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नोटबुक पर जीएसटी शून्य हुआ, आयात शुल्क पहले से शून्य था, और कॉपी बनाने वाले बीच में आ गए

अखिल भारतीय नोटबुक निर्माता संघ ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को लिखा है कि 1,500 इकाइयाँ और 1.25 लाख रोज़गार ख़तरे में हैं। संघ की चार माँगें हैं: आयात पर न्यूनतम मूल्य, इंडोनेशिया से आने वाली कॉपियों पर डंपिंग-रोधी जाँच, निर्यात रिफ़ंड की आसान प्रक्रिया, और काग़ज़ मिलों की क़ीमतों की जाँच। संघ का एक बड़ा दावा अधिसूचना के पाठ से पूरी तरह नहीं मिलता।

आंध्र प्रदेश के येदिथा में श्री रामचंद्र पेपर बोर्ड मिल। कॉपी उद्योग का झगड़ा इसी छोर से शुरू होता है, काग़ज़ की क़ीमत से
तस्वीर: Vmakumar, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

बस्ते में रखी एक कॉपी पर आज दो शून्य लगे हैं।

पहला शून्य टैक्स का है। 22 सितंबर 2025 से नोटबुक और अभ्यास-पुस्तिकाओं पर जीएसटी शून्य है, जो उससे पहले 12 फ़ीसदी था। दूसरा शून्य सीमा शुल्क का है, और वह 2010 से चला आ रहा है। आसियान देशों से आने वाली तैयार कॉपी पर मूल सीमा शुल्क शून्य है।

अलग-अलग पढ़ें तो दोनों फ़ैसले भले लगते हैं। एक ने बच्चों की कॉपी सस्ती करने की कोशिश की, दूसरे ने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार खोला।

साथ रखने पर वे एक तीसरी चीज़ बनाते हैं, जिसे अखिल भारतीय नोटबुक निर्माता संघ ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को लिखे अपने पत्र में "highly asymmetrical trading environment that actively penalises domestic production while incentivising imports" कहा है। यानी ऐसा ढाँचा जो घरेलू उत्पादन को दंडित करता है और आयात को प्रोत्साहन देता है।

पत्र में क्या है

पत्र वाणिज्य मंत्री को गया है, और संघ के मुताबिक़ जीएसटी परिषद को भी। द हिंदू ने 8 सितंबर को लिखा कि उसने यह पत्र देखा है।

उसमें उद्योग का आकार दो आँकड़ों से बताया गया है: लगभग 1,500 इकाइयाँ, और उन पर टिके लगभग 1.25 लाख रोज़गार। संघ की अपनी विज्ञप्ति के अनुसार यह काम श्रम-प्रधान है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और नौजवान लगे हैं।

माँगें चार हैं। तैयार नोटबुक के आयात पर न्यूनतम आयात मूल्य लगे। इंडोनेशिया से आने वाली कॉपियों पर डंपिंग-रोधी जाँच बैठे। निर्यातकों को रिफ़ंड की प्रक्रिया आसान मिले। और घरेलू काग़ज़ मिलों की क़ीमत-नीति की मुनाफ़ाख़ोरी-रोधी जाँच हो।

न्यूनतम आयात मूल्य का मतलब क्या होता है

यह शुल्क नहीं है। यह एक फ़र्श है।

सरकार तय कर देती है कि कोई चीज़ इससे कम दाम पर आ रही हो, तो उसका आयात "स्वतंत्र" नहीं रहेगा, "प्रतिबंधित" श्रेणी में चला जाएगा। प्रतिबंधित का अर्थ है कि उसे लाने के लिए अलग लाइसेंस चाहिए, जो आम तौर पर मिलता नहीं।

इसका असर शुल्क से अलग होता है। शुल्क हर खेप पर एक प्रतिशत जोड़ता है, चाहे दाम कुछ भी हो। न्यूनतम आयात मूल्य सिर्फ़ सबसे सस्ती खेप को रोकता है, बाक़ी को छूता भी नहीं। जिस उद्योग की शिकायत दाम से हो, वह यही माँगता है।

काग़ज़ के ही बाज़ार में इसकी एक मिसाल है

यह माँग हवा में नहीं है। पिछले साल इसी उद्योग-श्रृंखला के एक और छोर पर सरकार ऐसा कर चुकी है।

