भारत पन्ना
समझिए

पंजाब के संयंत्रों में कोयला ज़रूरत से ज़्यादा है, और वे 42 फ़ीसदी पर चल रहे हैं

कोयला मंत्रालय ने शनिवार को मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया। उसके अपने आँकड़े बताते हैं कि पीएसपीसीएल के भंडार 117 फ़ीसदी भरे हैं, संयंत्र 42 फ़ीसदी पर हैं, और उसी राज्य का एक निजी संयंत्र 93 फ़ीसदी पर चल रहा है।

एक ताप विद्युत संयंत्र का कूलिंग टावर। संयंत्र का चलना या न चलना अक्सर कोयले पर नहीं, क़ीमत पर तय होता है
तस्वीर: Ramilarora, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

कोयला मंत्रालय ने शनिवार को एक विज्ञप्ति जारी की जिसका मक़सद खंडन करना था।

मीडिया रिपोर्टों में कहा जा रहा था कि पंजाब के ताप विद्युत संयंत्रों में उत्पादन इसलिए घटा क्योंकि केंद्र से कोयला कम मिला। मंत्रालय ने कहा कि यह पूरी सच्चाई नहीं है।

खंडन के साथ मंत्रालय ने जो आँकड़े दिए, वे खंडन से ज़्यादा दिलचस्प हैं।

4 सितंबर 2026 तक पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के संयंत्रों में कोयले का भंडार मानक आवश्यकता का क़रीब 117 फ़ीसदी था। यानी जितना होना चाहिए, उससे ज़्यादा।

और अगस्त 2026 में उन्हीं संयंत्रों का औसत प्लांट लोड फ़ैक्टर क़रीब 42 फ़ीसदी रहा।

दो आँकड़े जो साथ नहीं बैठते

प्लांट लोड फ़ैक्टर का मतलब समझ लीजिए, क्योंकि पूरी कहानी उसी पर टिकी है।

किसी संयंत्र की क्षमता अगर 1,000 मेगावाट है, तो पूरे महीने चौबीसों घंटे चलने पर वह एक तय मात्रा में बिजली बनाएगा। उसने असल में कितनी बनाई, यह उस तय मात्रा का कितने फ़ीसदी है, वही पीएलएफ़ है।

42 फ़ीसदी का मतलब है कि संयंत्र अपनी क्षमता के आधे से भी कम पर चला।

पीएसपीसीएल तीन ताप संयंत्र चलाती है। लहरा मोहब्बत का गुरु हरगोबिंद संयंत्र, रोपड़ संयंत्र, और गोइंदवाल साहिब। तीनों की कुल क्षमता 2,300 मेगावाट है।

अब दूसरा आँकड़ा। उसी अगस्त में, उसी पंजाब में, एक निजी संयंत्र 93 फ़ीसदी पर चला।

नाभा पावर लिमिटेड का राजपुरा संयंत्र। मंत्रालय ने इसे ख़ास तौर पर गिनाया, और निष्कर्ष निकाला कि राज्य में बिजली उत्पादन के लिए कोयले की उपलब्धता कोई अड़चन नहीं रही।

यह निष्कर्ष सही है। कोयला भरा हो और संयंत्र आधे पर चले, तो वजह कोयला नहीं है।

पर मंत्रालय यहीं रुक जाता है। सवाल जहाँ से शुरू होता है, विज्ञप्ति वहाँ ख़त्म हो जाती है।

117 फ़ीसदी का मतलब क्या है

यह आँकड़ा जितना भरोसा जगाता है, उसे समझने पर वह भरोसा और बढ़ता है, पर एक अलग वजह से।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण हर संयंत्र के लिए एक मानक भंडार तय करता है। यह मानक दिनों में होता है, और दो चीज़ों पर निर्भर करता है: संयंत्र खदान से कितनी दूर है, और महीना कौन-सा है।

