मोबाइल रिचार्ज में वॉइस-एसएमएस का हर छोटा विकल्प अब देना अनिवार्य, ट्राई ने टैरिफ़ में 'उचित कमी' कहा, आँकड़ा नहीं दिया
मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को ट्राई ने टेलीकॉम कंज़्यूमर्स प्रोटेक्शन (तेरहवाँ संशोधन) विनियम, 2026 सार्वजनिक किए। अब कंपनी जिस भी वैधता में वॉइस-एसएमएस-डेटा वाला रिचार्ज बेचती है, तीस दिन तक की उसी वैधता में सिर्फ़ वॉइस-एसएमएस वाला वाउचर भी बेचना होगा, महीने की तय तारीख़ पर नवीनीकरण के साथ। टैरिफ़ में 'उचित कमी' की शर्त है, मगर कितनी कमी, यह कोई दस्तावेज़ तय नहीं करता।

मोबाइल पर सिर्फ़ कॉल और एसएमएस चाहिए, डेटा नहीं, ऐसे उपभोक्ता के सामने अभी दो ही विकल्प हैं। या तो वह डेटा वाला रिचार्ज ख़रीदे, भले उसे डेटा का इस्तेमाल न करना हो। या फिर वह महीनों लंबी वैधता वाला वॉइस-एसएमएस वाउचर एक साथ ख़रीदे, बड़ी रक़म एक ही बार में चुकाकर। बीच का कोई रास्ता नहीं था। तीस दिन के लिए सिर्फ़ कॉल-एसएमएस का छोटा रिचार्ज, जैसा डेटा वाले पैक में आम है, बाज़ार में लगभग मिलता ही नहीं।
मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने यही स्थिति बदलने वाला नियम सार्वजनिक किया। टेलीकॉम कंज़्यूमर्स प्रोटेक्शन (तेरहवाँ संशोधन) विनियम, 2026 पर अधिसूचना की तारीख़ 21 सितंबर है। पत्र सूचना कार्यालय ने इसे मंगलवार दोपहर 1 बजकर 4 मिनट पर जारी किया, और ट्राई ने अपनी वेबसाइट पर भी उसी दिन डाला। अब हर कंपनी को, वह हर वैधता जिसमें वॉइस, एसएमएस और डेटा वाला रिचार्ज बिकता है, उसी वैधता में सिर्फ़ वॉइस-एसएमएस वाला वाउचर भी बेचना होगा, बशर्ते वैधता तीस दिन या उससे कम की हो।
यह माँग नई नहीं है। ऐसा ही एक नियम ट्राई दिसंबर 2024 में भी बना चुका है। कंपनियों ने उसे माना, पर बमुश्किल: सिर्फ़ एक-दो वाउचर, वह भी बहुत लंबी वैधता में। यह बात ट्राई ख़ुद अपने दस्तावेज़ में लिखता है। तेरहवाँ संशोधन उसी ढील को बंद करने आया है।
वाउचर, प्लान और टॉप-अप का फ़र्क़
ट्राई के नियमों में मोबाइल रिचार्ज चार अलग तरह के वाउचर से चलता है। तेरहवाँ संशोधन इनमें से सिर्फ़ एक को छूता है। टेलीकॉम कंज़्यूमर्स प्रोटेक्शन रेगुलेशंस, 2012 की परिभाषा के मुताबिक़ "प्लान वाउचर" वह है जो उपभोक्ता को किसी तयशुदा टैरिफ़ प्लान में दाख़िल करता है, न कम न ज़्यादा। "टॉप-अप वाउचर" सिर्फ़ रुपये जोड़ता है, न वैधता पर कोई शर्त, न इस्तेमाल पर कोई बंदिश।
"विशेष टैरिफ़ वाउचर" यानी एसटीवी अलग चीज़ है। नियम के मुताबिक़ यह ऐसा वाउचर है जो चालू होने पर उपभोक्ता के प्लान में किसी मद को बदल देता है, वॉइस कॉल, एसएमएस या डेटा के सीमित या असीमित इस्तेमाल के हिसाब से, मगर खाते में कोई नक़द रक़म नहीं जोड़ता। यानी एसटीवी सिर्फ़ शर्तें बदलता है, पैसा नहीं। "कॉम्बो वाउचर", जो 2012 के चौथे संशोधन से जुड़ा, दोनों काम एक साथ करता है: शर्तें भी बदलता है और खाते में रक़म भी जोड़ता है।