विदेश व्यापार महानिदेशालय ने 22 अगस्त 2025 को अधिसूचना 26/2025-26 जारी की। उसमें वर्जिन मल्टी-लेयर पेपर बोर्ड पर न्यूनतम आयात मूल्य 67,220 रुपये प्रति टन तय किया गया, सीआईएफ़ मूल्य पर। एचएस कोड 48059100, 48059200, 48059300, 48109200 और 48109900 इसमें आते हैं।

इस दाम से नीचे आने वाला माल प्रतिबंधित श्रेणी में डाल दिया गया, और यह व्यवस्था 31 मार्च 2026 तक के लिए थी। संघ जो माँग रहा है, वह ठीक यही चीज़ है, बस तैयार कॉपी पर।

डंपिंग-रोधी जाँच किस बात की जाँच है

डंपिंग का अर्थ है कि कोई निर्यातक अपना माल भारत में उस दाम से सस्ता बेचे जिस दाम पर वह उसे अपने ही देश में बेचता है।

जाँच में तीन चीज़ें अलग-अलग साबित करनी होती हैं। पहली, कि सामान्य मूल्य और निर्यात मूल्य के बीच अंतर है। दूसरी, कि घरेलू उद्योग को चोट पहुँची है। तीसरी, कि चोट और उसी सस्ते आयात के बीच कारण-संबंध है।

तीनों साबित हों तो सरकार डंपिंग-रोधी शुल्क लगाती है। यह मुक्त व्यापार समझौते का उल्लंघन नहीं माना जाता, क्योंकि समझौते ऐसे उपाय की जगह अपने भीतर छोड़कर चलते हैं।

13 अगस्त 2009 को बैंकॉक में क्या हुआ

आसियान-भारत वस्तु व्यापार समझौता, यानी एआईटीआईजीए, 13 अगस्त 2009 को बैंकॉक में हस्ताक्षरित हुआ और 1 जनवरी 2010 से लागू हुआ। इसमें आसियान के दस देश शामिल हैं।

समझौते का दायरा छोटा नहीं है। दोनों ओर के व्यापार की 90 फ़ीसदी से ज़्यादा वस्तुओं पर शुल्क उदारीकरण तय हुआ, और 4,000 से ज़्यादा उत्पाद-श्रेणियों पर शुल्क 2016 तक ख़त्म करने का कार्यक्रम था।

अभ्यास-पुस्तिका, ग्राफ़ बुक और प्रयोगशाला नोटबुक उन्हीं श्रेणियों में हैं जिन पर मूल सीमा शुल्क शून्य पर पहुँच चुका है। कॉपी उद्योग के लिए यह 2010 से सच है, पर 2025 तक इसका असर सीमित रहा।

जकार्ता, इंडोनेशिया का तनजुंग प्रियोक कंटेनर टर्मिनल, 2006 की तस्वीर। संघ की डंपिंग-रोधी जाँच की माँग इसी देश से आने वाली कॉपियों को लेकर है
तस्वीर: Niels Johannes, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया

तीनों देश काग़ज़ बनाने वाले बड़े देश हैं। संघ की विज्ञप्ति में इंडोनेशिया को दुनिया का सबसे बड़ा काग़ज़ और काग़ज़-उत्पाद बनाने वाला देश कहा गया है।

काग़ज़ जिस जगह बनता है, कॉपी उसी जगह बनाना सस्ता पड़ता है, क्योंकि कॉपी की लागत का सबसे बड़ा हिस्सा काग़ज़ ही है। जब उस तैयार कॉपी पर भारत में घुसते वक़्त कोई शुल्क न लगे, तो वह लागत-लाभ सीधे दुकान की क़ीमत तक पहुँच जाता है।

डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट में संघ के शब्द हैं, "predatory, low-cost imports of finished notebooks from the ASEAN region", यानी आसियान क्षेत्र से आने वाली तैयार कॉपियों का शिकारी और सस्ता आयात।

3 सितंबर की परिषद और 22 सितंबर की तारीख़

56वीं जीएसटी परिषद की बैठक 3 सितंबर 2025 को हुई। उसमें नोटबुक और अभ्यास-पुस्तिकाओं की दर 12 फ़ीसदी से घटाकर शून्य कर दी गई। यह 22 सितंबर 2025 से लागू हुई।

