सत्य निकेतन में एम्बुलेंस किराने के ऐप से आई, और देश का सरकारी बेड़ा उसी साल 28,830 से घटकर 28,321 रह गया
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत जून 2025 तक 28,321 एम्बुलेंस चल रही थीं। इनमें उन्नत जीवन-रक्षक सुविधा वाली सिर्फ़ 3,129 हैं। 17वीं कॉमन रिव्यू मिशन की रिपोर्ट पुराने वाहन, प्रशिक्षित तकनीशियनों की कमी और असंगत जीपीएस दर्ज करती है। दिल्ली में सरकारी नंबर 102 है, और उस दोपहर सबसे पहले पहुँची गाड़ी उस नंबर की नहीं थी।

एक छात्र के फ़ोन में किराने का ऐप खुला था।
P-14, सत्य निकेतन, दक्षिण-पश्चिम दिल्ली। इमारत बैठ चुकी थी और मलबे के नीचे से आवाज़ें आ रही थीं। द प्रिंट के मुताबिक़ रितिक नाम के एक छात्र ने दोपहर 1:30 बजे उसी ऐप से एम्बुलेंस बुलाई। चार मिनट बाद, 1:34 पर, दक्षिण कैंपस थाने में पीसीआर कॉल दर्ज हुई। और क़रीब 1:45 बजे ब्लिंकिट के पैरामेडिक ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर मलबे पर चढ़ चुके थे।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत देश का एम्बुलेंस बेड़ा पिछले साल बढ़ा नहीं, घटा।
17वीं कॉमन रिव्यू मिशन की रिपोर्ट में दर्ज है कि एनएचएम-एमआईएस की जून 2025 की रिपोर्ट के अनुसार 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मिशन के तहत 28,321 एम्बुलेंस चल रही थीं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार जून 2024 का आँकड़ा 28,830 था।
वह डेढ़ घंटा, दो घड़ियों में

द प्रिंट के ब्योरे में पहली गाड़ी बुकिंग के मिनटों के भीतर पहुँची, और अगले डेढ़ घंटे में ब्लिंकिट की क़रीब नौ और एम्बुलेंस मौक़े पर आईं; लगभग 27 कर्मचारी इस काम में लगे। उन्होंने ऑक्सीजन, प्राथमिक उपचार और अस्पताल तक पहुँचाने का काम किया।
द ट्रिब्यून का समय इससे थोड़ा अलग है। अख़बार से बात करने वाली कर्मचारी श्रुति ने कहा कि पहला अलर्ट ऐप से मिला और सफ़दरजंग अस्पताल पर तैनात एम्बुलेंस तुरंत सत्य निकेतन की ओर भेजी गई। क्लस्टर मैनेजर अर्चना सुरमा ने ट्रिब्यून को बताया कि पहली कॉल क़रीब 1:40 बजे आई और टीम क़रीब 1:50 बजे मौक़े पर पहुँच गई।
दोनों समय-क्रम यहाँ जैसे के तैसे दर्ज हैं, क्योंकि आपातकालीन सेवा में समय ही एकमात्र पैमाना है।
जो किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं
दिल्ली सरकार की एम्बुलेंस सेवा कैट्स भी मौक़े पर पहुँची थी। इंडियन एक्सप्रेस ने यह लिखा है। किस समय पहुँची, यह किसी भी रिपोर्ट में नहीं है, न पुलिस के हवाले से, न सरकार के।
इसका मतलब यह नहीं कि वह देर से पहुँची। इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि उस दोपहर की सरकारी घड़ी सार्वजनिक नहीं है, जबकि निजी कंपनी की घड़ी उसके कर्मचारियों के बयानों से बाहर आ गई। इमारत, उसके मालिक और उस पर लागू होने वाले नियमों का ब्योरा सत्य निकेतन पर आज का लेख में अलग से है।
ऐप से आने वाली एम्बुलेंस में क्या होता है
