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एनएफ़एचएस-6 ने हीमोग्लोबिन नापा ही नहीं: 131 सूचकांक घटकर 101 रह गए

29 मई 2026 को जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के छठे दौर की 182 पन्नों की फ़ैक्ट शीट में एनीमिया और हीमोग्लोबिन, दोनों शब्द एक बार भी नहीं आते। बायोमार्कर शेड्यूल में ऊँचाई, वज़न, रक्तचाप, रैंडम ब्लड शुगर और उँगली से लिए ख़ून की एचआईवी तथा हेपेटाइटिस जाँच है। ख़ून की कमी उसमें नहीं है। उसी सर्वेक्षण से शिशु मृत्यु दर, नवजात मृत्यु दर और पाँच साल से कम उम्र की मृत्यु दर भी ग़ायब हैं।

दस्ताने पहने एक स्वास्थ्यकर्मी लैंसेट से उँगली चुभोकर ख़ून की बूँद ले रहा है, ताकि हीमोग्लोबिन का स्तर नापा जा सके; यह तस्वीर अमेरिकी रेड क्रॉस के बोस्टन रक्तदान केंद्र की है, नवंबर 2013 की
तस्वीर: Whoisjohngalt, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

29 मई 2026 को अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के छठे दौर की फ़ैक्ट शीट जारी कीं। 182 पन्ने। भारत का एक पन्ना, और मणिपुर को छोड़कर हर राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश के अलग-अलग पन्ने।

पूरे संकलन में एनीमिया और हीमोग्लोबिन, इन दोनों शब्दों की अंग्रेज़ी वर्तनियाँ मिलाकर चार, एक बार भी नहीं आतीं। शून्य बार।

सर्वेक्षण छोटा नहीं था। 6,79,238 घर, 7,16,397 महिलाएँ, 1,00,977 पुरुष, दो चरणों में 28 मई 2023 से 31 दिसंबर 2024 तक 27 फ़ील्ड एजेंसियों का काम। बायोमार्कर शेड्यूल भी ख़ाली नहीं था। ख़ून की कमी बस उसमें नहीं थी।

बायोमार्कर शेड्यूल में क्या-क्या था

एनएफ़एचएस-6 में चार प्रश्नावलियाँ चलीं: घरेलू, महिला, पुरुष और बायोमार्कर। बायोमार्कर शेड्यूल ने पाँच साल से छोटे बच्चों की लंबाई और वज़न नापे; 15 से 49 बरस की महिलाओं और 15 से 54 बरस के पुरुषों की ऊँचाई और वज़न नापे; और 15 साल से ऊपर के स्त्री-पुरुषों का रक्तचाप तथा रैंडम ब्लड शुगर नापा। इसके आगे उँगली चुभोकर ख़ून की बूँदें भी लीं। यह एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी की प्रयोगशाला जाँच के लिए था। चार और पाँच बरस के बच्चों से हेपेटाइटिस-बी के लिए सूखे ख़ून का धब्बा लिया गया।

यानी सुई चुभी। नमूना भी लिया गया। जो नहीं हुआ, वह हीमोग्लोबिन की गिनती थी।

सर्वेक्षण अपने परिचय में इस बदलाव को घटाव की तरह दर्ज नहीं करता। उलटा, वह लिखता है कि नैदानिक, मानवमितीय और जैवरासायनिक जाँच का दायरा बढ़ाया गया है, और बढ़ोतरी के तौर पर एचआईवी की जाँच का नाम लेता है। उसी परिच्छेद में यह भी दर्ज है कि एनएफ़एचएस-6 की विषय-वस्तु एनएफ़एचएस-5 जैसी ही है ताकि समय के साथ तुलना हो सके। हीमोग्लोबिन के हटने का ज़िक्र वहाँ नहीं है।

एक और वाक्य उसी पन्ने पर है, और वह सर्वेक्षण की अपनी बही में एक नया तथ्य है: एनएफ़एचएस-6 इस श्रृंखला का पहला दौर है जो आईआईपीएस ने किसी बाहरी संस्था की तकनीकी या वित्तीय मदद के बिना कराया। पहले के दौर ऐसे नहीं थे। सर्वेक्षण ख़ुद भी सावधान करता है। फ़ैक्ट शीट में दिए आँकड़े अनंतिम हैं, और कुछ राज्यों के नमूने छोटे होने के कारण रुझान सँभलकर पढ़े जाएँ।

