भारत मंडपम में मंगलवार को नौवां अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह शुरू हुआ, और केंद्रीय जल आयोग के अपने आंकड़े में देश 2021 से जल-तनाव की सीमा से नीचे है
मंगलवार, 22 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में जल शक्ति मंत्रालय का नौवां भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह शुरू हुआ, जिसका विषय जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन है। सम्मेलन की तैयारी-रिपोर्टों में कहीं नहीं छपा वह आंकड़ा जो केंद्रीय जल आयोग की जून 2019 की अपनी रिपोर्ट में दर्ज है: 2021 में देश की प्रति-व्यक्ति जल उपलब्धता 1,486 घन मीटर सालाना आंकी गई, और यह 1,700 घन मीटर की उस सीमा से नीचे है जिसे फ़ॉकेनमार्क सूचक जल-तनाव की शुरुआत मानता है।

भारत की प्रति-व्यक्ति जल उपलब्धता अभी 1,486 घन मीटर सालाना आंकी गई है। यह आंकड़ा किसी अख़बार का नहीं, केंद्र सरकार का अपना है। जिस रेखा को दुनिया भर में जल-तनाव की शुरुआत माना जाता है, यह आंकड़ा उससे नीचे है।
मंगलवार, 22 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में जल शक्ति मंत्रालय का नौवां भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह शुरू हुआ। पांच दिन चलने वाले इस सम्मेलन का विषय जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन है। सम्मेलन ख़ुद ख़बर नहीं है। ख़बर वह आंकड़ा है जो इसकी हर तैयारी-रिपोर्ट के नीचे दबा है, और उसे समझने के लिए तीन चीज़ें जाननी पड़ती हैं: वह गिनता किसे है, गिनता कैसे है, और दो सरकारी दस्तावेज़ एक ही साल के लिए अलग संख्या क्यों देते हैं।
1,700 घन मीटर की रेखा, और 2021 का आंकड़ा उससे नीचे
केंद्रीय जल आयोग हर कुछ बरस में देश की कुल जल-उपलब्धता का पुनर्आकलन करता है। सबसे ताज़ा रिपोर्ट जून 2019 में आई, नाम "Reassessment of Water Availability in India using Space Inputs"। इसके पहले अध्याय की एक तालिका प्रति-व्यक्ति जल उपलब्धता दर्ज करती है, और उसकी सबसे हालिया सत्यापित पंक्ति साल 2021 की है: 1,486 घन मीटर सालाना, प्रति व्यक्ति।
यह संख्या अकेले कुछ नहीं कहती, इसे मानक चाहिए। वह मानक फ़ॉकेनमार्क जल-तनाव सूचक है, स्वीडिश जल-विज्ञानी मालिन फ़ॉकेनमार्क के नाम पर। आयोग की रिपोर्ट इसे ख़ुद परिभाषित करती है: सालाना प्रति-व्यक्ति उपलब्धता 1,700 घन मीटर से कम हो तो अंग्रेज़ी में इसे "water stressed condition" कहा जाता है, और 1,000 घन मीटर से कम हो तो "water scarcity condition"। पहला जल-तनाव है, दूसरा जल-क़िल्लत। तालिका में भारत को जल-तनाव की श्रेणी पहली बार 2011 में मिली, और उसके बाद हर पंक्ति में यह श्रेणी दोहराई गई है, 2015 से 2051 तक, बिना नागा।
2031 का आंकड़ा और नीचे जाता है, 1,367 घन मीटर तक। दोनों को एक जैसा मत मानिए। रिपोर्ट 2021 को "assessed" लिखती है, 2031 को "projected"। एक मापा अनुमान है, दूसरा दस बरस आगे का प्रक्षेपण। यह फ़र्क़ छोटा लगता है। आगे हर हिस्से में यही फ़र्क़ काम करेगा।
