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सिरिंज पर 516 फ़ीसदी का औसत व्यापार मार्जिन एनपीपीए ने 2018 में ख़ुद नापा था, आदेश आठ साल में नहीं आया

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषध प्रशासन ने केंद्र को लिखा है कि 11.05 रुपये में अस्पताल तक पहुँचे एक ड्रिप सेट पर 325 रुपये की एमआरपी छपी है। राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने ठीक यही हिसाब सिरिंज और सुइयों पर 1 मार्च 2018 के अपने दफ़्तरी ज्ञापन में छापा था, हितधारकों से राय माँगी थी, और उसके बाद इन तीनों में से किसी पर कोई मूल्य आदेश जारी नहीं किया।

सोडियम क्लोराइड की दो थैलियों से जुड़ी पूरी परफ़्यूज़न लाइन, यानी ड्रिप चैंबर, रोलर क्लैंप, तीन रास्ते वाला वॉल्व और नली, एक स्टेराइल चादर पर फैलाकर रखी हुई, फ़रवरी 2006 की तस्वीर; यह तस्वीर भारत की नहीं है, पर 1989 की अधिसूचना जिस परफ़्यूज़न सेट को दवा कहती है वह यही सामान है
तस्वीर: Arnaud Froissart, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

अस्पताल के बिस्तर के पास जो लोहे का स्टैंड खड़ा होता है, उस पर टँगी बोतल से एक पतली नली मरीज़ की नस तक जाती है। पूरे सामान को ड्रिप सेट कहते हैं, और भर्ती हुए किसी भी मरीज़ के बिल में यह सबसे आम चीज़ है। जुलाई में महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषध प्रशासन ने निजी अस्पतालों की ख़रीद की क़ीमत और इन्हीं सामानों पर छपी एमआरपी मिलाकर देखी। एक ड्रिप सेट ऐसा मिला जो अस्पताल तक 11 रुपये 5 पैसे में पहुँचा था और जिस पर 325 रुपये छपे थे।

गणित सीधा है: (325 − 11.05) ÷ 11.05 × 100 = 2,841 फ़ीसदी।

आयुक्त तुकाराम मुंढे ने ये आँकड़े औषध विभाग और राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) को भेजे हैं, इस माँग के साथ कि व्यापार मार्जिन पर कोई हद बने। एनपीपीए यह काम आठ साल पहले ख़ुद कर चुका है। 1 मार्च 2018 के एक दफ़्तरी ज्ञापन में उसने सिरिंज और सुइयों का पूरा ब्यौरा छापा था, और उसके अनुलग्नक की आख़िरी पंक्ति में सब तरह की सिरिंजों का औसत व्यापार मार्जिन 516 फ़ीसदी दर्ज है। अधिकतम 1,251 फ़ीसदी। ज्ञापन के नीचे लिखा था कि हितधारक अपनी राय एनपीपीए को भेज सकते हैं।

उसके बाद सिरिंज, सुई या ड्रिप सेट पर कोई मूल्य आदेश जारी नहीं हुआ।

महाराष्ट्र के सर्वे में ख़रीद की क़ीमत और छपी एमआरपी

सर्वे महाराष्ट्र राज्य मूल्य निगरानी एवं संसाधन इकाई ने किया। यह इकाई राज्य की नहीं, एनपीपीए की योजना है, जो 34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ऐसी इकाइयों को पैसा देता है। काम जुलाई 2026 में हुआ। जगहें तीन थीं: मुंबई महानगर क्षेत्र, पुणे और छत्रपति संभाजीनगर। श्रेणियाँ चार थीं, यानी ड्रिप सेट, सिरिंज और सुइयाँ, नेबुलाइज़र और ऑक्सीजन मास्क, और भर्ती मरीज़ पर ख़र्च होने वाली बाक़ी सामग्री।

फ़्री प्रेस जर्नल ने 16 सितंबर की शाम अमित श्रीवास्तव की रिपोर्ट में आठ जोड़े छापे। लाइवोफ़्यूज़न ड्रिप सेट: 11.50 रुपये पर 252 रुपये। पॉलीमेड ड्रिप सेट: 10.50 पर 187। दस मिलीलीटर की सिरिंज: 6.75 पर 57.20, यानी 747 फ़ीसदी। नेबप्लस नेबुलाइज़र: 40 पर 715। एयरो कंफ़र्ट किट: 62.50 पर 662। कैथेटर: 29.41 पर 310। डिस्पोज़ेबल मास्क: 197.50 पर 500। कुल कितने उत्पाद देखे गए, यह किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं है।

अब वह फ़र्क़ जो अहम है। 2,841 फ़ीसदी अस्पताल का जोड़ा हुआ मुनाफ़ा नहीं है। यह व्यापार ख़रीद मूल्य और छपी एमआरपी के बीच की दूरी है, और आयुक्त ख़ुद यही कह रहे हैं। इंडिया टीवी ने 16 सितंबर को शाम 4 बजकर 14 मिनट पर मुंढे की एक्स पोस्ट से जो पंक्तियाँ छापीं, उनमें पहली यह है: "अस्पताल के बिल का सबसे महँगा हिस्सा शायद कभी अस्पताल को छूता तक नहीं।" दूसरी यह: "भर्ती मरीज़ के पास यह जानने का कोई रास्ता नहीं कि किसी चिकित्सा सामग्री पर लिखी क़ीमत उसकी असल लागत है या वह मार्जिन जो वार्ड तक पहुँचने से बहुत पहले तय हो चुका था। सूचना का यह फ़र्क़ अपनी जड़ में सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला है।"

