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गोडावण के प्राथमिकता क्षेत्र से 1.77 किलोमीटर दूर चूना-पत्थर खदान की मंज़ूरी टली, पर समिति ने जो सात चीज़ें माँगीं उनमें पक्षी का ज़िक्र नहीं

पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने 24-25 अगस्त 2026 की बैठक में जैसलमेर के रामगढ़ ब्लॉक की 256 हेक्टेयर खदान को टाल दिया। कार्यवृत्त में यह दर्ज है कि खदान से निकले इस्पात-श्रेणी के चूना-पत्थर का रास्ता गोडावण के प्राथमिकता क्षेत्र से होकर गुज़रता है। समिति ने इस पर शर्त नहीं लगाई, सुझाव दिया।

राजस्थान के खुले घास-मैदान में चलता हुआ एक गोडावण, यह तस्वीर नवंबर 2015 की है; कार्यवृत्त में दर्ज है कि खदान से निकले पत्थर का रास्ता इसी पक्षी के प्राथमिकता क्षेत्र से गुज़रता है
तस्वीर: Saurabhsawantphoto, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

इंदिरा पर्यावरण भवन के तीस्ता हॉल में स्क्रीन पर एक केएमएल फ़ाइल खुली हुई थी। उस पर वह रास्ता था जिससे जैसलमेर के रामगढ़ ब्लॉक से निकला इस्पात-श्रेणी का चूना-पत्थर सानू रेलवे स्टेशन तक जाना है। कार्यवृत्त में जो वाक्य दर्ज हुआ वह यह है कि यह रास्ता गोडावण के प्राथमिकता क्षेत्र से होकर गुज़रता है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (गैर-कोयला खनन) की ग्यारहवीं बैठक 24 और 25 अगस्त 2026 को हुई। डालमिया भारत ग्रीन विज़न लिमिटेड की 256 हेक्टेयर की इस खदान को पर्यावरणीय मंज़ूरी नहीं मिली। समिति ने प्रस्ताव टाल दिया और कंपनी से सात चीज़ें माँगीं।

उन सात में एक भी गोडावण से जुड़ी नहीं है।

जो मंज़ूरी टली, और किस समिति ने टाली

कार्यवृत्त की पहचान संख्या EC/MOM/EAC/823197/8/2026 है और उस पर तारीख़ 7 सितंबर 2026 पड़ी है, यानी बैठक के तेरह दिन बाद वह परिवेश पोर्टल पर आया। प्रस्ताव संख्या IA/RJ/MIN/565760/2026 है, फ़ाइल संख्या J-11015/34/2024-IA.II(NCM)। बैठक की अध्यक्षता सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा अधिकारी महेंद्र सिंह ढाकड़ ने की। पहला दिन तीस्ता हॉल में, दूसरा सतलुज हॉल में, दोनों जोड़ बाग़ के इंदिरा पर्यावरण भवन में। बैठक के सामने पंद्रह प्रस्ताव थे। बारह को समिति ने सिफ़ारिश दी, एक को मौजूदा रूप में लौटा दिया, और दो को अतिरिक्त ब्योरे के लिए टाला। रामगढ़ उन दो में से एक है।

जिन सात चीज़ों की माँग हुई

समिति ने कंपनी से कहा कि खनन योजना को संदर्भ शर्तों के अनुरूप संशोधित करे; ढके हुए कन्वेयर बेल्ट के लिए मील-पत्थर, समयसीमा और पीईआरटी/सीपीएम चार्ट दे, साथ में उस अधिकारी का नाम और पद जो इसे देखेगा; हरित पट्टी के लिए साल-दर-साल पौधरोपण की योजना दे; ब्लास्टिंग से पानी और गैस की पाइपलाइनों की सुरक्षा पर कार्ययोजना दे; गेल की शर्तें पूरी करने की कार्ययोजना दे; पर्यावरण प्रबंधन योजना और जन सुनवाई कार्ययोजना को भौतिक और वित्तीय लक्ष्यों के साथ दोबारा बनाए; और ज़मीन खोने वाले परिवारों को रोज़गार देने की योजना दे। सूची में पक्षी, आवास या परिवहन मार्ग पर कोई शर्त नहीं है।