131 से 101: सूची में जो जगह ख़ाली हुई

फ़ैक्ट शीट के शुरू में स्वास्थ्य मंत्रालय के महानिदेशक (सांख्यिकी) का संदेश छपा है। उसमें लिखा है कि राष्ट्रीय और राज्य फ़ैक्ट शीट 101 प्रमुख सूचकांकों के अनुमान देती हैं। एनएफ़एचएस-5 की भारत फ़ैक्ट शीट में यही सूची 131 पर ख़त्म होती थी।

तीस सूचकांक कहाँ गए, यह मिलाकर देखने पर दिखता है। एनएफ़एचएस-5 में क्रम इस तरह था। सूचकांक 86 से 91 तक वयस्कों की पोषण स्थिति थी, यानी महिलाओं तथा पुरुषों का बीएमआई और कमर-कूल्हे का जोखिम भरा अनुपात। उसके ठीक बाद, सूचकांक 92 से 98 तक, एक पूरा खंड था जिसका शीर्षक था बच्चों और वयस्कों में एनीमिया। उसके बाद सूचकांक 99 से ब्लड शुगर शुरू होता था।

एनएफ़एचएस-6 में सूचकांक 74 से 77 तक वयस्कों की पोषण स्थिति है। कमर-कूल्हे के दोनों सूचकांक उसमें नहीं हैं। और सूचकांक 78 पर सीधे ब्लड शुगर शुरू हो जाता है। बीच का पूरा खंड, शीर्षक समेत, तालिका से उठा लिया गया है।

जनगणना का एक कर्मचारी खेत में खड़े होकर अनुसूची भर रहा है, पश्चिम सिक्किम में रिनचेनपोंग के पास परेनगाँव में, मई 2010; यह तस्वीर 2011 की जनगणना की है, एनएफ़एचएस की नहीं, पर सूचकांक ऐसी ही किसी मुलाक़ात में दर्ज होता है या नहीं होता
तस्वीर: Ministry of Statistics and Programme Implementation, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

अकेला वही खंड नहीं गया। एनएफ़एचएस-5 में सूचकांक 25, 26 और 27 नवजात मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर और पाँच साल से कम उम्र की मृत्यु दर थे, क्रमशः 24.9, 35.2 और 41.9। एनएफ़एचएस-6 की फ़ैक्ट शीट में ये तीनों पद ढूँढ़ने पर कहीं नहीं मिलते। लिंगानुपात भी नहीं मिलता, न कुल आबादी का, न जन्म के समय का। खाना पकाने के साफ़ ईंधन वाला सूचकांक भी नहीं है, न गर्भाशय-ग्रीवा के कैंसर की जाँच वाला।

कुछ चीज़ें बची रहीं, और उनका बचना ही ख़ास है। कुल प्रजनन दर सूचकांक 18 पर है। संस्थागत प्रसव सूचकांक 35 पर है। और सूचकांक 32 तथा 33 वही दो हैं जिन पर एनीमिया मुक्त भारत का पूरा तर्क टिका है। गर्भावस्था में 100 दिन या उससे ज़्यादा आयरन फ़ोलिक एसिड लेने वाली माँएँ 54.9 फ़ीसदी हैं, और 180 दिन या उससे ज़्यादा लेने वाली माँएँ 37.8 फ़ीसदी।

गोली कितनों तक पहुँची, यह अब भी नापा जा रहा है। गोली से ख़ून में क्या हुआ, यह नहीं।

नवंबर 1998, हीमोक्यू और पहली बार

एनएफ़एचएस-1 का फ़ील्डवर्क अप्रैल 1992 से सितंबर 1993 तक चला। उसमें तीन प्रश्नावलियाँ थीं: घरेलू, महिला और गाँव। कोई बायोमार्कर औज़ार नहीं था। बच्चों की लंबाई और वज़न नापे गए थे, ख़ून नहीं लिया गया था।

पहली बार ख़ून एनएफ़एचएस-2 में लिया गया, जिसका फ़ील्डवर्क दो चरणों में नवंबर 1998 और मार्च 1999 में शुरू हुआ। उसकी भारत रिपोर्ट के पहले अध्याय में यह बात साफ़ शब्दों में दर्ज है: कभी विवाहित रहीं महिलाओं और उनके तीन साल से छोटे बच्चों के ख़ून में हीमोग्लोबिन का स्तर हीमोक्यू यंत्र से जाँचा गया, और इन जाँचों के ज़रिए सर्वेक्षण पहली बार पूरे भारत में एनीमिया के प्रसार की जानकारी देता है।

