81 करोड़ लोग भूखे हैं, यह इस आँकड़े का मतलब नहीं है, और यही सबसे ज़्यादा दोहराया जाता है
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम गाँव की 75 फ़ीसदी और शहर की 50 फ़ीसदी आबादी तक जाता है। यह ऊपरी सीमा है, गिनती नहीं। और यह सीमा 2011-12 की आबादी पर बैठाई गई थी।
सहकारिता मंत्रालय की एक विज्ञप्ति में एक वाक्य ऐसा है जो हर जगह दोहराया जाता है।
भारत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाता है, जिसके दायरे में लगभग 80 करोड़ लोग आते हैं।
यह संख्या सही है। पर इसका वह मतलब नहीं है जो आमतौर पर निकाला जाता है।
यह गिनती नहीं है
अधिनियम में लाभार्थियों की संख्या तय नहीं की गई थी। उसमें हिस्सा तय किया गया था।
क़ानून कहता है कि यह व्यवस्था ग्रामीण आबादी के 75 फ़ीसदी तक और शहरी आबादी के 50 फ़ीसदी तक जा सकती है। इन दोनों को मिलाकर देश की लगभग दो-तिहाई आबादी बनती है।
यानी संख्या ऊपर से नीचे आई है, नीचे से ऊपर नहीं।
किसी ने यह नहीं गिना कि कितने लोगों को अनाज चाहिए और फिर उतने लोगों को जोड़ा। तय यह हुआ कि आबादी का कितना हिस्सा ढका जाएगा, और फिर उस हिस्से को भरा गया।
इसलिए 81 करोड़ इस बात का माप नहीं है कि कितने लोग अपना खाना नहीं ख़रीद सकते। वह इस बात का माप है कि क़ानून ने कितनी दूर तक जाने की इजाज़त दी।
और वह हिस्सा किस आबादी का
यहाँ दूसरी बात आती है, जो पहली से बड़ी है।
अधिनियम 2013 में बना और उसके प्रतिशत 2011-12 के आँकड़ों पर बैठाए गए थे। तब की जनगणना 2011 की थी।
उसके बाद जनगणना नहीं हुई। अगली गिनती 2027 की है, और उसकी शुरुआत इसी 1 सितंबर से लद्दाख और बर्फ़ीले इलाक़ों में हुई है।
तो पंद्रह साल पुरानी आबादी पर बैठाया गया प्रतिशत आज भी वही चल रहा है। इस बीच आबादी बढ़ी है, गाँव से शहर की तरफ़ लोग गए हैं, और दोनों के अनुपात बदले हैं।
इसका असर दोनों तरफ़ जाता है। जो लोग इस बीच पैदा हुए या जिनकी हालत बिगड़ी, वे पुराने आँकड़े में नहीं हैं। और जिनकी हालत सुधरी, वे अब भी सूची में हैं।
जो सर्वे इस पर सवाल उठाता है
सांख्यिकी मंत्रालय का घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 बताता है कि घरों का ख़र्च बढ़ा है और खाने पर जाने वाले हिस्से में बदलाव आया है।
यही वजह है कि इस अधिनियम की समीक्षा की बात उठती रहती है। दलील यह होती है कि जो फ़ॉर्मूला 2011-12 के हालात पर बना था, वह आज की हालत नहीं बताता।
⚠ एक बात साफ़ रहनी चाहिए। सर्वे यह नहीं कहता कि 81 करोड़ लोगों को अनाज की ज़रूरत नहीं है। वह ख़र्च का सर्वे है, भूख का नहीं। दोनों एक चीज़ नहीं हैं, और उन्हें एक बनाकर पढ़ना उसी तरह की ग़लती है जैसी 81 करोड़ को भूखों की गिनती समझना।
व्यवस्था के भीतर दो हिस्से
अधिनियम के तहत दो श्रेणियाँ हैं।
अंत्योदय अन्न योजना, जो सबसे ग़रीब घरों के लिए है, और जिसमें लगभग नौ करोड़ लोग आते हैं। और प्राथमिकता वाले परिवार, जिनमें लगभग 72 करोड़।
दोनों को मिलाकर वही 81 करोड़ बनते हैं।