रिपोर्टें ख़ुद तय नहीं कर पातीं कि 325 रुपये छपे थे या वसूले गए। फ़्री प्रेस जर्नल इसे ख़रीद लागत बनाम एमआरपी बताता है। आउटलुक मनी ने 16 सितंबर को लिखा कि सर्वे अस्पताल की चुकाई क़ीमत की तुलना छपी एमआरपी या मरीज़ से वसूली रक़म से करता है, और यह तय नहीं करता कि किससे। अंतर छोटा नहीं है। एक सूरत में छपाई की जाँच होगी, दूसरी में बिल की।

एक और बात हर आँकड़े पर लागू होती है। वह चिट्ठी सार्वजनिक दस्तावेज़ नहीं है। न संदर्भ क्रमांक कहीं छपा है, न पाठ कहीं मिलता है। 17 सितंबर तक fda.maharashtra.gov.in के प्रेस विज्ञप्ति और अधिसूचना, दोनों पन्नों पर इस सर्वे का कोई ज़िक्र नहीं था। तारीख़ पर भी रिपोर्टें अलग हैं: आउटलुक मनी चिट्ठी 10 अगस्त की बताता है, इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट अगस्त के पहले हफ़्ते में सौंपी जाना लिखता है, और मुंढे की पोस्ट को टाइम्स ऑफ़ इंडिया मंगलवार यानी 15 सितंबर का बताता है जबकि इंडियन एक्सप्रेस 16 सितंबर का। यह ख़बर अख़बारों से आई है, सरकारी काग़ज़ से नहीं।

1 मार्च 2018 का ज्ञापन: सिरिंज पर 516 फ़ीसदी, सुई पर 255

एनपीपीए का जो काग़ज़ इस पूरी कहानी की रीढ़ है, वह तीन पन्ने का है। ऊपर फ़ाइल नंबर है, 19(837)/2016/डीपी/डिव.II/एनपीपीए। तारीख़ 1 मार्च 2018। विषय: "सिरिंज और सुइयों पर व्यापार मार्जिन का प्रदर्शन"। नीचे दस्तख़त सहायक निदेशक (मूल्य निर्धारण) बलजीत सिंह के हैं। पूरा पाठ चार पंक्तियों का है। एनपीपीए कहता है कि सरकारी स्रोतों तथा निर्माताओं और आयातकों से मिले आँकड़ों के आधार पर उसने सिरिंज और सुइयों के व्यापार मार्जिन का विश्लेषण किया है, श्रेणीवार औसत और अधिकतम मार्जिन साथ लगा है, और हितधारक अपनी राय [email protected] पर भेज सकते हैं।

असली चीज़ दो अनुलग्नकों में है। पहला अनुलग्नक सिरिंजों का है। उसमें सात ख़ाने हैं: क़िस्म, सुई के साथ या बिना, आकार मिलीलीटर में, औसत पीटीडी, औसत एमआरपी, और औसत तथा अधिकतम व्यापार मार्जिन। पीटीडी का मतलब है वितरक या स्टॉकिस्ट को दी जाने वाली क़ीमत, यानी वह दाम जिस पर माल कारख़ाने से निकलकर व्यापार में पहला हाथ बदलता है।

पंक्तियाँ आकार के हिसाब से चलती हैं। सुई वाली डिस्पोज़ेबल हाइपोडर्मिक सिरिंज, एक मिलीलीटर: पीटीडी 2.27 रुपये, एमआरपी 8.08 रुपये, औसत मार्जिन 254 फ़ीसदी, अधिकतम 332। दो मिलीलीटर: 1.30 पर 8.52, औसत 574, अधिकतम 1,090। पाँच मिलीलीटर: 2.31 पर 13.08, औसत 636, और अधिकतम 1,251 फ़ीसदी। बिना सुई वाली श्रेणी में दस मिलीलीटर की पंक्ति सबसे ख़राब है: पीटीडी 2.41, एमआरपी 18.60, औसत मार्जिन 664 फ़ीसदी, अधिकतम 1,247। पचास मिलीलीटर की पंक्ति में 16.96 रुपये का माल 97 रुपये पर पहुँचता है।

दस मिलीलीटर की एक डिस्पोज़ेबल प्लास्टिक सिरिंज, जिसके फलक पर एक से बारह तक के निशान पढ़े जा सकते हैं, 2004 की तस्वीर; अनुलग्नक में सबसे ऊँचा औसत मार्जिन इसी आकार की पंक्ति पर दर्ज है
तस्वीर: Photograph by Erich Schulz, Brisbane, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