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ ब्लिंकिट के पास इस समय 63 एम्बुलेंस हैं। कंपनी औसतन नौ मिनट में पहुँचने का दावा करती है। सेवा गुड़गाँव और दिल्ली-एनसीआर के कुछ हिस्सों में है, और अभी मुफ़्त है।
गाड़ी में ऑक्सीजन और एईडी होता है, यानी वह उपकरण जो रुके हुए दिल को बिजली का झटका देकर फिर चलाने की कोशिश करता है।
एक शर्त भी है: मरीज़ को 30 किलोमीटर के दायरे में किसी अस्पताल तक ले जाया जाता है। मूल कंपनी एटर्नल ने पूछे जाने पर कोई जवाब नहीं दिया।
पाँच गाड़ियों से शुरू हुई एक सेवा
स्टोरीबोर्ड18 के अनुसार यह सेवा गुड़गाँव में पाँच एम्बुलेंस से शुरू हुई थी। पहला साल पूरा होने पर बेड़ा 25 गाड़ियों का था, जो गुड़गाँव, मानेसर और दिल्ली के कुछ इलाक़ों में चलती थीं: लाजपत नगर, मालवीय नगर, पटेल नगर, द्वारका और ग्रेटर कैलाश।
उसी रिपोर्ट में पहले साल के आँकड़े हैं। 4,200 से ज़्यादा कॉल, जिनमें 1,810 समय-संवेदी चिकित्सा आपात स्थितियाँ थीं, और 87 फ़ीसदी मामलों में गाड़ी दस मिनट के भीतर मरीज़ तक पहुँची।
कंपनी के प्रमुख अलबिंदर ढींडसा ने कहा था कि आपातकालीन देखभाल में "लगातार प्रशिक्षण, मज़बूत ढाँचा और सीमित सूचना के साथ तेज़ फ़ैसले लेने की क्षमता" चाहिए।
28,321 का ब्योरा
रिपोर्ट में गिनती इस तरह टूटती है: 3,129 उन्नत जीवन-रक्षक यानी एएलएस, 15,251 आधारभूत जीवन-रक्षक यानी बीएलएस, 3,926 रोगी-परिवहन वाहन, 19 नाव एम्बुलेंस, 81 बाइक एम्बुलेंस और 5,915 अन्य श्रेणी की गाड़ियाँ।
पूरे देश के लिए एएलएस गाड़ियाँ तीन हज़ार से कुछ ऊपर हैं। दिल की धड़कन पर नज़र रखने वाले उपकरण, दवाइयाँ और गंभीर मरीज़ को अस्पताल तक ज़िंदा पहुँचाने का सामान इसी श्रेणी में होना चाहिए।
एएलएस, बीएलएस और वह गाड़ी जो सिर्फ़ ले जाती है

एएलएस का मतलब है ऐसी गाड़ी जिसमें उन्नत जीवन-रक्षक सुविधाएँ हों: निगरानी उपकरण, ऑक्सीजन और दवाओं के साथ प्रशिक्षित स्टाफ़, ताकि रास्ते में ही इलाज शुरू हो सके। बीएलएस में बुनियादी चीज़ें होती हैं, इलाज कम और सुरक्षित परिवहन ज़्यादा।
तीसरी श्रेणी, रोगी-परिवहन वाहन, इलाज के लिए बनी ही नहीं है। वह मरीज़ को लाने-ले जाने का साधन है।
रिपोर्ट की समीक्षा टीमों ने पाया कि बीएलएस गाड़ियाँ आमतौर पर एएलएस से ज़्यादा उपलब्ध थीं। यह बात मानदंड के हिसाब से स्वाभाविक है, पर इसका असर वहाँ दिखता है जहाँ मरीज़ को रास्ते में ही इलाज की ज़रूरत हो।
मानदंड, और उससे दूरी
केंद्र राज्यों को जिस मानदंड पर सहायता देता है, वह रिपोर्ट में साफ़ लिखा है: पाँच लाख की आबादी पर एक एएलएस एम्बुलेंस और एक लाख की आबादी पर एक बीएलएस।
यह सहायता का पैमाना है, गारंटी नहीं। राज्य अपनी कार्यक्रम कार्यान्वयन योजना में जितनी गाड़ियाँ माँगते हैं और जितनी उनके संसाधन में आती हैं, उतनी ही मिलती हैं।
नतीजा यह कि एक ही मानदंड पर बना बेड़ा राज्यों में अलग-अलग दिखता है, और रिपोर्ट में यह असमानता भूगोल और आबादी के घनत्व से जुड़ी बताई गई है।
