशोधन विनियम अधिसूचना की प्रक्रिया में हैं और उन्हें अंतिम रूप देने में और समय लग सकता है, इसलिए सीमाएँ 1 अप्रैल 2023 से फिर प्रवर्तित की जा रही हैं। 12 मार्च 2024 के निदेश में, फ़ाइल संख्या STD/SP-05/T(Foods for Infant Nutrition) पर, निदेशक अनिल मेहता ने यही बात दोहराई और 18 अक्टूबर 2022 तथा 22 मई 2023 के निदेशों को 1 अक्टूबर 2023 से फिर प्रवर्तित कर दिया, यानी जारी होने से पाँच महीने पीछे की तारीख़ से।
तो फ़ॉलो-अप फ़ॉर्मूला में बायोटिन की ऊपरी सीमा 19.0 है या 50, यह इस पर टिका है कि नमूना किस दस्तावेज़ से नापा गया। संकलन में एक अंक छपा है और निदेशों में दूसरा। दोनों एफ़एसएसएआई के अपने काग़ज़ हैं। यह विरोध आदेश सामने आने तक खुला रहेगा, क्योंकि आदेश ही बताएगा कि जाँच किस सीमा के विरुद्ध हुई। 12 मार्च 2024 के बाद का कोई निदेश इस मशीन से पढ़ा नहीं जा सका, और fssai.gov.in इसे जवाब नहीं दे रही। 2022 के संशोधन विनियम बाद में राजपत्र में आए या नहीं, यह भी इसीलिए पता नहीं चला।

नमूना चार हिस्सों में बँटता है और रेफ़रल प्रयोगशाला का फ़ैसला आख़िरी होता है
एफ़एसएसएआई के बयान में लिखा है कि नमूना दोबारा जाँच के लिए भेजा गया और रेफ़रल प्रयोगशाला ने भी उसे बायोटिन की अपेक्षा के अनुरूप नहीं पाया। पीछे धारा 47 की पूरी प्रक्रिया है।
खाद्य सुरक्षा अधिकारी नमूना लेते समय उसे चार हिस्सों में बाँटता है, हर हिस्से को अलग सील करता है, और जिससे नमूना लिया गया है उसके दस्तख़त या अँगूठे का निशान लेता है। एक हिस्सा खाद्य विश्लेषक के पास जाता है। दो हिस्से नामित अधिकारी के पास सुरक्षित रखे जाते हैं। चौथा हिस्सा कारोबारी के माँगने पर किसी मान्यता-प्राप्त प्रयोगशाला में जाता है।

इसके बाद वह शर्त आती है जो इस मामले में मायने रखती है। धारा 47(1)(ग) का परंतुक कहता है कि अगर पहले और चौथे हिस्से की रिपोर्टें अलग निकलें, तो नामित अधिकारी अपने पास रखा एक हिस्सा रेफ़रल प्रयोगशाला को भेजेगा, और उस पर उसका फ़ैसला अंतिम होगा। धारा 46(4) में इसका दूसरा रास्ता है: खाद्य विश्लेषक की रिपोर्ट के ख़िलाफ़ अपील नामित अधिकारी के पास जाती है, जो चाहे तो मामला रेफ़रल प्रयोगशाला को भेज दे।
अंतिम का मतलब यहाँ सीमित है। रेफ़रल प्रयोगशाला की रिपोर्ट नमूने में बायोटिन कितना था, इस सवाल को बंद कर देती है। वह यह तय नहीं करती कि उतनी मात्रा उल्लंघन है या नहीं, किस धारा में है, और जुर्माना कितना बनता है। वे तीनों सवाल न्यायनिर्णयन अधिकारी के हैं और अभी खुले हैं।
आईएमएस अधिनियम का हवाला है, पर उस क़ानून में सज़ा अदालत देती है
एफ़एसएसएआई के बयान में दो अलग क़ानूनों के नाम हैं। पहला विनियम 4(2) है, जिसका पाठ यह है: "No containers or label of food for infant nutrition shall have a picture of infant or women or both. It shall not have picture or other graphic materials or phrases designed to increase the saleability or the infant milk substitute or infant food." उसी उप-विनियम में "Humanised" और "Maternalised" जैसे शब्दों पर भी रोक है।
