ढाई महीने में 3,800 से ज़्यादा बच्चे मज़दूरी से छुड़ाए गए, और 575 मुक़दमे दर्ज हुए
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का अखिल भारतीय अभियान 12 जून से 31 अगस्त तक चला। दोनों आँकड़े आयोग के अपने हैं और दोनों एक ही विज्ञप्ति में हैं।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने 12 जून को एक अखिल भारतीय बचाव और पुनर्वास अभियान शुरू किया था। वह 31 अगस्त को ख़त्म हुआ।
आयोग के मुताबिक़ इस दौरान 3,800 से ज़्यादा बच्चे बाल मज़दूरी से छुड़ाए गए।
उसी विज्ञप्ति में एक और आँकड़ा है। इसी अभियान में 575 से ज़्यादा प्राथमिकियाँ दर्ज हुईं।
दोनों संख्याओं को साथ रखिए
3,800 बच्चे। 575 मुक़दमे।
अनुपात लगभग सात का एक बनता है।
एक मुक़दमे में कई बच्चे हो सकते हैं, अगर एक ही जगह से कई बच्चे मिले हों। कारख़ाना एक, बच्चे बीस, प्राथमिकी एक। ऐसा होता है।
पर विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि 575 में से कितनी प्राथमिकियाँ ऐसी थीं, और कितने बच्चे ऐसी जगहों से निकाले गए जहाँ कोई मुक़दमा दर्ज ही नहीं हुआ।
बच्चा छुड़ाना और नियोक्ता पर मुक़दमा चलना दो अलग काम हैं। पहला काम राहत है, दूसरा रोकथाम।
अभियान चला कैसे
आयोग एक वैधानिक संस्था है और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन आती है।
उसने राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों, ज़िलाधिकारियों, श्रम विभागों और पुलिस के साथ मिलकर काम किया, और उन जगहों पर लक्षित छापे मारने को कहा जहाँ बाल मज़दूरी और तस्करी होती है।
बीच-बीच में ज़िला प्रशासनों के साथ बैठकें हुईं। उनका मक़सद यह था कि छापों की समीक्षा हो, ज़मीन की अड़चनें दूर हों, कार्रवाई रिपोर्ट समय पर आएँ और विभागों के बीच तालमेल बने।
सोशल मीडिया पर जागरूकता अभियान भी चलाया गया।

आयोग ने जो माँगा था
विज्ञप्ति में एक सूची है जो बताती है कि राज्यों से क्या-क्या आँकड़ा माँगा गया था।
बचाव अभियान। छुड़ाए गए बच्चे। दर्ज प्राथमिकियाँ। पुनर्वास। पुनर्स्थापना। मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना। मुआवज़ा। और आगे की अनुवर्ती कार्रवाई।
आठ चीज़ें माँगी गईं।
विज्ञप्ति में दो का आँकड़ा है।
कितने बच्चे स्कूल पहुँचे, कितने परिवारों को मुआवज़ा मिला, कितने बच्चे अपने घर लौटे और कितने बालगृहों में हैं, इनमें से कोई संख्या नहीं दी गई।
राज्यवार बँटवारा भी नहीं है। इसलिए यह पता नहीं चलता कि 3,800 में से कितने बच्चे किस राज्य से मिले।
क़ानून क्या कहता है
चौदह साल से कम उम्र के बच्चे से कोई भी काम कराना प्रतिबंधित है।
चौदह से अठारह साल तक के किशोर ख़तरनाक कामों में नहीं लगाए जा सकते। यह रोक बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम के तहत आती है, जिसे 2016 में बदला गया था।
⚠ इस लेख के लिए हम अधिनियम का मूल पाठ नहीं खोल सके, इसलिए सज़ा और जुर्माने की रक़म यहाँ नहीं दी जा रही।
अगली संख्या जो देखनी है
प्राथमिकी दर्ज होना शुरुआत है, अंत नहीं।
575 मुक़दमों में से कितने अदालत तक पहुँचे और कितनों में सज़ा हुई, यह आँकड़ा आयोग के पास कुछ महीनों बाद ही बन सकेगा।
और यही वह संख्या है जो बताएगी कि अभियान का असर कितना रहा। बच्चों की गिनती हर बार छपती है। सज़ा की गिनती हमें इस विज्ञप्ति में नहीं मिली।
स्रोतराष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की विज्ञप्ति, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग