बीज अधिनियम 1966 में पहला जुर्माना पाँच सौ रुपये है और नए मसौदे में तीस लाख तक, 10 सितंबर को किसान संगठनों से राय ली जाएगी
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान 10 सितंबर को अपराह्न 4 बजे कृषि भवन में किसान संगठनों के साथ नए सीड एक्ट के मसौदे पर बैठेंगे। जिस अधिनियम की जगह यह मसौदा लेगा, उसमें पहली बार पकड़े जाने पर जुर्माना पाँच सौ रुपये तक है। पर उसी के साथ चलने वाले 1983 के आदेश में सज़ा तीन महीने से सात साल तक की है, यानी नए मसौदे की तीन साल की अधिकतम क़ैद से ज़्यादा।

बीज अधिनियम, 1966 की धारा 19 पूरी सज़ा एक ही वाक्य में निपटा देती है: पहली बार पकड़े जाने पर जुर्माना, जो पाँच सौ रुपये तक हो सकता है।
वही व्यक्ति दोबारा पकड़ा जाए तो धारा छह महीने तक की क़ैद, या एक हज़ार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों की इजाज़त देती है। अधिनियम 29 दिसंबर 1966 का है, क्रमांक 54। दिल्ली सरकार के विकास विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध पाठ में ये दोनों रक़में ज्यों की त्यों छपी हैं।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान 10 सितंबर को अपराह्न 4 बजे कृषि भवन, नई दिल्ली में किसान संगठनों के शीर्ष नेताओं के साथ बैठेंगे। कृषि मंत्रालय की 9 सितंबर की विज्ञप्ति के अनुसार विषय नया 'सीड एक्ट' है, जिसमें नक़ली या घटिया बीज बेचने वालों पर भारी जुर्माने और जेल के प्रावधान रखे जा रहे हैं। विज्ञप्ति यह भी कहती है कि बैठक आगामी संसद सत्र से पहले हो रही है।
धारा 19 में लिखा क्या है
धारा तीन स्थितियाँ गिनाती है: अधिनियम या नियमों का उल्लंघन, बीज निरीक्षक को नमूना लेने से रोकना, और निरीक्षक को उसकी किसी अन्य शक्ति के इस्तेमाल से रोकना। तीनों पर सज़ा एक जैसी है। नमूना लेने से रोकने वाले दुकानदार और मिलावटी बीज बेचने वाले उत्पादक के बीच अधिनियम कोई अंतर नहीं करता। दंड अपराध की गंभीरता से नहीं बदलता, सिर्फ़ इससे कि वह व्यक्ति पहले भी इसी धारा में दोषी ठहराया जा चुका है या नहीं। धारा 20 में ज़ब्ती भी अनिवार्य नहीं: बीज सरकार को ज़ब्त "किया जा सकता है"। 2004 के विधेयक में वही प्रावधान "किया जाएगा" के साथ आया था।
1983 का दूसरा दरवाज़ा
बीज बेचने का धंधा सिर्फ़ 1966 के अधिनियम से नहीं चलता। 30 दिसंबर 1983 को कृषि मंत्रालय ने जीएसआर 932(ई) के तहत बीज (नियंत्रण) आदेश जारी किया, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 की शक्तियों से। उसका खंड 3 कहता है कि बीज बेचने, निर्यात या आयात का कारोबार बिना लाइसेंस नहीं हो सकता। बीज की परिभाषा वह 1966 के अधिनियम से उधार लेता है। एक ही बीज, दो क़ानूनी रास्ते, दो अलग सज़ाएँ।
सात साल की सज़ा जो पहले से किताब में है
आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 7(1)(क)(ii) के मुताबिक़ धारा 3 के तहत बने किसी आदेश का उल्लंघन करने पर क़ैद तीन महीने से कम नहीं होगी और सात साल तक जा सकती है, साथ में जुर्माना। दोबारा वही अपराध करने पर न्यूनतम छह महीने हो जाता है। बिना लाइसेंस बीज बेचने पर आज जो अधिकतम सज़ा उपलब्ध है, वह नए मसौदे में प्रस्तावित तीन साल की अधिकतम क़ैद से ज़्यादा है। मसौदा 1966 के अधिनियम और 1983 के आदेश, दोनों की जगह लेने के लिए है।
पचास रुपये का लाइसेंस
1983 के आदेश के साथ लगे फ़ॉर्म 'ए' में डीलर को लिखना होता है कि उसने लाइसेंस शुल्क के पचास रुपये किस चालान से जमा किए। खंड 17 के अनुसार लाइसेंस में संशोधन के लिए दस रुपये की फ़ीस लगती है। फ़ॉर्म में एक सवाल यह भी है कि पिछले तीन साल में आवेदक कभी आवश्यक वस्तु अधिनियम या उसके किसी आदेश में दोषी ठहराया गया है या नहीं। ये रक़में 1983 से नहीं बदलीं।
क्यूआर कोड से पहले की पर्ची

नए मसौदे की सबसे ज़्यादा प्रचारित बात हर पैकेट पर क्यूआर कोड और एक केंद्रीय बीज ट्रेसेबिलिटी पोर्टल है। इसका पूर्वज 1983 के आदेश में मौजूद है। खंड 9 हर डीलर को हर ख़रीदार को नक़द या उधार का मेमोरंडम देने के लिए बाध्य करता है। खंड 8 उससे कहता है कि वह अपने कारोबार की जगह पर रोज़ का खुलता और बंद होता स्टॉक तथा अलग-अलग बीजों की क़ीमतों की सूची टाँगे। काग़ज़ पर यह व्यवस्था 43 साल पुरानी है।
किसान को 1966 का अधिनियम कहाँ छोड़ता है

धारा 24 में एक छूट है, और उसकी शर्तें तंग हैं। अधिनियम किसी अधिसूचित क़िस्म के उस बीज पर लागू नहीं होता जो किसी व्यक्ति ने ख़ुद उगाया हो और जिसे उसने अपने परिसर में ही, सीधे दूसरे व्यक्ति को, बोने या रोपने के लिए बेचा या दिया हो। तीनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए। बीज मंडी में बेचा गया, बिचौलिये के हाथ गया, या ख़रीदार ने आगे बेचने के लिए लिया, तो छूट ख़त्म।
2004: वह विधेयक जो राज्यसभा तक गया
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के विधायी ब्यौरे के अनुसार बीज विधेयक, 2004 राज्यसभा में 9 दिसंबर 2004 को पेश हुआ और 16 दिसंबर 2004 को स्थायी समिति को भेजा गया। समिति की रिपोर्ट 28 नवंबर 2006 को आई। पीआरएस के पन्ने पर विधेयक की अंतिम स्थिति दर्ज नहीं है। यही अब तक की इकलौती कोशिश है जो मसौदे से आगे बढ़कर सदन के पटल तक पहुँची। बाक़ी प्रयास मंत्रालय की वेबसाइट से आगे नहीं गए।
2004 के विधेयक में सज़ा की रक़म
खंड 38(1) में मिथ्या-चिह्नित बीज बेचने, बिना पंजीकरण प्रमाणपत्र के बीज बेचने या निरीक्षक के काम में बाधा डालने पर जुर्माना पाँच हज़ार रुपये से कम नहीं और पच्चीस हज़ार रुपये तक रखा गया था। खंड 38(2) में अंकुरण, शुद्धता या स्वास्थ्य के मानकों पर खरा न उतरने वाले बीज की बिक्री पर वही रक़म है। खंड 38(3) में नक़ली या अपंजीकृत बीज की आपूर्ति पर छह महीने तक की क़ैद या पचास हज़ार रुपये तक का जुर्माना या दोनों। यह ऊपरी सीमा भी 1983 के आदेश में पहले से उपलब्ध सात साल से कम थी।