दूसरा नाम शिशु दुग्ध विकल्प, फ़ीडिंग बोतल तथा शिशु आहार (उत्पादन, प्रदाय और वितरण विनियमन) अधिनियम, 1992 का है, जिसे आईएमएस अधिनियम कहा जाता है। उसकी धारा 3 तीन काम मना करती है: शिशु दुग्ध विकल्प, फ़ीडिंग बोतल या शिशु आहार का विज्ञापन या उसके प्रकाशन में हिस्सेदारी; यह धारणा या विश्वास पैदा करना कि इनसे पिलाना माँ के दूध के बराबर या उससे बेहतर है; और इनके प्रचार में हिस्सा लेना।
दोनों क़ानून एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं। खाद्य अधिनियम की धारा 3(1) "infant food" और "infant milk substitute" की परिभाषाएँ आईएमएस अधिनियम की धारा 2(1) से उधार लेती है। खाद्य अधिनियम की धारा 100 आईएमएस अधिनियम में संशोधन करती है, और उसका खंड (घ) आईएमएस की धारा 21(1) के खंड (क) को बदलकर वहाँ नामित अधिकारी या धारा 42(5) के तहत निर्देशित खाद्य सुरक्षा अधिकारी को बिठा देता है।
पर सज़ा का रास्ता अलग रहता है। आईएमएस अधिनियम की धारा 20(1) में सज़ा तीन साल तक की क़ैद, या पाँच हज़ार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों है। धारा 21(1) कहती है कि इस अधिनियम के किसी अपराध का संज्ञान कोई अदालत तभी लेगी जब लिखित शिकायत की जाए, और शिकायत करने वाले तीन ही हो सकते हैं: नामित अधिकारी या निर्देशित खाद्य सुरक्षा अधिकारी, सरकार का अधिकृत प्रथम श्रेणी अधिकारी, या बाल कल्याण के क्षेत्र की किसी अधिसूचित स्वैच्छिक संस्था का प्रतिनिधि।
न्यायनिर्णयन अधिकारी अदालत नहीं है। वह खाद्य अधिनियम के तहत जुर्माना लगा सकता है; आईएमएस अधिनियम की सज़ा उसके हाथ में नहीं है। आईएमएस अधिनियम का हवाला खाद्य अधिनियम की न्यायनिर्णयन कार्यवाही के भीतर किस तरह बैठाया गया है, यह आदेश के बिना तय नहीं किया जा सकता, और यह भी नहीं कि उसके साथ कोई अलग आपराधिक शिकायत दायर हुई है या नहीं।
शेयर बाज़ार को बताने का नियम सेबी के अलग विनियम से आता है
सूचीबद्ध कंपनी पर जो शर्त 18 सितंबर की शाम लगी, वह खाद्य क़ानून से नहीं आई। वह सेबी (सूचीबद्धता दायित्व एवं प्रकटीकरण अपेक्षाएँ) विनियम, 2015 के रेग्युलेशन 30 से आई।
रेग्युलेशन 30(11) की मूल पंक्ति कंपनी को छूट देती है: वह अपनी पहल पर किसी ख़बर की पुष्टि या खंडन कर सकती है। उसके साथ जुड़ा परंतुक छूट को शर्त में बदल देता है। बाज़ार पूँजी के हिसाब से शीर्ष 100, और उसके बाद शीर्ष 250 सूचीबद्ध कंपनियों को मुख्यधारा मीडिया में छपी ऐसी ख़बर की, जो सामान्य प्रकृति की न हो और जिससे लगे कि निवेशकों के बीच किसी आसन्न विशिष्ट घटना की अफ़वाह चल रही है, पुष्टि, खंडन या स्पष्टीकरण करना होगा, और वह भी "material price movement" शुरू होने के चौबीस घंटे के भीतर। रेग्युलेशन 30(10) अलग से कहता है कि कंपनी शेयर बाज़ार के हर सवाल का विशिष्ट और पर्याप्त जवाब देगी।
