भारत में दिल के वाल्व का मरीज़ पश्चिम के मरीज़ से औसतन तीस साल छोटा होता है, और इलाज की किताब वहीं की है
चेन्नई में शुक्रवार को इंडिया वाल्व रजिस्ट्री शुरू हुई। इसकी ज़रूरत इसलिए है कि जो उपकरण दुनिया में वाल्व का इलाज बदल चुका है, वह कैल्शियम पर टिकता है, और भारत के ज़्यादातर ख़राब वाल्व में कैल्शियम कम और रेशा ज़्यादा होता है।

शुक्रवार को चेन्नई में उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने एक रजिस्ट्री शुरू की।
नाम है इंडिया वाल्व रजिस्ट्री। काम यह है कि देश भर में जो लोग दिल के वाल्व की प्रक्रियाओं से गुज़र रहे हैं, उनका ब्योरा एक जगह, व्यवस्थित रूप से और नाम हटाकर दर्ज हो।
एक रजिस्ट्री शुरू होना आमतौर पर ख़बर नहीं होती। यह इसलिए है कि जो सवाल इसके पीछे है, वह भारतीय चिकित्सा के सबसे कम बोले जाने वाले सवालों में है।
सवाल यह है कि जिस मरीज़ का यहाँ इलाज हो रहा है, वह उस मरीज़ जैसा है ही नहीं जिस पर वह इलाज बना था।
पहले बीमारी
दिल में चार वाल्व होते हैं। हर वाल्व एक दरवाज़ा है जो एक तरफ़ खुलता है और दूसरी तरफ़ बंद रहता है, ताकि ख़ून एक ही दिशा में बहे।
यह दरवाज़ा दो तरह से ख़राब होता है। या तो वह पूरा खुलता नहीं, जिससे ख़ून को निकलने में ज़ोर लगाना पड़ता है, और इसे स्टेनोसिस कहते हैं। या वह पूरा बंद नहीं होता, जिससे ख़ून वापस रिसता है, और इसे रिगर्जिटेशन कहते हैं।
अब असली बात। यह ख़राबी होती क्यों है, इसका जवाब इस पर निर्भर करता है कि मरीज़ कहाँ रहता है।
अमीर देशों में सबसे आम कारण उम्र है। दशकों में वाल्व पर कैल्शियम जमता जाता है, वह सख़्त हो जाता है और खुलना बंद कर देता है। इसे अपकर्षी या कैल्सिफ़िक रोग कहते हैं, और उसका मरीज़ आमतौर पर सत्तर या अस्सी साल का होता है।
भारत में सबसे आम कारण उम्र नहीं, बचपन का एक संक्रमण है।
गले से दिल तक
यह रास्ता लंबा है और उसका हर क़दम रोका जा सकता था।
एक बच्चे के गले में स्ट्रेप्टोकोकस नाम का जीवाणु संक्रमण होता है। यह मामूली गले की ख़राश जैसा लगता है। अगर उसका सही इलाज हो जाए, बात वहीं ख़त्म हो जाती है।
अगर न हो, तो कुछ बच्चों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उस जीवाणु से लड़ते हुए भ्रम में पड़ जाती है और अपने ही ऊतकों पर हमला कर देती है। इसे आमवाती ज्वर कहते हैं। जोड़ों में दर्द होता है, बुख़ार आता है, और अक्सर यह भी गुज़र जाता है।
पर उस हमले में दिल के वाल्व पर निशान पड़ जाते हैं। एक बार में थोड़ा, और अगर संक्रमण बार-बार हो तो हर बार थोड़ा और।
फिर पंद्रह या बीस साल कुछ नहीं होता।
और तीस की उम्र के आसपास वह व्यक्ति साँस फूलने की शिकायत लेकर अस्पताल पहुँचता है, जहाँ पता चलता है कि उसका माइट्रल वाल्व सिकुड़ चुका है।
इसे आमवाती हृदय रोग कहते हैं। यह ग़रीबी की बीमारी है, भीड़ भरे घरों की बीमारी है, और उस स्वास्थ्य व्यवस्था की बीमारी है जहाँ बच्चे के गले का संक्रमण समय पर नहीं पकड़ा जाता।
पश्चिम में यह लगभग ख़त्म हो चुकी है। वहाँ इसे एंटीबायोटिक ने नहीं, एंटीबायोटिक और बेहतर घरों ने मिलकर ख़त्म किया।
संख्या
दुनिया भर में आमवाती हृदय रोग के अनुमानित 3.3 करोड़ मरीज़ों में से 1.32 करोड़ भारत में हैं।