एसटीवी की वैधता पर भी नियम बदलते रहे हैं। शुरुआती नियम में इसकी वैधता नब्बे दिन तक सीमित थी। 2016 के दसवें संशोधन ने इस सीमा को नए सिरे से लिखा और डेटा-केवल वाउचर के लिए अलग से तीन सौ पैंसठ दिन तक की छूट जोड़ी। दिसंबर 2024 के बारहवें संशोधन ने आम एसटीवी और कॉम्बो वाउचर, दोनों की वैधता-सीमा नब्बे दिन से बढ़ाकर तीन सौ पैंसठ दिन कर दी, और वाउचर दस रुपये के गुणकों में ही बेचने की पुरानी शर्त भी हटा दी।
तेरहवाँ संशोधन सिर्फ़ एसटीवी को छूता है, वह भी सिर्फ़ उसकी एक क़िस्म को: वह एसटीवी जो सिर्फ़ वॉइस और एसएमएस के लिए हो, डेटा के लिए बिलकुल नहीं। कॉम्बो वाउचर, टॉप-अप या बेस प्लान पर इसका कोई सीधा असर नहीं है।
संशोधन का पाठ: वाउचर पर अब तीन शर्तें
अधिसूचना ख़ुद बताती है कि क्या बदला। आरजी-8/(2)/2025-एडीवी_एफ़ईए-1 नंबर वाली यह अधिसूचना ट्राई एक्ट, 1997 की धारा 36 और धारा 11(1)(बी) के तहत जारी हुई है, और यह टेलीकॉम कंज़्यूमर्स प्रोटेक्शन रेगुलेशंस, 2012 के नियम 4 की उपधारा (2), खंड (सी), उपखंड (iii) की "चौथी शर्त" को बदलती है। यही शर्त दिसंबर 2024 में जुड़ी थी।

पुरानी शर्त सिर्फ़ इतना कहती थी: "सेवा प्रदाता कम से कम एक विशेष टैरिफ़ वाउचर, सिर्फ़ वॉइस और एसएमएस के लिए, ऐसी वैधता अवधि में देगा जो तीन सौ पैंसठ दिन से ज़्यादा न हो।" एक वाउचर, एक वैधता, बस इतना। नई शर्त की भाषा कहीं ज़्यादा बारीक़ है: "सेवा प्रदाता टैरिफ़ में उचित कमी के साथ, सिर्फ़ वॉइस और एसएमएस के लिए, विशेष टैरिफ़ वाउचर देगा: पहला, वॉइस, एसएमएस और डेटा वाले जिस वाउचर की वैधता तीस दिन या उससे कम है, उस हर वैधता के बराबर; दूसरा, हर महीने उसी तारीख़ को नवीनीकरण, और अगर वह तारीख़ किसी महीने में न हो तो उस महीने की आख़िरी तारीख़ को; और तीसरा, ऊपर की दोनों शर्तों से ज़्यादा वैधता वाला कम से कम एक वाउचर भी, जो वॉइस, एसएमएस और डेटा वाले वाउचर की वैधता के बराबर हो।"
तीन शर्तें, तीन अलग काम। पहली गिनती की है: कंपनी अगर 28, 24 और 20 दिन के तीन डेटा-सहित वाउचर बेचती है, तो उसे इन्हीं तीन वैधता में तीन वॉइस-एसएमएस-वाले वाउचर भी बेचने होंगे। दूसरी तारीख़ की है: महीने भर वाला वाउचर अब कैलेंडर की एक तय तारीख़ पर नवीनीकृत होगा, महीने की लंबाई अलग होने पर भी। तीसरी पुरानी शर्त को ही बचाए रखती है: लंबी वैधता वाला कम से कम एक वाउचर अब भी ज़रूरी है। बाक़ी दो शर्तें बिलकुल नई हैं।
पुरानी शर्त में यह ख़ामी थी कि "कम से कम एक" का मतलब कंपनियाँ अपने हिसाब से निकाल सकती थीं। ट्राई के अपने दस्तावेज़ के मुताबिक़ कंपनियों ने इसे अस्सी-चौरासी दिन या तीन सौ छत्तीस-तीन सौ पैंसठ दिन की वैधता में उतारा, ठीक वहीं जहाँ एक साथ बड़ी रक़म चुकानी पड़े। तीस दिन या उससे कम का कोई वॉइस-एसएमएस वाउचर किसी कंपनी ने नहीं निकाला। नई शर्त की पहली दो शर्तें ठीक इसी ख़ाली जगह भरने के लिए लिखी गई हैं।
