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गुवाहाटी हाई कोर्ट ने गोलपाड़ा की तोड़-फोड़ को ग़ैर-क़ानूनी नहीं ठहराया, सवाल 13 अक्टूबर के लिए रख दिया

गोलपाड़ा के मटिया राजस्व सर्कल के अंचल अधिकारी ने 5 सितंबर 2026 को नोटिस जारी किए जिनमें मकान मालिकों से कहा गया था कि अपने घर 24 घंटे में ख़ुद गिरा लें। 7 सितंबर की सुबह, अँधेरा रहते, घर गिरा दिए गए। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने उसी दिन और फिर 11 सितंबर को दो अंतरिम आदेश दिए, दोनों में 'प्रथम दृष्टया' लिखकर, और असली सवाल 13 अक्टूबर के लिए टाल दिया।

गुवाहाटी में गुवाहाटी हाई कोर्ट का फाटक और उस पर लगा नाम-पट्ट, अप्रैल 2026 की तस्वीर; 7 सितंबर को मकान गिरने के उसी दिन याचिका यहीं लगी और आदेश भी उसी दिन यहीं से निकला
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

गोलपाड़ा ज़िले के मटिया राजस्व सर्कल के अंचल अधिकारी ने 5 सितंबर 2026 को कुछ नोटिस जारी किए। उनमें लिखा था कि अपनी खेती की ज़मीन पर बने आवासीय मकान 24 घंटे के भीतर ख़ुद गिरा लिए जाएँ, वरना क़ानूनी कार्रवाई होगी। 7 सितंबर की सुबह, अँधेरा रहते, मकान गिरा दिए गए।

उसी दिन गुवाहाटी हाई कोर्ट में याचिका लगी और उसी दिन आदेश हुआ। जस्टिस देवाशीष बरुआ ने लिखा कि अंचल अधिकारी की कार्रवाई "प्रथम दृष्टया" (prima facie) ग़ैर-क़ानूनी और अनधिकृत जान पड़ती है। 11 सितंबर को उन्होंने वही दो शब्द दोबारा इस्तेमाल किए।

अदालत ने अब तक कुछ तय नहीं किया है।

दोनों आदेश मिलाकर पंद्रह पन्ने के हैं, और दोनों में सुप्रीम कोर्ट के 13 नवंबर 2024 के उस फ़ैसले का नाम एक बार भी नहीं आता जिसने किसी भी ढाँचे को गिराने से पहले कम से कम पंद्रह दिन का कारण-बताओ नोटिस, निजी सुनवाई और कारण लिखा हुआ आदेश अनिवार्य किया था। यहाँ नोटिस में 24 घंटे थे। मामला 13 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध है।

7 और 11 सितंबर के दो आदेश, और उनमें लिखा 'प्रथम दृष्टया'

मुक़दमा जहीदुल इस्लाम और 20 अन्य बनाम असम राज्य और 2 अन्य है, नंबर WP(C)/4903/2026, न्यूट्रल साइटेशन GAHC010194392026। एकल पीठ। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. बरठाकुर और अधिवक्ता जे. अब्बास पेश हुए, सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता एस.एस. रॉय और स्थायी अधिवक्ता जी. हज़ारिका। प्रतिवादी तीन हैं: राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के आयुक्त एवं सचिव, गोलपाड़ा के ज़िला आयुक्त, और मटिया राजस्व सर्कल के अंचल अधिकारी।

आदेश की पहली पंक्ति नोटिस जारी करती है। वापसी की तारीख़ 11 सितंबर रखी गई।

पैरा 8 वही है जो रिपोर्टों में सबसे ज़्यादा उद्धृत हुआ; लाइवलॉ ने 9 सितंबर को यही वाक्य छापा। उसमें अदालत कहती है कि प्रतिवादी संख्या 3 की कार्रवाई "प्रथम दृष्टया ग़ैर-क़ानूनी और अनधिकृत जान पड़ती है, और नैसर्गिक न्याय के उन सिद्धांतों का उल्लंघन है जो अनुच्छेद 14 और 21 का ही एक पहलू हैं"। अगला वाक्य और तीखा है: "आज के दिन, जब तय सिद्धांतों की भरमार है, यह सोचा भी नहीं जा सकता कि नोटिस इस तरह जारी हों, याचिकाकर्ताओं को कुछ कहने तक का मौक़ा दिए बिना।" और फिर: "इसके आगे, नोटिस निजी ज़मीनों पर ऐसी कठोर शक्तियों के इस्तेमाल के लिए किसी आसन्न ख़तरे को नहीं दिखाते।"

