अरावली की पहाड़ी किसे कहें, यह तय करने में दो फ़ैसले, एक रोक और एक समिति लग चुकी है; अदालत ने अब 30 नवंबर की तारीख़ दी है
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ही समिति को छह महीने और देने से मना कर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समिति ने साफ़ तौर पर उनकी सेवानिवृत्ति के बाद की तारीख़ माँगी है। सवाल वही पुराना है: 100 मीटर से नीची पहाड़ी अरावली है या नहीं।

एक पहाड़ी कितनी ऊँची हो तो पहाड़ी कहलाए?
यह सवाल बचकाना लगता है, जब तक यह न पता हो कि इसके जवाब पर राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली के 37 ज़िलों में खनन का पट्टा मिलने या न मिलने का फ़ैसला टिका है।
सोमवार 7 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का जवाब देने वाली अपनी ही समिति से कहा कि उसे छह महीने और नहीं मिलेंगे। जवाब 30 नवंबर तक चाहिए।
समिति ने क्या माँगा था, और अदालत ने क्या कहा
समिति ने 28 फ़रवरी 2027 तक का समय माँगा था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने मना किया और यह भी जोड़ा कि अब कोई विस्तार नहीं मिलेगा।
लाइव लॉ के मुताबिक़ मुख्य न्यायाधीश ने कहा: "उन्होंने साफ़ तौर पर मेरी सेवानिवृत्ति के बाद की तारीख़ माँगी है... अगर वे सक्षम नहीं हैं, तो हम समिति फिर से बनाएँगे।" समिति को "दिन-रात काम" करने को कहा गया। अगली सुनवाई 2 दिसंबर को है।
मामले का नाम ख़ुद बताता है कि झगड़ा किस बात पर है: *अरावली की पहाड़ियों और श्रेणियों की परिभाषा और उससे जुड़े प्रश्नों के संबंध में*, स्वतः संज्ञान रिट संख्या 10/2025।
समिति में कौन हैं
यह समिति जून 2026 में बनी। उसका पदेन प्रमुख भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद का महानिदेशक है। सदस्य: डॉ. सुभाष आशुतोष, भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक; डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक; बृज मोहन सिंह राठौर, पर्यावरण मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव; और प्रो. अशोक के. भटनागर, दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख।
दो विशेष आमंत्रित हैं: भारतीय मानव बस्ती संस्थान के प्रो. जगदीश कृष्णस्वामी और हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा। सदस्य-सचिव पर्यावरण मंत्रालय का निदेशक-स्तर का अधिकारी है।
यानी वन, भूविज्ञान, वनस्पति और मानव बस्ती, चारों विषय मेज़ पर हैं। और फिर भी तीन महीने में परिभाषा नहीं निकली।
100 मीटर का नियम आया कहाँ से
इस पूरे विवाद की जड़ राजस्थान का एक पुराना नियम है।
पीआईबी की दिसंबर 2025 की फ़ैक्टशीट के अनुसार राजस्थान सरकार की 2002 की एक समिति ने भू-आकृति के रिचर्ड मर्फ़ी वर्गीकरण के आधार पर तय किया कि स्थानीय धरातल से 100 मीटर ऊपर उठा हर भू-आकार पहाड़ी है, और उस पर तथा उसके सहायक ढलानों पर खनन नहीं होगा। राजस्थान इसे 9 जनवरी 2006 से लागू कर रहा है।
चारों राज्यों में सिर्फ़ राजस्थान के पास ऐसी कोई औपचारिक परिभाषा थी। हरियाणा, गुजरात और दिल्ली के पास नहीं थी।
अदालत की समिति ने उसे पूरे देश का नियम बनाया
सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2024 के आदेश से पर्यावरण मंत्रालय की अगुवाई में एक समिति बनाई थी, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के वन सचिव, भारतीय वन सर्वेक्षण, केंद्रीय अधिकार-प्राप्त समिति और भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के प्रतिनिधि थे। 12 अगस्त 2025 को अदालत ने उसे और निर्देश दिए।
फ़ैक्टशीट के मुताबिक़ चारों राज्य राजस्थान के 100 मीटर वाले मानदंड को अपनाने पर सहमत हुए, और समिति ने उसे और "वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी" बनाने के लिए कुछ जोड़ा।
परिभाषा के शब्द

20 नवंबर 2025 के फ़ैसले में अदालत ने जो परिभाषा मानी, वह इस तरह है।
अरावली पहाड़ी: अरावली ज़िलों में स्थित कोई भी भू-आकार जिसकी ऊँचाई स्थानीय धरातल से 100 मीटर या अधिक हो। स्थानीय धरातल उस सबसे नीची कंटूर रेखा से तय होगा जो उस भू-आकार को घेरती है, और उस रेखा के भीतर की पूरी ज़मीन, पहाड़ी, उसके सहायक ढलान और जुड़े हुए भू-आकार, ढलान चाहे जितनी हो, अरावली पहाड़ी का हिस्सा मानी जाएगी।
अरावली रेंज: ऐसी दो या अधिक पहाड़ियाँ जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर हों; उनके बीच की सारी ज़मीन, छोटी पहाड़ियाँ और ढलान समेत, रेंज का हिस्सा।
फ़ैक्टशीट यह भी कहती है कि रेंज को सुरक्षा देना राजस्थान की परिभाषा में नहीं था; यह नई बात जोड़ी गई। साथ में: पहाड़ियों को सर्वे ऑफ़ इंडिया के नक़्शों पर दर्ज करना, मुख्य क्षेत्र चिह्नित करना जहाँ खनन पूरी तरह वर्जित हो, और नए पट्टों पर तब तक रोक जब तक पूरे भू-दृश्य के लिए टिकाऊ खनन की प्रबंधन योजना न बन जाए।
सरकार का तर्क: सौ से नीची पर खनन खुला नहीं है
फ़ैक्टशीट का सबसे ज़ोरदार वाक्य यह है: "इसलिए यह निष्कर्ष निकालना ग़लत होगा कि 100 मीटर से नीचे के सभी भू-आकारों में खनन की अनुमति है।"
तर्क यह है कि 100 मीटर की पहाड़ी की सबसे नीची कंटूर के भीतर की हर छोटी टेकरी, और दो ऐसी पहाड़ियों के बीच के 500 मीटर के दायरे की हर ज़मीन, ऊँचाई चाहे जो हो, खनन से बाहर रहेगी।
यह तर्क सही है या नहीं, इसका जवाब इस पर टिका है कि अरावली में 100 मीटर की पहाड़ियाँ कितनी हैं और वे एक-दूसरे से कितनी दूर हैं। यहीं वह आँकड़ा आता है जिस पर सबसे ज़्यादा झगड़ा है।
12,081 और 1,048: यह आँकड़ा किसका है
आलोचकों का सबसे उद्धृत आँकड़ा यह है: 20 मीटर या उससे ऊँची 12,081 अरावली पहाड़ियों में सिर्फ़ 1,048, यानी लगभग 8.7 फ़ीसदी, 100 मीटर से ऊपर हैं। इसी से "92 फ़ीसदी बाहर" वाली सुर्ख़ी बनी।
डाउन टु अर्थ ने लिखा है कि यह आँकड़ा "सरकार के अपने भारतीय वन सर्वेक्षण के आंतरिक आकलन" को बताया जाता है, पर भारतीय वन सर्वेक्षण ने औपचारिक रूप से ऐसा कोई अध्ययन करने से इनकार किया है।
यानी जिस संख्या पर विरोध की इमारत खड़ी है, उसका घोषित स्रोत उसे अपना मानने से मना करता है। इस लेख के लिए हम उसे न सही मानते हैं, न ग़लत; वह विवाद है और विवाद की तरह दर्ज है।
एक दूसरी गिनती, जो अलग संस्था की है
अशोक ट्रस्ट फ़ॉर रिसर्च इन इकोलॉजी ऐंड द एनवायरनमेंट के विश्लेषण का हवाला देते हुए डाउन टु अर्थ ने राज्यवार अनुमान छापे हैं: 100 मीटर की परिभाषा से राजस्थान में अरावली के मौजूदा विस्तार का 70 फ़ीसदी, हरियाणा में 82 फ़ीसदी, गुजरात में 82 फ़ीसदी और दिल्ली में पूरा हिस्सा संरक्षण से बाहर जाने के जोखिम में है। राजस्थान के लिए यह 18,081 गाँवों में 83,380 वर्ग किलोमीटर बताया गया है।
