सेबी ने अडानी समूह की पाँच कंपनियों से जुड़ी हिंडनबर्ग-संबंधी कार्यवाही निपटाई
मंगलवार, 22 सितंबर को जारी सेबी के एक आदेश ने अडानी एंटरप्राइज़ेज़, अडानी टोटल गैस, एडब्ल्यूएल एग्री बिज़नेस, अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस के ख़िलाफ़ 15 फ़रवरी 2024 का वह कारण-बताओ नोटिस निपटाया, जो हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद हुई जाँच से निकला था। पाँचों कंपनियों ने मिलाकर 1,50,80,000 रुपये चुकाए। सेबी का अपना आदेश दर्ज करता है कि यह निपटारा 'without admitting or denying the findings of facts and conclusions of law' की शर्त पर हुआ, यानी न आरोप मानकर, न नकारकर, और यह ठीक वह हिस्सा नहीं है जिस पर सेबी ख़ुद एक साल पहले फ़ैसला सुना चुका था।

मंगलवार, 22 सितंबर को सेबी की वेबसाइट पर एक पाँच पन्नों का आदेश चढ़ा, शीर्षक सीधा-सा: "अडानी समूह की कंपनियों के मामले में निपटारा आदेश।" आदेश संख्या SO/JS/RJ/2026-27/7795-7799 पाँच आवेदन एक साथ निपटाता है: अडानी एंटरप्राइज़ेज़, अडानी टोटल गैस, एडब्ल्यूएल एग्री बिज़नेस (पहले अडानी विल्मर), अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस (पहले अडानी ट्रांसमिशन)। पाँचों ने मिलाकर 1,50,80,000 रुपये चुकाए। रक़म बड़ी नहीं है। यह आदेश का आकार बताती है, मतलब नहीं।
मतलब पाँचवें पैराग्राफ़ में दर्ज है। आवेदकों ने कार्यवाही निपटाने का प्रस्ताव अंग्रेज़ी के इन्हीं शब्दों की शर्त पर रखा था, "without admitting or denying the findings of facts and conclusions of law।" न आरोप मानना, न नकारना। एक निपटारे की पूरी परिभाषा यही है।
आदेश में दर्ज पाँच कंपनियाँ, एक नोटिस, डेढ़ करोड़ का हिसाब
सेबी ने अपनी जाँच हिंडनबर्ग रिपोर्ट में उठाए गए संबंधित-पक्ष लेनदेन (आरपीटी) के खुलासे और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों पर केंद्रित की थी। जाँच का विषय सेबी (लिस्टिंग बाध्यताएँ और खुलासा ज़रूरतें) विनियम, 2015 और उससे पहले चले लिस्टिंग एग्रीमेंट का उल्लंघन था, और यह सात कंपनियों को छूती थी: अडानी एंटरप्राइज़ेज़, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन, अडानी पावर, अडानी ट्रांसमिशन, अडानी ग्रीन एनर्जी, अडानी टोटल गैस और अडानी विल्मर। इसी जाँच से 15 फ़रवरी 2024 को एक कारण-बताओ नोटिस निकला, संदर्भ संख्या SEBI/HO/EAD-8/SKV/RM/6290/1-5। नोटिस पर सिर्फ़ पाँच कंपनियाँ आईं। अडानी पोर्ट्स और अडानी पावर के नाम इसमें नहीं हैं।
नोटिस के आरोप दो तरह के हैं। दोनों तकनीकी हैं। पहला आरोप सिर्फ़ अडानी एंटरप्राइज़ेज़ पर है: उसकी सहायक कंपनी अडानी एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड और एक संबंधित पक्ष वकोडर इन्वेस्टमेंट लिमिटेड के बीच हुआ लेनदेन 2013-14 के सालाना खाते में लागू लेखा मानक के तहत दर्ज नहीं हुआ, लिस्टिंग एग्रीमेंट के अनुच्छेद 32 का उल्लंघन। दूसरा आरोप पाँचों कंपनियों को अलग-अलग मात्रा में छूता है: 2015 से 2021 के बीच कई