आदेश यहीं रुक जाता है। यह राय है, निष्कर्ष नहीं।

पैरा 9 में सरकारी अधिवक्ता को निर्देश है कि अगली तारीख़ पर "बिना चूके" बताएँ कि वह कौन सा आसन्न ख़तरा था जिसने मकान गिराना ज़रूरी बना दिया। पैरा 10 याचिकाकर्ताओं को छूट देता है कि तोड़-फोड़ और अपने नुक़सान का ब्योरा अतिरिक्त हलफ़नामे में लाएँ। पैरा 11 अंतरिम राहत है: अगली तारीख़ तक प्रतिवादी संख्या 2 और 3 याचिकाकर्ताओं की ज़मीनों पर कोई और कार्रवाई न करें।

पूरे अभियान पर रोक नहीं है। रोक इन्हीं ज़मीनों पर है।

पैरा 12 एक छोटी सी बात दर्ज करता है जो बताती है कि उस दिन कितनी जल्दी थी: सरकारी अधिवक्ता ज़िला आयुक्त और अंचल अधिकारी को "टेलीफ़ोन से" इस आदेश की सूचना दें।

11 सितंबर का आदेश सात पन्ने का है और उसका पहला ही पैराग्राफ़ उसका मुख्य वाक्य है। सरकारी अधिवक्ता ने उस दिन कुछ निर्देश अदालत के सामने रखे। अदालत लिखती है कि वे निर्देश "प्रथम दृष्टया यह नहीं दिखाते कि निजी ज़मीनों पर मकान गिराने जैसी कठोर कार्रवाई के लिए आसन्न ख़तरे का कोई मामला था। बल्कि यह प्रथम दृष्टया आपदा प्रबंधन विभाग अधिनियम, 2005 का दुरुपयोग भी जान पड़ता है।"

क़ानून का नाम आदेश में इसी तरह छपा है, "आपदा प्रबंधन विभाग अधिनियम"। असल अधिनियम का नाम आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 है।

आख़िरी पैराग्राफ़ में लिखा है कि पहले दिया गया अंतरिम आदेश अगली तारीख़ तक चलता रहेगा।

5 सितंबर का नोटिस और उसमें गिनाई गईं तीन धाराएँ

7 सितंबर के आदेश का पैरा 4 नोटिस का ब्योरा दर्ज करता है। उसके मुताबिक़ याचिकाकर्ता अंचल अधिकारी की उस कार्रवाई से पीड़ित हैं जिसमें 5 सितंबर 2026 को नोटिस जारी हुए, "जिनमें याचिकाकर्ताओं को धमकी दी गई कि अगर उनकी अपनी खेती की ज़मीनों पर बने आवासीय मकान 24 घंटे के भीतर नहीं गिराए गए तो उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी"।

नोटिस यह नहीं कहता था कि प्रशासन तोड़ेगा। वह मकान मालिक से कह रहा था कि वह ख़ुद अपना मकान गिरा ले।

गोलपाड़ा ज़िले के मटिया में सड़क पर लगा असम लोक निर्माण विभाग का दिशा-सूचक, जून 2026 की तस्वीर; 5 सितंबर के नोटिस इसी मटिया राजस्व सर्कल के अंचल अधिकारी के दफ़्तर से निकले थे
तस्वीर: Moniruj, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

नोटिस में तीन प्रावधानों का नाम है: असम भूमि एवं राजस्व विनियमन, 1886 के तहत बने बंदोबस्त नियमों का नियम 6, और उसके साथ पढ़ी गईं आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 30(2)(v) तथा धारा 34(k)।