यह गिनती एक निजी शोध संस्था की है, सरकार की नहीं, और इसे उसी तरह पढ़ा जाना चाहिए।
फिर अदालत ने ख़ुद को रोका
20 नवंबर के फ़ैसले के बाद सड़क पर विरोध हुआ। 21 दिसंबर को सरकार ने फ़ैक्टशीट जारी कर कहा कि अरावली की पारिस्थितिकी को "कोई तत्काल ख़तरा नहीं"।
29 दिसंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की अवकाश पीठ ने 20 नवंबर के फ़ैसले पर रोक लगा दी, मामले का स्वतः संज्ञान लिया, और परिभाषा को दोबारा देखने के लिए नई विशेषज्ञ समिति बनाने का आदेश दिया।
एक ही अदालत, एक ही मुख्य न्यायाधीश, 39 दिन में फ़ैसला और उस पर रोक। और अब उसी समिति से यह कहना कि वह उनकी सेवानिवृत्ति का इंतज़ार कर रही है।
अरावली आख़िर है क्या

लंबाई पर स्रोत बँटे हैं: डाउन टु अर्थ 692 किलोमीटर लिखता है, दृष्टि का संकलन "800 किलोमीटर से अधिक"। दोनों मानते हैं कि श्रेणी गुजरात से दिल्ली तक राजस्थान और हरियाणा होकर जाती है। सबसे ऊँची चोटी माउंट आबू पर गुरु शिखर, 1,722 मीटर। चट्टानें लगभग 200 करोड़ साल पुरानी।
यह श्रेणी थार के रेगिस्तान को पूरब की ओर बढ़ने से रोकती है, भूजल भरती है, और 22 वन्यजीव अभयारण्यों और 3 बाघ अभयारण्यों का घर है। सुप्रीम कोर्ट ने अनियंत्रित खनन को यहाँ "देश की पारिस्थितिकी के लिए बड़ा ख़तरा" कहा है।
और इसी श्रेणी में जस्ता, सीसा, चाँदी, टंगस्टन, संगमरमर और ग्रेनाइट समेत 70 से ज़्यादा व्यावसायिक खनिज हैं। पहाड़ी की परिभाषा इसीलिए पैसे की परिभाषा भी है।
हरियाणा में क्या बचा है
आलोचकों की तरफ़ से "पीपल फ़ॉर अरावलीज़" की मई 2025 की नागरिक रिपोर्ट के आँकड़े डाउन टु अर्थ ने छापे हैं: हरियाणा में 2018-19 में 3,60,000 हेक्टेयर, यानी राज्य का 8.2 फ़ीसदी, अवक्रमित; वन-आवरण 3.6 फ़ीसदी, देश में सबसे कम; अजमेर से महेंद्रगढ़ के बीच श्रेणी में 12 से ज़्यादा बड़े टूटाव; महेंद्रगढ़ में भूजल 1,500 से 2,000 फ़ुट नीचे।
ये आँकड़े एक नागरिक समूह के हैं। सरकारी आँकड़ों से उनकी तुलना इस लेख के दायरे में नहीं है, पर संख्याएँ इस बात का पैमाना देती हैं कि दाँव पर क्या है।
तीन दशक के आदेश
यह झगड़ा 2025 का नहीं है। दृष्टि का कालक्रम इस तरह चलता है।
1992 में पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचना ने अरावली के हिस्सों में कई गतिविधियों पर पूर्व-अनुमति की शर्त लगाई। 2002 में राजस्थान की समिति ने 100 मीटर का पैमाना तय किया। 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के फ़रीदाबाद, गुड़गाँव और मेवात में खनन पर पूरी रोक लगाई। 2024 में अदालत ने पूरी श्रेणी में नए पट्टों और नवीनीकरण पर रोक लगाई और केंद्रीय अधिकार-प्राप्त समिति से विस्तृत जाँच कहलवाई।
हर आदेश ने खनन रोका। किसी ने यह तय नहीं किया कि रोक किस ज़मीन पर है। 2025 का फ़ैसला पहली कोशिश थी, और वही सबसे विवादित निकली।
2009 की रोक और 2024 की रोक में फ़र्क़
2009 की रोक हरियाणा के तीन ज़िलों की थी: फ़रीदाबाद, गुड़गाँव और मेवात। वह इलाक़े के नाम से चली, पहाड़ी की परिभाषा से नहीं। जहाँ ज़िले की सीमा ख़त्म, वहाँ रोक ख़त्म।
2024 की रोक पूरी श्रेणी पर है, पर उसमें भी "श्रेणी" शब्द की सीमा तय नहीं थी; इसीलिए अदालत ने उसी साल केंद्रीय अधिकार-प्राप्त समिति से विस्तृत जाँच कहलवाई और मंत्रालय की समिति से परिभाषा माँगी। दोनों रोकों के बीच पंद्रह साल हैं, और दोनों ही यह नहीं बतातीं कि 60 मीटर की टेकरी पर पट्टा मिलेगा या नहीं।