ऑडिट और सीमित समीक्षा रिपोर्टों पर दो फ़र्मों, धर्मेश पारेख एंड कंपनी और शाह ढांढरिया एंड कंपनी ने दस्तख़त किए। उस वक़्त उनके पास इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया का वैध पीयर रिव्यू सर्टिफ़िकेट नहीं था। अडानी एंटरप्राइज़ेज़ के मामले में यह तीन अलग मौक़ों पर दोहराया: 2015 की सालाना ऑडिट रिपोर्ट पर, फिर 2017 और 2021 की तिमाही समीक्षाओं पर, दोनों फ़र्मों के दस्तख़त से बारी-बारी।
रक़म बराबर नहीं बँटी। अडानी एंटरप्राइज़ेज़ ने सबसे ज़्यादा चुकाया, 76.05 लाख रुपये। अडानी ग्रीन एनर्जी ने 45.50 लाख रुपये चुकाए। बाक़ी तीन, अडानी टोटल गैस, एडब्ल्यूएल एग्री बिज़नेस और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस, ने अलग-अलग 9.75 लाख रुपये चुकाए। तीनों की रक़म एक बराबर थी। यह असमानता आरोपों की गिनती से मेल खाती है: अडानी एंटरप्राइज़ेज़ पर तीन अलग आरोप थे, बाक़ी तीन कंपनियों पर सिर्फ़ एक-एक।
रास्ता लंबा रहा। सेबी की आंतरिक समिति की तीन बैठकें हुईं: 6 अगस्त 2024, 9 अक्तूबर 2024 और 11 मई 2026 को। आवेदकों ने 29 मई 2026 को संशोधित शर्तें भेजीं। उच्चाधिकार सलाहकार समिति ने 29 जून 2026 को इन शर्तों की सिफ़ारिश की। सेबी के पूर्णकालिक सदस्यों के पैनल ने इसे 13 अगस्त 2026 को मंज़ूर किया। माँग का नोटिस 20 अगस्त को गया। कंपनियों ने 5 सितंबर को भुगतान की सूचना दी। आदेश 22 सितंबर को आया, क़रीब ढाई साल बाद जब नोटिस पहली बार जारी हुआ था।
निपटारे का मतलब आदेश ख़ुद तय करता है
इसका मतलब सीधा है, हालाँकि अक्सर ग़लत समझा जाता है। एक निपटारा अदालत का फ़ैसला नहीं है, जहाँ जज सबूत तौलकर दोष या निर्दोषता तय करता है। यह सेबी और आरोपित कंपनी के बीच एक समझौता है। कंपनी रक़म चुकाती है और शर्तें मानती है।

बदले में सेबी कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाता। न कोई दोष सिद्ध होता है, न कोई निर्दोषता। बीच का एक रास्ता है, और नियम उसे बीच का रास्ता ही रहने देते हैं।
सेबी (निपटान कार्यवाही) विनियम, 2018 का विनियम 27 इसे और पुख़्ता करता है। इसके तहत ऐसा कोई निपटारा आदेश किसी और कार्यवाही में सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं, बशर्ते वह कार्यवाही किसी ऐसे आरोप से जुड़ी हो जो इस निपटारे में शामिल ही नहीं। और यह किसी तीसरे पक्ष के अधिकार को प्रभावित नहीं करता। मतलब साफ़ है। अगर किसी निवेशक ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर अलग मुक़दमा किया हो, तो यह आदेश उसमें न सबूत बनेगा, न बचाव।
विनियम 5(1)(बी) एक शर्त और जोड़ता है: किसी मामले में जाँच, निरीक्षण या ऑडिट अधूरा हो, तो निपटारा आवेदन पर विचार ही नहीं होगा, गोपनीयता से जुड़े मामलों को छोड़कर। यानी जिस जाँच पर सेबी 2024 से पहले काम कर रहा था, वह इस निपटारे से पहले ख़त्म हो चुकी थी। फ़रवरी 2024 का नोटिस उसी पूरी जाँच का नतीजा था। अधूरी जाँच का यहाँ कोई शॉर्टकट नहीं।
निपटारा हर जगह नहीं चलता, 2018 के नियमों की सीमाएँ