धारा 30 का शीर्षक है "ज़िला प्राधिकरण की शक्तियाँ और कार्य"। उसकी उपधारा (2) में उनतीस खंड हैं और खंड (v) पूरा इतना है: "ज़िला स्तर के अलग-अलग प्राधिकारियों और स्थानीय प्राधिकारियों को यह निर्देश देना कि वे आपदाओं की रोकथाम या शमन के लिए ऐसे अन्य उपाय करें जो आवश्यक हों।"

यह किसी नागरिक पर चलने वाली शक्ति नहीं है। यह एक प्राधिकरण का दूसरे प्राधिकारियों को निर्देश देने का अधिकार है।

धारा 34 का शीर्षक है "किसी आसन्न आपदा की स्थिति या आपदा में ज़िला प्राधिकरण की शक्तियाँ और कार्य"। उसकी शुरुआती पंक्ति ही पूरी धारा पर शर्त लगा देती है: "समुदाय की सहायता, सुरक्षा या राहत के प्रयोजन से, किसी आसन्न आपदा की स्थिति या आपदा के जवाब में, ज़िला प्राधिकरण यह कर सकता है"। इसके बाद तेरह खंड आते हैं, जिनमें मलबा हटाना, खोज और बचाव, आश्रय, भोजन, पीने का पानी और लावारिस शवों का निपटान शामिल है। खंड (k) इसी सूची में है: "अस्थायी पुल या दूसरी ज़रूरी संरचनाएँ बनाना, और ऐसी संरचनाएँ गिराना जो जनता के लिए ख़तरनाक हों या आपदा के असर को और बढ़ाएँ।"

अदालत ने दोनों तारीख़ों पर एक ही सवाल पूछा: आसन्न ख़तरा क्या था। वह शर्त धारा 34 की अपनी पहली पंक्ति में लिखी हुई है।

एक और बात दोनों धाराओं में साझा है। दोनों "ज़िला प्राधिकरण" की शक्तियाँ हैं, और उसी अधिनियम की धारा 25 बताती है कि वह क्या है: ज़िला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, जिसमें सात से ज़्यादा सदस्य नहीं होते, जिसका पदेन अध्यक्ष कलेक्टर या ज़िला मजिस्ट्रेट या उपायुक्त होता है, सह-अध्यक्ष स्थानीय निकाय का निर्वाचित प्रतिनिधि होता है, और जिसके बाक़ी पदेन सदस्यों में पुलिस अधीक्षक और ज़िले का मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं।

गोलपाड़ा के नोटिस अंचल अधिकारी ने जारी किए। याचिका में वही प्रतिवादी संख्या 3 हैं।

बंदोबस्त नियमों का नियम 6 इस रिपोर्ट के लिए नहीं पढ़ा जा सका। उसका पाठ कहीं नहीं मिला। असम सरकार की वेबसाइटों पर ये नियम नहीं हैं, इसलिए यह नहीं बताया जा सकता कि नियम 6 किस चीज़ की इजाज़त देता है। 1886 के विनियमन की धारा 12, जिसके तहत अनधिकृत क़ब्ज़ेदारों को हटाने के नियम बनते हैं, अपनी शक्ति को ऐसी ज़मीन तक सीमित रखती है "जिस पर इस विनियमन के तहत किसी व्यक्ति को मालिक, भूमिधर या बंदोबस्तधारी के अधिकार न हों"। धारा 29 अलग है और राजस्व निर्धारण से जुड़े "बंदोबस्त नियमों" की बात करती है। नियम 6 इन दोनों में से किस धारा के तहत बना है, आदेश नहीं बताता।

पट्टा ज़मीन, एक बीघा और 2015 के क़ानून की धारा 3(iv)

7 सितंबर के आदेश का पैरा 5 एक ही वाक्य का है। वही वाक्य पूरे मामले की बुनियाद है। याचिका के साथ लगे नोटिस देखकर अदालत लिखती है: "यह स्पष्ट है कि ये नोटिस याचिकाकर्ताओं की पट्टा ज़मीनों के संबंध में हैं।"

पट्टा दर्ज अधिकार का काग़ज़ है।

द ऑब्ज़र्वर पोस्ट ने 9 सितंबर को इसी बात पर निवासियों का पक्ष छापा। नूरुल इस्लाम ने कहा, "जिनके मकान गिराए गए वे अपनी ही ज़मीन पर रह रहे थे और उनके पास ज़रूरी काग़ज़ात थे।"

