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टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति शुरू से शून्य बताई, आधार अनुच्छेद 121

रविवार, 20 सितंबर 2026 को टाटा संस की सबसे बड़ी हिस्सेदार ने अपनी वेबसाइट पर विज्ञप्ति डालकर कहा कि 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में पास हुआ प्रस्ताव क़ानून की नज़र में शुरू से शून्य है। पूरी दलील कंपनी के संविधान के एक वाक्य पर टिकी है, और उस वाक्य के दो पाठ आमने-सामने हैं।

मुंबई की फ़िरोज़ जीजीभॉय टावर्स इमारत का पार्श्व दृश्य, जहाँ बीएसई बैठता है, पेड़ों के ऊपर से लिया गया; 20 सितंबर रविवार था और बाज़ार बंद थे, जिस दिन टाटा ट्रस्ट्स ने अपनी विज्ञप्ति जारी की।
तस्वीर: Pradeep717, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

17 सितंबर 2026 की टाटा संस बोर्ड बैठक में वोट 4:1 रहा। अख़बारों के मुताबिक़ उसी बैठक में कास्टिंग वोट भी पड़ा। कास्टिंग वोट तब पड़ता है जब वोट बराबर हों। 4:1 में बराबरी कहाँ है? रविवार के अख़बारों में दोनों बातें साथ-साथ छपी हैं, और इस सवाल का जवाब कंपनी के संविधान के एक वाक्य में है।

रविवार, 20 सितंबर को टाटा ट्रस्ट्स ने अपनी वेबसाइट पर मुंबई की तारीख़ वाली एक विज्ञप्ति डाली। उसका शीर्षक ही उसकी दलील है: 17 सितंबर 2026 की बोर्ड बैठक में कोई गतिरोध नहीं था, और कास्टिंग वोट किसी मृत-जन्मे प्रस्ताव में जान नहीं डाल सकता। विज्ञप्ति कहती है कि एन. चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव "वैध रूप से पारित नहीं हुआ और उसका कोई क़ानूनी प्रभाव नहीं है"। आगे एक और वाक्य है। "क़ानून की नज़र में यह शुरू से शून्य है।"

जिस कंपनी की बात हो रही है, वह टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाइटन और एयर इंडिया की प्रवर्तक है। उसके लगभग दो-तिहाई शेयर परोपकारी ट्रस्टों के पास हैं। झगड़ा दो लोगों का नहीं है। वह संविधान के एक वाक्य का है, और उस वाक्य के एक शब्द का: बहुमत।

इस लेख में दस्तावेज़ों के उद्धरण अंग्रेज़ी मूल से हिंदी में हैं। जहाँ शब्द ही विवाद है, वहाँ मूल अंग्रेज़ी साथ है।

अनुच्छेद 121 का पूरा वाक्य, और उसके भीतर की दो शर्तें

टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड ग़ैर-सूचीबद्ध है। उसके संविधान, यानी आर्टिकल्स ऑफ़ असोसिएशन, किसी सार्वजनिक वेबसाइट पर नहीं मिलते। लेकिन उनका पाठ एक जगह दर्ज है, और वह जगह अदालत का रिकॉर्ड है। 26 मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने *टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ लिमिटेड बनाम साइरस इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड* में जो फ़ैसला सुनाया, उसके पैराग्राफ़ 19.2 में अनुच्छेद 86, 104B, 121 और 121A पूरे के पूरे उद्धृत हैं। साइरस मिस्त्री की कंपनियों ने अपनी याचिका के पैराग्राफ़ 153(M) में इन्हीं अनुच्छेदों को रद्द करने की माँग की थी। इसीलिए अदालत ने उन्हें ज्यों का त्यों छाप दिया।

अनुच्छेद 121 का शीर्षक है "मामले कैसे तय होंगे"। पूरा पाठ यह है: "बोर्ड की किसी भी बैठक के सामने आए वे मामले, जिनका फ़ैसला निदेशकों के बहुमत से होना है, उनके लिए बैठक में मौजूद (present at the meeting) उन निदेशकों के बहुमत (a majority) का समर्थक वोट चाहिए जो अनुच्छेद 104B के तहत नियुक्त हुए हैं, और वोट बराबर होने की सूरत (an equality of votes) में चेयरमैन के पास कास्टिंग वोट होगा।"