यानी दुनिया के हर दस में से चार मरीज़ यहीं हैं।
2015 में इस रोग से दुनिया भर में अनुमानित 3,47,000 मौतें हुईं, और उनमें से क़रीब 1,20,000 भारत में। एक-तिहाई से ज़्यादा।
इन दोनों अनुपातों को साथ रखिए तो एक बात निकलती है। मरीज़ों में भारत का हिस्सा चालीस फ़ीसदी है और मौतों में लगभग पैंतीस। यानी यहाँ का मरीज़ दुनिया के औसत मरीज़ से बदतर नतीजे की तरफ़ नहीं जा रहा, पर बेहतर की तरफ़ भी नहीं।
इन आँकड़ों को पढ़ते समय एक सावधानी ज़रूरी है। ये अनुमान हैं, गिनती नहीं। आमवाती हृदय रोग की कोई राष्ट्रीय जनगणना नहीं होती, और अनुमान स्कूली बच्चों की इको जाँच जैसी सीमित अध्ययनों से पूरे देश तक बढ़ाकर निकाले जाते हैं। ऐसी हर विधि में एक चौड़ा दायरा होता है।
यही इस पूरी कहानी का दूसरा सिरा है। जिस बीमारी का सबसे बड़ा बोझ इस देश पर है, उसकी अपनी गिनती भी अनुमान पर टिकी है।

तीस साल का फ़ासला
अब वह बात जो इस पूरे लेख की धुरी है।
चिकित्सा साहित्य में यह दर्ज है कि आमवाती हृदय रोग के मरीज़ पश्चिम के अपकर्षी वाल्व रोग के मरीज़ों से औसतन तीस साल छोटे होते हैं।
और मध्य-आय वाले देशों में आमवाती महाधमनी रिगर्जिटेशन के मरीज़ चालीस के मध्य में सर्जरी की मेज़ तक पहुँचते हैं।
तीस साल का फ़ासला सिर्फ़ आँकड़ा नहीं है। वह इलाज का हर फ़ैसला बदल देता है।
अस्सी साल के मरीज़ में लगाया गया कृत्रिम वाल्व अगर पंद्रह साल चले, तो काम पूरा हो गया। पैंतीस साल के मरीज़ में वही वाल्व पंद्रह साल चले, तो पचास की उम्र में दोबारा सर्जरी करनी होगी, और शायद पैंसठ में तीसरी बार।
इसलिए युवा मरीज़ में अक्सर यांत्रिक वाल्व लगाया जाता है, जो लंबा चलता है। पर उसकी अपनी क़ीमत है, और वह क़ीमत रोज़ की है।
ख़ून पतला करने वाली दवा और एक ख़ून की जाँच
यांत्रिक वाल्व पर ख़ून के थक्के जमने का ख़तरा रहता है, इसलिए मरीज़ को जीवन भर ख़ून पतला करने वाली दवा लेनी होती है।
उस दवा की मात्रा सही रखने के लिए एक जाँच होती है जिसे आईएनआर कहते हैं। ख़ून बहुत पतला हो तो रक्तस्राव का ख़तरा है, बहुत गाढ़ा हो तो थक्के का। सही खिड़की सँकरी है।
इसका मतलब है कि मरीज़ को नियमित रूप से, ज़िंदगी भर, ख़ून की जाँच करानी है और उसी हिसाब से दवा बदलनी है।
चिकित्सा साहित्य इस पर साफ़ है कि निम्न और मध्य आय वाले देशों में यह निगरानी अक्सर पूरी नहीं हो पाती, और इसीलिए वहाँ के डॉक्टरों को पश्चिमी दिशानिर्देशों को उम्र के आधार पर आँख मूँदकर लागू करने के बजाय यह आकलन करना पड़ता है कि इस मरीज़ की निगरानी हो भी पाएगी या नहीं।
एक मरीज़ जो हर महीने ज़िला अस्पताल तक नहीं पहुँच सकता, उसके लिए सबसे टिकाऊ वाल्व सबसे ख़तरनाक विकल्प हो सकता है।
यह वह हिसाब है जो किसी पश्चिमी दिशानिर्देश में नहीं मिलेगा, क्योंकि वहाँ यह सवाल ही नहीं उठता।
और अब वह उपकरण जो यहाँ ठीक से काम नहीं करता
पिछले बीस साल में पश्चिम में वाल्व का इलाज एक तकनीक से बदल गया है, जिसे ट्रांसकैथेटर वाल्व प्रत्यारोपण कहते हैं और आमतौर पर टीएवीआई कहा जाता है।
इसमें छाती नहीं खोली जाती। जाँघ की धमनी से एक नली अंदर डाली जाती है, उसके सिरे पर मुड़ा हुआ कृत्रिम वाल्व होता है, और उसे पुराने ख़राब वाल्व की जगह खोलकर बिठा दिया जाता है।