2018 के विनियम सिर्फ़ उन्हीं कार्यवाहियों पर लागू होते हैं जिन्हें विनियम ख़ुद "specified proceedings" कहते हैं: सेबी अधिनियम की धारा 11, 11बी, 11डी, 12(3) या 15-आई के तहत, या प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम की धारा 12ए या 23-आई के तहत शुरू हुई प्रशासनिक और सिविल कार्यवाहियाँ। सेबी अधिनियम की धारा 24 के तहत होने वाला आपराधिक अभियोजन इस परिभाषा में सिरे से नहीं आता। ऐसे मामलों का रास्ता अलग है, "समाधान" यानी कंपाउंडिंग, जिसकी प्रक्रिया विनियम 33 तय करता है। वही समितियाँ इसे भी देखती हैं। पर क़ानूनन यह निपटारे से अलग चीज़ है।
निपटारे की अपनी सीमाएँ भी हैं। विनियम 5(2) के तहत सेबी किसी मामले को निपटाने से इनकार कर सकता है, अगर उसे लगे कि आरोप का असर पूरे बाज़ार पर पड़ा, बड़ी संख्या में निवेशकों को नुक़सान हुआ, या बाज़ार की साख को चोट पहुँची। यह इनकार अनिवार्य नहीं, सेबी की राय पर टिका विकल्प है। एक बंदिश बिना शर्त है। विनियम 5(4) के तहत जान-बूझकर बकाया न चुकाने वाला, भगोड़ा आर्थिक अपराधी, या जिसने पहले से लगा जुर्माना न भरा हो, ऐसे आवेदक का मामला सेबी सुन ही नहीं सकता।
अगर आवेदक बाद में मुकरे तो रास्ता वापसी का भी है। विनियम 28 कहता है: आवेदक निपटारे की शर्तें न माने, या सेबी को बाद में पता चले कि पूरा और सच्चा खुलासा नहीं हुआ था, या वचनों का उल्लंघन हुआ, तो निपटारा आदेश ख़ुद-ब-ख़ुद रद्द हो जाता है और सेबी वही कार्यवाही फिर शुरू कर सकता है। इस हफ़्ते के आदेश का नौवाँ पैराग्राफ़ लगभग यही तीन शर्तें गिनाता है, हालाँकि तीसरी शर्त, यानी समझौते की रक़म तय करने में कोई गड़बड़ी निकलना, दरअसल विनियम 31 की भाषा के क़रीब है, जो रक़म के हिसाब में अंतर आने पर लागू होता है, रद्दीकरण के आम नियम पर नहीं। दिलचस्प यह भी है कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट से निकला मूल आरोप, कि अडानी समूह ने अडिकॉर्प एंटरप्राइज़ेज़ जैसी कंपनियों के ज़रिए पैसा घुमाया, निपटारे से हल नहीं हुआ। वह पूरी सुनवाई से हल हुआ। पीयर रिव्यू सर्टिफ़िकेट वाला यह छोटा मामला निपटारे से हल हुआ। सेबी ने यह फ़र्क़ क्यों रखा, आदेश में इसकी कोई वजह दर्ज नहीं।
एक साल पहले का आदेश, निपटारा नहीं, विधिवत फ़ैसला
ठीक एक साल पहले, 18 सितंबर 2025 को, सेबी की वेबसाइट पर एक 63 पन्नों का आदेश आया था। शीर्षक अलग तरह का था: "हिंडनबर्ग के आरोपों के मामले में, अडिकॉर्प एंटरप्राइज़ेज़ प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े लेनदेन के संबंध में अंतिम आदेश।" यह निपटारा नहीं था। यह सेबी अधिनियम की धारा 11, 11बी और प्रतिभूति संविदा अधिनियम की धारा 12ए के तहत पारित एक विधिवत फ़ैसला था, जिसमें नोटिसी के तौर पर अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन, अडानी पावर और अडिकॉर्प एंटरप्राइज़ेज़ के अलावा गौतम अडानी और राजेश अडानी के नाम ख़ुद दर्ज थे।