तालिका की आख़िरी पंक्ति पर "ग्रैंड टोटल" लिखा है। उसमें चार अंक हैं: 3.92, 20.27, 516, 1,251। पहला औसत पीटीडी है, दूसरा औसत एमआरपी, तीसरा औसत व्यापार मार्जिन, चौथा अधिकतम। इसी पंक्ति के किनारे किसी ने हाथ से दस्तख़त कर के नीचे 1/3/18 लिख रखा है।

दूसरा अनुलग्नक सुइयों का है और छोटा है, छह क़िस्में। डिस्पोज़ेबल हाइपोडर्मिक सुई: 1.48 रुपये पर 4.33 रुपये, औसत 270 फ़ीसदी, अधिकतम 789। ब्लड कलेक्शन सुई: 2.60 पर 9.00। स्पाइनल सुई: 626.32 पर 1,304। बायोप्सी सुई: 1,183.76 पर 2,179, औसत मार्जिन 83 फ़ीसदी। सबसे कम मार्जिन इंसुलिन पेन की सुई पर है, 57 फ़ीसदी, जहाँ 8.90 रुपये का माल 14 रुपये पर बिकता है। सुइयों का ग्रैंड टोटल 255 फ़ीसदी औसत और 789 फ़ीसदी अधिकतम है।

एक ब्योरा और, जो फ़ाइल नंबर में छिपा है। ठीक साल भर पहले, 20 फ़रवरी 2017 को, एनपीपीए ने कोरोनरी स्टेंट के व्यापार मार्जिन पर स्पष्टीकरण जारी किया था। उस काग़ज़ पर भी फ़ाइल नंबर 19(837)/2016 है। स्टेंट पर उसी फ़ाइल में आदेश निकला और क़ीमत बँधी। सिरिंज पर उसी फ़ाइल में आँकड़े छपे और राय माँगी गई। उस माँग पर क्या आया, एनपीपीए ने कभी नहीं बताया।

'दवा' का दर्जा 17 मार्च 1989 को तय हो चुका था

यह सवाल उठते ही जवाब आता है कि ये उपकरण हैं, दवा नहीं। वह जवाब 1989 में ग़लत हो चुका था। 17 मार्च 1989 के भारत के राजपत्र में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधिसूचना जीएसआर 365(अ) छपी है। उसमें औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 की धारा 3(ख)(iv) के तहत, औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड से सलाह के बाद, तीन चीज़ों को "तत्काल प्रभाव से" दवा घोषित किया गया है: डिस्पोज़ेबल हाइपोडर्मिक सिरिंज, डिस्पोज़ेबल हाइपोडर्मिक सुइयाँ, और डिस्पोज़ेबल परफ़्यूज़न सेट। तीसरी मद, परफ़्यूज़न सेट, वही नली है जिससे नस में तरल चढ़ता है। नीचे संयुक्त सचिव विनीता राय के दस्तख़त हैं।

सैंतीस बरस।

कैथेटर बाद में आया। 6 अक्टूबर 2005 की अधिसूचना का.आ. 1468(अ) ने दस स्टेराइल उपकरणों को दवा घोषित किया: कार्डियक स्टेंट, ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट, कैथेटर, इंट्रा ऑक्युलर लेंस, आई.वी. कैन्युला, बोन सीमेंट, हार्ट वाल्व, स्कैल्प वेन सेट, ऑर्थोपेडिक इंप्लांट और इंटरनल प्रॉस्थेटिक रिप्लेसमेंट। फिर 11 फ़रवरी 2020 की अधिसूचना का.आ. 648(अ) ने 1 अप्रैल 2020 से हर चिकित्सा उपकरण को दवा बना दिया, और एनपीपीए ने 31 मार्च 2020 की का.आ. 1232(अ) से कहा कि सभी उपकरण उसी तारीख़ से डीपीसीओ 2013 से चलेंगे। दस्ताने जैसी चीज़ें इसी आख़िरी, थोक अधिसूचना से भीतर आईं। सिरिंज और ड्रिप सेट उससे इकतीस साल पहले भीतर थे।

यह बात एनपीपीए को मालूम भी थी। 10 मार्च 2017 के अपने एक ज्ञापन में उसने लिखा कि बाज़ार में और स्वास्थ्य केंद्रों में कई चिकित्सा उपकरण ऐसे मिल रहे हैं जिनके पैकेट पर निर्माता ने एमआरपी छापी ही नहीं, और यह "देश के क़ानून का खुला उल्लंघन" है। उसी ज्ञापन में 22 अधिसूचित उपकरणों की गिनती है। पहले तीन नंबर वही हैं जो 1989 की सूची में थे। सूची के नीचे कोष्ठक में एनपीपीए ने ख़ुद लिखा है कि इनमें से क्रमांक 19 से 22 तक ही डीपीसीओ के तहत 'अनुसूचित' हैं और उसके मूल्य नियंत्रण में आते हैं। बाक़ी अठारह पर कोई क़ीमत नहीं बँधी। सिरिंज, सुई और परफ़्यूज़न सेट उन अठारह में थे।

अधिसूचित उपकरणों की गिनती पर भी दस्तावेज़ आपस में नहीं मिलते। एनपीपीए का 2017 का यह ज्ञापन 22 कहता है, पत्र सूचना कार्यालय 24, और जो आँकड़ा सबसे ज़्यादा उद्धृत होता है, 37, वह किसी सरकारी काग़ज़ में नहीं मिला।