पैरा 6 में अदालत अपनी ओर से एक क़ानून सामने रखती है जिसका नाम नोटिस में नहीं था: असम कृषि भूमि (ग़ैर-कृषि प्रयोजन के लिए पुनर्वर्गीकरण और हस्तांतरण का विनियमन) अधिनियम, 2015 की धारा 3(iv)। उस खंड का पूरा पाठ दो वाक्यों का है। पहला वाक्य आदेश में है: "इस धारा के तहत उपायुक्त से अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं है, जब एक बीघा से अधिक न होने वाली कृषि भूमि अपने ही आवासीय मकान के निर्माण के लिए इस्तेमाल या हस्तांतरित की जानी हो और उस संरचना का निर्माण दो मंज़िल तक सीमित हो।"

दूसरा वाक्य आदेश में उद्धृत नहीं है। वह यह है: "ऐसे मामलों में उपायुक्त स्वप्रेरणा से, या मालिक अथवा हस्तांतरिती से मिले आवेदन पर, ऐसी भूमि को आवासीय श्रेणी में पुनर्वर्गीकृत कर सकते हैं।"

ज़िला आयुक्त का दर्ज कारण यह है कि लोगों ने कृषि भूमि पर बिना भू-उपयोग बदलवाए मकान बना लिए। धारा 3(iv) की दोनों पंक्तियाँ ठीक इसी सवाल पर हैं। एक बीघा तक के अपने मकान के लिए अनुमति चाहिए ही नहीं, और उपायुक्त चाहें तो बिना किसी आवेदन के, अपनी ओर से, उस ज़मीन को आवासीय कर सकते हैं।

एक बात यहाँ दर्ज नहीं है। किस याचिकाकर्ता की ज़मीन कितनी है, दोनों आदेशों में कहीं नहीं लिखा। इसलिए यह तय नहीं होता कि इक्कीसों मामले एक बीघा की सीमा में आते हैं। अदालत ने भी इतना ही किया है: धारा 3(iv) को "संज्ञान में लिया" है, उसे लागू नहीं किया।

ज़िला आयुक्त प्रदीप तिमुंग का दर्ज बयान

प्रशासन का कारण एक नामज़द अधिकारी के हवाले से रिकॉर्ड पर है। गोलपाड़ा के ज़िला आयुक्त प्रदीप तिमुंग ने 7 सितंबर को असम ट्रिब्यून से कहा, "यह पूरी तरह कृषि भूमि थी, पर लोग रातोंरात यहाँ बसने लगे।"

उन्होंने आगे कहा, "अगर उन्होंने ज़मीन ख़रीदकर खेती की होती तो कोई दिक़्क़त नहीं होती। लेकिन मकानों के निर्माण से पानी के प्राकृतिक बहाव पर असर पड़ रहा है।" उसी बातचीत में वे कहते हैं, "अगर हमने अभी कार्रवाई नहीं की तो हमारी खेती की ज़मीन धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएगी।"

निचले असम के कोकराझार ज़िले में डिप्लाई बील और उसके बीच से निकलता पानी, सितंबर 2018 की तस्वीर; यह गोलपाड़ा की नहीं बल्कि पड़ोसी ज़िले की तस्वीर है, पर पानी का प्राकृतिक बहाव इसी तरह ज़मीन से होकर जाता है
तस्वीर: Debuapriyo, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

साम्प्रदायिक मंशा का सवाल भी उसी रिपोर्ट में है। तिमुंग का जवाब यह था: "यह हिंदू या मुसलमान की बात नहीं है। हमारे सर्वे के दौरान कुछ मुस्लिम निवासियों ने ख़ुद हमें बताया कि कृषि भूमि पर मकान बनाने वाले लोग दिक़्क़त पैदा कर रहे हैं।"

तिमुंग के मुताबिक़ बसने वाले दरंग, बरपेटा, धुबरी और मनकाचर समेत कई ज़िलों से आए थे, और उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि एक वकील ने कुछ बसावटों में मदद की थी।