अस्सी साल के मरीज़ के लिए, जिसकी छाती खोलना जोखिम भरा है, यह क्रांति है।
अब वह तकनीकी बात जो इसे भारत में सीमित कर देती है।
टीएवीआई का वाल्व सिला नहीं जाता। वह पुराने वाल्व की जगह में फँसकर टिकता है। और उसे फँसने के लिए कुछ सख़्त चाहिए, जो उसे पकड़ सके।
पश्चिम में वह सख़्ती कैल्शियम से मिलती है, क्योंकि वहाँ का ख़राब वाल्व कैल्शियम से जमा हुआ होता है।
आमवाती वाल्व में कैल्शियम कम होता है और रेशा ज़्यादा। वह सिकुड़ता है, चिपकता है, मोटा होता है, पर पत्थर जैसा नहीं होता।
समीक्षा साहित्य इसे साफ़ लिखता है: उभरती अर्थव्यवस्थाओं में महाधमनी वाल्व बदलने का प्रमुख कारण रिगर्जिटेशन है, और वह मौजूदा पीढ़ी के टीएवीआई कृत्रिम वाल्वों के लिए ठीक नहीं बैठता, क्योंकि इन वाल्वों में रेशा प्रमुख होता है और उपकरण को टिकाने लायक़ कैल्शियम कम।
एक और अड़चन दर्ज है, और वह और बुनियादी है: आमवाती वाल्वों में कैल्शियम कहाँ और कैसे बैठता है, इसका विस्तृत वर्णन ही उपलब्ध नहीं है, और यही इनके लिए उपकरण बनाने में बड़ी बाधा है।
यानी समस्या यह नहीं है कि उपकरण बनाया नहीं जा सकता। समस्या यह है कि उसे बनाने के लिए जो आँकड़ा चाहिए, वह किसी ने इकट्ठा नहीं किया।

160 और 900
एक आँकड़ा इस अंतर को सबसे साफ़ दिखाता है।
2016 में भारत में सिर्फ़ 160 टीएवीआई प्रक्रियाएँ हुईं। उसी साल चीन में 900।
यह आँकड़ा दस साल पुराना है और तब से संख्या बढ़ी है, इसलिए इसे आज की तस्वीर मानकर नहीं पढ़ना चाहिए। पर उस दौर की तुलना बताती है कि जिस तकनीक ने पश्चिम में वाल्व का इलाज बदल दिया, वह यहाँ शुरुआत में लगभग अनुपस्थित थी।
इसके कारण दो हैं और दोनों साथ चलते हैं। एक क़ीमत है, क्योंकि यह उपकरण महँगा है और अधिकतर बीमा में नहीं आता। दूसरा यही जैविक बेमेल है, क्योंकि जिन मरीज़ों के लिए यह सबसे उपयुक्त है, वे यहाँ अनुपात में कम हैं।
जो तकनीक यहाँ के मरीज़ पर बनी
यह कहानी सिर्फ़ अभाव की नहीं है।
आमवाती माइट्रल स्टेनोसिस, यानी सिकुड़ा हुआ माइट्रल वाल्व, के लिए एक प्रक्रिया है जिसे बलून माइट्रल वाल्वोटॉमी कहते हैं। इसमें नली के सिरे पर लगा गुब्बारा सिकुड़े हुए वाल्व में पहुँचाकर फुलाया जाता है, जिससे चिपकी हुई पंखुड़ियाँ अलग हो जाती हैं।
छाती नहीं खुलती। कोई कृत्रिम वाल्व नहीं लगता। इसलिए ख़ून पतला करने वाली दवा और आईएनआर की जाँच का पूरा बोझ भी नहीं आता।
एम्स नई दिल्ली के हृदय रोग विभाग की एक शुरुआती शृंखला में यह प्रक्रिया आमवाती माइट्रल स्टेनोसिस के पचास मरीज़ों पर आज़माई गई और चालीस में पूरी हुई। उसके तुरंत बाद फेफड़ों की धमनी का औसत दबाव, बाएँ आलिंद का दबाव और वाल्व के आर-पार का दबाव अंतर, तीनों में उल्लेखनीय कमी दर्ज हुई, और वाल्व का क्षेत्रफल बढ़ा।
यह उस दौर का काम है जब यह तकनीक दुनिया भर में नई थी।
और यह इस पूरे लेख का सकारात्मक सिरा है: जो प्रक्रिया यहाँ की सबसे आम वाल्व बीमारी पर सीधे लागू होती है, उसमें भारतीय अस्पतालों का अनुभव दुनिया में सबसे बड़े अनुभवों में है, क्योंकि मरीज़ यहीं सबसे ज़्यादा हैं।
जो इंजेक्शन इसे रोकता है
इस बीमारी का एक हिस्सा ऐसा है जिसका इलाज सस्ता है और वह इलाज दशकों पुराना है।