बीएसई के अपने रिकॉर्ड में दोनों प्रविष्टियाँ दर्ज हैं। 4:17:58 बजे की प्रविष्टि उप-श्रेणी "Clarification" में है और उसमें मनीकंट्रोल की ख़बर का लिंक और उसका तब का शीर्षक दोनों टंके हुए हैं। 6:41:23 बजे की प्रविष्टि का शीर्षक है "Rumour verification - Regulation 30(11)"। सवाल और जवाब के बीच 2 घंटे 23 मिनट का फ़ासला है।
अब असली मशीन। किसी नियामक की कार्रवाई कब अपने आप बतानी पड़ती है, यह अनुसूची तीन के भाग क, पैरा क में लिखा है। उप-पैरा 19 कार्रवाई "शुरू" होने की बात करता है, पर उसकी सूची छोटी है: तलाशी या ज़ब्ती, कंपनी अधिनियम की धारा 130 के तहत खातों का दोबारा खोला जाना, या कंपनी अधिनियम के चौदहवें अध्याय के तहत जाँच। खाद्य नियामक का न्यायनिर्णयन मामला उस सूची में नहीं है।
उप-पैरा 20 अलग है। वह कार्रवाई "की गई" या आदेश "पारित" होने पर लगता है, और उसकी सूची में निलंबन, जुर्माना या शास्ति लगाना, कार्यवाही का निपटारा, प्रतिबंध, अयोग्यता, परिचालन बंद करना, प्रतिबंधात्मक उपाय, चेतावनी या सतर्कता, और इसी तरह की कोई और कार्रवाई शामिल है। साथ में पाँच ब्योरे देने होते हैं: प्राधिकारी का नाम, कार्रवाई या आदेश का स्वरूप और विवरण, आदेश या किसी अन्य संचार के मिलने की तारीख़, किए गए या कथित उल्लंघनों का ब्योरा, और कंपनी के वित्त व कामकाज पर असर। इसी उप-पैरा की व्याख्या में समय-सीमा है: क्षेत्रीय नियामक का लगाया एक लाख रुपये या उससे ज़्यादा का जुर्माना चौबीस घंटे में बताना होगा, और उससे कम का तिमाही ब्योरे में।
नेस्ले इंडिया इस ख़ाने का इस्तेमाल करती रही है। 9 सितंबर 2026 को उसने तमिलनाडु में जीएसटी अपील आदेश मिलने की सूचना इसी उप-पैरा 20 का हवाला देकर दी, उन्हीं पाँच पंक्तियों वाली तालिका में, जिसमें घटी हुई कर देनदारी 1,29,69,981 रुपये और घटी हुई शास्ति 12,96,998 रुपये दर्ज हैं। 1 जून से 20 सितंबर के बीच कंपनी ने ऐसी चार सूचनाएँ दीं, दो सीमा शुल्क आयुक्तों के आदेशों पर और दो कर विभागों के। एफ़एसएसएआई पर उनमें एक भी नहीं है। उप-पैरा 20 की भाषा देखते हुए यह अपेक्षित है, क्योंकि जुर्माने का आदेश अभी पारित ही नहीं हुआ।
नेस्ले के पत्र में जो लिखा है और जो नहीं लिखा
कंपनी का जवाब एक पन्ने का है। पत्र क्रमांक PKR:SG: 47:2026-27, तारीख़ 18 सितंबर 2026, बीएसई और एनएसई दोनों को। कंपनी सचिव व अनुपालन अधिकारी प्रमोद कुमार राय के डिजिटल हस्ताक्षर शाम 6 बजकर 35 मिनट 2 सेकंड के हैं।
उसमें कंपनी लिखती है कि "we confirm that the aforesaid news item is factually incorrect", और फिर मीडिया को जारी अपना स्पष्टीकरण जोड़ देती है। उस स्पष्टीकरण के तीन वाक्य अहम हैं। पहला: "Our products are fully compliant with all the applicable regulations." दूसरा: दोनों उत्पाद और उनके लेबल "were approved by the expert committee of FSSAI"। तीसरा: "In response to the notice, we have again submitted our detailed response to the authorities regarding statements appearing on the label, which are factual in nature, and supported by scientific literature."