नियम सिर्फ़ इतना कहता है, इससे ज़्यादा नहीं। यह डेटा जोड़ने की माँग नहीं करता। यह किसी कंपनी को कितने वाउचर बेचने हैं, यह तय नहीं करता। यह लैंडलाइन या फ़िक्स्ड सेवाओं पर लागू नहीं होता; मूल नियम ख़ुद सिर्फ़ यूनिफ़ाइड ऐक्सेस सेवा और सेल्युलर मोबाइल टेलीफ़ोन सेवा पर लागू होता है।
टैरिफ़ में 'उचित कमी', रुपया या फ़ीसद कहीं तय नहीं
यहाँ वह सवाल आता है जो हर उपभोक्ता के लिए सबसे ज़्यादा मायने रखता है: नया वॉइस-एसएमएस वाउचर सस्ता कितना होगा। जवाब में नियम पूरी तरह चुप नहीं है, मगर पूरी तरह बोलता भी नहीं। ऑपरेटिव शर्त ख़ुद कहती है कि वाउचर "टैरिफ़ में उचित कमी के साथ" मिलेगा। यानी दाम में कुछ कमी होनी ही चाहिए, सिर्फ़ शर्तें नहीं, क़ीमत भी। मगर "उचित" कितनी कमी है, इसका कोई रुपया, कोई फ़ीसद, कोई फ़ॉर्मूला नियम में कहीं दर्ज नहीं है।
यह ढिलाई मसौदे में नहीं थी। सात अप्रैल 2026 को जारी मसौदे की भाषा सख़्त थी: "ऐसे वॉइस-एसएमएस वाउचर की क़ीमत, बराबर वैधता वाले वॉइस-एसएमएस-डेटा वाउचर के मुक़ाबले, टैरिफ़ में बड़े पैमाने पर आनुपातिक कमी के साथ रखी जाएगी।" आनुपातिक यानी हिसाब लगाकर तय की गई कमी, मनमानी नहीं। कई कंपनियों और उद्योग संगठनों ने इसका सीधा विरोध किया। उनकी दलील थी कि यह असल में ख़ुदरा क़ीमत तय करना है, घटक-वार दाम बाँधना है, और यह टैरिफ़ तय करने की कंपनियों की आज़ादी वाली ट्राई की पुरानी नीति से हटना है।
ट्राई ने जवाब में साफ़ लिखा है: "प्रस्तावित संशोधन न टैरिफ़ तय करता है, न घटकवार क़ीमत, क्योंकि यह न कोई दाम अधिसूचित करता है, न कंपनियों की व्यावसायिक आज़ादी पर रोक लगाता है।" इसीलिए अंतिम नियम में शब्द बदल गया। दस्तावेज़ ख़ुद कहता है कि मसौदे की "बड़े पैमाने पर आनुपातिक" कमी की जगह इससे मिलते-जुलते वाउचर में "उचित" कमी अनिवार्य करना ही ठीक रहेगा, क्योंकि डेटा वाले कई वाउचर में रोज़ाना की सीमा होती है, महीने भर की जमा सीमा नहीं, और हर वैधता पर इसका हिसाब एक जैसा नहीं बैठता।
"उचित" शब्द चुनने के बावजूद ट्राई ने कंपनियों के लिए कुछ रास्ते सुझाए हैं, मगर इन्हें सुझाव कहा गया है, शर्त नहीं। दस्तावेज़ में तीन तरीक़े गिनाए गए हैं: डेटा की प्रति-जीबी औसत आमदनी के आधार पर कमी निकालना, रोज़ाना-सीमा वाले वाउचर में अनुमानित खपत के आधार पर कमी निकालना, और एक वैधता पर तय हुई प्रति-दिन क़ीमत को दूसरी वैधता पर भी लागू करना। ट्राई यह भी मानता है कि बाज़ार की होड़ ख़ुद क़ीमत तय करने में भूमिका निभाएगी। बाक़ी हिसाब कंपनी का है। तीनों तरीक़े "संदर्भ" के लिए हैं, बंधन के लिए नहीं, और नियम की भाषा में इनका कोई ज़िक्र नहीं।