खदान के पास वाले संयंत्रों के लिए सितंबर का मानक 12 दिन का है। खदान से दूर वालों के लिए 20 दिन का। मानसून के बाद यह बढ़ता जाता है और फ़रवरी-मार्च में क्रमशः 17 और 26 दिन तक पहुँचता है, क्योंकि सर्दियों के बाद माँग चढ़ती है।

पंजाब के संयंत्र खदानों से दूर हैं, इसलिए उन पर ऊँचा मानक लागू होता है।

अगर भंडार मानक के 25 फ़ीसदी से नीचे चला जाए, तो उसे संकटग्रस्त कहा जाता है। 117 फ़ीसदी उससे बहुत ऊपर है।

पर मानक की गणना में एक शर्त छिपी है, और वही सबसे अहम है। कोयले की ज़रूरत 85 फ़ीसदी पीएलएफ़ मानकर निकाली जाती है।

यानी मानक भंडार वह है जो संयंत्र के 85 फ़ीसदी पर चलने पर तय दिनों तक चले।

अब दोनों आँकड़े साथ रखिए। संयंत्र 42 फ़ीसदी पर चल रहा है, यानी 85 फ़ीसदी की तुलना में आधे से भी कम कोयला जला रहा है। उतना ही भंडार लगभग दोगुने दिन चलेगा।

इससे एक बात निकलती है जो विज्ञप्ति नहीं कहती। भंडार का ऊँचा होना और संयंत्र का कम चलना दो अलग तथ्य नहीं हैं। जो संयंत्र कोयला नहीं जला रहा, उसका भंडार अपने आप चढ़ता है।

117 फ़ीसदी यह साबित करता है कि कोयला कम नहीं पड़ा। यह अपने आप में यह नहीं बताता कि आपूर्ति अच्छी थी। कम खपत भी वही आँकड़ा बना सकती है।

पंजाब की माँग जुलाई में बनती है, अगस्त में नहीं

एक और बात है जो अगस्त के आँकड़े को उसकी जगह पर रख देती है।

पंजाब की बिजली की माँग साल भर एक जैसी नहीं रहती। वह धान के मौसम में चढ़ती है, जब खेतों की सिंचाई के लिए ट्यूबवेल चलते हैं। राज्य में क़रीब 13.94 लाख ट्यूबवेल हैं।

इस साल पंजाब की सबसे ऊँची माँग 15 जुलाई 2026 को दर्ज हुई, 17,328 मेगावाट। बिजली कटौती किसी श्रेणी के उपभोक्ता पर नहीं करनी पड़ी।

अनुमान इससे ऊपर का था। मौसम विभाग की भविष्यवाणी के बाद विशेषज्ञ मान रहे थे कि माँग क़रीब छह फ़ीसदी बढ़कर 18,000 मेगावाट पार कर जाएगी। वह नहीं हुई।

उस मौसम में एक चीज़ ऐसी हुई जो पहले नहीं हुई थी। बिजली इतनी अधिशेष रही कि किसानों को ट्यूबवेल बंद करने पड़े।

अब क्षमता का हिसाब देखिए। पीएसपीसीएल का अपना उत्पादन क़रीब 6,500 मेगावाट का है। बाक़ी माँग वह ख़रीद और बैंकिंग से पूरी करती है, जो दस हज़ार मेगावाट से ऊपर बैठती है। इसमें तीन से साढ़े तीन हज़ार मेगावाट बैंकिंग व्यवस्था से आता है, यानी वह बिजली जो पहले किसी और राज्य को दी गई थी और अब लौटाई जा रही है। केंद्रीय परियोजनाओं और भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड में राज्य का हिस्सा क़रीब 4,800 मेगावाट है।

इस ढाँचे में एक बात साफ़ है। पंजाब का अपना ताप उत्पादन उसकी सबसे ऊँची माँग का एक तिहाई भी नहीं है, और वह सबसे ऊँची माँग साल में कुछ हफ़्तों की होती है।