आरोप हिंडनबर्ग रिपोर्ट के केंद्र में था। अडानी पोर्ट्स और अडानी पावर ने कथित तौर पर अडिकॉर्प एंटरप्राइज़ेज़ के ज़रिए पैसा घुमाया, एक ऐसा लेनदेन जो असल में छुपाया गया संबंधित-पक्ष लेनदेन था। सेबी की पूर्णकालिक सदस्य कमलेश सी. वार्ष्णेय ने 63 पन्नों में इस आरोप की जाँच की और अपने निष्कर्ष में लिखा, "the allegations made against Noticees in the SCN are not established।" आरोप साबित नहीं हुए, यह एक विधिवत निष्कर्ष है, निपटारे जैसा समझौता नहीं।
तर्क बारीक़ था।
जिस वक़्त यह लेनदेन हुआ, लिस्टिंग नियमों में "संबंधित-पक्ष लेनदेन" की परिभाषा किसी असंबंधित तीसरे पक्ष के ज़रिए हुए लेनदेन को शामिल नहीं करती थी। यह परिभाषा 2021 के एक संशोधन से बदली, जो 1 अप्रैल 2022 से लागू हुआ और 1 अप्रैल 2023 तक की मोहलत के साथ आया। आदेश ने कहा कि यह संशोधन आगे की तारीख़ से लागू होने के लिए बना था, पीछे के लेनदेन पर लागू नहीं हो सकता। इसके अलावा पैसा ब्याज सहित वापस आ चुका था, जाँच शुरू होने से पहले ही। इसलिए धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप भी नहीं टिका।
यह वही निष्कर्ष था जो सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से बनी विशेषज्ञ समिति पहले ही दे चुकी थी, और आदेश ख़ुद इसका हवाला देता है। कई अख़बारों ने 18 सितंबर 2025 के इस आदेश को "क्लीन चिट" कहा; बिज़नेस स्टैंडर्ड ने अपनी एक सुर्ख़ी में यही शब्द इस्तेमाल किया। पर "क्लीन चिट" क़ानून की भाषा नहीं है। सेबी ने जो लिखा, वह एक तय परिभाषा के तहत आरोप का न टिकना है, किसी को चरित्र प्रमाणपत्र देना नहीं। और यह फ़र्क़ ख़ुद इस हफ़्ते के निपटारे पर और भी सख़्ती से लागू होता है, क्योंकि निपटारे में तो कोई जाँच-पड़ताल हुई ही नहीं, सिर्फ़ भुगतान और एक शर्त हुई।
सुप्रीम कोर्ट, 3 जनवरी 2024: जाँच सेबी के पास ही रहेगी
यह पूरी जाँच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से गुज़री है। हिंडनबर्ग रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट 24 जनवरी 2023 को छापी थी। इसके बाद दायर हुईं कई याचिकाओं को अदालत ने एक साथ जोड़ा, विशाल तिवारी बनाम भारत संघ के नाम से। 3 जनवरी 2024 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अगुआई वाली तीन-जजों की पीठ ने फ़ैसला सुनाया।

फ़ैसले ने जाँच किसी विशेष जाँच दल या सीबीआई को सौंपने से इनकार किया। वजह अदालत ने ख़ुद लिखी। ऐसा क़दम असाधारण हालात में ही उठता है, जब जाँच एजेंसी जान-बूझकर ढिलाई बरत रही हो। यहाँ वह हद साबित नहीं हुई।
उस वक़्त तक सेबी चौबीस में से बाईस जाँचें पूरी कर चुका था। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल के भरोसे पर बाक़ी दो जाँचें "expeditiously preferably within three months" पूरी करने का निर्देश दिया। तीन महीने की मियाद तय हुई। सेबी ने उसी मियाद के भीतर बाक़ी जाँचें पूरी कीं, और उसी सिलसिले में 15 फ़रवरी 2024 का वह नोटिस आया, जिस पर इस हफ़्ते का निपटारा टिका है। अदालत ने एफ़पीआई और लिस्टिंग नियमों में हुए 2021-22 के संशोधन रद्द करने से भी इनकार किया। कोर्ट को प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं मिली।