नियंत्रण में चार अनुसूचित उपकरण और घुटने का प्रत्यारोपण

क़ीमत बाँधने के दो ही रास्ते हैं। पहला, चीज़ को डीपीसीओ 2013 की अनुसूची-1 में डाला जाए, जो राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची से बनती है। दूसरा, डीपीसीओ का पैरा 19, जो सरकार को "असाधारण परिस्थितियों" में, जनहित में, किसी भी दवा की अधिकतम या खुदरा क़ीमत तय करने की शक्ति देता है।

11 नवंबर 2022 की अधिसूचना का.आ. 5249(अ) से बदली हुई अनुसूची-1 में उपकरणों की चार ही प्रविष्टियाँ हैं: हार्मोन छोड़ने वाला आईयूडी, ताँबे वाला आईयूडी, कंडोम, और कोरोनरी स्टेंट। सूची में पाँचवाँ उपकरण नहीं है। 25 मार्च 2026 की अधिसूचना का.आ. 1587(अ) के मुताबिक़ 1 अप्रैल 2026 से बेयर मेटल स्टेंट की अधिकतम क़ीमत 10,762.15 रुपये है और ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट की 39,186.03 रुपये, जीएसटी अलग। घुटने का प्रत्यारोपण अनुसूची में नहीं है; वह 16 अगस्त 2017 की अधिसूचना का.आ. 2668(अ) से पैरा 19 के तहत बँधा है और तब से हर साल बढ़ाया जाता रहा है।

बाक़ी सब चीज़ों पर सिर्फ़ एक नियम चलता है, डीपीसीओ का पैरा 20(1)। वह कहता है कि सरकार सभी दवाओं की अधिकतम खुदरा क़ीमत पर नज़र रखेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि कोई निर्माता पिछले बारह महीनों में एमआरपी को दस फ़ीसदी से ज़्यादा न बढ़ाए। इस वाक्य में जो शब्द नहीं है, वही सबसे अहम है। यहाँ बढ़ोतरी पर हद है, स्तर पर नहीं। 325 रुपये की एमआरपी क़ानूनन ठीक है, और अगले बरस वह 357.50 हो सकती है। पैरा 26 कहता है कि कोई भी व्यक्ति किसी उपभोक्ता को मूल्य सूची या पैकेट पर लिखी क़ीमत, इन दोनों में से जो कम हो, उससे ऊपर नहीं बेच सकता। जो छत मरीज़ को बचाती है, वह छत निर्माता ख़ुद बनाता है।

इस ढाँचे की सबसे साफ़ तस्वीर एनपीपीए की अपनी फ़ाइलों में है। 25 अगस्त 2026 की 150वीं बैठक में प्राधिकरण ने आईवी फ़्लूड की बोतलों के ढक्कन पर विचार किया, कि "यूरो हेड ड्यूल पोर्ट" को अलग अधिकतम क़ीमत मिलनी चाहिए या नहीं। विशेषज्ञ समिति ने इस पर तीन बैठकें कीं, बहाव की दर का विश्लेषण देखा, प्लास्टिक के प्रमाणपत्र देखे। फ़ैसला हक़ में गया। कंपनी को मेट्रोनिडाज़ोल इंजेक्शन पर 0.25 रुपये प्रति मिलीलीटर और सिप्रोफ़्लॉक्सासिन पर 0.23 रुपये प्रति मिलीलीटर की अलग अधिकतम क़ीमत मिली। उससे पहले, 3 सितंबर 2026 को, एनपीपीए ने सभी आईवी फ़्लूड कंपनियों से ग्लूकोज़, सोडियम क्लोराइड और रिंगर लैक्टेट के आँकड़े दस दिन में माँगे थे। बोतल के भीतर के तरल की क़ीमत पैसे के सौवें हिस्से तक तय होती है। उससे नस तक जाने वाली नली की कोई क़ीमत नहीं।

अस्पताल की एक अलमारी में रखी 0.9 फ़ीसदी सोडियम क्लोराइड की 500 और 1,000 मिलीलीटर की बोतलें, जिन पर लेबल और मात्रा के निशान साफ़ दिखते हैं; यह तस्वीर फ़िलिस्तीन के एक अस्पताल की है, मई 2020 की
तस्वीर: أمين, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

70 फ़ीसदी की सीमा और 19 जून 2023 की बैठक के मिनट

कोविड की दूसरी लहर में सरकार ने यही काम एक बार किया था, और काग़ज़ बताते हैं कि वह कैसे किया जाता है। 3 जून 2021 की अधिसूचना का.आ. 2161(अ) ने ऑक्सीजन सांद्रक पर, और 13 जुलाई 2021 की का.आ. 2808(अ) ने पाँच उपकरणों पर, पैरा 19 के तहत व्यापार मार्जिन बाँध दिया। पाँच उपकरण थे पल्स ऑक्सीमीटर, ब्लड प्रेशर नापने की मशीन, नेबुलाइज़र, डिजिटल थर्मामीटर और ग्लूकोमीटर। वजह काग़ज़ पर दर्ज है। दूसरी अधिसूचना की प्रस्तावना का पैरा 7 दर्ज करता है कि एनपीपीए ने निर्माताओं, विपणकों और आयातकों से आँकड़े जुटाए और पाया कि वितरक के मूल्य से एमआरपी तक 709 फ़ीसदी तक के मार्जिन दर्ज हुए हैं।