एक वाक्य, दो शर्तें। पहली शर्त एक अतिरिक्त गिनती लगाती है: बोर्ड के साधारण बहुमत भर से काम नहीं चलेगा, उसके भीतर एक छोटे समूह का बहुमत भी चाहिए। दूसरी शर्त कास्टिंग वोट देती है, और वह भी इसी वाक्य में है, उसी अनुच्छेद के भीतर। यही बनावट पूरे विवाद की बनावट है। ट्रस्ट्स की दलील है कि पहली शर्त एक अलग और स्वतंत्र शर्त है, और दूसरी शर्त उसे पूरा नहीं कर सकती। 20 सितंबर की विज्ञप्ति के शब्द हैं कि टाटा संस का संविधान "बोर्ड के किसी भी फ़ैसले को निदेशकों की महज़ सिर-गिनती पर नहीं छोड़ता"।

अगली पंक्ति गिनती की है। "टाटा संस के बोर्ड पर टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित व्यक्ति हैं। दो में बहुमत दो होता है, एक नहीं।" इसके बाद विज्ञप्ति 17 सितंबर पर आती है: "उस दिन ऐसे एक निदेशक ने प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट दिया। इस तरह, जिस समर्थक वोट का आदेश संविधान देता है, वह नहीं मिला। शर्त पूरी नहीं हुई, और प्रस्ताव भी नहीं।" और कास्टिंग वोट पर: "चेयरमैन का कास्टिंग वोट सिर्फ़ वहाँ उपलब्ध है जहाँ पूरे बोर्ड के स्तर पर वोट बराबर हों। वह टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के बीच लागू नहीं होता। वोट का नतीजा 4:1 था या कुछ और, यह बेमानी है। शर्त या तो पूरी होती है या नहीं होती। इस मामले में वह पूरी नहीं हुई।"

ध्यान दीजिए कि 20 सितंबर की विज्ञप्ति में विरोध करने वाले निदेशक का नाम नहीं है। वह सिर्फ़ "ऐसे एक निदेशक" कहती है। नाम 17 सितंबर की पहली विज्ञप्ति में है, जो उसी बैठक के दिन जारी हुई थी और जिसमें दर्ज है कि प्रस्ताव पर "चार निदेशकों ने पक्ष में और श्री नोएल टाटा ने विरोध में" वोट दिया।

जिन दो ट्रस्टों के नाम अनुच्छेद 104B में हैं

अनुच्छेद 121 अपने आप कुछ नहीं करता। वह अनुच्छेद 104B के सहारे खड़ा है, और 104B का पाठ भी उसी फ़ैसले में है। वह कहता है: "जब तक टाटा ट्रस्ट्स कंपनी की चुकता साधारण शेयर पूँजी का कम से कम 40 फ़ीसदी कुल मिलाकर रखते हैं, तब तक सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट, संयुक्त रूप से काम करते हुए, बोर्ड में उस समय के कुल निदेशकों में से एक-तिहाई को नामित करने का अधिकार रखेंगे।" उसी अनुच्छेद की व्याख्या कहती है कि "संयुक्त रूप से" का मतलब है, दोनों ट्रस्ट मिलकर तय करेंगे; मतभेद पर दोनों के न्यासियों के कुल बहुमत की राय चलेगी।

यानी नामित करने का अधिकार सात ट्रस्टों के समूह के पास नहीं है। वह दो नामज़द ट्रस्टों के पास है। 40 फ़ीसदी वाली शर्त ज़रूर "टाटा ट्रस्ट्स" के कुल जोड़ पर लगती है।

कंपनी की अपनी एक सौ सातवीं वार्षिक रिपोर्ट, 2024-25, में यह जोड़ शेयर दर शेयर दर्ज है। कुल 4,04,146 साधारण शेयर हैं, हर एक का अंकित मूल्य एक हज़ार रुपये। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के पास 1,13,067 शेयर हैं, यानी 27.98 फ़ीसदी। सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास 95,211, यानी 23.56 फ़ीसदी। बाक़ी पाँच प्रवर्तक ट्रस्ट हैं: जेआरडी टाटा ट्रस्ट 4.01, टाटा एजुकेशन ट्रस्ट 3.73, टाटा सोशल वेलफ़ेयर ट्रस्ट 3.73, आरडी टाटा ट्रस्ट 2.19 और सर्वजनिक सेवा ट्रस्ट 0.10 फ़ीसदी। सातों का जोड़ 65.29 फ़ीसदी बैठता है। अनुच्छेद 104B में नाम वाले दो ट्रस्टों का अपना जोड़ 51.54 फ़ीसदी है, जो 40 फ़ीसदी की शर्त से ऊपर है।