पहली बार। 1998 में। आज से 27 बरस पहले, तीन दशक पहले नहीं।

उससे पहले का देशव्यापी आँकड़ा माप नहीं, संकलन था। एनएफ़एचएस-2 की रिपोर्ट अपने पोषण अध्याय में जो पुराना आँकड़ा देती है, उसका स्रोत एक शोध-संकलन है। भारत में एनीमिया अनुमानतः आधी आबादी को छूता है, शेषाद्रि 1998 के हवाले से। उसी अध्याय में यह भी लिखा है कि एनीमिया की जाँच और पकाने के नमक में आयोडीन की जाँच, ये दो परीक्षण एनएफ़एचएस-2 में पहली बार जोड़े गए।

रिपोर्ट में पैसे का ज़िक्र भी है। अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी ने ओआरसी मैक्रो के ज़रिए इसे वित्त दिया, और पोषण वाले हिस्सों के लिए अतिरिक्त पैसा यूनिसेफ़ ने दिया। जिस दौर में हीमोग्लोबिन की जाँच आई, उसके पोषण घटक का ख़र्च यूनिसेफ़ ने उठाया था। जिस दौर में वह गई, वह इस श्रृंखला का पहला दौर है जिसमें कोई बाहरी मदद नहीं थी। ये दोनों वाक्य दो अलग सरकारी दस्तावेज़ों से हैं और दोनों तारीख़ के तथ्य हैं; इनमें से किसी में कारण नहीं लिखा।

चार दौर के आँकड़े, और उन्हें आपस में मिलाने की अड़चनें

चार दौर में जो निकला, वह सीधी रेखा नहीं है।

दौरफ़ील्डवर्कमहिलाएँ 15-49बच्चे 6-59 माहपुरुष 15-49
एनएफ़एचएस-2नवंबर 1998 से51.8 (सिर्फ़ कभी-विवाहित)74.3 (6-35 माह)नापा नहीं गया
एनएफ़एचएस-32005-0655.369.524.2
एनएफ़एचएस-42015-1653.158.622.7
एनएफ़एचएस-52019-2157.067.125.0
एनएफ़एचएस-62023-24नापा नहीं गयानापा नहीं गयानापा नहीं गया

तीन जगह ये आँकड़े आपस में ही नहीं मिलते। बच्चों के लिए एनएफ़एचएस-3 का आँकड़ा उसकी अपनी तालिका में 69.5 है और एनएफ़एचएस-4 की फ़ैक्ट शीट के तुलना स्तंभ में 69.4। एनएफ़एचएस-4 के बच्चों का आँकड़ा अलग-अलग जगह तीन रूपों में छपा है: 58.6, 58.5 और 58.4। दोनों फ़ैक्ट शीटों में वह 58.6 है, यानी एनएफ़एचएस-4 की अपनी और एनएफ़एचएस-5 के तुलना स्तंभ में। स्क्रॉल पर 16 सितंबर को छपे लेख में वही आँकड़ा 58.4 है।

तीसरा झगड़ा परिभाषा का है और सबसे ज़्यादा जगह पाता है। एनएफ़एचएस-5 का सूचकांक 93 गर्भवती को छोड़कर बाक़ी महिलाओं का है और 57.2 फ़ीसदी है; सूचकांक 95 सब महिलाओं का है और 57.0 फ़ीसदी है। एनीमिया मुक्त भारत की वेबसाइट के अपने विवरण में 57.2 फ़ीसदी को प्रजनन आयु की महिलाओं का आँकड़ा बताया गया है, जो एनएफ़एचएस-5 में 57.0 है। लोकसभा के 24 जुलाई 2026 के उत्तर में सरकार ने 57 फ़ीसदी कहा।

चौथी उलझन श्रृंखला के भीतर ही है। एनएफ़एचएस-2 ने सिर्फ़ कभी-विवाहित महिलाओं का ख़ून जाँचा था, और बच्चों में भी सिर्फ़ तीन साल से छोटों का। बाद के दौरों में दायरा 15 से 49 बरस की सब महिलाओं और छह से 59 माह के बच्चों तक फैल गया। पहली संख्या और बाक़ी संख्याएँ एक ही आबादी नहीं नापतीं।