जिस बच्चे को एक बार आमवाती ज्वर हो चुका हो, उसे दोबारा होने से रोकना ज़रूरी है, क्योंकि हर बार वाल्व पर और निशान पड़ते हैं। इसके लिए एक लंबी अवधि तक नियमित अंतराल पर पेनिसिलिन का इंजेक्शन दिया जाता है। इसे द्वितीयक रोकथाम कहते हैं।
दवा महँगी नहीं है। कठिनाई पालन की है।
एक किशोर को, जो ख़ुद को बीमार महसूस नहीं करता, सालों तक हर कुछ हफ़्ते में एक दर्दनाक इंजेक्शन के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक लाना होता है। स्कूल छूटता है, मज़दूरी का दिन छूटता है, और लक्षण कुछ है नहीं।
यही वजह है कि यह बीमारी वहाँ बनी रहती है जहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुँचना ख़र्चीला है, और वहाँ ख़त्म हो जाती है जहाँ पहुँचना आसान है।
रजिस्ट्री इस हिस्से को नहीं छूती। वह उन मरीज़ों को दर्ज करती है जो प्रक्रिया की मेज़ तक पहुँच चुके हैं।
रजिस्ट्री करती क्या है
अब उस सवाल पर लौटिए जिससे यह शुरू हुआ था।
दुनिया भर में इलाज के दिशानिर्देश रजिस्ट्रियों से बनते हैं। किसी देश में हज़ारों मरीज़ों का ब्योरा वर्षों तक दर्ज होता है, फिर उससे निकाला जाता है कि कौन-सा उपकरण किस तरह के मरीज़ में कितने साल चला, किसमें जटिलता आई, और किसमें नहीं।
यूरोप और अमेरिका के पास ऐसी कई रजिस्ट्रियाँ हैं। जापान की अपनी है, फ़िनलैंड की अपनी।
भारत की अब तक ऐसी कोई राष्ट्रीय रजिस्ट्री नहीं थी।
इसका सीधा नतीजा यह है कि यहाँ का डॉक्टर जिस किताब से इलाज तय करता है, वह किताब किसी और आबादी के आँकड़ों से लिखी गई है। उस आबादी की उम्र अलग है, बीमारी का कारण अलग है, वाल्व की बनावट अलग है, और जाँच तक पहुँच अलग है।
उपराष्ट्रपति ने अपने भाषण में यही बात कही, और उनके शब्द इस पूरे मामले का सबसे छोटा सारांश हैं: ऐसी रजिस्ट्रियाँ हमारे देशवासियों के लिए हमारे देश का अपना डेटा बनाने में मदद करेंगी।
जो देखना बाक़ी है
रजिस्ट्री शुरू होने और रजिस्ट्री चलने में फ़र्क़ होता है, और वह फ़र्क़ तीन चीज़ों पर टिकता है।
पहली, कितने केंद्र इसमें आँकड़े भेजते हैं। अगर सिर्फ़ बड़े निजी अस्पताल भेजते हैं, तो जो तस्वीर बनेगी वह उन मरीज़ों की होगी जो वहाँ तक पहुँच सके।
दूसरी, मरीज़ का पीछा कितने साल तक होता है। वाल्व का असली सवाल दस और पंद्रह साल बाद का है, और उसका जवाब तभी मिलेगा जब आज दर्ज हुआ मरीज़ 2041 में भी रिकॉर्ड में हो।
तीसरी, आँकड़ा किसे मिलेगा। जो रजिस्ट्री सिर्फ़ अपने सदस्यों के लिए खुले, वह शोध का साधन कम और क्लब ज़्यादा बन जाती है।

आख़िर में
एक तेरह साल का बच्चा जिसके गले का संक्रमण समय पर पकड़ लिया जाए, वह पैंतीस की उम्र में कैथ लैब की मेज़ पर नहीं होगा।
यह सबसे सस्ता इलाज है और सबसे कम चर्चा में रहता है।
रजिस्ट्री उस बच्चे के लिए नहीं है। वह उन लोगों के लिए है जिनके लिए यह इलाज पहले ही देर हो चुकी है, और जिनकी संख्या 1.32 करोड़ है।
उनका इलाज बेहतर तभी होगा जब उनका ब्योरा दर्ज हो। अब तक वह दर्ज नहीं था।
स्रोतउपराष्ट्रपति सचिवालय की विज्ञप्ति, 5 सितंबर 2026, आमवाती हृदय रोग में ट्रांसकैथेटर वाल्व हस्तक्षेप, समीक्षा, आमवाती हृदय रोग में यांत्रिक वाल्व और आईएनआर नियंत्रण की वास्तविकता, एम्स नई दिल्ली, बलून माइट्रल वाल्वुलोप्लास्टी के पचास मरीज़