2.99 और 5.4 के बीच का फ़र्क़

टालने की जो पहली वजह कार्यवृत्त में दर्ज है, वह काग़ज़ों की है। भारतीय खान ब्यूरो ने 4 सितंबर 2023 के पत्र से जिस खनन योजना को मंज़ूरी दी, वह सालाना 2.99 मिलियन टन उत्पादन की है। मंत्रालय ने 2 सितंबर 2024 को संदर्भ शर्तें 5.4 मिलियन टन के लिए दीं। समिति ने लिखा कि स्वीकृत खनन योजना संदर्भ शर्तों के "अनुरूप नहीं" है। स्वीकृत योजना की साल-दर-साल तालिका भी कार्यवृत्त में है: पहले साल शून्य, दूसरे साल 2,15,280 टन, तीसरे साल 7,36,920 टन, चौथे साल 20,28,600 टन और पाँचवें साल 29,99,016 टन। यही आख़िरी आँकड़ा 2.99 मिलियन टन बनता है।

सानू का रास्ता, जो प्राथमिकता क्षेत्र से गुज़रता है

जैसलमेर ज़िले के हमीरा में रेलवे फाटक पर रुका एक लदा हुआ ट्रक, पीछे पत्थर-मिट्टी के ऊँचे ढेर; यह तस्वीर 2011 या उससे पहले की है और रामगढ़ की खदान से इसका कोई संबंध नहीं
तस्वीर: Blue cab, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

खदान से निकलने वाला ज़्यादातर चूना-पत्थर ढके कन्वेयर बेल्ट से बग़ल के प्रस्तावित सीमेंट संयंत्र में जाएगा। इस्पात गलाने के काम आने वाली एसएमएस-श्रेणी अलग है। वह ट्रकों से राष्ट्रीय राजमार्ग 68 पर होते हुए सानू रेलवे स्टेशन तक जाएगी, जो पट्टा सीमा से लगभग 17 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है; उसी दस्तावेज़ की एक तालिका में यही दूरी 15.22 किलोमीटर लिखी है। कंपनी ने यह मार्ग केएमएल पर दिखाया और कार्यवृत्त ने दर्ज किया कि वह गोडावण प्राथमिकता क्षेत्र से गुज़रता है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की सिफ़ारिश थी कि ढुलाई मौजूदा सड़कों से ही हो। समिति ने कंपनी को इस सिफ़ारिश का पालन करने का "सुझाव" दिया।

1.77 किलोमीटर और वह नक़्शा जिस पर मुहर लगी

दूरी का काग़ज़ 14 मई 2026 का है। उप वन संरक्षक (वन्यजीव), जैसलमेर के दफ़्तर से प्रमाणित नक़्शा पत्र संख्या एफ/विविध/उपसंवजीजै/2026/2563 के साथ जारी हुआ। उसके मुताबिक़ खदान संशोधित गोडावण प्राथमिकता क्षेत्र के बाहर है और उससे लगभग 1.77 किलोमीटर दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम पड़ती है। उसी प्रमाणपत्र से यह भी दर्ज हुआ कि मरु राष्ट्रीय उद्यान 51.4 किलोमीटर दक्षिण में है और उसका पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र 41.4 किलोमीटर। मोकला-परेवर संरक्षण रिज़र्व की सीमा 22 किलोमीटर दूर है। कार्यवृत्त इस प्राथमिकता क्षेत्र की परिभाषा का स्रोत भी लिखता है: सुप्रीम कोर्ट का रिट याचिका (सिविल) 838/2019 में 19 दिसंबर 2025 का आदेश।

गोडावण कितने बचे हैं, और यह आँकड़ा किसका है

भारतीय वन्यजीव संस्थान की ताज़ा गणना रिपोर्ट 2017-18 के बाद पहली है। इंडियन एक्सप्रेस ने 10 जुलाई 2026 को लिखा कि इसे केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने जारी किया और उसमें संख्या 130 दी गई है, जिसके साथ जमा-घटा 21 का दायरा जुड़ा है। यानी असल दायरा 110 से 150 के बीच है। इसी अख़बार ने 10 सितंबर की ख़बर में इसे "लगभग 130" लिखा, बिना दायरे के। रिपोर्ट यह भी कहती है कि पक्षी सर्वेक्षित भूभाग के "सिर्फ़ 16 फ़ीसदी" हिस्से में मिलता है। गणना सिर्फ़ राजस्थान में हुई, गुजरात में नहीं, जहाँ जंगल में कुछ मादाएँ ही बची हैं। 2024-25 के सर्वेक्षण में 35 गोडावण झुंड, 1,568 चिंकारा समूह और 79 मरु लोमड़ियाँ दर्ज हुईं।