उँगली पर लगा एक पल्स ऑक्सीमीटर, जिसकी स्क्रीन पर 97 फ़ीसदी ऑक्सीजन और 112 की नब्ज़ दिख रही है, अक्टूबर 2020 की तस्वीर, जो भारत की नहीं है; 2021 में जिन पाँच उपकरणों पर मार्जिन बाँधा गया था उनमें यह पहला था
तस्वीर: Johanchristell99, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

फिर एक सूत्र है, और वह पूरा तरीक़ा है: अधिकतम खुदरा मूल्य = वितरक का मूल्य + (वितरक का मूल्य × व्यापार मार्जिन) + लागू जीएसटी, जहाँ व्यापार मार्जिन 70 फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं होगा।

दोनों अधिसूचनाएँ स्थायी नहीं थीं। हर कुछ महीने बाद इन्हें बढ़ाया जाता रहा। ऑक्सीजन सांद्रक की सीमा 30 नवंबर 2021, 30 मई 2022, 30 जून 2022 और 30 दिसंबर 2022 को बढ़ी; पाँच उपकरणों की 31 जनवरी 2022, 29 जुलाई 2022 और 30 दिसंबर 2022 को। आख़िरी बार 29 मार्च 2023 को, अधिसूचना का.आ. 1518(अ) और 1519(अ) से, दोनों को "30 जून 2023 तक या अगले आदेश तक, जो पहले हो" बढ़ाया गया। फिर यह सिलसिला रुक गया।

उसके बाद क्या हुआ, यह प्राधिकरण की अपनी बैठक के मिनट में लिखा है। 19 जून 2023 को दोपहर तीन बजे, अध्यक्ष कमलेश कुमार पंत की अध्यक्षता में, प्राधिकरण की 246वीं और डीपीसीओ 2013 के तहत 114वीं बैठक हुई। कार्यसूची में मद 8 और मद 9 इन्हीं दो अधिसूचनाओं की "वैधता बढ़ाने" के बारे में थीं। मद 8 पर दर्ज फ़ैसला यह है: "प्राधिकरण ने मामले पर विचार-विमर्श किया और निर्देश दिया कि ऑक्सीजन सांद्रकों की एमआरपी पर डीपीसीओ 2013 के पैरा 20(1) के अनुसार निगरानी जारी रहेगी।" मद 9 पर पाँचों उपकरणों के लिए वही वाक्य दोहराया गया है।

पैरा 20(1) यानी वही दस फ़ीसदी वाली सालाना हद। सीमा बढ़ाने के बजाय निगरानी की भाषा चुनी गई, और उसके बाद कोई अधिसूचना नहीं आई। यह कहीं नहीं लिखा कि सीमा ख़त्म की जा रही है। जो लिखा है वह इतना ही है कि इन्हें बढ़ाया नहीं गया, और तीन साल में कोई नया आदेश नहीं आया।

एनपीपीए की वेबसाइट यह नहीं मानती। 17 सितंबर 2026 को उसके 'अध्यक्ष का संदेश' पन्ने पर यह वाक्य मौजूद है कि एनपीपीए ने 3 जून 2021 और 13 जुलाई 2021 की अधिसूचनाओं से ऑक्सीजन सांद्रक और पाँच अन्य चिकित्सा उपकरणों का व्यापार मार्जिन वितरक मूल्य के स्तर पर 70 फ़ीसदी पर बाँध दिया है। वाक्य वर्तमान काल में है। पन्ने पर न कोई तारीख़ है, न किसी का नाम।

सरकार का अपना जवाब इससे अलग पढ़ा जाता है। 17 मार्च 2026 को राज्यसभा में रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल के लिखित उत्तर में यही पाँच उपकरण भूतकाल में आते हैं, कोविड महामारी के दौरान की गई कार्रवाई के तौर पर, और ऑक्सीजन सांद्रक का नाम उसमें है ही नहीं। उसी उत्तर का अगला वाक्य कहता है कि ग़ैर-अनुसूचित उपकरणों पर निर्माता बारह महीने में दस फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं बढ़ा सकते।