उँगली की चुभन बनाम नस का ख़ून

एनएफ़एचएस-5 की भारत फ़ैक्ट शीट में एनीमिया के सातों सूचकांकों पर एक ही फ़ुटनोट लगा है, संख्या 22। उसमें ऊँचाई और धूम्रपान के हिसाब से समायोजन की सामान्य बात के बाद एक वाक्य और है: चूँकि एनएफ़एचएस एनीमिया के आकलन के लिए केशिका ख़ून का इस्तेमाल करता है, इसलिए एनएफ़एचएस-5 के नतीजों की तुलना नस से लिए गए ख़ून वाले दूसरे सर्वेक्षणों से करने की ज़रूरत नहीं है।

एनएफ़एचएस-4 की फ़ैक्ट शीट में एनीमिया के पाँच सूचकांकों पर फ़ुटनोट 15 है। वह समायोजन की उसी बात पर ख़त्म हो जाता है। चेतावनी वाला वाक्य उसमें नहीं है। यह वाक्य एनएफ़एचएस-5 में जुड़ा, यानी उसी दौर में जिसने आख़िरी बार यह चीज़ नापी।

दूसरी तरफ़ का दस्तावेज़ भी वही कहता है, उलटी दिशा से। व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण, यानी सीएनएनएस, ने 2016-18 में नस से ख़ून लिया और प्रयोगशाला में स्वचालित काउंटर पर साइनमेटहीमोग्लोबिन विधि से हीमोग्लोबिन नापा। उसकी भारत फ़ैक्ट शीट में एक से चार बरस के बच्चों में एनीमिया 40.6 फ़ीसदी है, पाँच से नौ बरस में 23.5 और दस से उन्नीस बरस के किशोरों में 28.4। उसी पन्ने पर फ़ुटनोट 4 पाठक से कहता है कि ये अनुमान भारत के उन बड़े सर्वेक्षणों से सीधे तुलनीय नहीं हैं जो हीमोक्यू पर केशिका ख़ून से एनीमिया आँकते हैं।

दो सरकारी दस्तावेज़, दोनों पाठक को दूसरे से न मिलाने की हिदायत देते हुए।

किसी अस्पताल की प्रयोगशाला में लगा एक स्वचालित रक्त-गणना यंत्र और उसके बग़ल में वैक्यूटेनर नलियों का रैक, मार्च 2019 की तस्वीर, जो भारत की नहीं है; सीएनएनएस ने नस से लिया ख़ून ऐसे ही किसी यंत्र पर नापा था
तस्वीर: Ptrump16, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

यह सवाल नया नहीं है। एनएफ़एचएस-2 की भारत रिपोर्ट के सातवें अध्याय में हीमोक्यू पर दो फ़ुटनोट हैं। पहला बताता है कि यह यंत्र दुनिया भर में केशिका ख़ून से हीमोग्लोबिन आँकने के लिए इस्तेमाल होता रहा है और नस के नमूनों पर इसके नतीजे प्रयोगशाला के बड़े यंत्रों जैसे ही सटीक पाए गए हैं। फिर वह जोड़ता है कि भारत में हुए एक छोटे अध्ययन, प्रकाश और अन्य 1999, में हीमोक्यू ने मानक ब्लड सेल काउंटर के मुक़ाबले हीमोग्लोबिन के कुछ ऊँचे अनुमान दिए। दूसरा फ़ुटनोट प्रक्रिया बताता है: पहली दो-तीन बूँदें पोंछ दी जाती हैं ताकि नमूना ताज़ा केशिका ख़ून का ही रहे, इसलिए क्यूवेट में असल में तीसरी या चौथी बूँद जाती है।

जिस पद्धति-संबंधी शक का हवाला देकर 2026 में जाँच बंद की गई, उसकी तरफ़ वह दौर ख़ुद इशारा कर चुका था जिसने पहली बार जाँच की थी।