19 दिसंबर 2025: अदालत ने खनन पर क्या कहा

फ़ैसले का पैराग्राफ़ 68 इस पूरे मामले की धुरी है। याचिकाकर्ताओं ने माँगा था कि प्राथमिकता क्षेत्रों और संशोधित प्राथमिकता क्षेत्रों में चूना-पत्थर या दूसरा खनन रोका जाए। न्यायमूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने यह माँग स्वीकार नहीं की। फ़ैसले में लिखा है कि खनन, चाहे लघु खनिज का ही हो, खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 जैसे क़ानूनों के दायरे में आता है। इसके बाद अदालत ने एक वाक्य जोड़ा: वैधानिक प्राधिकरण और नियामक इस इलाक़े की नाज़ुकी से वाक़िफ़ होंगे, और "हमें भरोसा है कि ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा जो गोडावण के संरक्षण पर रत्ती भर भी असर डाले।"

बिजली की लाइनें और सुप्रीम कोर्ट का 2021 का आदेश

जैसलमेर के बाहर थार की खुली रेत और झाड़ी, बीच में बिजली के खंभे और दूर क्षितिज पर पवन चक्कियाँ, अक्टूबर 2007 की तस्वीर; 2021 के अंतरिम आदेश ने ऐसे ही इलाक़े में नई ऊपरी लाइनें खड़ी करने पर रोक लगाई थी
तस्वीर: Vyacheslav Argenberg, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

19 अप्रैल 2021 के अंतरिम आदेश ने लगभग 99,000 वर्ग किलोमीटर के इलाक़े में ऊपरी बिजली लाइनें खड़ी करने पर रोक लगाई थी। अदालत ने तीन सदस्यों की एक समिति बनाई जो यह देखे कि उच्च वोल्टेज की लाइनें ज़मीन के नीचे डाली जा सकती हैं या नहीं। जहाँ लाइनें पहले से थीं, वहाँ पक्षी-मोड़क लगाने का आदेश हुआ। जहाँ ज़मीन के नीचे डालना संभव हो, वहाँ एक साल के भीतर काम पूरा करने को कहा गया। बाद में यही समिति मामला-दर-मामला छूट देती रही। पक्षी की आगे की नज़र कमज़ोर होती है, इसलिए वह तार देखकर मुड़ नहीं पाता।

मार्च 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना ही आदेश क्यों बदला

नवंबर 2021 में पर्यावरण मंत्रालय, बिजली मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने संशोधन की अर्ज़ी दी। 21 मार्च 2024 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने 2021 का आदेश बदल दिया। फ़ैसले में जो कारण गिनाए गए वे तकनीकी हैं: ज़मीन के नीचे डालने लायक़ केबल सिर्फ़ 400 केवी में उपलब्ध है और उसका ड्रम 250 मीटर का होता है, जिससे जोड़ों की संख्या और ख़तरा दोनों बढ़ते हैं; रेगिस्तान की तेज़ हवा और रेत ज़मीनी केबल के निशान ढँक देती है; भूमिगत केबल में संचरण हानि लगभग पाँच गुना ज़्यादा होती है; और जिस इलाक़े की बात है उसकी सौर क्षमता का सिर्फ़ 3 फ़ीसदी अब तक इस्तेमाल हुआ है। फ़ैसले में यह आकलन भी दर्ज है कि बाक़ी क्षमता अछूती रही तो भविष्य में 93,000 मेगावाट कोयला बिजली और लगानी पड़ेगी, जिससे लगभग 623 अरब किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड निकलेगी। पैराग्राफ़ 60 में अदालत ने लिखा कि दोनों लक्ष्यों में से किसी एक को दूसरे की वेदी पर नहीं चढ़ाया जा सकता।