बेड़ा घटने का मतलब
रिपोर्ट में इस गिरावट का कारण अलग से नहीं दिया गया, पर उसी रिपोर्ट में एक वाक्य इस दिशा में इशारा करता है: कई राज्यों में पुराने पड़ चुके बेड़े, बदलने में देरी और ख़राब या ठीक से रखरखाव न होने वाले वाहन देखे गए।
गाड़ी हटती है तो गिनती से निकल जाती है, और उसकी जगह नई गाड़ी उसी साल आए, यह ज़रूरी नहीं। सिफ़ारिशों में इसीलिए लिखा गया कि राज्य व्यवस्थित ख़रीद और वाहन-निष्कासन नीति से पुरानी और बेकार गाड़ियाँ बदलें।
108 और 102 एक ही नंबर के दो रूप नहीं हैं
रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत की एम्बुलेंस सेवाओं की शुरुआत 1991 में कैट्स से हुई, और 2012 में यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राष्ट्रीय एम्बुलेंस सेवा बनी।
108 मुख्यतः गंभीर हालत के मरीज़ों, चोट और दुर्घटना के शिकार लोगों के लिए है। 102 में बुनियादी रोगी-परिवहन आता है, जिसका मक़सद गर्भवती महिलाओं, बच्चों और उन जैसी ज़रूरतों को पूरा करना है।
यह फ़र्क़ काग़ज़ का नहीं है। सत्य निकेतन जैसी जगह पर जो चाहिए, वह 108 की श्रेणी है। दिल्ली का सरकारी नंबर 102 है, और 2015 के आँकड़ों में दिल्ली के पास 108 की एक भी गाड़ी नहीं थी।
सत्रह राज्य, चौंतीस ज़िले
17वीं कॉमन रिव्यू मिशन ने 17 राज्यों का दौरा किया: आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, नगालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड। हर राज्य में दो ज़िले, यानी कुल 34 ज़िले।
हर राज्य में 10 से 13 सदस्यों की टीम गई, जिसमें स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी, नीति आयोग और दूसरे मंत्रालयों के प्रतिनिधि, तथा एनएचएसआरसी, पीजीआईएमईआर और एम्स समेत संस्थानों के जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ थे।
इस सूची में दिल्ली नहीं है। जिस समीक्षा से देश की एम्बुलेंस व्यवस्था की तस्वीर बनती है, उसने राजधानी को देखा ही नहीं।
गाड़ियाँ कहाँ हैं और कहाँ नहीं
रिपोर्ट का पहला निष्कर्ष उपलब्धता और वितरण पर है। 102 और 108 के नेटवर्क ज़्यादातर राज्यों में चल रहे थे, केंद्रीकृत कॉल सेंटरों के सहारे, और अक्सर सार्वजनिक-निजी भागीदारी के मॉडल पर।
वितरण असमान था। कुछ राज्यों ने विशेष मॉडल भी शुरू किए हैं: फ़ीडर एम्बुलेंस, नदी वाले इलाक़ों में नाव एम्बुलेंस और नवजात शिशुओं के लिए अलग परिवहन इकाइयाँ।
छत्तीसगढ़ का उदाहरण बताता है कि गिनती कितनी बिखरी होती है। कांकेर ज़िले की 70 एम्बुलेंस में 12 '108' की थीं, 16 '102' की, 10 '1099' की, 30 विभागीय और दो मोबाइल मेडिकल यूनिट।
पहुँचने में कितना समय
रिपोर्ट कहती है कि प्रतिक्रिया समय राज्यों और ज़िलों में बहुत अलग-अलग है, और यह मुख्यतः भूगोल, इलाक़े की बनावट और गाड़ियों की तैनाती से तय होता है।
शहरी इलाक़ों में समय कम है। ग्रामीण, आदिवासी और पहाड़ी इलाक़ों में ज़्यादा। रात के समय कुछ जगहों पर प्रतिक्रिया और धीमी थी, क्योंकि उस वक़्त गाड़ियों की तैनाती सीमित रहती है।