मुंबई के परेल इलाक़े में टाटा मेमोरियल अस्पताल के प्रवेश-द्वार पर नाम-पट्ट, मार्च 2022 की तस्वीर; अनुच्छेद 104B में नामित सर दोराबजी और सर रतन टाटा ट्रस्ट जिन संस्थाओं को चलाते हैं, यह उनमें एक है।
तस्वीर: Ad baheti, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

यहाँ एक आँकड़ा टकराता है और यह लेख उसे सुलझा नहीं रहा। ट्रस्ट्स की 20 सितंबर की विज्ञप्ति कहती है कि उनके नामित निदेशक उन शेयरधारकों के हैं "जो कंपनी का लगभग 66 फ़ीसदी रखते हैं"। नोएल टाटा के बोर्ड बयान में भी "लगभग 66 फ़ीसदी" है। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का पैराग्राफ़ 19.22 भी "क़रीब 66 फ़ीसदी" लिखता है। पर उसी फ़ैसले में, टाटा संस की अपनी दलीलों के ब्योरे में, आँकड़ा "65.3 फ़ीसदी" दर्ज है। और कंपनी की अपनी ताज़ा वार्षिक रिपोर्ट की तालिका 65.29 फ़ीसदी पर जाती है। फ़र्क़ छोटा है, पर वह पाँच बरस और दो अलग दस्तावेज़ों का फ़र्क़ है, और किसी पक्ष ने उसे स्पष्ट नहीं किया है।

बोर्ड कितना बड़ा है, यह भी इसी गिनती का हिस्सा है। वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़ 31 मार्च 2025 को टाटा संस के बोर्ड में नौ निदेशक थे, जिनमें दो कार्यकारी, तीन स्वतंत्र और बाक़ी ग़ैर-कार्यकारी। नौ का एक-तिहाई तीन होता है। ट्रस्ट्स की अपनी विज्ञप्ति कहती है कि उनके नामित निदेशक दो हैं। 17 सितंबर 2026 को बोर्ड में कुल कितने निदेशक थे, यह इस डेस्क को किसी दस्तावेज़ से नहीं मिला।

इन्हीं दो ट्रस्टों का नाम चेयरमैन वाले अनुच्छेद में भी है। अनुच्छेद 118, जो 2021 के फ़ैसले के पैराग्राफ़ 16.33 में पूरा छपा है, कहता है कि नया चेयरमैन चुनने के लिए एक चयन समिति बनेगी। उसमें पाँच लोग होंगे: दोनों ट्रस्टों के संयुक्त रूप से नामित तीन, बोर्ड का एक निदेशक, और बोर्ड का चुना एक स्वतंत्र बाहरी व्यक्ति। समिति का अध्यक्ष दोनों ट्रस्ट अपने तीन नामितों में से चुनते हैं। समिति की बैठक का कोरम भी उन्हीं नामितों के बहुमत की मौजूदगी है। यह ढाँचा भी 40 फ़ीसदी वाली शर्त से बँधा है।

17 सितंबर की विज्ञप्ति में ट्रस्ट्स ने यही माँग दर्ज की है कि कंपनी उत्तराधिकारी के लिए चयन समिति बनाने की प्रक्रिया शुरू करे। दोबारा नियुक्ति पर अनुच्छेद 118 लागू होता है या नहीं, यह अपने आप में एक विवाद है। कंपनी ने अपने नाम से इस पर कुछ नहीं कहा है।

17 सितंबर की बैठक और 4:1 का अंक

बैठक गुरुवार, 17 सितंबर 2026 को हुई। द हिंदू की व्याख्या के मुताबिक़ नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति के फ़ैसले के बाद बोर्ड ने चंद्रशेखरन से अपना निर्णय दोबारा सोचने का अनुरोध किया, और उन्होंने अनुरोध मान लिया। द इंडियन एक्सप्रेस ने उसी दिन टाटा संस के अपने वक्तव्य से यह वाक्य छापा कि बोर्ड ने "उसके बाद बहुमत के वोट से उन्हें उनके मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति पर पाँच साल के और कार्यकाल के लिए कार्यकारी चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया"।