अनुच्छेद 21 और 14 से निकला अधिकार

उसी 2024 के फ़ैसले का एक हिस्सा बिजली की तारों से बहुत आगे चला गया। अदालत ने लिखा कि अनुच्छेद 48ए राज्य से पर्यावरण की रक्षा कहता है और अनुच्छेद 51ए(छ) नागरिक से, पर ये दोनों वाद-योग्य नहीं हैं। फिर उसने जोड़ा कि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है और अनुच्छेद 14 क़ानून के समक्ष समानता, और यही दोनों स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार तथा जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्ति के अधिकार के स्रोत हैं। फ़ैसले ने यह भी दर्ज किया कि भारत में जलवायु परिवर्तन पर कोई एक छाता क़ानून नहीं है, पर इससे यह नहीं निकलता कि लोगों के पास ऐसा अधिकार नहीं है।

जिन पाँच जगहों को विशेषज्ञ समिति ने सबसे नाज़ुक बताया

2024 के आदेश से बनी विशेषज्ञ समिति ने राजस्थान के प्राथमिकता क्षेत्र को 13,163 वर्ग किलोमीटर से बढ़ाकर 14,013 वर्ग किलोमीटर करने की सिफ़ारिश की, यानी 850 वर्ग किलोमीटर जोड़ने की। गुजरात के लिए 740 वर्ग किलोमीटर का संशोधित प्राथमिकता क्षेत्र तय हुआ। दिसंबर 2025 के फ़ैसले ने दोनों आँकड़े मंज़ूर कर लिए। समिति ने संशोधित प्राथमिकता क्षेत्र के भीतर पाँच जगहें चिह्नित कीं जिन्हें जोड़ने, बहाल करने और बचाने की ज़रूरत है। इनमें दूसरी जगह का नाम "सानू-मोकला-परेवर क्षेत्र" है। रामगढ़ की खदान से एसएमएस-श्रेणी का पत्थर जिस रेलवे स्टेशन तक जाना है, कार्यवृत्त में उसका पूरा नाम "सानू रेलवे स्टेशन परेवर" लिखा है।

जैसलमेर का वह इलाक़ा: डीएनपी, पोकरण, और खनन के पट्टे

बाक़ी चार चिह्नित जगहें मरु राष्ट्रीय उद्यान का सलखा-कुचरी हिस्सा, पोकरण फ़ील्ड फ़ायरिंग रेंज और उसका बफ़र, रामदेवरा का इलाक़ा तथा धोलिया-खेतोलाई-चाचा का इलाक़ा हैं। बिजली के लिए अदालत ने 5 किलोमीटर तक चौड़ा एक गलियारा मंज़ूर किया, जो मरु राष्ट्रीय उद्यान के सबसे दक्षिणी बाड़े से कम से कम 5 किलोमीटर दक्षिण रहेगा। राजस्थान में 33 केवी की 80 किलोमीटर लाइन तुरंत ज़मीन के नीचे डालने का निर्देश है, और भारतीय वन्यजीव संस्थान की चिह्नित 250 किलोमीटर महत्वपूर्ण लाइनों को भी। सारे शमन उपाय आदेश की तारीख़ से दो साल में पूरे करने हैं। खनन इस पूरी सूची से बाहर रखा गया।

प्रजनन केंद्र में जो चूज़े पैदा हुए

मरु राष्ट्रीय उद्यान, राजस्थान में एक नर गोडावण का मादा के सामने प्रणय-प्रदर्शन, अगस्त 2016 की तस्वीर; यह जंगल की है, किसी प्रजनन केंद्र की नहीं
तस्वीर: T. R. Shankar Raman, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सम और रामदेवरा के संरक्षण प्रजनन केंद्र इसी परियोजना का हिस्सा हैं, जहाँ जंगल से अंडे उठाकर नियंत्रित हालात में पाले जाते हैं। द बेटर इंडिया ने 31 मार्च 2026 को छपी रिपोर्ट में लिखा कि सम केंद्र में उस महीने दो चूज़े निकले, एक 10 मार्च को प्राकृतिक संसर्ग से और दूसरा 12 मार्च को कृत्रिम गर्भाधान से। इन दोनों से पहले केंद्रों में 68 पक्षी थे, इनके बाद 70। परियोजना की मुख्य पशु-चिकित्सक डॉ. तुष्ना करकरिया ने उसी रिपोर्ट में छोड़े जाने वाले पक्षियों के बारे में कहा कि "साठ से 70 फ़ीसदी नहीं बचेंगे, पर 20 से 30 फ़ीसदी बचेंगे।" अगले चरण में इन्हीं पक्षियों को जंगल में छोड़ा जाना है।