व्यवहार में उपभोक्ता के पास यह जानने का कोई तयशुदा तरीक़ा नहीं होगा कि नया वॉइस-एसएमएस वाउचर पुराने डेटा-सहित वाउचर से ठीक कितना सस्ता है। कंपनी दस रुपये कम रखे या पचास, दोनों "उचित कमी" के दायरे में आ सकते हैं। दस्तावेज़ का अपना एक वाक्य इस पूरे तनाव को समेटता है: "जो उपभोक्ता डेटा इस्तेमाल नहीं करते, उनसे डेटा की क़ीमत वसूलना उन उपभोक्ताओं की डेटा-लागत की क्रॉस-सब्सिडी जैसा दिखता है जो डेटा इस्तेमाल करते हैं।" यह वाक्य बताता है कि दिक़्क़त क्या है। समाधान की माप ट्राई ने बाज़ार पर छोड़ दी है।
पहले महीने में यह फ़र्क़ शायद न दिखे। कंपनी वॉइस-एसएमएस वाउचर ठीक कब बाज़ार में उतारेगी, इसकी कोई अलग तारीख़ नियम में नहीं है, सिर्फ़ नियम लागू होने की एक ही तारीख़ है। वाउचर जिस दिन दुकान और ऐप पर दिखेंगे, उसी दिन पता चलेगा कि "उचित" शब्द का मतलब हर कंपनी के लिए क्या निकला।

बारह बरस, तेरह संशोधन
टेलीकॉम कंज़्यूमर्स प्रोटेक्शन रेगुलेशंस मूल रूप से 6 जनवरी 2012 को अस्तित्व में आए। तेरह बरस से कुछ कम में इनमें तेरह बार संशोधन हो चुका है, मूल नियम को छोड़कर। रफ़्तार कभी एक जैसी नहीं रही। अकेले 2012 में पाँच संशोधन हुए, जनवरी से नवंबर के बीच, फिर 2013 में दो। 2015 में दो और 2016 में एक के बाद रफ़्तार धीमी पड़ी: अगला संशोधन 2020 में आया, उसके बाद वाला दिसंबर 2024 में, यानी दोनों बार चार बरस का फ़ासला रहा। बारहवें और तेरहवें संशोधन के बीच सिर्फ़ इक्कीस महीने बीते, हाल के दशक में सबसे कम।
फिर रफ़्तार अचानक तेज़ हुई।
हर संशोधन ने अलग परत जोड़ी। 2012 के चौथे संशोधन ने कॉम्बो वाउचर की अलग श्रेणी बनाई। 2013 के छठे संशोधन ने बिना इस्तेमाल के बंद पड़े प्री-पेड नंबर को दोबारा ज़िंदा रखने के नियम, यानी ऑटोमैटिक नंबर रिटेंशन स्कीम, पहली बार जोड़े। उसी बरस के सातवें संशोधन ने वह तरीक़ा तय किया जिससे कोई एसटीवी वैधता ख़त्म होने पर अपने आप नवीनीकृत होता है, सिर्फ़ उपभोक्ता की सहमति से, और उसे एसएमएस, वेब या आईवीआर से कभी भी रोकने का हक़ भी दिया। यही तरीक़ा अब तेरहवें संशोधन वाले वॉइस-एसएमएस वाउचर पर भी लागू होगा, क्योंकि इनका नवीनीकरण भी हर महीने अपने आप होना है।
2020 के ग्यारहवें संशोधन ने विदेश में रोमिंग बंद रखने को डिफ़ॉल्ट बनाया, ताकि बिल अचानक न बढ़े। सभी संशोधन टिके नहीं, यह याद रखने लायक़ बात है। 2015 का नौवाँ संशोधन हर टूटी कॉल पर एक रुपया हर्जाना तय करता था, दिन में तीन कॉल तक। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई 2016 को सेल्युलर ऑपरेटर्स असोसिएशन ऑफ़ इंडिया बनाम ट्राई मामले में इसे रद्द कर दिया, और ट्राई अपने ही नियमों के संकलन में यह बात आज भी दर्ज करता है। तेरहवाँ संशोधन उस राह पर नहीं चला; यह किसी नई देनदारी की बात नहीं करता, सिर्फ़ उपलब्धता की।
सुनवाई: कंपनियों का विरोध, उपभोक्ता संगठनों का समर्थन
सात अप्रैल 2026 को मसौदा सार्वजनिक हुआ। टिप्पणियाँ जमा करने की तारीख़ पहले 28 अप्रैल रखी गई, फिर हितधारकों के अनुरोध पर 5 मई तक बढ़ाई गई। जवाबी टिप्पणियाँ यानी काउंटर-कमेंट 12 मई तक लिए गए, और 15 जून 2026 को खुली सुनवाई यानी ओपन हाउस डिस्कशन हुई। कुल 1,132 जवाब आए, टेलीकॉम कंपनियों, उद्योग संगठनों, उपभोक्ता संगठनों और आम नागरिकों से। बहस खुलकर हुई।