बाक़ी महीनों में उस क्षमता का बड़ा हिस्सा ज़रूरत से ज़्यादा रहेगा। यह व्यवस्था की बनावट है, अगस्त की कोई ख़ास घटना नहीं।

पंजाब में क़रीब 13.94 लाख ट्यूबवेल हैं, और राज्य की बिजली माँग का शिखर धान की सिंचाई के हफ़्तों में बनता है
तस्वीर: deepay, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

तो फिर वजह क्या है

बिजली की व्यवस्था में एक नियम चलता है जिसे मेरिट ऑर्डर कहते हैं।

किसी भी घंटे में राज्य को जितनी बिजली चाहिए, वह सबसे सस्ते स्रोत से शुरू करके ख़रीदी जाती है। सस्ता स्रोत पहले, महँगा बाद में। जब ज़रूरत पूरी हो जाए, बाक़ी स्रोत बंद रहते हैं।

अब लागत का हिसाब देखिए। किसी ताप संयंत्र की लागत दो हिस्सों में बँटी होती है। एक तयशुदा हिस्सा, जो संयंत्र चले या न चले, चुकाना पड़ता है, क्योंकि उसमें क़र्ज़ का ब्याज, मूल्यह्रास और तनख़्वाहें हैं। दूसरा परिवर्तनशील हिस्सा, जो मुख्य रूप से कोयले का ख़र्च है और तभी लगता है जब संयंत्र चले।

मेरिट ऑर्डर में तुलना परिवर्तनशील लागत की होती है।

अगर बिजली एक्सचेंज पर बिजली उस परिवर्तनशील लागत से सस्ती मिल रही है, तो अपना संयंत्र चलाने का कोई आर्थिक कारण नहीं बचता। बाहर से ख़रीदना सस्ता पड़ता है।

अगस्त मानसून का महीना है। माँग गर्मियों के मुक़ाबले गिरती है, पनबिजली बढ़ती है, और सौर बिजली दिन में सस्ती रहती है। एक्सचेंज पर दाम नरम पड़ते हैं।

इस हालत में एक राज्य वितरण कंपनी का अपने महँगे संयंत्र बंद रखना लापरवाही नहीं होती। वह हिसाब होता है।

बिजली की माँग हर घंटे सबसे सस्ते उपलब्ध स्रोत से पूरी की जाती है, इसी को मेरिट ऑर्डर कहते हैं
तस्वीर: Shishirdasika, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

पर हिसाब का दूसरा सिरा भी है

अगर बंद रखना बचत है, तो सवाल यह है कि संयंत्र बनाए क्यों गए।

यहीं तयशुदा लागत वाला हिस्सा लौटकर आता है। बंद पड़ा संयंत्र भी पैसा माँगता है। ब्याज चलता रहता है, कर्मचारी तनख़्वाह पाते रहते हैं, और मशीन बिना चले भी घिसती है।

निजी संयंत्रों के मामले में यह और साफ़ दिखता है। बिजली ख़रीद समझौतों में वितरण कंपनी को क्षमता शुल्क देना होता है, चाहे उसने बिजली ली हो या नहीं। शर्त यह होती है कि संयंत्र चलने को तैयार रहा।

यानी राज्य दो तरफ़ से भुगतान करता है। एक तरफ़ एक्सचेंज से ख़रीदी गई सस्ती बिजली का दाम, दूसरी तरफ़ अपने और अनुबंधित संयंत्रों की तयशुदा लागत।

यह दोनों मिलकर उस औसत लागत में जाते हैं जिस पर राज्य विद्युत नियामक आयोग बिजली की दर तय करता है। यानी उपभोक्ता के बिल में।

मंत्रालय की विज्ञप्ति में इनमें से कोई आँकड़ा नहीं है। न यह कि अगस्त में पंजाब ने बाहर से कितनी बिजली किस दाम पर ख़रीदी, न यह कि 42 फ़ीसदी पर चलने से तयशुदा लागत का बोझ कितना पड़ा।