चूना-पत्थर यहाँ क्यों है, और सीमेंट उद्योग का इससे क्या रिश्ता

ब्लॉक के नीचे जो भंडार आँका गया है वह 194.14 मिलियन टन भूवैज्ञानिक संसाधन है, जिसमें से 82.62 मिलियन टन खनन-योग्य भंडार माना गया। कंपनी ने पट्टे के दक्षिण-पश्चिम में सटा हुआ सीमेंट संयंत्र प्रस्तावित किया है। गड्ढे से क्रशर तक पत्थर 50 टन क्षमता के आठ डंपरों से जाएगा, क्रशर 1,800 टन प्रति घंटा का है, और कुचला पत्थर ढके कन्वेयर बेल्ट से संयंत्र तक। इस्पात-श्रेणी वाला हिस्सा माँग के हिसाब से ट्रकों पर जाएगा, राजमार्ग 68 पर, जिसकी चौड़ाई 7 से 15 मीटर के बीच है।

एक ही बैठक में तीन चूना-पत्थर ब्लॉक

उसी बैठक की सूची में राजस्थान के दो और चूना-पत्थर ब्लॉक थे। श्री सीमेंट लिमिटेड का एचपीबी19 ब्लॉक नागौर ज़िले में 476.8022 हेक्टेयर का है और सालाना 5.00 मिलियन टन का। उसके कार्यवृत्त में दर्ज है कि पाँच राजस्व गाँवों में फैले इस पट्टे से 344 परिवार प्रभावित होंगे और पुनर्वास का बजट 219.99 करोड़ रुपये रखा गया है। मंगलम सीमेंट लिमिटेड का निमाना-दुनिया ब्लॉक कोटा ज़िले में 299.15 हेक्टेयर का है और 1.50 मिलियन टन सालाना का; यही दूसरा प्रस्ताव है जिसे इस बैठक में टाला गया। मध्य प्रदेश के धार ज़िले का देदली-बी ब्लॉक अभी संदर्भ शर्तों के चरण में है।

लीज़ के भीतर एक गाँव, और एक जोड़ जो नहीं मिलता

पट्टे की ज़मीन का बँटवारा कार्यवृत्त में इस तरह है: 49.13 हेक्टेयर निजी खातेदारी, 160.19 हेक्टेयर सरकारी, 46.68 हेक्टेयर सेट अपार्ट या आरक्षित, और 9.3557 हेक्टेयर आबादी। पहली तीन संख्याएँ जोड़ने पर ठीक 256.00 हेक्टेयर बनती हैं, यानी पूरा पट्टा। आबादी वाली 9.3557 हेक्टेयर उसके ऊपर बैठती है और दस्तावेज़ इस अंतर को कहीं नहीं समझाता। बस्ती पट्टे के उत्तर-पश्चिमी कोने में है, कामियों की ढाणी 0.12 किलोमीटर दक्षिण में, और तीन स्कूल खदान की सीमा से 500 मीटर के भीतर। समिति ने कंपनी को यह टटोलने की सलाह दी कि बस्ती को पट्टे से बाहर बसाया जा सकता है या नहीं, क्योंकि अवधारणात्मक चरण में उसी हिस्से में खनन प्रस्तावित है।

गैस और पानी की दो पाइपलाइनें

राजमार्ग 68 के दक्षिण में गेल की 1,040 मीटर लंबी गैस पाइपलाइन पट्टे के भीतर से निकलती है। गेल ने 15 जनवरी 2026 के पत्र से दो पाइपलाइनों को पार करने की सैद्धांतिक मंज़ूरी दी, पर कार्यवृत्त कहता है कि कंपनी ने गेल की तय शर्तें अभी पूरी नहीं कीं और उसकी उठाई माँग का भुगतान भी नहीं किया। पानी की पाइपलाइन राजमार्ग के साथ बिछी है और आशय-पत्र क्षेत्र के भीतर आती है। समिति ने साफ़ किया कि स्कूल, बस्ती, गैस पाइपलाइन, पानी की पाइपलाइन और पेट्रोल पंप से 500 मीटर के भीतर ब्लास्टिंग नहीं होगी, और कंपन, फ़्लाई-रॉक तथा वायु-अतिदाब को नियंत्रित करने की कार्ययोजना माँगी।