इसका एक नतीजा सीमा पर निकला, जिसकी चर्चा घोषणा में नहीं थी। आयातित माल पर लगने वाला एकीकृत जीएसटी घरेलू दर के बराबर होता है। घरेलू दर शून्य हुई तो आयात पर आईजीएसटी भी शून्य हो गया।

जीएसटी परिषद की एक बैठक, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली कर रहे हैं। यह 2017 की फ़ाइल तस्वीर है, सितंबर 2025 की बैठक की नहीं
तस्वीर: वित्त मंत्रालय GODL-India

दो शून्य मिलकर एक गलियारा बनाते हैं

अब आयातित कॉपी पर सीमा पर कोई कर नहीं लगता। शुल्क शून्य, आईजीएसटी शून्य।

डेक्कन क्रॉनिकल में संघ का वाक्य है कि आयातित नोटबुक पर न्यूनतम आयात मूल्य "would prevent foreign suppliers from leveraging the zero per cent BCD and zero per cent IGST corridor to weaken Indian MSMEs", यानी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को उस शून्य-शून्य गलियारे का फ़ायदा उठाकर भारतीय एमएसएमई को कमज़ोर करने से रोकेगा।

पत्र में यह भी लिखा है कि क़दम न उठे तो घरेलू क्षेत्र को "face inevitable destruction", अपरिहार्य विनाश का सामना करना पड़ेगा।

शून्य दर और छूट का फ़र्क़ यहाँ चुभता है

टैक्स की भाषा में शून्य दर और छूट एक चीज़ नहीं हैं, और यही इस पूरे झगड़े की जड़ है।

निर्यात शून्य-दर की आपूर्ति है। उसमें निर्माता कच्चे माल पर चुकाया कर वापस माँग सकता है। छूट वाली आपूर्ति में वह नहीं माँग सकता। जीएसटी क़ानून की धारा 17(2) कहती है कि छूट वाली आपूर्ति पर इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलेगा।

नोटबुक को छूट मिली है। इसलिए कॉपी बनाने वाला जो कर अपने कच्चे माल पर चुकाता है, वह उसके पास ही रह जाता है। न वह उसे आगे वसूल सकता है, न सरकार से वापस ले सकता है।

"स्थायी, वसूल न होने वाली लागत"

संघ का शब्द-चयन यही है, "permanent, unrecoverable cost"।

इस वाक्य का असल मतलब हिसाब की एक पंक्ति है। पहले तैयार कॉपी पर 12 फ़ीसदी जीएसटी लगता था और कच्चे माल का कर उसमें घट जाता था, इसलिए कर लागत नहीं था, सिर्फ़ गुज़रता हुआ पैसा था। अब वह गुज़रता नहीं, ठहर जाता है।

संघ की विज्ञप्ति में यह भी है कि लेपित काग़ज़-बोर्ड पर जीएसटी हाल में 12 से बढ़कर 18 फ़ीसदी हुआ है। यानी जिस चीज़ की भरपाई अब नहीं होती, उसकी दर पहले से ऊँची भी हो गई।

यहाँ संघ का दावा और अधिसूचना का पाठ अलग हो जाते हैं

संघ कहता है कि उसका कच्चा माल 18 फ़ीसदी पर है: काग़ज़, लेपित बोर्ड, चिपकाने वाला गोंद, सिलाई का तार, कार्टन और स्याही।

17 सितंबर 2025 को इसी विषय पर दो अधिसूचनाएँ एक साथ निकली थीं, 09/2025-सीटी(रेट) और 10/2025-सीटी(रेट)। पहली में बिना कोटिंग वाले काग़ज़ और काग़ज़-बोर्ड, एचएसएन 4802, को 18 फ़ीसदी पर रखा गया, पर उसमें से वह काग़ज़ बाहर कर दिया गया जो अभ्यास-पुस्तिका, ग्राफ़ बुक, प्रयोगशाला नोटबुक और नोटबुक के लिए है। दूसरी अधिसूचना उसी काग़ज़ को शून्य दर देती है।

यानी कॉपी बनाने के लिए दिया गया काग़ज़ ख़ुद 18 फ़ीसदी पर नहीं है। संघ का दावा इस हद तक आंशिक है, और हम इसे विवाद के रूप में दर्ज कर रहे हैं, फ़ैसले के रूप में नहीं।