तीसरा वाक्य दो शब्द ले आता है, "notice" और "again"। ख़बर को तथ्यात्मक रूप से ग़लत बताने वाले पत्र में यह स्वीकार है कि कोई नोटिस है और उस पर कंपनी दोबारा जवाब दे चुकी है।
पत्र में दो उत्पादों के नाम हैं, NAN EXCELLA PRO और LACTOGEN PRO। बायोटिन वाले तीसरे उत्पाद का, जिस पर एफ़एसएसएआई के बयान के मुताबिक़ तीसरा मामला है, कहीं ज़िक्र नहीं। एक्सचेंज के तीसरे सवाल का जवाब एक शब्द है: "The material impact of this article on the Company: None"।
यह पहली बार नहीं है। 12 जून 2026 को भी बीएसई ने दोपहर 3:18 बजे स्पष्टीकरण माँगा था, मैगी में कीड़े के आरोप वाली मनीकंट्रोल की ख़बर पर, और कंपनी ने शाम 5:26 बजे जवाब दिया था। उस पत्र, क्रमांक PKR:SG: 21:2026-27, में एक्सचेंज का एक सवाल और था: "In case of regulatory/ legal proceedings please provide the information on initiation/ outcome of the proceedings: - Not Applicable." उसी पत्र में यह भी लिखा है कि एफ़एसएसएआई की तथ्य-खोजी पूछताछ के जवाब में विस्तृत अभ्यावेदन दिया जा चुका है।
18 सितंबर की शाम से एक चीज़ और बदल चुकी है। मनीकंट्रोल की उसी ख़बर का शीर्षक अब कहता है कि शेयर मामूली गिरा। यूआरएल में अब भी "shares-fall-nearly-2" लिखा है, और बीएसई का सवाल तथा नेस्ले का पत्र पुराने शीर्षक को ज्यों का त्यों टाँके हुए हैं। बीएसई के चार्ट फ़ीड के हिसाब से दिन भर में दोनों बातें सच थीं: 1:18 बजे भाव 2.79 फ़ीसदी नीचे था, और आख़िरी दर्ज भाव 1,353.10 रुपये, यानी 1.38 फ़ीसदी नीचे।
अपील की सीढ़ी अधिनियम में लिखी है और पहला पायदान अभी आया नहीं
आदेश आने पर अपील की सीढ़ी अधिनियम में लिखी है। धारा 70 के तहत खाद्य सुरक्षा अपील अधिकरण बनता है, जिसमें एक ही व्यक्ति होता है और वह ज़िला जज रह चुका होना चाहिए। अधिकरण के फ़ैसले के ख़िलाफ़ धारा 71(6) के तहत हाई कोर्ट में साठ दिन के भीतर अपील होती है, और पर्याप्त कारण पर साठ दिन और मिल सकते हैं। धारा 72 दीवानी अदालतों का दरवाज़ा बंद रखती है।
जुर्माना न भरने का नतीजा धारा 96 में है: वसूली भू-राजस्व के बक़ाए की तरह होगी और भुगतान तक लाइसेंस निलंबित रहेगा।
इस मामले में अभी इनमें से कुछ भी नहीं हुआ है। कोई आदेश संख्या सार्वजनिक नहीं है, कोई तारीख़ नहीं, कोई ज़िला नहीं, कोई धारा नहीं, और कोई अधिकरण कार्यवाही नहीं। अधिनियम में जो और औज़ार हैं, वे भी इस्तेमाल हुए नहीं दिखते: धारा 30(2)(क) के तहत खाद्य सुरक्षा आयुक्त एक साल तक के लिए किसी खाद्य का निर्माण या बिक्री रोक सकता है, और धारा 32 के तहत नामित अधिकारी सुधार नोटिस दे सकता है। इनमें से किसी की ख़बर नहीं है। जो है, वह तीन दायर मामले हैं, जिनमें धारा 68(2) के तहत कंपनी को अभ्यावेदन का अवसर मिलना बाक़ी है।