68 परिवार, और मुआवज़े का हिसाब

पुनर्वास योजना के मुताबिक़ रामगढ़ गाँव के 34 परिवारों की खेती की ज़मीन जाएगी और 34 परिवारों के मकान, कुल 68 प्रभावित परिवार। इसके लिए 3.8869 करोड़ रुपये रखे गए हैं। परियोजना की पूँजी लागत 58.13 करोड़ रुपये बताई गई और रोज़गार 62 लोगों का। समिति ने पर्यावरण संरक्षण के लिए बढ़ा हुआ बजट माँगा, जिस पर कंपनी ने 25 अगस्त की ई-मेल से 516 लाख रुपये पूँजीगत और 52.49 लाख रुपये सालाना आवर्ती ख़र्च बताया। सातवीं माँग यही है कि ज़मीन खोने वालों को नौकरी देने की अलग कार्ययोजना बने।

जन सुनवाई: 49 लोग, 12 लिखित आपत्तियाँ

23 दिसंबर 2025 को रामगढ़ के तहसील दफ़्तर में जन सुनवाई हुई, जो पट्टा क्षेत्र से 1.7 किलोमीटर दूर है। अध्यक्षता अतिरिक्त ज़िला कलेक्टर पारसराम और राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी जगदीश चौधरी ने की। आस-पास के गाँवों से लगभग 49 लोग पहुँचे, दो ने मौखिक बात रखी और 12 लिखित अभ्यावेदन मंडल को मिले। सूचना अंग्रेज़ी में इंडियन एक्सप्रेस में 19 नवंबर 2025 को और हिंदी में दैनिक भास्कर में 20 नवंबर को छपी थी। सुनवाई में उठे मुद्दों पर तीन साल में 150 लाख रुपये ख़र्च करने की योजना है, जिसका बँटवारा 51.50, 35.50 और 63.00 लाख रुपये है।

जो आँकड़े एक ही मौसम के हैं

आधारभूत पर्यावरणीय आँकड़े अक्टूबर से दिसंबर 2024 के बीच जुटाए गए, यानी सिर्फ़ मानसून के बाद वाले मौसम में। समिति ने इसे दर्ज किया और कंपनी का यह कहना भी कि सभी मापे गए मानक तय सीमा के भीतर मिले और वायु प्रदूषकों की अनुमानित सांद्रता राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों के भीतर रही। मानसून वाले महीनों की धूल और मानसून-पूर्व की गर्मी दोनों इस आधार-रेखा से बाहर हैं। पानी की ज़रूरत 115 किलोलीटर रोज़ आँकी गई है, जिसकी अनुमति इंदिरा गांधी नहर से 24 मार्च 2025 को मिली।

खदान के बाद जो बचेगा

खनन के बाद की भूमि-उपयोग तालिका सबसे ज़्यादा बताती है। 256 हेक्टेयर में से 225 हेक्टेयर जल-निकाय या खुदा हुआ गड्ढा रहेगा, 24.1 हेक्टेयर पौधरोपण के नीचे, 6.50 हेक्टेयर सार्वजनिक उपयोग या तालाब, और 0.40 हेक्टेयर सड़क तथा ढाँचे के साथ अछूता। शुरुआती हरित पट्टी 11.10 हेक्टेयर की है, जो पट्टे का 4.33 फ़ीसदी बनती है, और उसमें पाँच साल में 27,750 पौधे लगने हैं। अवधारणात्मक चरण में यह 24.10 हेक्टेयर तक जाती है, यानी 9.41 फ़ीसदी, और 60,250 पौधे। समिति ने कहा कि बेंचों पर लगने वाले पौधों का ब्योरा नहीं दिया गया, इसलिए साल-दर-साल योजना दोबारा दी जाए।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची एक में होने का मतलब क्या है

