जिस झील ने 550 लोगों को बहाया, वह उससे पिछली शाम तक थी ही नहीं
रसुवा की बाढ़ हिमनद झील के फटने से नहीं आई। पहाड़ का एक हिस्सा नदी में गिरा, नदी रुकी, और वह अस्थायी बाँध टूट गया। दुनिया की किसी ख़तरा-सूची में यह झील दर्ज नहीं थी।
26 अगस्त की सुबह रसुवा में बारिश नहीं हुई थी। नेपाल के मौसम विभाग का रिकॉर्ड यही कहता है, उस दिन भी और अगले दिन भी।
पौने नौ बजे के आसपास, 5,200 मीटर की ऊँचाई पर, चट्टान और बर्फ़ का एक बड़ा हिस्सा टूटा। वह लगभग 1,200 मीटर नीचे ल्हेंदे खोला में गिरा, जो त्रिशूली की सहायक नदी है और रसुवागढ़ी से क़रीब बीस किलोमीटर उत्तर-पूर्व में बहती है।
मलबे ने नदी को बाँध दिया। पानी पीछे जमा होने लगा।
फिर वह बाँध टूट गया।
पानी तीस मिनट में नौ मीटर चढ़ा। बेत्रावती तक का 36 किलोमीटर का रास्ता उसने लगभग चालीस मिनट में तय किया। शव उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और महाराजगंज तक बहकर पहुँचे, घटनास्थल से 240 किलोमीटर दूर।
यह हिमनद झील का फटना नहीं था
हर जगह इसे GLOF लिखा गया, यानी हिमनद झील का विस्फोटक बहाव। ICIMOD और नेपाल के जल एवं मौसम विज्ञान विभाग, दोनों इससे असहमत हैं।
अंतर तकनीकी नहीं है। हिमनद झीलें सालों में बनती हैं। उन्हें उपग्रह से देखा जा सकता है, नापा जा सकता है, सूची में डाला जा सकता है। रसुवा में जो झील टूटी, वह उस सुबह बनी और उसी सुबह ख़त्म हो गई।
अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण ने पहले इसे 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया था। बाद में उसने अपना आकलन बदला। कंपन भूकंप से नहीं आया था, वह भूस्खलन से पैदा हुआ था।
जो संख्याएँ अभी हिल रही हैं
मरने वालों की गिनती अलग-अलग बुलेटिन में अलग है। 538, 553, 579। लापता लोगों की संख्या लगभग 1,900 बताई जा रही है।
भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार 288 भारतीयों से संपर्क नहीं हो पा रहा। इनमें त्रिशूली-1 परियोजना के 73 कर्मचारी हैं, तमिलनाडु से गए 86 कैलाश मानसरोवर यात्री, पश्चिम बंगाल से 32 और केरल से 33 लोग। ये उप-आँकड़े जोड़ने पर 252 बनते हैं, 288 नहीं। बाक़ी 36 का ब्योरा अब तक सार्वजनिक नहीं है।
गिनती का इस तरह बदलते रहना सामान्य है। 2024 में थामे की बाढ़ में तबाह हुए घरों की संख्या पहले दिन 12 बताई गई थी, दूसरे दिन 20, और एक साल बाद के अंतिम आकलन में 25। कुछ छिपाया नहीं गया था। आकलन में समय लगता है।
असली सवाल: यह झील किसी सूची में क्यों नहीं थी
पिछले साल अगस्त में एवरेस्ट के पास थामे गाँव में जो हुआ, वह इस सवाल का सबसे साफ़ जवाब है।
वहाँ दो झीलें एक के बाद एक टूटीं। ऊपर वाली फटी, उसका पानी नीचे वाली में गिरा, और वह भी फट गई। लहर 22 मिनट में गाँव तक पहुँची। कोई नहीं मरा, पर 25 घर, एक स्कूल, एक स्वास्थ्य केंद्र, एक पुल और 930 किलोवाट का बिजलीघर बह गया।
पिछले हफ़्ते छपे एक शोधपत्र में इसकी वजह लिखी है। दोनों झीलें 0.1 वर्ग किलोमीटर से छोटी थीं, इसलिए वे ख़तरे की सूचियों में आती ही नहीं थीं। सूचियाँ एक न्यूनतम आकार से नीचे की झीलें गिनती नहीं हैं। और वे यह भी नहीं गिनतीं कि एक झील के टूटने से दूसरी टूट सकती है।
छोटी झीलों से पैदा होने वाले ख़तरों को समझने और रोकने में हमें कहीं ज़्यादा मेहनत करनी होगी।
ICIMOD
और जो झीलें नेपाल में हैं ही नहीं
एक आँकड़ा हर रिपोर्ट में ग़लत छप रहा है। कहा जा रहा है कि नेपाल में 47 ख़तरनाक झीलें हैं।
ICIMOD और यूएनडीपी की 2020 की गिनती में 47 झीलें कोसी, गंडकी और कर्णाली घाटियों में हैं। इनमें से नेपाल के भीतर सिर्फ़ 21 हैं। 25 तिब्बत में हैं और एक भारत में। नेपाल पर मंडराने वाली ज़्यादातर झीलें नेपाल की ज़मीन पर नहीं हैं।
ICIMOD की 2011 की सूची में नेपाल की 24 पुरानी बाढ़ें दर्ज हैं, जिनमें से 10 तिब्बत से आई थीं। इनमें लोंगदा (1964) और ज़ानाको (1995) इसी त्रिशूली घाटी की हैं। 1981 में झांगझांगबो की बाढ़ आई थी और यह किसी को पता नहीं था कि वह तिब्बत से आई है, जब तक चार साल बाद एक चीनी शोधपत्र नहीं छपा।
चीन और नेपाल के बीच रियल-टाइम आँकड़ा साझा करने का कोई औपचारिक समझौता आज भी नहीं है। जुलाई 2025 की बाढ़ के बाद ज़बानी सहमति बनी थी, दस्तख़त कभी नहीं हुए। दोनों देश मिलकर ठीक एक झील पर नज़र रखते हैं, चिरेनमाको।
चीन ने इस बार उपग्रह तस्वीरें साझा कीं, ICIMOD के ज़रिए। पर वह घटना के बाद था। नाकामी घटना से पहले की चेतावनी में थी।
जो नापने वाले यंत्र नापी जाने वाली चीज़ में बह गए
इस गलियारे पर लगे आठ जलस्तर मापी यंत्रों में से पाँच उसी बाढ़ में तबाह हो गए, जिसे पकड़ने के लिए वे लगाए गए थे।
नेपाल के मौसम विभाग के परजुली का कहना है कि 8:40 तक आँकड़े सामान्य रूप से आ रहे थे, और 8:50 का पाठ कभी नहीं आया।
नदी के इसी तीन किलोमीटर हिस्से में चौदह महीनों के भीतर दूसरी बार बाढ़ आई है। जुलाई 2025 की बाढ़ ने मितेरी पुल गिरा दिया था। रसुवागढ़ी 29 दिसंबर 2025 को एक बेली पुल के सहारे फिर खुला। आठ महीने बाद वह भी बह गया।
स्रोतICIMOD, काठमांडू पोस्ट, Natural Hazards and Earth System Sciences