समर्थन में तर्क सीधा था। कई हितधारकों ने कहा कि डेटा-सहित वाउचर हर वैधता में मिलते हैं जबकि सिर्फ़ वॉइस-एसएमएस वाला विकल्प गिनती का है, इसलिए उपभोक्ता अक्सर वह डेटा ख़रीदने पर मजबूर होता है जो उसे चाहिए ही नहीं। इनकी दलील थी कि उपभोक्ता को अपनी ज़रूरत, इस्तेमाल और जेब के हिसाब से सेवा चुनने की आज़ादी होनी चाहिए, और टैरिफ़ पारदर्शी तथा निष्पक्ष होने चाहिए।
विरोध कई मोर्चों से आया। कुछ ने कहा कि वॉइस-एसएमएस-वाले वाउचर की माँग है ही नहीं; अगर होती तो बाज़ार पहले ही यह विकल्प दे चुका होता। कुछ ने सरकार की डिजिटल इनक्लूज़न नीति का हवाला दिया, यह कहते हुए कि टेलीमेडिसिन, बैंकिंग और खेती की सलाह जैसी सेवाएँ डेटा माँगती हैं। कुछ ने आगाह किया कि सस्ते, कम वैधता वाले वॉइस-एसएमएस वाउचर से बिना रजिस्ट्रेशन वाले टेलीमार्केटर और स्पैम बढ़ेंगे, क्योंकि इस्तेमाल करके फेंक देने वाले नंबर आसान होंगे। सबसे तीखा तर्क यह था कि इससे कंपनियों की कमाई घटेगी, ख़ासकर गाँव और अर्ध-शहरी इलाक़ों में, जहाँ नेटवर्क बढ़ाने की लागत पहले से मुश्किल है।
ट्राई ने हर दलील का जवाब अपने दस्तावेज़ में दर्ज किया है। स्पैम की आशंका पर कहा गया कि मौजूदा निगरानी तंत्र और कंपनियों के अपने विश्लेषण-आधारित सिस्टम पहले से ऐसी हरकतें पकड़ते हैं। डिजिटल इनक्लूज़न पर कहा गया कि यह दलील उन उपभोक्ताओं पर डेटा थोपने का बहाना नहीं बन सकती जिन्हें उसकी ज़रूरत नहीं; फ़ीचर फ़ोन पर भी यूपीआई लेन-देन यूएसएसडी यानी अनस्ट्रक्चर्ड सप्लीमेंट्री सर्विस डेटा से हो सकता है, मोबाइल इंटरनेट के बिना। कमाई घटने की आशंका पर ट्राई का जवाब छोटा था: बाज़ार में होड़ बनी रहेगी, और मौजूदा विकल्प भी उपभोक्ता के पास बने रहेंगे।
फ़ीचर फ़ोन, बुज़ुर्ग और गाँव के उपभोक्ता को सीधा फ़ायदा
ट्राई के दस्तावेज़ में यह बात बार-बार आती है कि यह नियम किसके लिए है। दिसंबर 2024 के बारहवें संशोधन के वक़्त भी यही लिखा गया था: बुज़ुर्ग उपभोक्ता, गाँवों में रहने वाले उपभोक्ता, और सिर्फ़ फ़ीचर फ़ोन इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता, जिन्हें वॉइस और एसएमएस के अलावा कुछ नहीं चाहिए।

तर्क आय से जुड़ा है, तकनीक से कम। दस्तावेज़ के मुताबिक़ कम आमदनी वाले उपभोक्ता के लिए अस्सी-चौरासी दिन या साल भर की वैधता वाला वाउचर ख़रीदना मुश्किल है, क्योंकि इसमें एक साथ बड़ी रक़म चुकानी पड़ती है। तीस दिन या उससे भी कम की वैधता वाला छोटा रिचार्ज ऐसे उपभोक्ता के लिए बेहतर बैठता है, भले उसका सालाना जोड़ बड़े वाउचर से ज़्यादा ही क्यों न पड़े। यह विकल्प देने से उपभोक्ता को अपनी ज़रूरत और हैसियत के हिसाब से रिचार्ज करने का मौक़ा मिलता है।