इसी बैठक में सूचीबद्ध होने पर भी एक अलग प्रस्ताव पास हुआ। बिज़नेस स्टैंडर्ड के मुताबिक़ बोर्ड ने बहुमत से तय किया कि रिज़र्व बैंक के निर्देश के बाद कंपनी सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी, और नोएल टाटा ने उसका भी विरोध किया।

अब कास्टिंग वोट। द हिंदू ने 20 सितंबर को लिखा कि बैठक के चेयरमैन, स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी के कास्टिंग वोट से बोर्ड ने दो अहम प्रस्ताव बहुमत से मंज़ूर किए। द इंडियन एक्सप्रेस ने उसी दिन अपने शीर्षक और अपनी पहली पंक्ति में वही कास्टिंग वोट चंद्रशेखरन का बताया, यानी अपनी ही नियुक्ति के लिए ख़ुद का वोट। दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते। दोनों रिपोर्टें 20 सितंबर की हैं और दोनों एक ही बैठक की बात कर रही हैं। टाटा ट्रस्ट्स की कोई भी विज्ञप्ति यह नहीं कहती कि कास्टिंग वोट किसने डाला।

वार्षिक रिपोर्ट से इतना तय है कि हरीश मनवानी 18 मई 2018 से टाटा संस के स्वतंत्र निदेशक हैं, और चंद्रशेखरन 25 अक्टूबर 2016 से निदेशक तथा 21 फ़रवरी 2017 से कार्यकारी चेयरमैन। बाक़ी 17 सितंबर की बैठक के भीतर की बात है। उस बैठक का कार्यवृत्त सार्वजनिक नहीं है।

एक और गिनती बाक़ी रह जाती है। द हिंदू ने उस बैठक से जुड़े छह निदेशकों के नाम गिनाए हैं: चंद्रशेखरन, वेणु श्रीनिवासन, नोएल टाटा, हरीश मनवानी, सौरभ अग्रवाल और अनीता मारंगोली जॉर्ज। दर्ज वोट पाँच हैं, चार पक्ष में और एक विरोध में। छठे ने क्या किया, वह किसी दस्तावेज़ में नहीं है। पूरे बोर्ड के स्तर पर 4:1 में बराबरी कहीं नहीं है। बराबरी सिर्फ़ एक जगह है, दो नामित निदेशकों के बीच, एक-एक। ट्रस्ट्स की विज्ञप्ति ठीक उसी जगह कास्टिंग वोट का इनकार करती है।

कास्टिंग वोट किसलिए होता है

कास्टिंग वोट कोई टाटा संस की ईजाद नहीं है। कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची एक में सारणी "एफ़" नाम का एक नमूना संविधान है, जिसे कंपनियाँ चाहें तो अपना सकती हैं। उसका विनियम 68 दो हिस्सों में है। पहला: बोर्ड की बैठक में उठे सवाल वोटों के बहुमत से तय होंगे। दूसरा: "वोट बराबर होने की स्थिति में बोर्ड के चेयरपर्सन, यदि कोई हों, के पास दूसरा या कास्टिंग वोट होगा।"

टाटा संस ने नमूना नहीं अपनाया। उसके पास अनुच्छेद 121 है, जो उसी ज़मीन को अपने शब्दों में ढकता है, और जो कास्टिंग वोट को एक अतिरिक्त शर्त के बाद रखता है। इसका असर सीधा है। यहाँ कास्टिंग वोट का अधिकार कंपनी के अपने संविधान से आता है। क़ानून की कोई धारा उसे नहीं देती। और कंपनी अधिनियम की धारा 10(1) कहती है कि पंजीकृत होने के बाद संविधान कंपनी तथा उसके सदस्यों को उसी हद तक बाँधता है मानो उस पर सबके दस्तख़त हों।

यहीं दो क़ानूनी राय आमने-सामने हैं। यह लेख किसी को सही या ग़लत नहीं ठहरा रहा।

एक राय ट्रस्ट्स की विज्ञप्ति में है और अपने नाम से है। वह कहती है कि समर्थन देने से इनकार को गतिरोध कहकर कास्टिंग वोट से हल करने का सुझाव दिया जा रहा है, "पर न कोई पक्षाघात था और न कोई गतिरोध"। और आगे: "बोर्ड ने एक सवाल रखा, और संविधान ने उसका जवाब ना में दिया। किसी कंपनी के अपने संविधान से मिले सुरक्षात्मक अधिकार का इस्तेमाल गतिरोध नहीं है; वह उस संविधान का वैसे ही चलना है जैसे उसे लिखा गया था।"