बिना इन दो संख्याओं के यह तय नहीं हो सकता कि 42 फ़ीसदी समझदारी थी या नाकामी।

जो संयंत्र दिवालिया अदालत से ख़रीदा गया

तीन में से एक संयंत्र की कहानी अलग है।

गोइंदवाल साहिब का 540 मेगावाट का संयंत्र जीवीके समूह का था। अक्तूबर 2022 में एक्सिस बैंक ने 442 करोड़ रुपये की चूक पर दिवालिया याचिका दायर की। संयंत्र पर अलग-अलग लेनदारों का कुल 6,615 करोड़ रुपये बक़ाया था।

राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण की प्रक्रिया में जुलाई 2023 में बोलियाँ खुलीं। पीएसपीसीएल अकेली बोलीदाता थी।

राज्य ने पावर फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन से 1,080 करोड़ रुपये का क़र्ज़ लेकर यह संयंत्र ख़रीदा। शेयर फ़रवरी 2024 में हस्तांतरित हुए।

इसका मतलब यह है कि पीएसपीसीएल की तयशुदा लागत में एक नया क़र्ज़ भी जुड़ा है, और वह क़र्ज़ उस संयंत्र पर लिया गया है जो अब आधे से कम पर चल रहा है।

और वह खदान जिसके लिए पंजाब दस साल लड़ा

विज्ञप्ति में एक नाम आता है जिस पर आमतौर पर ध्यान नहीं जाता। पचवारा सेंट्रल।

यह पीएसपीसीएल की अपनी कैप्टिव कोयला खदान है, और यह पंजाब में नहीं, झारखंड के पाकुड़ ज़िले के अमरापाड़ा प्रखंड में है।

इसका आवंटन 2002 में हुआ था, पैनम कोल माइंस लिमिटेड को, जो पंजाब राज्य विद्युत बोर्ड और ईएमटीए की साझा कंपनी थी।

25 अगस्त 2014 को उच्चतम न्यायालय ने कोयला ब्लॉक आवंटन पर अपने फ़ैसले में इसे भी रद्द कर दिया। पंजाब को इस खदान से कोयला आना 31 मार्च 2015 को बंद हो गया।

इसके बाद के साल मुक़दमेबाज़ी में गए। सितंबर 2021 में उच्चतम न्यायालय से रास्ता साफ़ हुआ, और खनन 2022 के आख़िर में दोबारा शुरू हुआ। अब खदान डीबीएल पचवारा कोल माइंस प्राइवेट लिमिटेड चलाती है, जो दिलीप बिल्डकॉन और वीपीआर माइनिंग की विशेष प्रयोजन कंपनी है, और जिसने उलटी बोली में 840 रुपये प्रति टन की सबसे कम दर लगाई थी।

पंजाब ने यह खदान वापस पाने में क़रीब आठ साल लगाए।

एक खुली कोयला खदान (यह तस्वीर तेलंगाना की है)। पचवारा सेंट्रल झारखंड के पाकुड़ ज़िले के अमरापाड़ा प्रखंड में है
तस्वीर: Adityamadhav83, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

अब उस कोयले का आधा हिस्सा निजी संयंत्रों को जा सकता है

विज्ञप्ति की सबसे अहम बात यही है, और वह सबसे कम पढ़े जाने वाले वाक्य में है।

मंत्रालय ने बताया कि पचवारा सेंट्रल से निकले कोयले का इस्तेमाल उन स्वतंत्र विद्युत उत्पादकों को करने की अनुमति पहले ही दी जा चुकी है जो पीएसपीसीएल के नहीं हैं। नाम भी दिए गए हैं: नाभा पावर लिमिटेड, राजपुरा, और तलवंडी साबो पावर लिमिटेड, मनसा।

सीमा दो हैं। पहली, यह अनुमति निर्दिष्ट अंतिम उपयोग संयंत्रों की ज़रूरत पूरी होने के बाद लागू होती है। दूसरी, यह सालाना उत्पादन के 50 फ़ीसदी तक है।