यह आंकड़ा कुल पानी का हिसाब है, बरते जा सकने वाले पानी का हिसाब अलग है
1,486 घन मीटर किस चीज़ का हिसाब है? आयोग की अपनी वेबसाइट पर, जिसे आज 22 सितंबर 2026 की तारीख़ के साथ अपडेट दिखाया गया है, साफ़ लिखा है: 2019 के पुनर्आकलन में देश की बेसिनों का औसत सालाना जल-संसाधन 1,999.20 अरब घन मीटर आंका गया, तीस बरस के आंकड़ों, 1985 से 2015 तक, के आधार पर। यह प्राकृतिक बहाव है, नदियों में मौजूद कुल पानी। इसमें यह नहीं देखा गया कि उसमें से कितना बांधा जा सकता है, कितना नहरों तक पहुंचता है, कितना बिना इस्तेमाल हुए समंदर में मिल जाता है।
बरते जा सकने वाला पानी इससे बहुत कम है। वही वेबसाइट आगे बताती है: स्थलाकृति और मौजूदा ढांचे की सीमाओं के चलते इस्तेमाल-योग्य पानी सिर्फ़ 1,137 अरब घन मीटर है, जिसमें 690 अरब घन मीटर सतही पानी है और 447 अरब घन मीटर भूजल। दोनों अलग एजेंसियां नापती हैं। सतही पानी केंद्रीय जल आयोग नापता है। भूजल केंद्रीय भूजल बोर्ड नापता है। दोनों की गिनती इसी एक पन्ने पर जुड़ती है।

प्रति-व्यक्ति 1,486 घन मीटर वाला आंकड़ा 1,999.20 अरब घन मीटर को जनसंख्या से बांटकर निकला है, 1,137 अरब घन मीटर को नहीं। यानी कुल आंके गए पानी का बमुश्किल 57 फ़ीसदी हिस्सा ही मौजूदा ढांचे में बरता जा सकता है। सिर्फ़ बरते जा सकने वाले पानी पर प्रति-व्यक्ति हिसाब निकाला जाए तो वह आधे से भी कम बैठेगा। आयोग की तालिका यह दूसरा हिसाब कहीं नहीं देती। फ़ॉकेनमार्क सूचक ख़ुद कुल नवीकरणीय जल-संसाधन पर बना है, बरते जा सकने वाले हिस्से पर नहीं। तो यह चूक तालिका की नहीं, तरीक़े की है, और यह तरीक़ा दुनिया भर में यही सूचक बरतने वाला हर देश अपनाता है।
2021 और 2031 की आबादी गिनी नहीं गई, अनुमानित है
तालिका में हर साल के आगे जनसंख्या का कॉलम भी है, और यहीं भाजक की असली कहानी है। 2001 के आगे 102.7 करोड़ लिखा है, 2011 के आगे 121.1 करोड़, दोनों जनगणना के करीब के आंकड़े। पर 2021 के आगे 134.5 करोड़ है और 2031 के आगे 146.3 करोड़, और तालिका का अपना फुटनोट कहता है कि ये दोनों गिनती नहीं हैं। ये योजना आयोग के प्रक्षेपण से लिए गए हैं।
यह फ़र्क़ मामूली नहीं है। जनगणना की गिनती के बाद बहस नहीं बचती, लोग गिने जा चुके होते हैं। प्रक्षेपण की गिनती में मानी हुई जन्म-दर शामिल रहती है, मानी हुई मृत्यु-दर, मानी हुई प्रवासन-दर। असल आबादी अनुमान से कम निकले तो असल प्रति-व्यक्ति आंकड़ा 1,486 से ऊपर बैठेगा। ज़्यादा निकले तो नीचे। रिपोर्ट यह भेद छिपाती नहीं। फुटनोट में दर्ज है, बस पढ़ने वाले को तालिका की तीसरी पंक्ति तक जाना पड़ता है।
तो 1,486 घन मीटर दो अलग अनुमानों पर टिका एक नंबर है, एक बेसिनों के बहाव का, दूसरा भविष्य की आबादी का। दोनों 2019 में बने, दोनों उस साल की सबसे अच्छी समझ पर आधारित, और दोनों में बदलाव की गुंजाइश है। रिपोर्ट पहले अनुमान को "assessed" कहकर ज़्यादा पक्का जताती है, दूसरे को "projected" कहकर कम पक्का। असल में दोनों अनुमान हैं।