बिहार के सारण ज़िले का ब्योरा इसे ठोस बनाता है: वहाँ एएलएस और बीएलएस गाड़ियाँ औसतन दिन में साढ़े तीन चक्कर लगाती थीं और सौ किलोमीटर तक चलती थीं। ज़िला अस्पताल के पास तीन एएलएस और चार बीएलएस थीं।
गाड़ी के भीतर क्या नहीं मिला
तीसरा निष्कर्ष उपकरणों पर है। कुछ एम्बुलेंस में उन्नत जीवन-रक्षक सुविधाएँ, निगरानी उपकरण, नवजात परिवहन का सामान और ज़रूरी जाँच-उपकरण नहीं थे।
नियमित जाँच, रखरखाव और सामान की भरपाई हर जगह एक तरह से नहीं हो रही थी। इसका मतलब यह भी है कि काग़ज़ पर जो गाड़ी एएलएस है, वह ज़मीन पर उस श्रेणी का काम कर पाएगी या नहीं, यह उसमें रखे सामान पर निर्भर करता है।
सिफ़ारिश में इसीलिए कहा गया कि सभी श्रेणियों की गाड़ियों में ज़रूरी उपकरण और आपातकालीन दवाइयाँ एक समान उपलब्ध हों।
पीछे बैठा कौन है
प्रशिक्षित आपातकालीन चिकित्सा तकनीशियन यानी ईएमटी की कमी को रिपोर्ट कई राज्यों में बार-बार आने वाली दिक़्क़त बताती है। कुछ इलाक़ों में एम्बुलेंस पर्याप्त चिकित्सकीय सहायता के बिना चलती हैं और चालक अकेले ही मरीज़ को ले जाते हैं।
जहाँ ईएमटी मौजूद थे, वहाँ भी कौशल में अंतर मिला: चोट के प्रबंधन, नवजात शिशु के स्थानांतरण, उन्नत पुनर्जीवन और आपात स्थिति में फ़ैसला लेने में।
महाराष्ट्र में टीम ने देखा कि एम्बुलेंस पर प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारी ही ईएमटी की भूमिका निभा रहा था। नंदुरबार की टीम ने बताया कि चिकित्सा अधिकारी न मिलने से गाड़ियाँ चालू रखने में दिक़्क़त आती है, और सुझाव दिया कि उनकी जगह ईएमटी तैनात किए जाएँ।
धड़गाँव में जो हुआ
महाराष्ट्र में सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर 233 एएलएस और 703 बीएलएस एम्बुलेंस थीं। नंदुरबार ज़िले के हिस्से में तीन एएलएस और 11 बीएलएस आईं, सातारा के हिस्से में छह एएलएस और 26 बीएलएस। नंदुरबार जैसे आदिवासी ज़िले में गाड़ियों की यह संख्या पहाड़ी रास्तों पर लगने वाले समय के साथ पढ़ी जानी चाहिए, क्योंकि एक चक्कर पूरा होने में जितनी देर लगती है, उतनी देर वह गाड़ी किसी और के काम की नहीं रहती। रिपोर्ट में धड़गाँव जैसे दुर्गम आदिवासी ब्लॉक का ज़िक्र है, जहाँ भौगोलिक कठिनाई की वजह से एम्बुलेंस की उपलब्धता में अंतर दिखा। और फिर वह वाक्य आता है जो पूरी व्यवस्था का हाल एक झटके में बता देता है: ऐसे मामले देखे गए जहाँ तालुका स्वास्थ्य अधिकारी को अपने निजी पैसे से आशा कार्यकर्ताओं को निजी वाहन किराये पर लेने के लिए देना पड़ा, ताकि मरीज़ पहुँच सकें, क्योंकि सरकारी एम्बुलेंस तक पहुँच नहीं थी।
जीपीएस पर दो अलग गिनतियाँ
रिपोर्ट का पाँचवाँ निष्कर्ष निगरानी पर है: जीपीएस ट्रैकिंग और केंद्रीकृत निगरानी व्यवस्था कुछ राज्यों में लागू है, पर उसकी पहुँच और कार्यशीलता असंगत है।