फ़ैसले ने एक और काम किया, जिसका ज़िक्र कम होता है। अदालत ने सेबी और केंद्र सरकार की जाँच एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे यह भी देखें कि हिंडनबर्ग रिसर्च और उससे जुड़े दूसरे पक्षों ने शॉर्ट पोज़िशन लेकर भारतीय निवेशकों को जो नुक़सान पहुँचाया, उसमें कोई क़ानून का उल्लंघन तो नहीं हुआ। यह निर्देश एकतरफ़ा नहीं था। दोनों तरफ़ की जाँच का रास्ता एक साथ खुला।
उसी निर्देश पर सेबी ने 2 जुलाई 2024 को हिंडनबर्ग रिसर्च, उसके इकलौते लाभकारी मालिक नेथन एंडरसन और अमेरिकी निवेशक मार्क किंगडन को 46 पन्नों का कारण-बताओ नोटिस भेजा। आरोप था कि इन्होंने रिपोर्ट छापने से पहले ग़ैर-सार्वजनिक जानकारी के आधार पर शॉर्ट पोज़िशन बनाई, प्रतिभूति क़ानून के धोखाधड़ी-रोधी नियमों और शोध विश्लेषक आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए। हिंडनबर्ग ने जवाब में इसे "nonsense" कहकर ख़ारिज किया।
निपटारे के दायरे से बाहर क्या रह जाता है
इस हफ़्ते के निपटारे के दायरे से बाहर कम से कम तीन कार्यवाहियाँ अब भी खड़ी हैं। पहली, तेरह विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों से जुड़ी है। नाम जाने-पहचाने हैं: अल्बुला इन्वेस्टमेंट फ़ंड, क्रेस्टा फ़ंड, इमर्जिंग इंडिया फ़ोकस फ़ंड्स। हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने इन्हीं फ़ंडों पर आरोप लगाया था कि इनकी होल्डिंग असल में अडानी परिवार से जुड़ी है, और इनके ज़रिए न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी का नियम दरकिनार किया गया। सेबी की निगरानी प्रणाली ने इन फ़ंडों की असामान्य हिस्सेदारी पहले ही चिह्नित कर ली थी। जाँच अक्तूबर 2020 से चली आ रही है।
इन फ़ंडों ने अप्रैल 2024 में सेबी के दो तरह के नोटिसों, एक पंजीकरण रद्द करने की चेतावनी और दूसरा जुर्माने का, के जवाब में निपटारा आवेदन दिए थे। कोटक नियो की 24 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक़, जो मामले से वाक़िफ़ लोगों के हवाले से है, न कि किसी प्रकाशित आदेश पर, सेबी ने सभी तेरह आवेदन ख़ारिज कर दिए। आवेदन नहीं चला। वजह थी दो इनकार: सूचना का, रक़म का। फ़ंड न तो सेबी की माँगी जानकारी देने को राज़ी थे, न सैकड़ों करोड़ रुपये लौटाने को। पाँच फ़ंडों ने जून 2026 में सैट का रुख़ भी किया। दावा यह था कि सेबी ख़ुद अपना एक ज़रूरी प्रक्रियागत नियम भूल गया।
दूसरी कार्यवाही हिंडनबर्ग रिसर्च और नेथन एंडरसन को भेजा गया वही जुलाई 2024 का नोटिस है। सेबी ने उस वक़्त कहा था कि मामला तय प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के मुताबिक़ चल रहा है। इससे आगे कोई आदेश या निपटारा सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं मिलता। तीसरी एक अलग कड़ी है। अक्तूबर 2024 में सेबी ने अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस को हिस्सेदारी के ग़लत वर्गीकरण पर अलग से नोटिस भेजा था, कुछ निवेशकों को प्रवर्तक की जगह सार्वजनिक शेयरधारक बताने के आरोप पर। इसका आगे क्या हुआ, कोई सार्वजनिक दस्तावेज़ नहीं बताता। तीनों कार्यवाहियाँ इस हफ़्ते के आदेश में कहीं नहीं आतीं। आदेश ख़ुद सिर्फ़ पाँच आवेदकों और एक नोटिस की बात करता है।