2001 और 2011 के आंकड़ों पर मंत्रालय और आयोग की अपनी तालिका अलग-अलग बात कहती हैं
यहां एक तालिका मदद करेगी। पिछले एक दशक में जल शक्ति मंत्रालय ने संसद में लिखित जवाबों में 2001 और 2011 के लिए जो आंकड़े बार-बार दोहराए, वे 2019 की उसी रिपोर्ट की तालिका से अलग हैं जिस पर वे आधारित होने का दावा करते हैं।
| साल | आबादी (करोड़) | मंत्रालय के संसदीय जवाब, 2014-2020 | आयोग की 2019 रिपोर्ट, तालिका-1 |
|---|---|---|---|
| 2001 | 102.7 | 1,816 घन मीटर | 1,820 घन मीटर |
| 2011 | 121.1 | 1,545 घन मीटर | 1,651 घन मीटर |
| 2021 | 134.5 | 1,486 घन मीटर | 1,486 घन मीटर |
| 2031 | 146.3 | 1,367 घन मीटर | 1,367 घन मीटर |
आख़िरी दो साल में कोई फ़र्क़ नहीं। पर 2001 में चार घन मीटर का अंतर है, और 2011 में 106 घन मीटर का, एक ही साल की एक ही आबादी पर। यह पूर्णांक की भूल जितना छोटा नहीं है। हिसाब लगाकर देखा जा सकता है।
1,820 को 102.7 करोड़ से गुणा करें तो जवाब आता है क़रीब 1,869 अरब घन मीटर। 1,651 को 121.1 करोड़ से गुणा करें तो जवाब आता है क़रीब 1,999 अरब घन मीटर। पहला आंकड़ा आयोग के 1993 वाले पुनर्आकलन का कुल जल-संसाधन है। दूसरा 2019 वाले का। यानी आयोग की अपनी तालिका 2001 की पंक्ति में पुराना कुल इस्तेमाल करती है, और 2011 की पंक्ति में नया, बिना यह कहीं लिखे कि बीच में तरीक़ा बदल गया।
मंत्रालय की तरफ़ का हिसाब उलटा जांचें तो और साफ़ होता है। 1,816 को 102.7 करोड़ से और 1,545 को 121.1 करोड़ से गुणा करने पर दोनों बार जवाब 1,865 से 1,871 अरब घन मीटर के बीच आता है। यानी मंत्रालय दोनों सालों के लिए पुराना ही कुल इस्तेमाल करता रहा, 14 अगस्त 2014 के जवाब से लेकर 2 मार्च 2020 के जवाब तक। फ़रवरी 2024 के अपने जवाब में मंत्रालय ने 2001 और 2011 का ज़िक्र ही छोड़ दिया, सिर्फ़ 2021 और 2031 के आंकड़े दिए। विवाद बताया नहीं गया, बस अगली बार टाल दिया गया।
पहला मौक़ा जब मंत्रालय ने 2021 और 2031 के नए आंकड़े जोड़े, वह 9 दिसंबर 2019 का जवाब था, रिपोर्ट के प्रकाशन के महज़ छह महीने बाद। उसी जवाब में मंत्रालय ने 2001 और 2011 के लिए पुराने आंकड़े जस के तस दोहराए, हालांकि नई रिपोर्ट तब मंत्रालय के अपने दफ़्तर में मौजूद थी। मंत्रालय का नाम भी इस बीच बदल गया। 14 अगस्त 2014 का जवाब जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के राज्य मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने लोकसभा में दिया था। 2019 में मंत्रालय जल शक्ति मंत्रालय बना, और उसके बाद के जवाब, राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया का 2 मार्च 2020 वाला और राज्य मंत्री बिश्वेश्वर टुडू का 5 फ़रवरी 2024 वाला (रिलीज़ आईडी 2002726), नए नाम से आए। नाम बदला, आंकड़ा नहीं बदला।
गिरावट आबादी बढ़ने से आई है, पानी घटने से नहीं।