दूसरी राय अख़बार में है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 20 सितंबर को लिखा कि वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे टाटा संस को सलाह दे रहे हैं, और उन्होंने एक हालिया साक्षात्कार में कहा था कि ऐसी स्थिति में बैठक के चेयरमैन के कास्टिंग वोट के बिना कंपनी में गतिरोध और पक्षाघात आ जाएगा। यह बयान साक्षात्कार का है, हलफ़नामे का नहीं। उसी रिपोर्ट के मुताबिक़ ट्रस्ट्स की तरफ़ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी हैं, जिन्होंने रविवार को सोशल मीडिया पर लिखा कि वे इस विवाद में आ चुके हैं। 17 सितंबर की विज्ञप्ति यह भी दर्ज करती है कि नोएल टाटा ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ से ली गई एक क़ानूनी राय बोर्ड के सामने रखी थी, और "बोर्ड ने उस पर ध्यान नहीं दिया"। वह राय सार्वजनिक नहीं है। इस डेस्क ने उसे पढ़ा नहीं है।

"बहुमत" और "सभी": एक ही फ़ैसले में दो पाठ

अब उस दरार पर, जो किसी अख़बार में नहीं है और जो अदालत के अपने रिकॉर्ड में है।

अनुच्छेद 121 का पाठ, जैसा पैराग्राफ़ 19.2 में छपा है, "बहुमत" कहता है: अनुच्छेद 104B के तहत नियुक्त और बैठक में मौजूद निदेशकों का बहुमत। पर उसी फ़ैसले के पैराग्राफ़ 16.33 में अनुच्छेद 118 पूरा उद्धृत है, और वह अनुच्छेद 121 की उसी शर्त को इन शब्दों में दोहराता है: "अनुच्छेद 121 के अधीन, जो अनुच्छेद 104B के तहत नियुक्त सभी निदेशकों (all Directors) के समर्थक वोट की माँग करता है"।

बहुमत और सभी एक शब्द नहीं हैं। दो निदेशकों के मामले में दोनों का नतीजा एक ही निकलता है, क्योंकि दो में बहुमत भी दो ही है। तीन नामित निदेशक होते तो दोनों पाठ अलग जवाब देते। अंतर अभी सैद्धांतिक है। पर वह उसी दस्तावेज़ के भीतर है जिस पर दोनों पक्ष खड़े हैं। दो सदस्यों के समूह में "बहुमत" कैसे गिना जाए, इस पर किसी अदालत का कोई फ़ैसला इस डेस्क को नहीं मिला।

2021 का फ़ैसला असल में क्या कहता है

ट्रस्ट्स की 20 सितंबर की विज्ञप्ति की सबसे तीखी पंक्ति यही है कि कंपनी वही सुरक्षा अब नकार नहीं सकती जिसे बचाने वह सुप्रीम कोर्ट गई थी। "वे या तो संविधान में हैं या नहीं हैं। टाटा संस देश की सबसे बड़ी अदालत से पहले ही कह चुकी है कि वे हैं।"

फ़ैसले का रिकॉर्ड इस दावे का ढाँचा तो पुष्ट करता है, पर तारीख़ों और दायरे के साथ। एनसीएलएटी का जो आदेश अपील में था, वह 18 दिसंबर 2019 का है। सुप्रीम कोर्ट ने जो चौथा क़ानूनी सवाल ख़ुद तय किया, वह शब्दशः यह था कि क्या ट्रस्टों के नामित निदेशकों को अनुच्छेद 121 से मिले समर्थक मताधिकार को अधिकरण का दमनकारी और पूर्वाग्रही ठहराना उचित है, ख़ासकर तब जब इन अनुच्छेदों की चुनौती स्पष्ट रूप से छोड़ दी गई थी। जवाब ना में था। पैराग्राफ़ 19.50 में अदालत ने वह सवाल टाटा समूह के पक्ष में तय किया और समर्थक मताधिकार तथा आनुपातिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी प्रति-अपील की माँग ख़ारिज कर दी।