पर उस शून्य दर के साथ एक शर्त बँधी है

छूट उत्पाद की पहचान से नहीं मिलती, उसके अंतिम उपयोग से मिलती है।

टैक्सगुरु के विश्लेषण के अनुसार काग़ज़ बेचने वाला यह छूट तभी ले सकता है जब उसे उचित निश्चितता और सबूत हो कि वह काग़ज़ सचमुच कॉपी बनाने में जाएगा। किसी और उपयोग में गया तो 18 फ़ीसदी लगेगा, और दस्तावेज़ न हों तो देनदारी उसी पर आएगी जिसने छूट ली थी।

उसी विश्लेषण में इसे निर्माताओं और व्यापारियों के लिए "a legal tightrope", क़ानूनी रस्सी पर चलना कहा गया है, क्योंकि मिल बिक्री के वक़्त हर रोल का अंतिम उपयोग नहीं जान सकती।

मिलों ने अपने ग्राहकों को क्या भेजा

इस शर्त का नतीजा काग़ज़ मिलों के परिपत्रों में दिखता है।

द पल्प एंड पेपर टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार ट्राइडेंट लिमिटेड के परिपत्र में लिखा है कि "the Ex-Factory Price of uncoated paper for notebooks shall be increased to reflect the change in applicable tax credit", यानी नोटबुक के काग़ज़ का कारख़ाना-मूल्य कर-क्रेडिट में आए बदलाव के हिसाब से बढ़ेगा। बीजीपीपीएल और जेके पेपर ने भी ऐसे ही परिपत्र निकाले।

इसका अर्थ यह हुआ कि काग़ज़ पर कर शून्य होने पर भी कॉपी बनाने वाले की लागत नहीं गिरती, क्योंकि मिल अपना डूबा हुआ क्रेडिट आधार-मूल्य में जोड़ देती है।

चौथी माँग यहीं से निकलती है

संघ की जिस माँग की चर्चा सबसे कम हुई है, वह यही है कि घरेलू काग़ज़ मिलों की क़ीमत-नीति की मुनाफ़ाख़ोरी-रोधी जाँच हो।

इस माँग का सीधा संदर्भ यही परिपत्र-व्यवहार है। मिल कहती है कि कर-क्रेडिट डूबा, इसलिए दाम बढ़ेगा; ख़रीदार कहता है कि दाम कितना बढ़ना चाहिए, इसका कोई स्वतंत्र हिसाब उसके सामने नहीं है।

यह पहली तीन माँगों से अलग क़िस्म की माँग है। वह तीनों सीमा पर या रिफ़ंड की खिड़की पर लागू होती हैं। यह देश के भीतर, अपनी ही आपूर्ति-श्रृंखला के ऊपरी सिरे पर जाँच माँगती है।

कार्टन का आँकड़ा भी दावे से मेल नहीं खाता

संघ की सूची में कार्टन 18 फ़ीसदी पर बताया गया है।

टैक्सक्लू की दर-सूची के अनुसार 22 सितंबर 2025 से कार्टन, डिब्बे और काग़ज़ की थैलियाँ 5 फ़ीसदी पर आ गईं, जो पहले 12 फ़ीसदी थीं। लिखने-छापने का काग़ज़, क्राफ़्ट और लेपित काग़ज़ 12 से बढ़कर 18 फ़ीसदी हुए। अख़बारी काग़ज़ 5 फ़ीसदी पर बना रहा।

टैक्सटीएमआई की रिपोर्ट में एक और जोड़ है: लकड़ी 18 फ़ीसदी पर है और लुगदी 12 से घटकर 5 फ़ीसदी पर आई। यानी श्रृंखला के अलग-अलग हिस्सों पर दरें अलग-अलग दिशाओं में गईं, और एक ही प्रतिशत से पूरे उद्योग की लागत नहीं समझी जा सकती।

डिब्बा बनाने वाले को रिफ़ंड मिलता है, कॉपी बनाने वाले को नहीं

यह तुलना उल्टी शुल्क संरचना की असल चुभन दिखाती है।

कार्टन बनाने वाला क्राफ़्ट काग़ज़ 18 फ़ीसदी पर ख़रीदता है और डिब्बा 5 फ़ीसदी पर बेचता है। उसके पास बचा हुआ क्रेडिट जमा होता जाता है, पर धारा 54(3) उसे उस जमा क्रेडिट के रिफ़ंड का हक़ देती है, क्योंकि उसका उत्पाद कर-योग्य है।

कॉपी बनाने वाले का उत्पाद कर-योग्य नहीं, छूट वाला है, इसलिए वही धारा उसके काम नहीं आती। दोनों एक ही फँसाव में हैं, पर निकास सिर्फ़ एक के पास है। संघ की तीसरी माँग इसी बंद दरवाज़े के बग़ल वाली खिड़की है।

अक्टूबर 2025 में पहली चेतावनी जा चुकी थी

यह शिकायत सितंबर 2026 में नई नहीं है।

17 अक्टूबर 2025 को केएनएन इंडिया की रिपोर्ट में संघ ने 1,500 से ज़्यादा एमएसएमई पर बंद होने का ख़तरा बताया था। संघ की कार्यसमिति के सदस्य एस. सरवणकुमार के शब्द थे, "Despite a widely appreciated policy intent, the ground reality is stark", यानी नीति की मंशा की सराहना सब करते हैं, ज़मीनी हक़ीक़त कठोर है।

उसी बयान में सरकार से "an urgent corrective mechanism" की माँग थी, एक तत्काल सुधार-तंत्र, ताकि घरेलू खिलाड़ियों को बराबरी का मैदान वापस मिले।

और उससे पहले सितंबर 2025 में

फ़्री प्रेस जर्नल ने 30 सितंबर 2025 को लिखा कि संघ ने आयात पर रोक और डंपिंग-रोधी शुल्क, दोनों माँगे थे।

उस रिपोर्ट में संघ के शब्द थे कि छूट "will play havoc with the Indian notebook industry", भारतीय नोटबुक उद्योग में तबाही मचाएगी, और यह कि क्षेत्र "imminent collapse", निकट पतन का सामना कर रहा है।

एक साल में शब्द तीखे हुए हैं और माँग की शक्ल बदली है। अक्टूबर में माँग रोक और शुल्क की थी। सितंबर 2026 के पत्र में वही माँग न्यूनतम आयात मूल्य और औपचारिक डंपिंग-रोधी जाँच के रूप में आई है, जो व्यापार-नियमों के भीतर टिकने वाले उपाय हैं।

भारत का एक कंटेनर बंदरगाह। तैयार कॉपियों का आयात कितना बढ़ा, इसका कोई आँकड़ा संघ के पत्र में नहीं है
तस्वीर: Bharat S Raj, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

जो आँकड़ा कहीं नहीं है

पूरे मामले में एक चीज़ लगातार अनुपस्थित है, और उसे दर्ज करना ज़रूरी है।

आयात कितना आया, इसका कोई मूल्य या मात्रा का आँकड़ा न पत्र पर आधारित किसी रिपोर्ट में है, न संघ की विज्ञप्ति में, न अक्टूबर 2025 और सितंबर 2025 के बयानों में। जिन स्रोतों तक हम पहुँच सके, उनमें से किसी ने यह नहीं बताया कि इंडोनेशिया से पिछले साल कितनी कॉपियाँ भारत आईं, किस दाम पर आईं, और उसमें कितनी बढ़ोतरी हुई।

डंपिंग-रोधी जाँच में यही आँकड़ा पहली शर्त होता है। उसके बिना चोट और आयात के बीच कारण-संबंध साबित नहीं होता।

बाज़ार का आकार और दुकान की क़ीमत

टैक्सटीएमआई के अनुसार नोटबुक और अभ्यास-पुस्तिका क्षेत्र का बाज़ार लगभग 10,000 करोड़ रुपये का है।

उपभोक्ता के लिए इस पूरे बदलाव का नतीजा वह नहीं निकला जो 3 सितंबर की घोषणा से उम्मीद थी। ईज़ी नोट स्टेशनरी के प्रबंध निदेशक के शब्द रिपोर्ट में हैं, "We may not be able to reduce prices of notebooks and exercise books because of cost pressures", लागत के दबाव के कारण दाम घटा पाना मुश्किल है।

फ़ेडरेशन ऑफ़ पेपर ट्रेडर्स एसोसिएशन के एक पदाधिकारी ने इसे और सीधा कहा: जब काग़ज़ और नोटबुक दोनों पर 12 फ़ीसदी था, तब कोई दिक़्क़त नहीं थी।