आयोग का अपना कुल जल-संसाधन 1901-03 से 2019 तक हर पुनर्आकलन में या तो बढ़ा या करीब-करीब बराबर रहा, कभी घटा नहीं: 1,443.2, फिर 1,673, फिर 1,881, फिर 1,880, फिर 1,869, फिर 1,953, और अब 1,999.20 अरब घन मीटर। सात पुनर्आकलन, 118 बरस। हर बार अंश बढ़ा। जो घटता गया वह भाग है, आबादी है, हर तालिका की हर पंक्ति में।
नीति आयोग के अपने इंडिया क्लाइमेट ऐंड एनर्जी डैशबोर्ड पर भी प्रति-व्यक्ति जल उपलब्धता नाम से यही सूचक एक अलग पन्ने पर दर्ज है। उसके भीतर के आंकड़े जावास्क्रिप्ट से लोड होते हैं, और इस रिपोर्टिंग के दौरान सीधे निकाले नहीं जा सके। इसलिए यहां सिर्फ़ आयोग की अपनी रिपोर्ट और मंत्रालय के संसदीय जवाबों के आंकड़े दिए गए हैं, दोनों सीधे पढ़े हुए।
मापने का तरीक़ा उपग्रह-मॉडल है, ज़मीन के गेज उसकी जांच करते हैं, और यह हर साल नहीं दोहराया जाता
2019 की रिपोर्ट गिनती नहीं, एक मॉडल है। आयोग ने देश को बीस नदी-बेसिनों में बांटा, बारह बड़े और आठ संयुक्त, और हर बेसिन के लिए हर महीने का बहाव उपग्रह से मिले बारिश और भू-आकृति के आंकड़ों से हर पिक्सेल पर निकाला। महीना-दर-महीना हिसाब जोड़कर साल का बहाव बनता है, और साल-दर-साल हिसाब जोड़कर तीस बरस का औसत, 1985 से 2015 तक।
प्राकृतिक बहाव अकेले नदी में बहते पानी से नहीं निकलता। रिपोर्ट का अपना समीकरण इसमें ऊपर की सिंचाई, घरेलू और औद्योगिक निकासी जोड़ता है, फिर उन्हीं मदों से वापस लौटने वाला पानी घटाता है, फिर जलाशयों के भंडारण में बदलाव और वाष्पीकरण का हिसाब लगाता है। मतलब सिर्फ़ बहता हुआ पानी नहीं, वह पानी जो बहता अगर ऊपर कोई हाथ न लगाता।
मॉडल को अकेला नहीं छोड़ा गया। हर बेसिन में आयोग के अपने गेज-और-डिस्चार्ज केंद्रों पर जो बहाव सच में नापा गया, मॉडल के अनुमान को उसी से जांचा गया। साबरमती बेसिन में यह जांच कैसी दिखती है, रिपोर्ट ख़ुद बताती है। 1993 के आकलन में वहां सिर्फ़ एक गेज केंद्र था, धरोई में, और उसका जलागम क्षेत्र बेसिन के एक छोटे हिस्से तक सीमित था। नए आकलन ने अहमदाबाद वाले पुराने केंद्र का डेटा भी जोड़ा, बीच के खाली सालों को बारिश-बहाव के गणित से भरकर।
यह हर साल नहीं होता। पहला अनुमान 1901-03 में बना, फिर 1949 में, 1960 में, 1988 में, 1993 में, 1999 में, और अब 2019 में। सात बार, 118 बरस में। दो पुनर्आकलनों के बीच का हर साल कोई नई गिनती नहीं देखता। वही आख़िरी तालिका आगे खिसकती रहती है, बस आबादी का अनुमान बदलता है। तो 2026 में कोई देश की प्रति-व्यक्ति जल उपलब्धता पूछे तो जवाब सात बरस पुराने एक मॉडल से आता है, इस हफ़्ते नापे गए पानी से नहीं आता।
जलागम क्षेत्र का हिसाब भी बदला। 1993 के अध्ययन ने 32,27,121 वर्ग किलोमीटर नापा था, नए अध्ययन ने 32,71,953, बेहतर भू-स्थानिक आंकड़ों की मदद से। तीस बरस पर औसत बारिश 3,880 अरब घन मीटर आंकी गई, जिसमें लेह-लद्दाख का 27 अरब घन मीटर अलग से जोड़ा गया।
भूजल की अपनी अलग गिनती: 6,746 इकाइयों में से 751 अति-दोहित