स्रोतबीएसई कॉरपोरेट फ़ाइलिंग: नेस्ले इंडिया लिमिटेड का पत्र क्रमांक PKR:SG: 47:2026-27, 18 सितंबर 2026, बीएसई और एनएसई को, डिजिटल हस्ताक्षर शाम 6:35:02 बजे, बीएसई का कॉरपोरेट घोषणा रिकॉर्ड, नेस्ले इंडिया (स्क्रिप 500790): 18 सितंबर 2026 को शाम 4:17:58 बजे स्पष्टीकरण की माँग और 6:41:23 बजे कंपनी का जवाब; 1 जून से 20 सितंबर 2026 तक की पूरी सूची, 21 सितंबर को पढ़ी गई, बीएसई कॉरपोरेट फ़ाइलिंग: नेस्ले इंडिया का पत्र PKR:SG: 45:2026-27, 9 सितंबर 2026, तमिलनाडु जीएसटी के अपील आदेश की सूचना, अनुसूची तीन के उप-पैरा 20 के तहत, बीएसई कॉरपोरेट फ़ाइलिंग: नेस्ले इंडिया का पत्र PKR:SG: 21:2026-27, 12 जून 2026, मैगी में कीड़े के आरोप पर स्पष्टीकरण, बीएसई का अपना इंट्राडे चार्ट फ़ीड, नेस्ले इंडिया, 18 सितंबर 2026 का सत्र: पिछला बंद भाव 1,372 रुपये, 384 मिनट के भाव, 21 सितंबर को पढ़ा गया, सेबी (सूचीबद्धता दायित्व एवं प्रकटीकरण अपेक्षाएँ) विनियम, 2015, 14 जुलाई 2026 तक संशोधित, 230 पन्ने: रेग्युलेशन 30(10), 30(11), 30(13) और अनुसूची तीन, भाग क, पैरा क के उप-पैरा 19 व 20, खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (2006 का 34) का पूरा पाठ: धारा 3, 30, 32, 36, 37, 42, 46, 47, 49, 51, 52, 53, 58, 68, 70, 71, 72, 96 और 100, शिशु दुग्ध विकल्प, फ़ीडिंग बोतल तथा शिशु आहार (उत्पादन, प्रदाय और वितरण विनियमन) अधिनियम, 1992 (1992 का 41) का पूरा पाठ: धारा 2, 3, 6, 20 और 21, एफ़एसएसएआई का संकलन, खाद्य सुरक्षा और मानक (शिशु पोषण के लिए खाद्य) विनियम, 2020, संस्करण एक दिनांक 04.10.2022, 53 पन्ने: विनियम 2, 4, 7 और 10 की पोषक तालिकाएँ, एफ़एसएसएआई निदेश, फ़ाइल संख्या STD/SP-05/T(Foods for Infant Nutrition), 12 मार्च 2024, संलग्नक में 22 मई 2023 और 18 अक्टूबर 2022 के निदेश और अनुलग्नक-1 की प्रतिस्थापित प्रविष्टियाँ, एफ़एसएसएआई निदेश, फ़ाइल संख्या REG-11027/3/2022-Regulation-FSSAI, 22 मई 2023, धारा 16(5) के तहत, 1 अप्रैल 2023 से पुनः प्रवर्तन, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग तीन खंड चार, संख्या 416, 31 अगस्त 2022: खाद्य सुरक्षा और मानक (शिशु पोषण के लिए खाद्य) प्रथम संशोधन विनियम, 2022, 30 अगस्त 2022 को अधिसूचित, मनीकंट्रोल, जे. जगन्नाथ, 18 सितंबर 2026, दोपहर 1:14 बजे पहली बार प्रकाशित: एफ़एसएसएआई के बयान का विस्तृत उद्धरण और दिन के भाव, द इंडियन एक्सप्रेस, अनोन्ना दत्त, 19 सितंबर 2026: एफ़एसएसएआई की सोशल मीडिया पोस्ट का जड़ा हुआ मूल पाठ, बायोटिन की सीमा और डॉ. अरुण गुप्ता का बयान, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 18 सितंबर 2026, दोपहर 1:59 बजे: कार्रवाई को 'adjudication sanction' कहने वाला परिचय-वाक्य, द हिंदू, 19 सितंबर 2026: '5HMOs' और 'Whey Protein' के दावों पर एफ़एसएसएआई की ओर से स्पष्टीकरण माँगे जाने की रिपोर्ट