इसे अभियान का दूसरा चरण बताया गया है। पहला नवंबर 2025 में दाहिकाटा में हुआ था, जहाँ आरोप वन भूमि पर क़ब्ज़े का था।

सरकारी आधार को लेकर रिपोर्टिंग में एक फ़र्क़ बना हुआ है। असम ट्रिब्यून में ज़िला आयुक्त के अपने शब्दों में आधार कृषि भूमि और पानी का बहाव है। कुछ दूसरे अख़बारों ने इसे वन भूमि या आर्द्रभूमि बताया है। दोनों आदेशों में इनमें से कोई शब्द नहीं आता; वहाँ सिर्फ़ "पट्टा ज़मीन" और "निजी ज़मीन" हैं।

तिमुंग याचिका में प्रतिवादी संख्या 2 हैं। 11 सितंबर के आदेश ने उन्हें और अंचल अधिकारी को अलग-अलग हलफ़नामे दाख़िल करने का मौक़ा दिया है, यानी दोनों को अपना-अपना पक्ष ख़ुद लिखकर देना होगा।

सुप्रीम कोर्ट का 13 नवंबर 2024 का फ़ैसला, जिसका नाम दोनों आदेशों में नहीं आता

उस फ़ैसले का नाम इन री: डायरेक्शंस इन द मैटर ऑफ़ डिमोलिशन ऑफ़ स्ट्रक्चर्स है, साइटेशन 2024 INSC 866, याचिका W.P.(C) 295/2022। जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ। 95 पन्ने। पैरा 90 में अदालत लिखती है कि वह ये निर्देश "संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए" दे रही है, ताकि नागरिकों के मन से राज्य के अफ़सरों की मनमानी का डर निकल सके।

नई दिल्ली में उच्चतम न्यायालय की इमारत और उसका गुंबद, जनवरी 2019 की तस्वीर; 2024 INSC 866 वाला फ़ैसला यहीं से आया और गुवाहाटी के दोनों आदेशों में उसका नाम नहीं आता
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

निर्देश पाँच हिस्सों में हैं।

पहला हिस्सा नोटिस का है। कोई तोड़-फोड़ बिना पूर्व कारण-बताओ नोटिस के न हो, और नोटिस की मियाद या तो स्थानीय नगरपालिका क़ानून में दी गई हो, या नोटिस तामील होने की तारीख़ से पंद्रह दिन हो, दोनों में से जो बाद में पड़े। नोटिस पंजीकृत डाक से भेजा जाए और साथ ही उसी ढाँचे के बाहरी हिस्से पर स्पष्ट रूप से चिपकाया जाए। पंद्रह दिन तामील की तारीख़ से गिने जाएँ। तारीख़ पीछे करने के आरोप न लगें, इसलिए तामील की सूचना ज़िले के कलेक्टर या ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ़्तर को ई-मेल से जाए और वहाँ से अपने आप पावती मिले; कलेक्टर एक नोडल अफ़सर नियुक्त करें और एक ई-मेल पता तय करके उसे सब निकायों को बताएँ। नोटिस में चार चीज़ें लिखी हों: अनधिकृत निर्माण किस तरह का है, उल्लंघन और तोड़ने के आधार क्या हैं, जवाब के साथ कौन से काग़ज़ लगने हैं, और निजी सुनवाई की तारीख़ तथा वह अधिकारी कौन है जिसके सामने सुनवाई होगी।

दूसरा हिस्सा सुनवाई का है: निजी सुनवाई का मौक़ा दिया जाए और उसका कार्यवृत्त लिखा जाए।

तीसरा हिस्सा अंतिम आदेश का है। आदेश में नोटिस पाने वाले की दलीलें दर्ज हों, असहमति हो तो उसके कारण लिखे जाएँ, यह बताया जाए कि निर्माण शमनीय है या नहीं, और अगर नहीं तो क्यों नहीं, और यह भी कि तोड़-फोड़ जैसा चरम क़दम ही अकेला विकल्प क्यों है जबकि शमन या आंशिक तोड़-फोड़ मौजूद हैं।