राज्यवार अध्यायों में यह अंतर दिखता है। बिहार के सारण में सभी एम्बुलेंस जीपीएस से जुड़ी थीं, उत्तराखंड की सेवा 112 से जुड़ी थी और उसकी सभी गाड़ियाँ जीपीएस-युक्त। छत्तीसगढ़ के एक ज़िले में केंद्रीकृत कॉल सेंटर तो था, पर जीपीएस और केंद्रीकृत ट्रैकिंग नहीं।
इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि जाँचे गए 34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 13 के पास जीपीएस नहीं था या सिर्फ़ थोड़ी गाड़ियों में था। रिपोर्ट ख़ुद कहती है कि मिशन ने 17 राज्यों का दौरा किया। ये दोनों गिनतियाँ आपस में नहीं बैठतीं, और यहाँ दोनों जैसी हैं वैसी दर्ज हैं।
मुफ़्त सेवा, कम इस्तेमाल
छठा निष्कर्ष सबसे उलटा दिखने वाला है। मुफ़्त एम्बुलेंस सेवा उपलब्ध होने के बावजूद कई इलाक़ों में उसका इस्तेमाल कम है।
रिपोर्ट तीन वजहें गिनाती है: जानकारी की कमी, पहुँच में अड़चनें, और देरी की धारणा। इन्हीं की वजह से मरीज़ निजी साधन पर लौट जाते हैं। आपातकालीन हेल्पलाइन और परिवहन के हक़ के बारे में जानकारी समुदायों में बहुत अलग-अलग मिली।
बिहार के अध्याय में एक और बात है: निजी एम्बुलेंस भी सक्रिय थीं, पर उनका सरकारी व्यवस्था से जुड़ाव और नियमन कमज़ोर था। सत्य निकेतन की दोपहर इसी वाक्य का शहरी रूप है।
दिल्ली का अपना बेड़ा

15 अप्रैल 2026 को दिल्ली सरकार ने बुज़ुर्गों के लिए 20 उन्नत एम्बुलेंस जोड़ीं। इसके साथ कैट्स का बेड़ा 331 से बढ़कर 351 हो गया। सेवा का टोल-फ़्री नंबर 102 है और यह 112 आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली से जुड़ी है।
स्वास्थ्य मंत्री पंकज कुमार सिंह ने उस दिन कहा था कि सरकार ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था बनाना चाहती है जो "समावेशी हो और हर नागरिक की, ख़ासकर हमारी बुज़ुर्ग आबादी की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील हो"। सरकार ने चरणबद्ध तरीक़े से बेड़े को 1,000 गाड़ियों तक ले जाने की बात कही है।
आँकड़ा 351 है, लक्ष्य 1,000। बीच का रास्ता कितने चरणों में और किस समयसीमा में तय होगा, यह घोषणा में नहीं था।
2015 का वह काग़ज़ जिसमें दिल्ली के 120 वाहन थे
6 फ़रवरी 2018 को स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने लोकसभा में लिखित उत्तर के साथ चार तालिकाएँ रखीं। मार्च 2015 की तालिका में मिशन के तहत देश में कुल 21,752 एम्बुलेंस थीं: 108 की 7,361, 102/104 की 8,147 और सूचीबद्ध अन्य रोगी-परिवहन वाहन 6,244।
उसी तालिका में दिल्ली की पंक्ति इस तरह है: 108 में शून्य, 102/104 में 120, अन्य में शून्य, कुल 120।
सितंबर 2017 तक देश का आँकड़ा 23,989 हो चुका था और दिल्ली का 265, फिर भी सब 102/104 के ख़ाने में। ग्यारह साल की दूरी से देखें तो देश का बेड़ा 21,752 से 28,321 हुआ है, और दिल्ली का 120 से 351।
वह वाक्य जो सरकार ने ख़ुद लिखा
उसी 2018 के उत्तर में एक पंक्ति ऐसी है जो तालिकाओं से बड़ी है। मंत्रालय ने लिखा कि आपात स्थिति में, ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों में, एम्बुलेंस सेवा उपलब्ध न होने के कारण कितने लोगों की मौत हुई, इसका आँकड़ा केंद्रीय स्तर पर रखा ही नहीं जाता।