डीएलएचएस में यह पहले भी हुआ था

एनएफ़एचएस अकेली श्रृंखला नहीं है जिसने ख़ून नापा और फिर नापना छोड़ा।

ज़िला स्तरीय घरेलू सर्वेक्षण के दूसरे दौर ने, जिसका फ़ील्डवर्क 2002-04 में 593 ज़िलों में हुआ, एक स्वास्थ्य प्रश्नावली जोड़ी थी। उसके तहत 72 माह से छोटे बच्चों, 10 से 19 बरस के किशोरों और गर्भवती महिलाओं का ख़ून लेकर हीमोग्लोबिन का स्तर आँका गया, और इसी पर बच्चों की पोषण स्थिति तथा एनीमिया के प्रसार पर अलग रिपोर्ट निकाली गई।

तीसरे दौर की भारत रिपोर्ट, 2007-08, में यह सब नहीं है। पूरे दस्तावेज़ में हीमोग्लोबिन शब्द एक ही जगह आता है। वह उपस्करों की उस सूची में है जहाँ नसबंदी किट और वैक्सीन कैरियर के साथ हीमोग्लोबिन मीटर गिनाया गया है। एनीमिया शब्द भी सेवा के विवरण में आता है, माप के नतीजे में नहीं।

चौथा दौर उसे वापस लाया। स्वास्थ्य मंत्रालय ने डीएलएचएस-4 में नैदानिक, मानवमितीय और जैवरासायनिक घटक जोड़ा, उसे चलाने का ज़िम्मा राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान को दिया, और 336 ज़िलों में हर छह माह से ऊपर के व्यक्ति के ख़ून की जाँच रखी गई। संस्थान के अपने दस्तावेज़ में इस काम की शुरुआत अगस्त 2012 और समाप्ति फ़रवरी 2014 दर्ज है।

7x7x7, टी-4 और पोर्टल पर छपने वाले पाँच आँकड़े

29 जून 2026 की शाम विज्ञान भवन में, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद की सोलहवीं बैठक में, स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने एनीमिया मुक्त भारत अभियान की संचालन निर्देशिका जारी की। पत्र सूचना कार्यालय की उसी शाम 5 बजकर 49 मिनट पर जारी विज्ञप्ति के शीर्षकों में ही बदलाव दर्ज है: कार्यक्रम एनीमिया मुक्त भारत से एनीमिया मुक्त भारत अभियान हुआ, 6x6x6 का ढाँचा 7x7x7 हुआ, और टी-3 की जगह टी-4 आया।

सातवाँ लाभार्थी समूह कम वज़न के साथ जन्मे शून्य से छह माह के शिशु हैं। सातवाँ हस्तक्षेप सही खानपान है। सातवाँ संस्थागत तंत्र डिजिटल ट्रैकिंग के लिए मज़बूत की गई निगरानी और मूल्यांकन व्यवस्था है। टी-4 का चौथा टी ट्रैक है। जाँचो, इलाज करो, बात करो, फिर पीछा करो। 11 अगस्त 2026 को राज्यसभा में अनुप्रिया पटेल के लिखित उत्तर ने यही सूची दोहराई, और उसका पहला घटक डिजिटल इनवेसिव हीमोग्लोबिनोमीटर से हीमोग्लोबिन जाँच की संतृप्ति है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं का रिकॉर्ड जननी पोर्टल पर, स्कूली बच्चों का आरबीएसके पर, टीकाकरण वाले बच्चों का यू-विन पर, और तीनों एक साझा अभियान पोर्टल में मिलते हैं।

निर्देशिका के मुताबिक़ अब पहले से ज़्यादा हीमोग्लोबिन नापा जाना है। छप क्या रहा है, यह अलग सवाल है।

अभियान के डैशबोर्ड पर पाँच मुख्य निष्पादन सूचकांक हैं, और पन्ना ख़ुद बताता है कि इनके पीछे मानक रिपोर्ट के कौन से आँकड़े हैं। पहला है एचएमआईएस 5.1.2: छह से 59 माह के वे बच्चे जिन्हें आयरन फ़ोलिक एसिड सिरप की आठ से दस ख़ुराकें मिलीं। दूसरा है एचएमआईएस 5.1.3: पाँच से नौ बरस के वे बच्चे जिन्हें महीने में चार से पाँच गोलियाँ मिलीं। तीसरा है एचएमआईएस 12.2.1 और 12.2.3: दस से उन्नीस बरस के किशोर-किशोरियाँ। चौथा है एचएमआईएस 1.2.4: वे गर्भवती महिलाएँ जिन्हें 180 गोलियाँ दी गईं। पाँचवाँ है एचएमआईएस 6.3: प्रसव के बाद 180 गोलियों का पूरा कोर्स पाने वाली माँएँ।