घुटने की टिप्पणी (आर), और स्टेंट की वह टिप्पणी जो 2022 में बंद हुई

अस्पताल ख़ुद कितना जोड़ सकता है, इस पर दवा मूल्य नियंत्रण के पूरे ढाँचे में एक ही जगह हद बँधी है। 16 अगस्त 2017 की अधिसूचना का.आ. 2668(अ) की टिप्पणी (आर) कहती है कि तालिका के क्रमांक 4, 7, 8, 9, 10 और 11 वाले प्राथमिक घुटना प्रतिस्थापन तंत्र पर वितरक या स्टॉकिस्ट का अधिकतम व्यापार मार्जिन अधिकतम क़ीमत का 16 फ़ीसदी और अस्पताल, नर्सिंग होम या क्लिनिक का 8 फ़ीसदी होगा; बाक़ी क्रमांकों पर ये आँकड़े 12 और 4 फ़ीसदी हैं। टिप्पणी (एस) कहती है कि जहाँ निर्माता सीधे अस्पताल को बेचे, वहाँ अस्पताल का मार्जिन 16 फ़ीसदी तक सीमित रहेगा। टिप्पणी (टी) सबसे तीखी है: इससे ज़्यादा मार्जिन, किसी भी रूप में, लेन-देन में शामिल व्यक्तियों, संस्थाओं, निर्माताओं, आयातकों, वितरकों और "अस्पतालों" का संयुक्त और पृथक उल्लंघन माना जाएगा, जिस पर अभियोजन तक हो सकता है।

ये टिप्पणियाँ आज भी ज़िंदा हैं। 14 नवंबर 2025 की अधिसूचना का.आ. 5190(अ) ने घुटने की क़ीमतें 15 नवंबर 2026 तक बढ़ाईं, और उसके दूसरे पैराग्राफ़ में लिखा है कि 2668(अ) की टिप्पणी (ख) से (टी) तक लागू रहेंगी।

टिप्पणी (आर) पर एनपीपीए को एक बार दख़ल देना पड़ा था। दिशा दूसरी थी। 29 अगस्त 2019 के दफ़्तरी ज्ञापन में वह दर्ज करता है कि कुछ थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर, यानी बीमा दावे निपटाने वाली कंपनियाँ, अस्पतालों को टिप्पणी (आर) में तय मार्जिन देने से इनकार कर रही हैं। ज्ञापन स्पष्ट करता है कि अस्पताल यह मार्जिन जोड़ सकते हैं, बशर्ते कुल क़ीमत सीमा के भीतर रहे। मार्जिन की इकलौती क़ानूनी हद का दर्ज इस्तेमाल अस्पताल के हक़ में हुआ।

स्टेंट पर यही व्यवस्था बनी थी, और फिर बंद कर दी गई। 20 फ़रवरी 2017 के ज्ञापन में एनपीपीए ने लिखा था कि अधिसूचित क़ीमतें अधिकतम 8 फ़ीसदी व्यापार मार्जिन समेत हैं, और यह 8 फ़ीसदी "अस्पतालों के हैंडलिंग शुल्क, यदि कोई हो, को भी पर्याप्त रूप से कवर करता है"। अक्टूबर 2022 के एक ज्ञापन में तय हुआ कि आगे से व्यापार मार्जिन पर सिर्फ़ 30 मार्च 2022 की अधिसूचना का.आ. 1502(अ) की टिप्पणियाँ लागू होंगी। उसमें टिप्पणियाँ (क) से (घ) तक हैं। उनमें से कोई न व्यापार मार्जिन का नाम लेती है, न अस्पताल का।

एक आख़िरी ब्योरा, एनपीपीए के अपने काग़ज़ों की आपसी टकराहट। 20 फ़रवरी 2017 का वह ज्ञापन स्टेंट की पहली अधिसूचना को "का.आ. 421(अ), दिनांक 13.02.2017" कहता है, और एनपीपीए की वेबसाइट की सूची में भी यही नंबर दर्ज है। उसी वेबसाइट पर रखा असली राजपत्र 412(अ) है। दो हफ़्ते बाद के एक और ज्ञापन में, जिसमें एनपीपीए अस्पतालों को बिल में स्टेंट का ब्रांड, निर्माता और बैच नंबर लिखने का निर्देश देता है, नंबर 412 ही लिखा है। उस ज्ञापन में ऐसा न करने को "सबूत की जानबूझकर विकृति" कहा गया है।

नियम 9 की दर सूची चौदह साल से अधिसूचित नहीं हुई

एक क़ानून ऐसा है जो सीधे अस्पताल पर लागू होता। 23 मई 2012 की अधिसूचना जीएसआर 387(अ) से बने नैदानिक प्रतिष्ठान (केंद्र सरकार) नियम 2012 का नियम 9 पंजीकरण और उसे बनाए रखने की शर्तें गिनाता है। शर्त (i) कहती है कि हर नैदानिक प्रतिष्ठान अपनी हर सेवा और सुविधा की दरें मरीज़ों के फ़ायदे के लिए किसी दिखने वाली जगह पर, स्थानीय भाषा और अंग्रेज़ी दोनों में, प्रदर्शित करेगा। शर्त (ii) असली है: नैदानिक प्रतिष्ठान हर तरह की प्रक्रिया और सेवा के लिए "केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर, राज्य सरकारों के परामर्श से, तय और जारी की गई दरों की सीमा के भीतर" ही वसूलेंगे।