चौथे हिस्से में अपील का समय है। आदेश मिलने के पंद्रह दिन तक उसे लागू न किया जाए, फिर मालिक को अपने ख़र्च पर ख़ुद हटाने के लिए पंद्रह दिन मिलें, और उसके बाद ही प्रशासन आगे बढ़े। तोड़ने से पहले दो पंचों के दस्तख़त वाली विस्तृत निरीक्षण रिपोर्ट बने। पाँचवाँ हिस्सा कहता है कि पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफ़ी हो और उसमें शामिल पुलिसकर्मियों तथा नागरिक कर्मचारियों की सूची के साथ रिपोर्ट बने।

पैरा 91 में अदालत ने अपवाद भी लिख दिए हैं। ये निर्देश तब लागू नहीं होते जब ढाँचा सड़क, गली, फ़ुटपाथ, रेल लाइन के किनारे, किसी नदी या जलाशय जैसी सार्वजनिक जगह पर हो, या जब तोड़ने का आदेश ख़ुद किसी अदालत ने दिया हो।

इसके बाद के चार पैराग्राफ़ पालन कराने के बारे में हैं। पैरा 93: किसी भी निर्देश का उल्लंघन अवमानना की कार्यवाही और अभियोजन दोनों को जन्म देगा। पैरा 94: अगर तोड़-फोड़ अदालत के आदेशों के उल्लंघन में पाई गई तो संबंधित अफ़सर गिराई गई सम्पत्ति को "अपने निजी ख़र्च पर" वापस बनवाने के लिए ज़िम्मेदार होंगे, और हर्जाना अलग। पैरा 95 में रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश है कि फ़ैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों तथा सभी हाई कोर्टों के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, और हर राज्य सरकार अपने सभी ज़िला मजिस्ट्रेटों और स्थानीय निकायों को परिपत्र जारी करे।

गोलपाड़ा में नोटिस 5 सितंबर का था और मियाद 24 घंटे की।

इन दोनों आदेशों में इस फ़ैसले का ज़िक्र नहीं है। यह दो तरह से जाँचा गया: दोनों आदेशों का पूरा पाठ पढ़कर, और इंडियन कानून की अपनी उद्धरण-सूची देखकर, जिसमें 7 सितंबर का आदेश सिर्फ़ धाराओं का हवाला देता दिखता है (आपदा प्रबंधन अधिनियम की 30(2)(v) और 34(k), 2015 के अधिनियम की धारा 3 और 3(iv), और अनुच्छेद 14 तथा 21) और 11 सितंबर का आदेश किसी मिसाल का हवाला नहीं देता। लाइवलॉ की 9 सितंबर की रिपोर्ट में भी इस फ़ैसले का नाम नहीं है, और असम ट्रिब्यून की 17 सितंबर की रिपोर्ट में भी नहीं।

इसलिए यह लिखना ग़लत होगा कि गुवाहाटी हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तोड़-फोड़ संबंधी दिशा-निर्देश लागू किए। दोनों आदेश उस फ़ैसले तक जाते ही नहीं।

20 जून की जाँच रिपोर्ट, 23 जून का आदेश, और अदालत में रखे तीन काग़ज़

11 सितंबर के आदेश का पैरा 2 तीन काग़ज़ों के नाम और तारीख़ें दर्ज करता है: 20 जून 2026 की जाँच रिपोर्ट, ज़िला आयुक्त का 23 जून 2026 का आदेश, और 9 सितंबर 2026 की पैरावार टिप्पणियाँ। अदालत ने इन्हें रिकॉर्ड पर रखकर क्रमशः X, Y और Z अक्षर दे दिए।

तारीख़ें अपने आप में एक बात कहती हैं। जाँच रिपोर्ट सरकार के पास 20 जून को थी। ज़िला आयुक्त का आदेश 23 जून का है। नोटिस 5 सितंबर को गया और उसमें 24 घंटे थे।