पाँचों में एक भी हीमोग्लोबिन की माप नहीं है। पाँचों गिनते हैं कि कितनों को कितनी गोलियाँ दी गईं।

अंतर सिर्फ़ सैद्धांतिक नहीं है, और डैशबोर्ड के अपने आँकड़े उसे दिखा देते हैं। 19 सितंबर 2026 को पढ़े गए आँकड़ों में, जून 2026 के महीने के लिए, छह से 59 माह के बच्चों का आँकड़ा 44.1 फ़ीसदी है और गर्भवती महिलाओं का 114.2 फ़ीसदी। डैशबोर्ड की 2026 की पहली तिमाही वाली तालिका में गर्भवती महिलाओं का आँकड़ा 113.6 फ़ीसदी है, आंध्र प्रदेश का 156.2 और तेलंगाना का 127.4। सौ से ऊपर का मतलब है कि दी गई गोलियों की गिनती उस अनुमानित संख्या से ज़्यादा है जिससे उसे भाग दिया गया। डैशबोर्ड इस पर दो टिप्पणियाँ रखता है। मासिक और तिमाही तालिकाओं के नीचे तारांकित चेतावनी है कि आँकड़ों की गुणवत्ता की समस्याएँ हैं। रैंकिंग वाली तालिका के नीचे लिखा है कि 95 फ़ीसदी से ऊपर की कवरेज को 95 पर सामान्यीकृत कर दिया जाता है, क्योंकि राज्यों की एचएमआईएस कवरेज के लिए 95 फ़ीसदी को छत माना गया है।

सेवा-रजिस्टर जिसे गिनता है, वह वही लोग हैं जो केंद्र तक आए। जो नहीं आए, वे हर में हैं, अंश में नहीं। इससे कवरेज निकलती है; प्रसार नहीं निकलता।

डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर डैशबोर्ड पर मौजूद तो है, पर किसी माप की तरह नहीं। वह राज्यों की जाँच-सूची में सवाल बनकर आता है: क्या सभी एएनएम और आरबीएसके टीमों के पास डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर उपलब्ध है, हाँ या नहीं। क्या इस वित्त वर्ष में उसकी ख़रीद पूरी हुई, आंशिक हुई, या जानकारी उपलब्ध नहीं। एनीमिया की जाँच किस विधि से होती है, डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर से, रंग वाले कार्ड से, या साहली विधि से। यंत्र गिना जाता है। उसने जो पढ़ा, उसका कोई आँकड़ा पन्ने पर नहीं आता।

साहली हीमोग्लोबिनोमीटर का पूरा सेट, यानी तुलना करने वाला ख़ाना, अंशांकित नली, ड्रॉपर और अम्ल की शीशी, दिसंबर 2021 की तस्वीर; राज्यों की जाँच-सूची में यही विधि तीन विकल्पों में से एक के तौर पर गिनी जाती है
तस्वीर: Ajay Kumar Chaurasiya, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

और प्रसार का पन्ना अब भी 2021 पर खड़ा है। भारत की एनीमिया स्थिति वाले पन्ने पर एनएफ़एचएस चुनने का ड्रॉपडाउन वेबसाइट के अपने कोड में निष्क्रिय बनाया गया है, और डाउनलोड के सिर्फ़ दो बटन हैं: एनएफ़एचएस-5 और सीएनएनएस। 19 सितंबर 2026 को वेबसाइट अपने कार्यक्रम को 6x6x6 रणनीति ही कहती है; मेन्यू में उसी नाम का पन्ना है। 7x7x7 शब्द उस पूरी साइट के कोड में एक बार भी नहीं मिलता, जबकि निर्देशिका जारी हुए अस्सी दिन से ज़्यादा बीत चुके हैं।

कारण किसी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं है

जाँच क्यों हटी, यह किसी सरकारी दस्तावेज़ में ढूँढ़ने पर नहीं मिलता। न पत्र सूचना कार्यालय की विज्ञप्तियों में, न संसद के उत्तरों में, न सर्वेक्षण की अपनी फ़ैक्ट शीट में।