वह सीमा आज तक जारी नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट में यह सवाल जनहित याचिका के रूप में पहुँचा, रिट याचिका (सिविल) 648/2020, वेटरन्स फ़ोरम फ़ॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ़ बनाम भारत संघ। 27 फ़रवरी 2024 को जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस संदीप मेहता के सामने केंद्र के वरिष्ठ वकील शैलेश मडियाल ने कहा कि यह अधिनियम 12 राज्यों और 7 केंद्रशासित प्रदेशों ने अपनाया है, और नियम 9 के प्रावधानों को देखते हुए राज्यों से जवाब आए बिना केंद्र दरें तय नहीं कर सकता; पत्र कई बार लिखे गए, जवाब नहीं आया। आदेश के चौथे पैराग्राफ़ में अदालत ने यह दलील नहीं मानी। उसके शब्द हैं कि भारत संघ केवल यह कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पत्र लिखे गए हैं और वे जवाब नहीं दे रहे। अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के सचिव को राज्यों के समकक्ष अधिकारियों के साथ बैठक कर अगली तारीख़ तक ठोस प्रस्ताव लाने का निर्देश दिया। आदेश की आख़िरी पंक्ति है: "छह हफ़्ते बाद लगाएँ।"

वे छह हफ़्ते दो साल से ज़्यादा पहले बीत गए। इस बीच नियम 9(ii) पर ख़ुद हमला हो चुका है। ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसाइटी ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, और लाइव लॉ तथा बार एंड बेंच ने 11 अगस्त 2026 को रिपोर्ट किया कि केंद्र ने हलफ़नामे में नियम का बचाव किया है: यह अलग-अलग प्रतिष्ठानों की दरों को मानकीकृत करने के लिए है, ताकि असंगत और अनाप-शनाप क़ीमतों की गुंजाइश न रहे और मरीज़ शोषण के शिकार न हों। मेडिकल डायलॉग्स ने 12 अगस्त को उसी हलफ़नामे के हवाले से लिखा कि कई दौर की बातचीत के बावजूद दरों की सीमा तय करने के लिए राज्यों से कोई ठोस प्रस्ताव नहीं मिला है।

सरकार का छह महीने पुराना जवाब, और अभी का काग़ज़

यह सवाल संसद में भी पूछा जा चुका है। 17 मार्च 2026 के राज्यसभा उत्तर का विषय ही था "आवश्यक चिकित्सा उपकरणों पर ऊँचे व्यापार मार्जिन का मुद्दा"। उसमें स्टेंट की क़ीमतें, घुटने की तारीख़ और पैरा 20(1) की दस फ़ीसदी वाली हद है। आख़िरी वाक्य यह है कि आवश्यक चिकित्सा उपकरणों के लिए किसी "एक राष्ट्र, एक क़ीमत" ढाँचे या देशव्यापी मूल्य सीमा का प्रस्ताव विभाग के विचाराधीन नहीं है।

सितंबर में एनपीपीए ने उपकरणों पर एक ही काग़ज़ निकाला है। 14 सितंबर का ज्ञापन घुटने के प्रत्यारोपण के निर्माताओं और आयातकों से 30 सितंबर तक आँकड़े माँगता है। उन क़ीमतों की मियाद 15 नवंबर को ख़त्म होगी। उद्योग का प्रस्ताव आ चुका है। भारतीय चिकित्सा उपकरण निर्माता संघ ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा है कि खपत-सामग्री पर मार्जिन 75 और महँगे उपकरणों पर 50 फ़ीसदी पर बाँधा जाए।

मुंढे ने आदेश नहीं, समीक्षा माँगी है। उनके शब्दों में, इन नतीजों की समीक्षा और ख़रीद मूल्य तथा घोषित एमआरपी के बीच जायज़ फ़ासले पर साफ़ दिशानिर्देश औषध विभाग और एनपीपीए को सुझाए गए हैं। एनपीपीए की ओर से कोई बयान नहीं आया है। जून से अगस्त के बीच हुई चार प्राधिकरण बैठकों के मिनट में 'घुटना', 'व्यापार मार्जिन' या 'खपत-सामग्री' शब्द एक बार भी नहीं आते।