पुराने ढाँचे में एक और पेच था जो सीधे आमदनी से जुड़ता है। हिसाब उलटा बैठता रहा है। ट्राई ख़ुद दर्ज करता है कि मौजूदा अस्सी-चौरासी दिन और तीन सौ छत्तीस-तीन सौ पैंसठ दिन वाले वाउचर में जितनी लंबी वैधता, प्रति-दिन क़ीमत उतनी ही सस्ती बैठती है। यानी सिर्फ़ छोटी अवधि के लिए रिचार्ज करने वाला उपभोक्ता, जिसके पास एक साथ बड़ी रक़म देने की गुंजाइश कम है, वह हर दिन के हिसाब से अब तक ज़्यादा क़ीमत चुकाता आया है। कम वैधता वाला विकल्प सिर्फ़ सुविधा की बात नहीं; यह उसी उलटे हिसाब को सीधा करने की कोशिश भी है।
यह नियम किसी को डेटा वाले वाउचर से रोकता नहीं। जो उपभोक्ता डेटा चाहता है, वह पहले की तरह वही ख़रीद सकता है। बदलाव सिर्फ़ इतना है कि जिसे डेटा नहीं चाहिए, अब उसके पास भी उतने ही विकल्प होंगे जितने डेटा वाले उपभोक्ता के पास हैं, कम से कम वैधता की गिनती में।
तीस दिन बाद असर, न मानने पर जुर्माने का प्रावधान
अधिसूचना में एक शर्त साफ़ है: नियम राजपत्र में प्रकाशन की तारीख़ से "तीस दिन बाद" लागू होंगे। अधिसूचना पर तारीख़ 21 सितंबर 2026 है, और अगर यही तारीख़ राजपत्र-प्रकाशन की भी मानी जाए, जैसा बारहवें संशोधन के नोट में भी दर्ज है, तो तीस दिन 21 अक्तूबर 2026 के आसपास पूरे होते हैं। तब तक कंपनियों के पास पुराने ढाँचे में बेचते रहने की छूट है। इसके बाद यह छूट ख़त्म होगी।
न मानने पर क्या होगा, यह अधिसूचना ख़ुद नहीं बताती। ट्राई एक्ट, 1997 की धारा 29 प्राधिकरण के निर्देशों की अवहेलना पर सज़ा तय करती है: पहली बार में एक लाख रुपये तक जुर्माना, दोबारा हो तो दो लाख रुपये तक, और अवहेलना जारी रहे तो हर दिन के लिए दो लाख रुपये तक अतिरिक्त। यह सज़ा सीधे किसी "विनियम" पर नहीं, ट्राई के "निर्देश" पर लागू होती है, इसलिए इसका असली इस्तेमाल तभी होता है जब ट्राई किसी कंपनी को पालन का निर्देश दे और वह कंपनी उसे भी न माने।
छह महीने में समीक्षा की माँग कुछ हितधारकों ने की थी। दस्तावेज़ का आख़िरी वाक्य इसे टाल देता है: इतनी टिप्पणियों और चर्चा के बाद छह महीने में समीक्षा ज़रूरी नहीं समझी गई, हालांकि ज़रूरत पड़ने पर प्राधिकरण नियम दोबारा देख सकता है।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, संचार मंत्रालय, 22 सितंबर 2026, दोपहर 1:04: ट्राई का तेरहवाँ संशोधन जारी, ट्राई की वेबसाइट: तेरहवें संशोधन पर प्रेस विज्ञप्ति संख्या 120/2026 और उसका पीडीएफ़, ट्राई की अधिसूचना: टेलीकॉम कंज़्यूमर्स प्रोटेक्शन (तेरहवाँ संशोधन) विनियम, 2026 (6 ऑफ़ 2026), 21 सितंबर 2026, सचिव हरिंदर कुमार के हस्ताक्षर से, साथ में 43-पैराग्राफ़ का एक्सप्लेनेटरी मेमोरेंडम, ट्राई: टेलीकॉम कंज़्यूमर्स प्रोटेक्शन रेगुलेशंस (टीसीपीआर), 2012 का संकलित रूप, बारहवें संशोधन तक अद्यतन, मार्च 2025, ट्राई: टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1997 का पूरा पाठ, धारा 29 और 36 सहित, ट्राई की नियम-सूची: टेलीकॉम कंज़्यूमर्स प्रोटेक्शन रेगुलेशंस, 2012 के सभी तेरह संशोधनों की तारीख़ें