जो है, वह पत्रकारों को दी गई अनाम जानकारी है। सरकारी प्रसारक डीडी न्यूज़ ने 7 जून 2026 को स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से, नाम बताए बिना, लिखा कि पिछले दौरों में इस्तेमाल हुई केशिका ख़ून की पद्धति को लेकर चिंताओं के कारण एनएफ़एचएस-6 में हीमोग्लोबिन की जाँच नहीं की गई, और एनीमिया के अनुमान अब आईसीएमआर के डायट एंड बायोमार्कर्स सर्वे से आएँगे, जो नस से ख़ून लेता है। उसी रिपोर्ट में अधिकारी यह भी कहते हैं कि मक़सद यह है कि हर सूचकांक सबसे उपयुक्त और आधिकारिक स्रोत से आए, ताकि दोहराव घटे। एक दिन बाद, 8 जून को, द वायर ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के हवाले से मंत्रालय के अनाम अधिकारियों का यह स्पष्टीकरण छापा कि फ़ैक्ट शीट आँकड़े देने का पहला चरण भर हैं, एनएफ़एचएस-6 की अंतिम रिपोर्ट नहीं।

अनाम अधिकारी। दोनों बार। हस्ताक्षर किसी पर नहीं।

जिस सर्वेक्षण की तरफ़ इशारा किया गया, वह भी अभी नतीजे नहीं दे रहा। आईसीएमआर के राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने दिसंबर 2022 में शुरू हुआ यह सर्वेक्षण 2025 में पूरा किया: 183 ज़िले, 81,000 से ज़्यादा घर, क़रीब 2.6 लाख लोग और 1.76 लाख शिरा-रक्त नमूने। द ट्रिब्यून ने 30 मार्च 2026 को इसके पूरा होने की ख़बर देते हुए लिखा कि आँकड़ों का विश्लेषण चल रहा है। जारी करने की कोई तारीख़ अब तक घोषित नहीं है। देश में क़रीब 800 ज़िले हैं; 183 उनका एक चौथाई भी नहीं। ज़िले-दर-ज़िले का वह सिलसिला जो एनएफ़एचएस-4 और 5 देते थे, इससे लौटेगा नहीं।

इस बीच सरकार को आँकड़ा चाहिए, तो वह पुराना ही उठाती है। लोकसभा के अतारांकित प्रश्न 1124 का उत्तर, 24 जुलाई 2026, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय। उसमें एक तालिका है जो एनएफ़एचएस-1 के 52 फ़ीसदी से चलकर एनएफ़एचएस-6 के 29.3 फ़ीसदी तक बौनेपन की पूरी श्रृंखला देती है। छठे दौर का हवाला उसी काग़ज़ पर है। ठीक अगले पैराग्राफ़ में मंत्रालय लिखता है कि एनएफ़एचएस-5 (2019-21) के अनुसार छह से 59 माह के बच्चों में एनीमिया का प्रसार 67.1 फ़ीसदी और 15 से 49 बरस की महिलाओं में 57 फ़ीसदी है। नए सर्वेक्षण के आने के दो महीने बाद, एक ही जवाब में, बौनेपन के लिए नया आँकड़ा और एनीमिया के लिए पाँच साल पुराना।

कार्यक्रम का अपना लक्ष्य भी उसी पैमाने पर लिखा है जो अब नपता नहीं। अभियान की वेबसाइट अपने परिचय में कहती है कि लक्ष्य बच्चों, किशोरों और प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया का प्रसार हर साल तीन प्रतिशत अंक घटाना है। प्रसार प्रति वर्ष तीन अंक। यह वाक्य तभी जाँचा जा सकता है जब प्रसार नापा जाए।

जिस लेख से यह सवाल उठा, वह एक्सएलआरआई जमशेदपुर में अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफ़ेसर करण बब्बर का हस्ताक्षरित लेख है, जो 16 सितंबर 2026 को स्क्रॉल पर छपा। उसका शीर्षक कहता है कि तीन दशक में पहली बार भारत के पास एनीमिया का आँकड़ा नहीं है। गिनती 27 बरस की है। और आँकड़ा नहीं, सर्वेक्षण-स्तर का देशव्यापी अनुमान नहीं है। मशीनें चल रही हैं, रजिस्टर भर रहे हैं, पोर्टल जुड़ रहे हैं। जो नहीं है, वह वह संख्या है जिससे यह पता चले कि देश में कितने लोगों के ख़ून में हीमोग्लोबिन कम है।