प्रति-व्यक्ति 1,486 घन मीटर पूरे देश का औसत है, एक ही तराज़ू पर तौला हुआ। भूजल का हिसाब अलग तराज़ू से होता है। वह तराज़ू व्यक्ति नहीं, ब्लॉक गिनता है। आयोग की वेबसाइट ने भूजल का बरते जा सकने वाला हिस्सा 447 अरब घन मीटर बताया था, ऊपर के हिस्से में। भूजल बोर्ड की ताज़ा गिनती में सालाना पुनर्भरण 446.90 अरब घन मीटर निकला, यानी दो अलग संस्थाओं के अलग-अलग वक़्त पर किए गए हिसाब लगभग एक ही जगह मिलते हैं।
केंद्रीय भूजल बोर्ड और राज्यों ने मिलकर देश की गतिशील भूजल संसाधन आकलन रिपोर्ट 2024 बनाई, जिसे जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटील ने 31 दिसंबर 2024 को जारी किया। इसके मुताबिक़ देश में सालाना भूजल पुनर्भरण 446.90 अरब घन मीटर है। प्राकृतिक बहाव के लिए हिस्सा अलग रखने के बाद निकालने-योग्य संसाधन 406.19 अरब घन मीटर बचता है, और असल सालाना निकासी 245.64 अरब घन मीटर है। यानी देश औसतन अपने निकालने-योग्य भूजल का 60.47 फ़ीसदी हर साल निकाल लेता है।
यह औसत भी पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। रिपोर्ट देश को 6,746 आकलन इकाइयों में बांटती है, यानी ब्लॉक, मंडल और तालुका। इनमें से 4,951, यानी 73.4 फ़ीसदी, सुरक्षित श्रेणी में हैं। 711 यानी 10.5 फ़ीसदी अर्ध-संकटग्रस्त हैं, 206 यानी 3.05 फ़ीसदी संकटग्रस्त, और 751 यानी 11.1 फ़ीसदी अति-दोहित घोषित हैं, जहां निकासी दर सौ फ़ीसदी से ऊपर जा चुकी है। बाक़ी 127 इकाइयां खारे पानी की वजह से अलग श्रेणी में रखी गई हैं।

यह वर्गीकरण फ़ॉकेनमार्क सूचक से बिल्कुल अलग गणित पर टिका है। फ़ॉकेनमार्क पूछता है कि एक व्यक्ति के हिस्से कितना पानी आता है। भूजल बोर्ड का वर्गीकरण पूछता है कि एक ब्लॉक कितना निकाल रहा है, चाहे वहां कितने भी लोग रहें। इसलिए कोई राज्य प्रति-व्यक्ति हिसाब में औसत दिख सकता है, और उसके भीतर के दर्जनों ब्लॉक अति-दोहित हो सकते हैं। दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं, और दोनों अलग दस्तावेज़ों में दर्ज हैं।
2017 के मुक़ाबले सुधार भी हुआ है, रिपोर्ट के अपने आंकड़ों में: अति-दोहित इकाइयों का हिस्सा 17.24 फ़ीसदी से घटकर 11.13 फ़ीसदी पर आया है। पर यह सुधार भूजल बोर्ड के तराज़ू पर है, फ़ॉकेनमार्क के तराज़ू पर नहीं। दोनों तराज़ू कभी एक-दूसरे से नहीं मिलते।
सम्मेलन पांच दिन का है, फ़ैसला आज कोई नहीं हुआ
भारत जल सप्ताह की शुरुआत 2012 में हुई थी। इसके बाद 2013, 2015, 2016, 2017, 2019, 2022 और 2024 में एक-एक बार यह आयोजन हुआ, आधिकारिक आयोजक वेबसाइट के मुताबिक़। यह नौवां संस्करण है, और पहली बार नाम में अंतरराष्ट्रीय शब्द जुड़ा है।
22 अप्रैल 2026 को जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटील ने श्रम शक्ति भवन में इसका पूर्व-शुभारंभ किया था, विज्ञप्ति और वेबसाइट जारी करके। पीआईबी की उस विज्ञप्ति के मुताबिक़ सम्मेलन में 49 सत्र होंगे, क़रीब 150 देशों को न्योता भेजा गया है, और 11 देशों के भागीदार देश बनने की उम्मीद है। 84 केंद्रीय मंत्रालयों और 36 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों को भी बुलाया गया है। भारत मंडपम के हॉल नंबर 14जीएफ़ में चार दिन की प्रदर्शनी भी लगेगी, और आख़िरी दिन प्रतिनिधि क्षेत्र-भ्रमण पर जाएंगे।