मुआवज़े का रास्ता उपभोक्ता अदालत की तरफ़
खंड 20 का शीर्षक "किसान को मुआवज़ा" है, पर उसका तंत्र मुआवज़ा देता नहीं, भेज देता है। खंड कहता है कि पंजीकृत क़िस्म का बीज बेचते समय उत्पादक, वितरक या विक्रेता को दी हुई परिस्थितियों में अपेक्षित प्रदर्शन बताना होगा, और अगर बीज वह प्रदर्शन न दे तो किसान उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत मुआवज़े का दावा कर सकता है। दावे का बोझ, ख़र्च और सबूत किसान पर आ जाते हैं। यही आपत्ति 2019 और 2025 के मसौदों पर भी दोहराई गई।
छूट जो एक शर्त के साथ आई
2004 के विधेयक का खंड 43(1) "पंजीकरण से छूट" के शीर्षक से आता है। उसमें लिखा है कि अधिनियम किसान के अपने खेत के बीज और रोपण सामग्री को बचाने, इस्तेमाल करने, बदलने, साझा करने या बेचने के अधिकार को सीमित नहीं करेगा, सिवाय इसके कि वह उसे ब्रांड नाम से नहीं बेचेगा और न ही ऐसा बीज बेचेगा जो धारा 6 के खंड (क) या (ख) के तहत निर्धारित अंकुरण तथा शुद्धता की न्यूनतम सीमा पूरी न करता हो। दूसरी शर्त ही असली शर्त है।
पीपीवीएफ़आर की धारा 39 का वाक्य
पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 की धारा 39(1)(iv) कहती है कि किसान संरक्षित क़िस्म के बीज सहित अपनी खेत की उपज को बचाने, इस्तेमाल करने, बोने, दोबारा बोने, बदलने, साझा करने या बेचने का उसी तरह हक़दार माना जाएगा जैसे वह इस अधिनियम के लागू होने से पहले था। एकमात्र शर्त परंतुक में है: वह संरक्षित क़िस्म का ब्रांडेड बीज नहीं बेच सकता। स्पष्टीकरण ब्रांडेड बीज को ऐसा बीज बताता है जो किसी पात्र में रखा हो और जिस पर लगे लेबल से ज़ाहिर हो कि वह संरक्षित क़िस्म का है।
दो क़ानूनों के बीच की दरार
धारा 39 में गुणवत्ता की कोई शर्त नहीं है। किसान का बीज कम अंकुरण वाला हो तब भी उसे बेचने का अधिकार वहाँ बना रहता है, बस ब्रांड नाम नहीं लग सकता। 2004 के खंड 43(1) ने उसी अधिकार पर अंकुरण और शुद्धता की न्यूनतम सीमा चिपका दी थी। किसान संगठनों की सबसे पुरानी आपत्ति यही है, और वह 22 साल से एक ही जगह खड़ी है। नए मसौदे में यह शर्त पंजीकरण की शक्ल में लौटी है।
2019 का मसौदा और शीतकालीन सत्र
द वायर की 1 अप्रैल 2021 की व्याख्या के अनुसार स्थायी समिति ने खंड 1(3)(ख) में संशोधन की सिफ़ारिश की थी ताकि क़ानून की परिधि "किसान के अलावा" उत्पादकों तक सीमित रहे, और किसानों पर अपने बीज पंजीकृत कराने तथा न्यूनतम शुद्धता-सीमा पूरी करने की बाध्यता पर आपत्ति की थी। 2019 के मसौदे से यह बाध्यता हटा ली गई। दिसंबर 2019 में मंत्रालय उसे उसी शीतकालीन सत्र में रखने की बात कह रहा था। वह सत्र बीत गया और मसौदा सदन तक नहीं आया।
कोशिशों की गिनती पर मतभेद