स्रोतराष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण, दफ़्तरी ज्ञापन फ़ा. सं. 19(837)/2016/डीपी/डिव.II/एनपीपीए, 1 मार्च 2018: 'सिरिंज और सुइयों पर व्यापार मार्जिन का प्रदर्शन', दो अनुलग्नकों सहित, प्राधिकरण की 246वीं (कुल) और डीपीसीओ 2013 के तहत 114वीं बैठक के मिनट, 19 जून 2023, कार्यसूची मद 8 और 9, एनपीपीए की वेबसाइट, 'अध्यक्ष का संदेश' पन्ना, 17 सितंबर 2026 को पढ़ा गया, राजपत्र अधिसूचना का.आ. 2808(अ), 13 जुलाई 2021: पाँच चिकित्सा उपकरणों पर व्यापार मार्जिन की 70 फ़ीसदी सीमा, प्रस्तावना का पैरा 7, राजपत्र अधिसूचना का.आ. 2161(अ), 3 जून 2021: ऑक्सीजन सांद्रक पर व्यापार मार्जिन की सीमा, राजपत्र अधिसूचना का.आ. 1518(अ), 29 मार्च 2023: पाँच उपकरणों की सीमा 30 जून 2023 तक बढ़ाई गई, राजपत्र अधिसूचना का.आ. 1519(अ), 29 मार्च 2023: ऑक्सीजन सांद्रक की सीमा 30 जून 2023 तक बढ़ाई गई, राजपत्र अधिसूचना का.आ. 2668(अ), 16 अगस्त 2017: घुटने के प्रत्यारोपण की अधिकतम क़ीमतें, टिप्पणी (आर), (एस) और (टी) सहित, राजपत्र अधिसूचना का.आ. 5190(अ), 14 नवंबर 2025: घुटने के प्रत्यारोपण की क़ीमतें 15 नवंबर 2026 तक बढ़ाई गईं, टिप्पणी (ख) से (टी) लागू रहेंगी, एनपीपीए का दफ़्तरी ज्ञापन, 29 अगस्त 2019: थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर अस्पतालों को टिप्पणी (आर) का मार्जिन नहीं दे रहे, एनपीपीए का दफ़्तरी ज्ञापन, अक्टूबर 2022: कोरोनरी स्टेंट पर व्यापार मार्जिन की प्रयोज्यता, राजपत्र अधिसूचना का.आ. 412(अ), 13 फ़रवरी 2017: कोरोनरी स्टेंट की पहली अधिकतम क़ीमत, एनपीपीए का दफ़्तरी ज्ञापन, 20 फ़रवरी 2017: स्टेंट पर 8 फ़ीसदी व्यापार मार्जिन का स्पष्टीकरण, जिसमें अधिसूचना का नंबर 421(अ) लिखा है, एनपीपीए का दफ़्तरी ज्ञापन, 10 मार्च 2017: अधिसूचित चिकित्सा उपकरणों पर एमआरपी छापना अनिवार्य, 22 उपकरणों की सूची सहित, एनपीपीए का दफ़्तरी ज्ञापन, 2 मार्च 2017: अस्पताल बिलों में स्टेंट का ब्यौरा न देने पर, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, जीएसआर 365(अ), 17 मार्च 1989: सिरिंज, सुई और परफ़्यूज़न सेट को 'दवा' घोषित करने वाला राजपत्र (सीडीएससीओ की प्रति), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, का.आ. 1468(अ), 6 अक्टूबर 2005: दस स्टेराइल उपकरणों को 'दवा' घोषित करने वाला राजपत्र, डीपीसीओ 2013 की बदली हुई अनुसूची-1, 11 नवंबर 2022 की अधिसूचना का.आ. 5249(अ), मद 18.2.2, 18.2.3 और 28, राजपत्र अधिसूचना का.आ. 1587(अ), 25 मार्च 2026: कोरोनरी स्टेंट की 1 अप्रैल 2026 से लागू अधिकतम क़ीमतें, प्राधिकरण की 282वीं (कुल) और 150वीं बैठक के मिनट, 25 अगस्त 2026: कार्यसूची मद 6 और 7, आईवी फ़्लूड की अलग अधिकतम क़ीमतें, एनपीपीए का दफ़्तरी ज्ञापन फ़ा. सं. 12(94)/2022/डीपी/एनपीपीए-डिव-II, 3 सितंबर 2026: आईवी फ़्लूड की अधिकतम क़ीमत तय करने के लिए आँकड़े माँगे गए, एनपीपीए का दफ़्तरी ज्ञापन फ़ा. सं. 25(8)/1/2024/डिव.VI/एनपीपीए, 14 सितंबर 2026: घुटने के प्रत्यारोपण के आँकड़े 30 सितंबर तक माँगे गए, पत्र सूचना कार्यालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, 17 मार्च 2026, दोपहर 3:27: राज्यसभा में अनुप्रिया पटेल का लिखित उत्तर, 'आवश्यक चिकित्सा उपकरणों पर ऊँचे व्यापार मार्जिन का मुद्दा', सुप्रीम कोर्ट, रिट याचिका (सिविल) 648/2020, वेटरन्स फ़ोरम फ़ॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ़ बनाम भारत संघ, 27 फ़रवरी 2024 का आदेश, जस्टिस बी.आर. गवई और संदीप मेहता, नैदानिक प्रतिष्ठान (केंद्र सरकार) नियम 2012 का पाठ, नियम 9 सहित, लाइव लॉ, 11 अगस्त 2026: ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसाइटी बनाम भारत संघ में केंद्र का हलफ़नामा, नियम 9(ii) के बचाव में, फ़्री प्रेस जर्नल, अमित श्रीवास्तव, 16 सितंबर 2026, रात 8:58: महाराष्ट्र एफ़डीए के सर्वे में मिले आठ उत्पादों की ख़रीद क़ीमत और एमआरपी, इंडिया टीवी, 16 सितंबर 2026, शाम 4:14: तुकाराम मुंढे की एक्स पोस्ट के उद्धरण, आउटलुक मनी, 16 सितंबर 2026: चिट्ठी 10 अगस्त को भेजी गई, और सर्वे किन दो क़ीमतों की तुलना करता है इस पर अस्पष्टता, महाराष्ट्र खाद्य एवं औषध प्रशासन का प्रेस विज्ञप्ति पन्ना, 17 सितंबर 2026 को देखा गया: सर्वे या चिट्ठी का कोई ज़िक्र नहीं

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