आज के उद्घाटन की तफ़सील कई पूर्वावलोकन रिपोर्टों में है: उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन सुबह साढ़े दस बजे भारत मंडपम के प्लेनरी हॉल में सम्मेलन का उद्घाटन कर रहे हैं, और नीदरलैंड्स तथा जर्मनी को इस बार का भागीदार देश बताया गया है। इस डेस्क को उद्घाटन समारोह पर कोई पीआईबी विज्ञप्ति नहीं मिली। यह पैराग्राफ़ इसलिए पूर्वावलोकन रिपोर्टों पर टिका है, मंत्रालय के अपने दस्तावेज़ पर नहीं।

जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन थीम सिर्फ़ एक जुमला नहीं है। अप्रैल की विज्ञप्ति में सूचीबद्ध सत्रों में शहरी बाढ़, नदी-लचीलापन, समावेशी जल-प्रशासन, जल-सुरक्षा के लिए तकनीक, जलवायु जोखिम, और जल ढांचे के लिए नए वित्तपोषण मॉडल जैसे विषय शामिल हैं। यही सूची बताती है कि थीम का असल मतलब क्या है, अप्रैल की विज्ञप्ति के अपने शब्दों में।
पांच दिन में जो भी घोषणा हो, मंत्री की तरफ़ से या उपराष्ट्रपति की तरफ़ से, वह भाषण है, फ़ैसला नहीं। 1,486 घन मीटर का आंकड़ा किसी सम्मेलन से नहीं बदलता। वह अगले पुनर्आकलन से बदलेगा, और अगला पुनर्आकलन कब आएगा, इसकी कोई तारीख़ किसी दस्तावेज़ में तय नहीं है।
स्रोतकेंद्रीय जल आयोग, \"Reassessment of Water Availability in India using Space Inputs\" (मुख्य रिपोर्ट, जून 2019) — तालिका-1 पृष्ठ 3, तालिका-7 पृष्ठ 78-79, अध्याय 2 पृष्ठ 13-17 और 20, केंद्रीय जल आयोग की वेबसाइट, \"Water Resource Estimation\" पन्ना, 22 सितंबर 2026 को देखा गया, पत्र सूचना कार्यालय, जल शक्ति मंत्रालय, 5 फ़रवरी 2024, राज्यसभा में लिखित उत्तर (बिश्वेश्वर टुडू), पत्र सूचना कार्यालय, जल संसाधन मंत्रालय, 14 अगस्त 2014, लोकसभा में लिखित उत्तर (संतोष कुमार गंगवार), पत्र सूचना कार्यालय, जल शक्ति मंत्रालय, 9 दिसंबर 2019, पत्र सूचना कार्यालय, जल शक्ति मंत्रालय, 2 मार्च 2020, राज्यसभा में लिखित उत्तर (रतन लाल कटारिया), पत्र सूचना कार्यालय, जल शक्ति मंत्रालय, 31 दिसंबर 2024, गतिशील भूजल संसाधन आकलन रिपोर्ट 2024, पत्र सूचना कार्यालय, जल शक्ति मंत्रालय, 22 अप्रैल 2026, नौवें भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह का पूर्व-शुभारंभ (सी.आर. पाटील), भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह की आधिकारिक वेबसाइट, पिछले संस्करणों की सूची, नीति आयोग, इंडिया क्लाइमेट ऐंड एनर्जी डैशबोर्ड (पन्ने पर सूचक मौजूद; भीतर के आंकड़े जावास्क्रिप्ट-रेंडर्ड, इस रिपोर्टिंग में सीधे नहीं निकाले जा सके), उत्कर्ष क्लासेज़ करेंट अफ़ेयर्स, पूर्वावलोकन रिपोर्ट, एशियानेट न्यूज़एबल, पूर्वावलोकन रिपोर्ट