जनवरी 2023 से यह अनाज पूरी तरह मुफ़्त है। उससे पहले अधिनियम में एक मामूली क़ीमत तय थी। मुफ़्त करने का सालाना ख़र्च लगभग दो लाख करोड़ रुपये आँका गया था।
⚠ यह अनुमान सरकारी घोषणा के समय का है। इस लेख के लिए हम मौजूदा साल का असली ख़र्च नहीं जाँच सके, इसलिए वह नहीं दिया जा रहा।
अब अनाज की तरफ़ देखिए
उसी विज्ञप्ति में उत्पादन का आँकड़ा है।
तीसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक़ 2025-26 में देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन 376.563 मिलियन टन रहा। पिछले साल यह 357.732 मिलियन टन था। यानी 18.8 मिलियन टन ज़्यादा, 5.3 फ़ीसदी की बढ़त।
तो अनाज की कमी नहीं है।
सवाल यह है कि वह अनाज रखा कहाँ जाए और वहाँ तक पहुँचे कैसे।

भंडारण, जो तीन साल में यहाँ तक पहुँचा
सहकारी क्षेत्र में विकेंद्रित अनाज भंडारण योजना 31 मई 2023 को शुरू हुई थी। मक़सद यह था कि प्राथमिक कृषि ऋण समितियों, यानी पैक्स, के ज़रिये भंडारण, प्रसंस्करण, ख़रीद और वितरण सुधरे।
शुरुआत 11 राज्यों की चुनी हुई समितियों में प्रायोगिक परियोजना के तौर पर हुई, कुल 9,750 मीट्रिक टन क्षमता के साथ।
जुलाई 2026 तक देश भर के 313 पैक्स में गोदाम बनकर तैयार हुए हैं, और उनसे 1.80 लाख मीट्रिक टन से ज़्यादा क्षमता बनी है।
अब दोनों संख्याओं को साथ रखिए।
एक साल का उत्पादन 376.563 मिलियन टन है। तीन साल में बनी नई सहकारी भंडारण क्षमता 1.80 लाख मीट्रिक टन है।
हमारी अपनी गणना में यह उस उत्पादन का लगभग 0.05 फ़ीसदी बैठता है।
यह तुलना योजना को नाकाम नहीं ठहराती। यह प्रायोगिक योजना है और उसका मक़सद पूरे देश का अनाज रखना नहीं था। पर यह बता देती है कि विकेंद्रित भंडारण अभी किस पैमाने पर है।
तो सवाल क्या है
जो सवाल आमतौर पर पूछा जाता है वह यह है कि इतने बड़े देश में 81 करोड़ लोगों को अब भी सरकारी अनाज की ज़रूरत क्यों है।
दस्तावेज़ों से जो निकलता है वह यह है कि यह सवाल अपने भीतर एक ग़लत मान्यता लिए हुए है।
81 करोड़ ज़रूरत की गिनती नहीं है। वह एक फ़ॉर्मूले का नतीजा है, जो 75 और 50 के प्रतिशत से निकला और पंद्रह साल पुरानी आबादी पर बैठा हुआ है।
असली सवाल दूसरे हैं, और वे ज़्यादा मुश्किल हैं।
आज की आबादी में कितने लोग ऐसे हैं जो बिना इस अनाज के अपना खाना नहीं जुटा पाएँगे। यह आँकड़ा किसी एक जगह प्रकाशित नहीं मिलता।
सूची में कितने ऐसे हैं जिन्हें अब ज़रूरत नहीं, और कितने ऐसे बाहर हैं जिन्हें है। यह भी नहीं मिलता, और यह तब तक नहीं मिलेगा जब तक नई जनगणना के आँकड़े नहीं आते।
और तीसरा, जो सबसे कम पूछा जाता है। अनाज पैदा तो हो रहा है, पर उसे रखने और आख़िरी दुकान तक पहुँचाने का ढाँचा किस हाल में है।
इन तीनों में से किसी का जवाब 81 करोड़ नहीं है।
स्रोतसहकारिता मंत्रालय, विकेंद्रित अनाज भंडारण योजना पर विज्ञप्ति, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013, एमओएसपीआई, घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24