और एक शर्त है। यह आपूर्ति झारखंड राज्य को वैधानिक भुगतान दायित्व पूरा करने के अधीन है।

इस एक वाक्य में तीन सरकारें हैं। कोयला झारखंड की ज़मीन से निकलता है, खदान पंजाब की कंपनी की है, और अनुमति केंद्र देता है। झारखंड को उसका हक़ मिले, इसकी शर्त लगाकर।

तस्वीर यह बनती है। पंजाब आठ साल तक अपनी खदान के लिए लड़ा, खदान वापस मिली, और अब उस कोयले का आधा हिस्सा निजी संयंत्रों को जा सकता है, जबकि उसके अपने संयंत्र 42 फ़ीसदी पर चल रहे हैं और निजी संयंत्र 93 पर।

जो कोयला दिया गया, वह उठाया नहीं गया

विज्ञप्ति में एक और शिकायत है, और वह राज्य की तरफ़ नहीं, संयंत्रों की तरफ़ है।

मंत्रालय का कहना है कि कोल इंडिया की सहायक कंपनियों ने पंजाब के स्वतंत्र विद्युत उत्पादकों को सक्रिय रूप से कोयले की पेशकश की, पर बुकिंग और निकासी में देरी हुई।

यह अलग तरह की अड़चन है। कोयला खदान पर मौजूद होना एक बात है, उसे बुक करना, रेक लगवाना और संयंत्र तक पहुँचाना दूसरी।

रेक की उपलब्धता, माल भाड़ा, और खदान से संयंत्र की दूरी, तीनों इसमें आते हैं। पंजाब देश के कोयला क्षेत्रों से दूर है, इसलिए ढुलाई की लागत उसके लिए हमेशा ज़्यादा रही है।

इस विज्ञप्ति को कैसे पढ़ा जाए

एक आख़िरी बात, जो विज्ञप्ति की क़िस्म के बारे में है।

यह सामान्य ख़बर नहीं है। यह खंडन है, और खंडन एक पक्ष का बयान होता है।

मंत्रालय ने जो कहा, वह अपनी जगह सही है और आँकड़ों के साथ है। कोयला पर्याप्त था, यह उसने दिखा दिया।

पर उसने यह नहीं बताया कि फिर उत्पादन कम क्यों रहा। उसने सिर्फ़ यह बताया कि उसकी वजह से नहीं रहा।

पंजाब सरकार का पक्ष इसमें नहीं है। राज्य ने अगस्त में बाहर से कितनी बिजली किस दर पर ली, यह भी नहीं है। और यह भी नहीं कि 117 फ़ीसदी भंडार किस तारीख़ के लिए है, क्योंकि 4 सितंबर का भंडार अगस्त के उत्पादन के बारे में सीमित बात ही कह सकता है।

अगली बार जब कोयला संकट की ख़बर आए, तो देखने की चीज़ भंडार का आँकड़ा अकेले नहीं होगा। तीन संख्याएँ साथ चाहिए: भंडार कितने दिन का है, संयंत्र कितने फ़ीसदी पर चल रहा है, और उस घंटे एक्सचेंज पर बिजली का दाम क्या था।

पहली दो अकेले पढ़ने पर उल्टा नतीजा दे सकती हैं, क्योंकि भरा भंडार बंद संयंत्र का सबूत भी हो सकता है।

तीनों साथ देखने पर ही पता चलता है कि संयंत्र रुका है, या रोका गया है।

स्रोतकोयला मंत्रालय की विज्ञप्ति, 6 सितंबर 2026, द ट्रिब्यून, गोइंदवाल साहिब संयंत्र के अधिग्रहण पर रिपोर्ट, ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर, पचवारा सेंट्रल खदान का ब्योरा, गोइंदवाल साहिब संयंत्र का विवरण, द ट्रिब्यून, 15 जुलाई 2026 की रिकॉर्ड माँग पर रिपोर्ट, पावरलाइन, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के संशोधित भंडार मानक

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।