प्रशासन के पास दो महीने से ज़्यादा थे। घरवालों के पास एक दिन।

इन तीनों काग़ज़ों का पाठ सार्वजनिक नहीं है। वे अदालत के रिकॉर्ड पर हैं, किसी वेबसाइट पर नहीं। इसलिए सरकार का पूरा लिखित पक्ष अभी पढ़ा नहीं जा सकता: जाँच में क्या मिला था, ज़िला आयुक्त ने 23 जून को क्या तय किया, और 9 सितंबर की टिप्पणियों में आसन्न ख़तरे के बारे में क्या कहा गया।

अदालत ने इन्हीं निर्देशों को देखकर 11 सितंबर को कहा था कि वे आसन्न ख़तरा नहीं दिखाते।

21, 73 और 74: तीन आँकड़े, तीन दस्तावेज़

आदेश में एक ही संख्या है, और वह 21 है। याचिकाकर्ता नाम, पिता के नाम, गाँव, डाकघर, थाना और पिनकोड के साथ दर्ज हैं। गाँव चार हैं: खामारमानिकपुर (मागुरमारी), तेंगाबाड़ी, भुजमाला पार्ट-II और हरिमुरा, सब थाना मोरनोई, ज़िला गोलपाड़ा।

"73" दोनों आदेशों में कहीं नहीं है।

वह आँकड़ा असम ट्रिब्यून की 7 सितंबर की रिपोर्ट का है, जिसमें 73 मकान और पाँच गाँव हैं: खारिजा पाइकान, खामार मानिकपुर, भोजमाला पार्ट II, जातशरबदी और तेंगाबाड़ी। उसी रिपोर्ट में ये गाँव "कृष्णाई राजस्व सर्कल" के बताए गए हैं, जबकि याचिका में प्रतिवादी मटिया राजस्व सर्कल के अंचल अधिकारी हैं।

मध्यमम ने 12 सितंबर को 74 मुस्लिम परिवार लिखे, और उसके पाँच गाँवों के नाम फिर अलग हैं: हरिमुरा, भोजमाला तेंगाबाड़ी, पश्चिम भेलाखामार, खारिजा मानिकपुर और जोतसरवाड़ी।

असम ट्रिब्यून ने 17 सितंबर की अपनी दूसरी रिपोर्ट में संख्या 21 इस्तेमाल की, यानी उसी अख़बार के दो आँकड़े दस दिन के फ़ासले पर 73 और 21 हैं। दोनों ग़लत नहीं हैं। पहला पूरे अभियान का है, दूसरा उन याचिकाकर्ताओं का जो अदालत गए। पूरे अभियान में कुल कितने ढाँचे गिरे, इसका कोई सरकारी आँकड़ा सार्वजनिक नहीं है।

धर्म का सवाल इसी तरह अलग-अलग जगह अलग-अलग है। दोनों आदेशों में याचिकाकर्ताओं का धर्म कहीं नहीं लिखा; वे नाम और पते वाले व्यक्ति हैं। "मुस्लिम परिवार" रिपोर्टिंग का शब्द है: मध्यमम ने 12 सितंबर को "74 मुस्लिम परिवार" लिखा और द ऑब्ज़र्वर पोस्ट ने 9 सितंबर को शीर्षक में गोलपाड़ा को मुस्लिम-बहुल कहा। लाइवलॉ की 9 सितंबर की रिपोर्ट में याचिकाकर्ताओं का धर्म नहीं है।

अदालत ने 13 अक्टूबर के लिए क्या रख छोड़ा है

11 सितंबर के आदेश का पैरा 6 वह जगह है जहाँ मुआवज़े का ज़िक्र आता है, और उसका वाक्य शर्त वाला है। अतिरिक्त हलफ़नामे के जवाब में हलफ़नामा माँगते हुए अदालत लिखती है कि वह "मुआवज़े के सवाल पर भी निर्णय करेगी, उस स्थिति में जब यह न्यायालय यह माने कि प्रतिवादियों, विशेषकर ज़िला आयुक्त और अंचल अधिकारी ने जो कार्रवाई की वह क़ानून से अधिकृत नहीं थी।"