पैराग्राफ़ 19.25 में अदालत की अपनी भाषा है कि बहुमत शेयर रखने वाली संस्थाओं के नामितों के लिए समर्थक मताधिकार दुनिया भर में स्वीकृत रहे हैं, और यह कि अनुच्छेद 121 "सिर्फ़ उस तरीक़े की बात करता है जिससे बोर्ड की किसी बैठक के सामने आए मामले तय होंगे"। उसी पैराग्राफ़ में एक और वाक्य है। अदालत कहती है कि अनुच्छेद 104B दोनों ट्रस्टों को "सिर्फ़ एक न्यूनतम गारंटी" देता है, यानी कम से कम एक-तिहाई निदेशक, जब तक वे कुल 40 फ़ीसदी रखते हैं। पैराग्राफ़ 19.29 जोड़ता है कि जब तक ऐसे विशेष अधिकार संविधान में दर्ज हैं और अधिनियम के किसी प्रावधान के ख़िलाफ़ नहीं हैं, उन पर इन आधारों पर हमला नहीं किया जा सकता।

अंतिम आदेश, पैराग्राफ़ 21.5: सी.ए. 1802/2020 को छोड़कर सारी अपीलें मंज़ूर, एनसीएलएटी का 18 दिसंबर 2019 का आदेश रद्द, और एनसीएलटी में दाख़िल कंपनी याचिका संख्या 82/2016 ख़ारिज। पीठ में मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे, न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन थे।

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की चीफ़ जस्टिस कोर्ट का प्रवेश-द्वार, राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे, जुलाई 2017 की तस्वीर; 26 मार्च 2021 का फ़ैसला जिस पीठ ने सुनाया, वह यहीं बैठी थी।
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

एक सुधार यहीं दर्ज कर देना चाहिए। द हिंदू की 20 सितंबर की रिपोर्ट में, दो उद्धरणों के बीच अख़बार की अपनी पंक्ति में, लिखा है कि "2020 में" सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस की बात मानी थी। फ़ैसला 26 मार्च 2021 का है। 2020 अपील संख्याओं और स्थगन का साल है। यह वाक्य ट्रस्ट्स की विज्ञप्ति में नहीं है; विज्ञप्ति में साल लिखा ही नहीं गया।

और जो अदालत ने तय नहीं किया, वह भी उतना ही अहम है। 2021 का फ़ैसला इस सवाल पर नहीं है कि जब नामित निदेशक आपस में बराबर बँट जाएँ तो अनुच्छेद 121 कैसे चलेगा। वह सवाल 2016 की याचिका में था ही नहीं।

नोएल टाटा के बयान का पाँचवाँ पैराग्राफ़

17 सितंबर की विज्ञप्ति के साथ एक दो पन्नों की पीडीएफ़ नत्थी है, जिसका शीर्षक है कि यह नोएल एन. टाटा का उसी बोर्ड बैठक में दिया गया वक्तव्य है। बारह पैराग्राफ़ हैं। पहले चार 12 अगस्त 2026 की उस चिट्ठी पर हैं जिसमें चंद्रशेखरन ने बोर्ड को लिखा था कि वे 20 फ़रवरी 2027 को कार्यकाल पूरा होने पर ख़ुद को अगले कार्यकाल के लिए पेश नहीं करेंगे।

पाँचवाँ पैराग्राफ़ किसी अख़बार में नहीं छपा। उसमें लिखा है: "एक तार्किक रूप से पूर्ववर्ती सवाल अनसुलझा है। इस कंपनी की चेयरमैनी एक ऐसा पद है जिसे कंपनी का कोई निदेशक धारण करता है। चेयरमैन की अपनी स्थिति, बतौर निदेशक, इस समय अनिश्चित है, क्योंकि जिस आम सभा में वह सवाल तय होना है, वह कोरम के अभाव में चल ही नहीं सकी। जब तक वह सवाल हल नहीं होता, चेयरमैनी पर कोई प्रस्ताव ऐसी नींव पर टिका है जो अभी रखी ही नहीं गई।" छठे पैराग्राफ़ में वे जोड़ते हैं कि ऐसे व्यक्ति के बारे में लिया गया फ़ैसला, जिसका निदेशक पद संदेह से मुक्त न हो, किसी भी शेयरधारक की क़ानूनी चुनौती के लिए खुला रहेगा।

यह चेयरमैनी से अलग, दूसरा विवाद है। वक्तव्य यह नहीं बताता कि वह आम सभा कौन सी थी, कब हुई, या कोरम क्यों नहीं बना। इस डेस्क को वह भी कहीं दर्ज नहीं मिला।