दस किलोमीटर के अध्ययन क्षेत्र में अनुसूची एक की 26 प्रजातियाँ दर्ज हुईं। सूची में गोडावण का वैज्ञानिक नाम आर्डियोटिस नाइग्रिसेप्स है, और उसके साथ सांडा तथा मरु गोह जैसे जीव भी हैं। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 51 के तहत सामान्य उल्लंघन पर तीन साल तक की क़ैद या एक लाख रुपये तक जुर्माना है। अनुसूची एक के जीव से जुड़े अपराध पर सज़ा तीन साल से कम नहीं होगी, सात साल तक जा सकती है, और जुर्माना 25,000 रुपये से कम नहीं होगा; दोबारा अपराध पर जुर्माना एक लाख रुपये से कम नहीं। यह सूची शिकार और व्यापार को रोकती है। ज़मीन के इस्तेमाल पर वह अपने आप कोई रोक नहीं लगाती, और यही फ़र्क़ इस मामले में काम कर रहा है।

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड का इसमें कोई काम नहीं

कार्यवृत्त की एक पंक्ति सबसे कम पढ़ी जाएगी और सबसे ज़्यादा तय करती है: "एनबीडब्ल्यूएल मंज़ूरी की स्थिति: लागू नहीं।" राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति के पास मामला तब आता है जब परियोजना किसी अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान या पर्यावरण-संवेदी क्षेत्र के दस किलोमीटर के भीतर हो। 10 अक्टूबर 2025 के प्रमाणपत्र में उप वन संरक्षक, जैसलमेर ने लिखा कि दस किलोमीटर में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है। गोडावण का प्राथमिकता क्षेत्र अदालत की बनाई श्रेणी है, अधिसूचित संरक्षित क्षेत्र नहीं। इसलिए बोर्ड की जगह वन्यजीव संरक्षण योजना आती है, जिसे मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, जयपुर ने 30 जुलाई 2026 को सैद्धांतिक मंज़ूरी दी और जिसका बजट 2.58 करोड़ रुपये है।

अब मामला कहाँ खड़ा है

प्रस्ताव अब "अतिरिक्त ब्योरे के लिए स्थगित" श्रेणी में है, जिसका मतलब है कि कंपनी सातों बिंदुओं पर जवाब देगी और मामला फिर उसी समिति के सामने आएगा। आशय-पत्र राजस्थान सरकार ने 8 मार्च 2023 को जारी किया था और वह 7 मार्च 2027 तक वैध है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने स्थापना की सहमति 23 जुलाई 2026 को पोर्टल पर चढ़ा दी। मंडल ने यह शर्त भी रखी थी कि भीतर की ढुलाई सड़कें बिटुमेन से पक्की की जाएँ और तीन महीने में तस्वीरों के साथ अनुपालन दिया जाए। समिति ने इसे खुली खदानों के लिए अव्यावहारिक बताते हुए हटाने की सिफ़ारिश कर दी।

स्रोतपरिवेश पोर्टल, पर्यावरण मंत्रालय: विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (गैर-कोयला खनन) की 11वीं बैठक का कार्यवृत्त, बैठक 24-25 अगस्त 2026, दस्तावेज़ की तारीख़ 7 सितंबर 2026, सुप्रीम कोर्ट: एम.के. रणजीतसिंह बनाम भारत संघ, रिट याचिका (सिविल) 838/2019, फ़ैसला 19 दिसंबर 2025 (2025 INSC 1472), इंडियन कानून पर सुप्रीम कोर्ट का 21 मार्च 2024 का फ़ैसला, एम.के. रणजीतसिंह बनाम भारत संघ (2024 INSC 280), इंडियन एक्सप्रेस, 10 सितंबर 2026: मंज़ूरी टलने की पहली ख़बर, इंडियन एक्सप्रेस, 10 जुलाई 2026: भारतीय वन्यजीव संस्थान की गोडावण गणना रिपोर्ट पर, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून: राजस्थान और गुजरात के संशोधित गोडावण प्राथमिकता क्षेत्र के नक़्शे और केएमएल, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 51 का पाठ, द बेटर इंडिया, 31 मार्च 2026: सम प्रजनन केंद्र में दो चूज़ों के जन्म पर रिपोर्ट

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