यह शर्त ही मुक़दमे की मौजूदा स्थिति है। अभी अदालत ने ऐसा नहीं माना है।

पैरा 3 ज़िला आयुक्त और अंचल अधिकारी को अलग-अलग हलफ़नामे दाख़िल करने का मौक़ा देता है। पैरा 4 दर्ज करता है कि याचिकाकर्ताओं का अतिरिक्त हलफ़नामा आ चुका है और उसमें तोड़-फोड़ की तस्वीरें तथा नुक़सान का ब्योरा है। पैरा 7 में अगली तारीख़ है, 13 अक्टूबर 2026।

जो नहीं हुआ है उसकी सूची भी उतनी ही साफ़ है। मुआवज़े की कोई रक़म तय नहीं हुई। मकान दोबारा बनाने का कोई आदेश नहीं है। किसी अफ़सर के ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं हुई, न कोई जाँच बिठाई गई है। अभियान के बाक़ी हिस्से पर, यानी उन लोगों पर जो अदालत नहीं गए, कोई निर्देश नहीं है।

यह भी नहीं पता कि 7 सितंबर के बाद इक्कीस याचिकाकर्ताओं में से किसी को कहीं रखा गया या नहीं। आदेशों में इसका ज़िक्र नहीं है और किसी सरकारी दस्तावेज़ में यह मिला नहीं।

13 अक्टूबर को अदालत के सामने ज़िला आयुक्त और अंचल अधिकारी के हलफ़नामे होंगे।

स्रोतजहीदुल इस्लाम और 20 अन्य बनाम असम राज्य और 2 अन्य, WP(C)/4903/2026, न्यूट्रल साइटेशन GAHC010194392026, गुवाहाटी हाई कोर्ट, जस्टिस देवाशीष बरुआ, 7 सितंबर 2026 का आदेश, आठ पन्ने, उसी मुक़दमे में 11 सितंबर 2026 का आदेश, सात पन्ने: X, Y और Z चिह्नित तीन दस्तावेज़, मुआवज़े की शर्त, और 13 अक्टूबर 2026 की अगली तारीख़, इन री: डायरेक्शंस इन द मैटर ऑफ़ डिमोलिशन ऑफ़ स्ट्रक्चर्स, 2024 INSC 866, W.P.(C) 295/2022, सुप्रीम कोर्ट, 13 नवंबर 2024 (बी.आर. गवई और के.वी. विश्वनाथन), 95 पन्ने; पैरा 90 से 95 तक के निर्देश सुप्रीम कोर्ट के अपने सर्वर से पढ़े गए, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 30: ज़िला प्राधिकरण की शक्तियाँ और कार्य, उपधारा (2) के उनतीस खंड, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 34: आसन्न आपदा की स्थिति या आपदा में ज़िला प्राधिकरण की शक्तियाँ, खंड (k) सहित, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 25: ज़िला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन और उसके पदेन सदस्य, असम कृषि भूमि (ग़ैर-कृषि प्रयोजन के लिए पुनर्वर्गीकरण और हस्तांतरण का विनियमन) अधिनियम, 2015 की धारा 3(iv) का पूरा पाठ, दोनों वाक्य, असम भूमि एवं राजस्व विनियमन, 1886, संशोधित पाठ, 52 पन्ने: धारा 12 की नियम-निर्माण शक्ति और धारा 29 के बंदोबस्त नियम, असम ट्रिब्यून, 7 सितंबर 2026: 73 मकान, पाँच गाँव, और ज़िला आयुक्त प्रदीप तिमुंग के अपने शब्दों में कारण तथा साम्प्रदायिक मंशा से इनकार, असम ट्रिब्यून, 17 सितंबर 2026: उसी अख़बार की दूसरी रिपोर्ट, जिसमें संख्या 21 है, मुआवज़े का ज़िक्र है और अगली तारीख़ 13 अक्टूबर, लाइवलॉ, 9 सितंबर 2026, उदित सिंह: 7 सितंबर के आदेश के पैरा 8 का उद्धरण; रिपोर्ट में याचिकाकर्ताओं का धर्म नहीं लिखा, मध्यमम, 12 सितंबर 2026: 74 मुस्लिम परिवार और पाँच गाँवों के अलग नाम, द ऑब्ज़र्वर पोस्ट, 9 सितंबर 2026: नूरुल इस्लाम का बयान कि मकान मालिकों के पास ज़मीन के काग़ज़ात थे

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।