इतना ज़रूर उसी 2021 के फ़ैसले से पढ़ा जा सकता है कि टाटा संस की आम सभा का कोरम मामूली नहीं है। उसमें भी इन्हीं दो ट्रस्टों का नाम है। अनुच्छेद 86 का पाठ, वहीं पैराग्राफ़ 19.2 में, कहता है कि साधारण शेयरधारकों की आम सभा का कोरम तब तक नहीं बनता जब तक व्यक्तिगत रूप से मौजूद सदस्यों की संख्या पाँच से कम न हो और उनमें सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट तथा सर रतन टाटा ट्रस्ट का संयुक्त रूप से नामित कम से कम एक अधिकृत प्रतिनिधि शामिल न हो, बशर्ते ट्रस्ट कुल मिलाकर 40 फ़ीसदी रखते हों। कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि वेणु श्रीनिवासन और सौरभ अग्रवाल आम सभा में बारी-बारी से सेवानिवृत्त होने वाले निदेशक थे। इन दोनों तथ्यों को जोड़ना इस लेख का काम नहीं है। बीच की कड़ी किसी दस्तावेज़ से नहीं मिली।

एक तरफ़ के काग़ज़, दूसरी तरफ़ की ख़ामोशी

20 सितंबर तक इस विवाद के सारे दस्तावेज़ एक ही पक्ष के हैं। टाटा ट्रस्ट्स की दो विज्ञप्तियाँ हैं, 17 और 20 सितंबर की, दोनों अपनी वेबसाइट पर, मुंबई की तारीख़ के साथ। उनके साथ नोएल टाटा का दो पन्नों का वक्तव्य है। टाटा संस की तरफ़ से इनमें से किसी का जवाब नहीं है। रविवार को tata.com के न्यूज़रूम में इस मामले पर कुछ नहीं था; वहाँ की ताज़ा विज्ञप्तियाँ एयर इंडिया, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और टीसीएस के कारोबारी सौदों की थीं। 17 सितंबर की बैठक के बाद कंपनी का एक वक्तव्य ज़रूर आया था, जिसका एक वाक्य द इंडियन एक्सप्रेस ने छापा। वह वक्तव्य भी इस डेस्क को कंपनी की वेबसाइट पर नहीं मिला।

ख़ामोशी को स्वीकारोक्ति पढ़ना ग़लत होगा। पर पाठक को यह जानने का हक़ है कि रविवार तक एक पक्ष ने अपने नाम से दो दस्तावेज़ रखे हैं और दूसरे पक्ष की दलील सिर्फ़ वकीलों के बयानों और अख़बारों के सूत्रों से आ रही है।

अदालत में भी अभी कुछ नहीं है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने रविवार को लिखा कि ट्रस्ट्स ज़रूरत पड़ने पर अदालत जाने की तैयारी कर रहे हैं और कई क़ानूनी विकल्प तौल रहे हैं। तैयारी की ख़बर मुक़दमे की फ़ाइलिंग नहीं है। 20 सितंबर तक दाख़िल कोई याचिका इस डेस्क को नहीं मिली।

पीछे की बड़ी बात सूचीबद्धता है। 11 सितंबर 2026 की एक चिट्ठी में रिज़र्व बैंक ने टाटा संस का वह आवेदन ख़ारिज कर दिया जिसमें कंपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी का पंजीकरण लौटाना चाहती थी, और उसे तुरंत सूचीबद्ध होने की तैयारी करने को कहा। यह अख़बार 14 सितंबर के अंक में उस चिट्ठी और उसके नियामक ढाँचे पर विस्तार से लिख चुका है। ट्रस्ट्स का जवाब 20 सितंबर की विज्ञप्ति में है: सूचीबद्धता से बेहतर अभिशासन आएगा, यह दलील एक ऐसी कमी मान लेती है जो है ही नहीं, और "सौ साल पुराने ढाँचे को एक काल्पनिक ख़ाली जगह भरने के लिए तोड़ना एक गुठली तोड़ने के लिए हथौड़ा चलाना है"।