स्रोतअंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (आईआईपीएस), मई 2026: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफ़एचएस-6) 2023-24, भारत और राज्य/केंद्रशासित प्रदेश फ़ैक्ट शीट, 182 पन्ने, आईआईपीएस: एनएफ़एचएस-5 (2019-21) भारत फ़ैक्ट शीट, 131 सूचकांक, एनीमिया खंड सूचकांक 92 से 98, फ़ुटनोट 22 (इंटरनेट आर्काइव की प्रति; rchiips.org इस मशीन से नहीं खुलता), आईआईपीएस: एनएफ़एचएस-4 (2015-16) भारत फ़ैक्ट शीट, एनीमिया सूचकांक 79 से 83 और उनका फ़ुटनोट 15 (इंटरनेट आर्काइव की प्रति), आईआईपीएस और ओआरसी मैक्रो: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफ़एचएस-2) 1998-99, भारत रिपोर्ट — अध्याय 1 और अध्याय 7, हीमोक्यू पर फ़ुटनोट सहित, आईआईपीएस, अगस्त 2006: ज़िला स्तरीय घरेलू सर्वेक्षण (डीएलएचएस-2) 2002-04, भारत रिपोर्ट, 593 ज़िले, स्वास्थ्य प्रश्नावली और ख़ून के नमूने, आईआईपीएस: ज़िला स्तरीय घरेलू एवं सुविधा सर्वेक्षण (डीएलएचएस-3) 2007-08, भारत रिपोर्ट — पूरे दस्तावेज़ में हीमोग्लोबिन सिर्फ़ उपकरण सूची में है, राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान (एनआईएचएफ़डब्ल्यू): डीएलएचएस-4 में सीएबी घटक का एकीकरण, अगस्त 2012 से फ़रवरी 2014, 336 ज़िले, व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (सीएनएनएस) 2016-18, भारत फ़ैक्ट शीट — नस से लिए ख़ून पर साइनमेटहीमोग्लोबिन विधि, और फ़ुटनोट 4, पत्र सूचना कार्यालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, 29 जून 2026, शाम 5:49: जे.पी. नड्डा ने सोलहवीं सीसीएचएफ़डब्ल्यू बैठक में एनीमिया मुक्त भारत अभियान की संचालन निर्देशिका जारी की; 6x6x6 से 7x7x7 और टी-3 से टी-4, पत्र सूचना कार्यालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, 11 अगस्त 2026, दोपहर 1:36: राज्यसभा में अनुप्रिया पटेल का लिखित उत्तर, 7x7x7 ढाँचे के सातों लाभार्थी, हस्तक्षेप और संस्थागत तंत्र, लोकसभा अतारांकित प्रश्न संख्या 1124, 24 जुलाई 2026, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर का उत्तर — एनएफ़एचएस-1 से 6 तक बौनेपन की श्रृंखला, और एनीमिया के लिए एनएफ़एचएस-5, एनीमिया मुक्त भारत की आधिकारिक वेबसाइट और उसका डैशबोर्ड, 19 सितंबर 2026 को पढ़ा गया — पाँच केपीआई की एचएमआईएस परिभाषाएँ, सामान्यीकरण की टिप्पणी और प्रसार पन्ने के दो बटन, डीडी न्यूज़, 7 जून 2026: स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से, नाम बताए बिना, कि केशिका ख़ून की विधि पर चिंताओं के कारण एनएफ़एचएस-6 में हीमोग्लोबिन की जाँच नहीं की गई, द वायर, 8 जून 2026: टाइम्स ऑफ़ इंडिया के हवाले से स्वास्थ्य मंत्रालय के अनाम अधिकारियों का स्पष्टीकरण कि फ़ैक्ट शीट अंतिम रिपोर्ट नहीं हैं, द ट्रिब्यून, 30 मार्च 2026: आईसीएमआर-एनआईएन का डायट एंड बायोमार्कर्स सर्वे — 183 ज़िले, 81,000 से ज़्यादा घर, 2.6 लाख लोग, 1.76 लाख शिरा-रक्त नमूने, नतीजे विश्लेषण में, स्क्रॉल, 16 सितंबर 2026: एक्सएलआरआई जमशेदपुर में अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफ़ेसर करण बब्बर का हस्ताक्षरित लेख, जिसके शीर्षक में 'तीन दशक' है

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