बेड़े का आकार दर्ज होता है। बेड़े के न पहुँचने का नतीजा दर्ज नहीं होता।
उसी उत्तर में यह भी दर्ज है कि स्वास्थ्य और अस्पताल राज्य का विषय होने के कारण गंभीर देखभाल समेत एम्बुलेंस सेवाएँ देने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की है।
बाज़ार का आकार, और पंजीकरण की गिनती
प्राइमस पार्टनर्स के अनुमान के अनुसार भारत का एम्बुलेंस बाज़ार 2022 में 1.5 अरब डॉलर का था, और 2024 से 2028 के बीच इसकी सालाना वृद्धि दर 5.12 फ़ीसदी रहने का अनुमान है।
वाहन पोर्टल पर एम्बुलेंस के पंजीकरण की गिनती इस अनुमान से अलग चाल चलती है। 2020 में 7,814, 2021 में 14,236, 2022 में 12,737 और 2023 में 11,950।
2021 के बाद पंजीकरण लगातार दो साल घटे हैं, और सरकारी बेड़े की गिनती भी बाद में उसी दिशा में गई।
निजी गाड़ी की जगह
एनएचएम की व्यवस्था में निजी वाहन पहले से मौजूद हैं, पर एक अलग रूप में। 2018 की तालिकाओं में एक पूरा ख़ाना "अन्य रोगी-परिवहन वाहन (सूचीबद्ध)" का है, यानी वे गाड़ियाँ जिन्हें सरकार अपने पैनल में लेकर चलाती है; मार्च 2015 में देश भर में उनकी संख्या 6,244 थी।
अब एक और रूप आया है, जिसमें कंपनी न सूचीबद्ध है, न ठेके पर, न मानदंड के दायरे में। वह अपनी गाड़ी, अपना कर्मचारी और अपना ऐप लेकर उसी सड़क पर है।
रिपोर्ट की सिफ़ारिशों में एक पंक्ति इसी बिंदु को छूती है: राज्य सुनिश्चित करें कि हर चालू एम्बुलेंस में प्रशिक्षित ईएमटी हो। निजी बेड़े पर यह शर्त किस क़ानून से लागू होगी, यह तय नहीं है।
सत्य निकेतन से जो सवाल बचता है
उस दोपहर मलबे के पास जो हुआ, उसमें दो व्यवस्थाएँ आमने-सामने नहीं थीं। छात्र, स्थानीय लोग, पुलिस, एनडीआरएफ़ और दोनों तरह की एम्बुलेंस एक ही जगह काम कर रही थीं।
जो चीज़ें अब भी दर्ज नहीं हैं, वे यही हैं: कैट्स की गाड़ी कितने बजे पहुँची, कितने घायलों को किस गाड़ी ने ले जाया, और उस डेढ़ घंटे में कुल कितनी एम्बुलेंस मौक़े पर थीं। इनमें से किसी का जवाब अभी सार्वजनिक नहीं है।
जो दर्ज है, वह यह है कि पाँच लाख की आबादी पर एक एएलएस के मानदंड वाले देश में एएलएस गाड़ियों की कुल संख्या 3,129 है, और बेड़ा उस साल घटा है जिस साल एक किराना कंपनी ने अपना बेड़ा 63 तक पहुँचाया।
स्रोतद प्रिंट, सत्य निकेतन में बचाव कार्य का ब्योरा, 6 सितंबर 2026, द ट्रिब्यून, ब्लिंकिट कर्मियों के बयान और अलग समय, 17वीं कॉमन रिव्यू मिशन रिपोर्ट, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र, नवंबर 2025 (मूल दस्तावेज़), पीआईबी, स्वास्थ्य मंत्रालय का लोकसभा में लिखित उत्तर, 6 फ़रवरी 2018, द न्यूज़मिल, दिल्ली में 20 वृद्ध-एम्बुलेंस और कैट्स का बेड़ा, 15 अप्रैल 2026, स्टोरीबोर्ड18, ब्लिंकिट एम्बुलेंस सेवा के पहले साल के आँकड़े, प्राइमस पार्टनर्स का दस्तावेज़, बाज़ार का अनुमान और वाहन पंजीकरण के आँकड़े