20 सितंबर रविवार था और बाज़ार बंद थे। टीसीएस या टाटा मोटर्स का शेयर रखने वाले पाठक के लिए इस विवाद से अभी सीधे तौर पर कुछ नहीं बदला। वे कंपनियाँ अलग से सूचीबद्ध हैं और उनके अपने बोर्ड हैं; झगड़ा उस ग़ैर-सूचीबद्ध मालिक कंपनी के भीतर है जिसके शेयर बाज़ार में ख़रीदे ही नहीं जा सकते। पैसे की एक गिनती ज़रूर है। कंपनी की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट में निदेशकों ने 64,900 रुपये प्रति शेयर लाभांश की सिफ़ारिश की, जिससे कुल 2,622.91 करोड़ रुपये बाहर जाएँगे। उसी तालिका के हिसाब से सात प्रवर्तक ट्रस्टों के हिस्से में 1,712.46 करोड़ रुपये आते हैं। यही वह रक़म है जो ट्रस्टों के अपने ब्योरे के मुताबिक़ स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, पानी-सफ़ाई और रोज़गार के कामों में लगती है। जिस बोर्ड की एक कुर्सी पर यह झगड़ा है, वह बोर्ड इसी रास्ते पर पड़ता है।

बेंगलुरु में भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) की मुख्य इमारत, अप्रैल 2022 की तस्वीर; जमशेदजी टाटा के दान से बना यह संस्थान भी उसी तरह के काम की मिसाल है जिस पर ट्रस्टों का पैसा लगता है।
तस्वीर: Pravega, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

स्रोतटाटा ट्रस्ट्स, प्रेस विज्ञप्ति, मुंबई, 20 सितंबर 2026: 'No Deadlock at the Board Meeting on September 17, 2026; A Casting Vote Cannot Revive a Stillborn Resolution' — 'void ab initio' वाला दस्तावेज़, टाटा ट्रस्ट्स, प्रेस विज्ञप्ति, मुंबई, 17 सितंबर 2026: बोर्ड बैठक के दिन जारी पहली विज्ञप्ति, जिसमें 12 अगस्त की चिट्ठी, चयन समिति की माँग और 'दोनों नामित निदेशकों' वाली शर्त दर्ज है, 'Statement made by Mr. Noel N. Tata in the Tata Sons Board Meeting held on 17 September 2026', दो पन्ने, बारह पैराग्राफ़, 17 सितंबर की विज्ञप्ति के साथ नत्थी, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ लिमिटेड बनाम साइरस इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड, सुप्रीम कोर्ट, 26 मार्च 2021: पैरा 19.2 में अनुच्छेद 86, 104B, 121 और 121A का पूरा पाठ; पैरा 16.33 में अनुच्छेद 118; पैरा 19.7, 19.25, 19.50 और 21.5। sci.gov.in कैप्चा माँगता है, इसलिए पाठ इंडियन कानून से, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड, एक सौ सातवीं वार्षिक रिपोर्ट 2024-25: नौ निदेशकों की सूची और नियुक्ति तारीख़ें, प्रवर्तक शेयरधारिता की तालिका, और 64,900 रुपये प्रति शेयर लाभांश पर 2,622.91 करोड़ रुपये का नक़द बहिर्वाह, कंपनी अधिनियम, 2013 का राजपत्र पाठ: धारा 10(1), और अनुसूची एक की सारणी 'एफ़' का विनियम 68(i) तथा 68(ii), द हिंदू, ललातेंदु मिश्रा, मुंबई, 20 सितंबर 2026, शाम 5:17 बजे प्रकाशित और रात 9:19 बजे अद्यतन: कास्टिंग वोट स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी का बताया गया, द इंडियन एक्सप्रेस, जॉर्ज मैथ्यू, 20 सितंबर 2026, शाम 6:01 बजे: शीर्षक में कास्टिंग वोट चंद्रशेखरन का बताया गया; 17 सितंबर के टाटा संस वक्तव्य का उद्धरण; चंद्रचूड़ की राय, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 20 सितंबर 2026, शाम 4:18 बजे, रात 11:10 बजे अद्यतन: हरीश साल्वे टाटा संस को सलाह दे रहे हैं; अभिषेक मनु सिंघवी की रविवार की सोशल मीडिया पोस्ट, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 20 सितंबर 2026, शाम 5:04 बजे: अनुच्छेद 121 का पाठ 2021 के फ़ैसले से उद्धृत, और 17 सितंबर की बैठक में सूचीबद्धता वाला अलग प्रस्ताव, द हिंदू, व्याख्या, 20 सितंबर 2026 को अद्यतन: बैठक में शामिल छह निदेशकों के नाम और नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति की भूमिका

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।