आदेश ने जितना कहा, उतना ही निपटा है
यह आदेश अपनी सीमा ख़ुद दर्ज करता है, नौवें पैराग्राफ़ में। अगर आवेदकों की कोई बात झूठी निकले, वचनों या शर्तों का उल्लंघन हो, या समझौते की रक़म तय करने में कोई गड़बड़ी सामने आए, तो सेबी विनियम 28 के तहत यही निपटारा वापस खोल सकता है। भरी गई रक़म तब भी वापस नहीं मिलेगी, विनियम इतना साफ़ कहते हैं।
तब तक इस आदेश का मतलब उतना ही है जितना पाँच पन्नों में लिखा है: पाँच कंपनियाँ, एक पुराना नोटिस, 1,50,80,000 रुपये, और एक वाक्य जो न आरोप मानता है, न नकारता है। बाक़ी हर सवाल वहीं खड़ा है जहाँ हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद खड़ा हुआ था।
स्रोतभारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी): निपटारा आदेश संख्या SO/JS/RJ/2026-27/7795-7799, 'अडानी समूह की कंपनियों के मामले में', 22 सितंबर 2026, न्यायनिर्णायक अधिकारी जय सेबस्टियन, सेबी: भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (निपटान कार्यवाही) विनियम, 2018, 28 नवंबर 2024 तक संशोधित समेकित पाठ, सेबी: अंतिम आदेश संख्या WTM/KV/CFID/CFID-TPD/31671/2025-26, 'हिंडनबर्ग के आरोपों के मामले में, अडिकॉर्प एंटरप्राइज़ेज़ से जुड़े लेनदेन के संबंध में', 18 सितंबर 2025, पूर्णकालिक सदस्य कमलेश सी. वार्ष्णेय, इंडियन कानून पर उपलब्ध सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला: विशाल तिवारी बनाम भारत संघ, 2024 INSC 3, 3 जनवरी 2024 (sci.gov.in इस मशीन पर कैप्चा-बंद है), बिज़नेस स्टैंडर्ड, 22 सितंबर 2026: पाँच अडानी कंपनियों का सेबी के साथ 1.51 करोड़ रुपये में निपटारा, द स्टेट्समैन, 22 सितंबर 2026: सेबी का पाँच अडानी समूह कंपनियों से जुड़ी हिंडनबर्ग-संबंधी कार्यवाही का निपटारा, कोटक नियो, 24 अगस्त 2026, विश्व वेद की रिपोर्ट: सेबी ने अडानी समूह में हिस्सेदारी रखने वाले तेरह विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों के निपटारा आवेदन ख़ारिज किए, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 18 नवंबर 2024: इमर्जिंग इंडिया फ़ोकस फ़ंड्स का सेबी के साथ 64.35 लाख रुपये में अलग मामले का निपटारा, न्यूज़ ऑन एयर (प्रसार भारती), 2 जुलाई 2024: सेबी का हिंडनबर्ग रिसर्च, नेथन एंडरसन और अन्य को कारण-बताओ नोटिस, लॉ.एशिया, सितंबर 2025: सेबी के 18 सितंबर 2025 के आदेशों पर विश्लेषण, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 18 सितंबर 2025, शाम 8:46: सुर्ख़ी 'Sebi gives Adani group clean chit, dismisses Hindenburg allegations', बिज़नेस स्टैंडर्ड, 22 अक्तूबर 2024: अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस को हिस्सेदारी के वर्गीकरण पर सेबी का अलग नोटिस