संघ ने जीएसटी परिषद से क्या अलग माँगा

वाणिज्य मंत्रालय वाली चार माँगों के साथ संघ की एक माँग कर-व्यवस्था के भीतर की है, और वह पहली नज़र में उल्टी लगती है।

संघ की विज्ञप्ति के अनुसार उसने कहा है कि नोटबुक पर शून्य के बजाय एक मामूली दर रखी जाए, ताकि इनपुट टैक्स क्रेडिट की धारा बहती रहे। साथ में उसने कच्चे माल की दरों की समीक्षा माँगी है, ख़ासकर लेपित काग़ज़-बोर्ड की।

टैक्सटीएमआई में यही बात एक्सरसाइज़ बुक निर्माताओं के हवाले से है, कि शून्य दर से "production costs will increase and nullify the intended benefit"। कर्नाटक पेपर एंड स्टेशनरी ट्रेडर्स एसोसिएशन ने भी यही कहा कि शून्य कर पर इनपुट कर की भरपाई का रास्ता नहीं बचता।

यह उद्योग शून्य दर हटाने की माँग क्यों कर रहा है

एक उद्योग अपने ही उत्पाद पर टैक्स लगाने की माँग करे, यह असामान्य दिखता है। इसकी वजह हिसाब में है। शून्य दर उसे दो नुक़सान एक साथ देती है। पहला, कच्चे माल का चुकाया कर लौटता नहीं, इसलिए वह लागत में जुड़ जाता है और उत्पाद का दाम नीचे नहीं आता। दूसरा, वही शून्य सीमा पर भी लागू होता है, इसलिए आयातित कॉपी को भी वही छूट बिना किसी घरेलू लागत के मिल जाती है। एक मामूली दर, मान लीजिए 5 फ़ीसदी, दोनों को एक साथ हल कर देती है: घरेलू निर्माता का क्रेडिट चलने लगता है, और आयात पर उतने का आईजीएसटी लगने लगता है। इस उद्योग की माँग छूट के ख़िलाफ़ है, राहत के ख़िलाफ़ नहीं।

अब गेंद किसके पाले में है

चार माँगों में से हर एक अलग दरवाज़े पर जाती है, और यह ब्योरा तय करता है कि जवाब कब आएगा।

न्यूनतम आयात मूल्य विदेश व्यापार महानिदेशालय की अधिसूचना से लगता है, जैसा पिछले अगस्त पेपर बोर्ड पर हुआ। डंपिंग-रोधी जाँच व्यापार उपचार महानिदेशालय के पास जाती है, और वह घरेलू उद्योग के आवेदन और आँकड़ों पर शुरू होती है। रिफ़ंड की प्रक्रिया जीएसटी परिषद का विषय है। मिलों की क़ीमत-नीति की जाँच का ठिकाना पत्र में स्पष्ट नहीं है।

सरकार की ओर से इनमें से किसी माँग पर अभी कोई सार्वजनिक जवाब नहीं आया है, और स्कूली सत्र की अगली ख़रीद का मौसम सामने है।

स्रोतबिज़नेस स्टैंडर्ड, आर्थिक दैनिक, 8 सितंबर 2026, डेक्कन क्रॉनिकल, अंग्रेज़ी दैनिक, संघ के पत्र पर रिपोर्ट, 8 सितंबर 2026, केएनएन इंडिया, एमएसएमई समाचार सेवा, 17 अक्टूबर 2025, फ़्री प्रेस जर्नल, मुंबई, 30 सितंबर 2025, फ़र्स्ट इंडिया, अखिल भारतीय नोटबुक निर्माता संघ की प्रेस विज्ञप्ति, टैक्सगुरु, कर-विश्लेषण, अधिसूचना 09/2025 और 10/2025-सीटी(रेट) पर, टैक्सक्लू, काग़ज़ पर जीएसटी दरों की सूची, 2025-26, टैक्सटीएमआई, उल्टी शुल्क संरचना पर निर्माताओं की माँग, ए2ज़ेड टैक्सकॉर्प, नोटबुक की क़ीमतों पर रिपोर्ट, द पल्प एंड पेपर टाइम्स, काग़ज़ मिलों के परिपत्रों पर रिपोर्ट, टैक्सगुरु, डीजीएफ़टी अधिसूचना 26/2025-26, 22 अगस्त 2025, विकिपीडिया, आसियान-भारत मुक्त व्यापार क्षेत्र

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