यही वह छेद है जिसे 100 मीटर की परिभाषा भरने आई थी, और जिस पर अब झगड़ा है।
पुराने पट्टों का क्या होगा

रोक नए पट्टों और नवीनीकरण पर है। जो पट्टे पहले से चल रहे हैं, वे अपनी अवधि तक चलते रहेंगे, जब तक कोई अलग आदेश न आए। फ़ैक्टशीट "नए पट्टों पर अंतरिम रोक" की भाषा इस्तेमाल करती है, और यही भाषा 2024 के आदेश की भी है।
यानी अगली परिभाषा जो भी बने, वह आगे के पट्टों की सीमा तय करेगी। जो खदान आज खुदी हुई है, वह उससे बंद नहीं होगी। खनिजों की सूची में संगमरमर और ग्रेनाइट ऊपर हैं, और जयपुर के आसपास की संगमरमर की खदानें इसी श्रेणी के दायरे में आती हैं।
अदालत की अपनी दो बातें
20 नवंबर के फ़ैसले में अदालत ने समिति की दो सिफ़ारिशों की तारीफ़ की थी: अवैध खनन रोकने के उपाय और सिर्फ़ टिकाऊ खनन की अनुमति। फ़ैक्टशीट फ़ैसले के पैरा 33 और 39 का हवाला देती है।
यानी विवाद इस पर नहीं है कि खनन रुके या नहीं। विवाद इस पर है कि "अरावली" शब्द के भीतर कितनी ज़मीन आती है। 100 मीटर की रेखा उस शब्द की सीमा खींचती है, और सीमा के बाहर का इलाक़ा वह है जहाँ पट्टे माँगे जाएँगे।
भारतीय वन सर्वेक्षण का अपना पैमाना
डाउन टु अर्थ के अनुसार भारतीय वन सर्वेक्षण पहले ढलान के आधार पर काम करता था: 3 डिग्री से ज़्यादा ढलान वाला हिस्सा, 100 मीटर के बफ़र के साथ। यह पैमाना ऊँचाई से नहीं, ढलान से चलता है, और उसमें नीची लेकिन ढलान वाली टेकरियाँ भी आ जाती हैं।
राजस्थान का 100 मीटर ऊँचाई का पैमाना और वन सर्वेक्षण का 3 डिग्री ढलान का पैमाना एक ही ज़मीन पर अलग-अलग नक़्शे बनाते हैं। समिति को इन्हीं दो नक़्शों में से एक चुनना है, या तीसरा बनाना है।
एक उदाहरण से यह फ़र्क़ समझिए। मान लीजिए एक टेकरी 60 मीटर ऊँची है और उसकी ढलान 8 डिग्री की। ऊँचाई के पैमाने पर वह पहाड़ी नहीं है, क्योंकि 100 से नीचे है। ढलान के पैमाने पर वह पहाड़ी है, क्योंकि 3 डिग्री से ज़्यादा है। अब मान लीजिए वही टेकरी किसी 120 मीटर की पहाड़ी से 400 मीटर दूर है; तब 500 मीटर के रेंज-नियम से वह ऊँचाई के पैमाने में भी सुरक्षित हो जाती है। और अगर वह 700 मीटर दूर है, तो नहीं।
यह गणित काल्पनिक है, पर समिति के सामने का सवाल यही है: कौन-सा पैमाना, और कितनी दूरी।
30 नवंबर के बाद क्या
अगर समिति समय पर रिपोर्ट देती है, तो 2 दिसंबर को अदालत उसे देखेगी। अगर नहीं देती, तो मुख्य न्यायाधीश के शब्दों में समिति दोबारा बनेगी।
तब तक 2024 की रोक चलती रहेगी: पूरी श्रेणी में कोई नया पट्टा नहीं, कोई नवीनीकरण नहीं। नवंबर 2025 का फ़ैसला रुका हुआ है, इसलिए 100 मीटर की राष्ट्रीय परिभाषा अभी काग़ज़ पर नहीं है; राजस्थान में वह 2006 से है ही।
जो सवाल बचा है
एक पहाड़ी कितनी ऊँची हो तो पहाड़ी कहलाए। राजस्थान ने बीस साल पहले कहा, सौ मीटर। एक मंत्रालय की समिति ने कहा, सौ मीटर, पर पूरी कंटूर और पाँच सौ मीटर के दायरे के साथ। एक अदालत ने मान लिया, फिर रोक दिया। एक शोध संस्था ने कहा कि इससे तीन-चौथाई ज़मीन बाहर रह जाएगी। एक सरकारी सर्वेक्षण ने कहा कि वह आँकड़ा उसका नहीं है।
30 नवंबर को इनमें से किसी एक को जवाब बनना है।
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