5 जनवरी 2026 को मोंगाबे इंडिया पर छपी टिप्पणी में आशा-किसान स्वराज की संचालन समिति के सदस्य श्रीधर राधाकृष्णन लिखते हैं कि भारत ने बीज क़ानून चार बार लिखने की कोशिश की: 2004, 2010, 2019 और 2025। 2010 में स्थायी समिति की आपत्तियों के बाद 72 संशोधन लाए गए थे। पीआरएस का ब्यौरा 2010 को अलग विधेयक नहीं गिनता, क्योंकि वे संशोधन 2004 के उसी विधेयक पर थे। गिनती तीन भी बनती है और चार भी।
नवंबर 2025 का मसौदा
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने बीज विधेयक 2025 का मसौदा नवंबर 2025 में सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए रखा। तारीख़ पर स्रोत एकमत नहीं हैं: मोंगाबे इंडिया 12 नवंबर लिखता है, साउथ एशिया टाइम्स 13 नवंबर। टिप्पणियों की आख़िरी तारीख़ 11 दिसंबर 2025 थी। मसौदे में हर व्यावसायिक बीज क़िस्म का पंजीकरण अनिवार्य है, जो खेती और उपयोग के लिए मूल्य यानी वीसीयू के परीक्षण पर टिका होगा। हर पात्र पर पोर्टल से बना क्यूआर कोड लगेगा।
पंजीकरण की वह शर्त जिस पर आपत्ति टिकी है
आशा-किसान स्वराज ने 10 दिसंबर 2025 को भेजे धारावार सुझावों में मसौदे की धारा 1(2) के परंतुक पर आपत्ति की। उनके अनुसार परंतुक किसान के अधिकार को "इस अधिनियम के तहत पंजीकृत" क़िस्म तक सीमित करता है, जबकि पीपीवीएफ़आर की धारा 39(1)(iv) यह अधिकार पंजीकरण की शर्त के बिना देती है। किसान की परिभाषा पर भी सवाल है, जो कंपनी और व्यापारी को बाहर रखती है पर सामुदायिक बीज बैंकों को शामिल नहीं करती। धारा 28(1) के तहत अपील उसी समिति के पास जाती है जिसका फ़ैसला चुनौती में है।
मुआवज़ा कोष की माँग
मसौदे में फ़सल ख़राब होने पर मुआवज़े का कोई तंत्र नहीं है, और यही आपत्ति का केंद्र है। आशा-किसान स्वराज ने एक नई धारा 38 जोड़ने की माँग की है जिसके तहत बीज मुआवज़ा कोष बने और उसमें केंद्र तथा राज्य का हिस्सा 60 और 40 के अनुपात में हो। मोंगाबे की टिप्पणी के अनुसार जुर्माने की रक़म राज्य के ख़ज़ाने में जाती है, प्रभावित किसान के पास नहीं, जिससे किसान उपभोक्ता अदालत या राज्य के तदर्थ फ़ैसलों पर निर्भर रह जाता है।
नौ हज़ार सुझाव और बजट सत्र का लक्ष्य
7 जनवरी 2026 को कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी ने पीटीआई से कहा कि बीज विधेयक 2025 पर सुझावों के नौ हज़ार आवेदन मिले हैं, उन्हें संसाधित कर कैबिनेट नोट रखा जाएगा, और लक्ष्य विधेयक को बजट सत्र के पहले चरण में लाने का है। द फ़ेडरल की उसी रिपोर्ट में जुर्माने की सीमा एक लाख से तीस लाख रुपये और अधिकतम क़ैद तीन साल बताई गई है, जो अपराध की गंभीरता के हिसाब से श्रेणीबद्ध होगी।
संसद की दोनों सूचियों में यह विधेयक नहीं था
पीआरएस की सत्र-सूचना के अनुसार बजट सत्र 2026 28 जनवरी से 2 अप्रैल तक चला, 30 बैठकें, और 14 फ़रवरी से 8 मार्च तक अवकाश। उस सत्र की विधायी सूची में एक ही विधेयक था, वित्त विधेयक 2026। मानसून सत्र 2026 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला और उसकी सूची में पाँच विधेयक थे: आयकर संशोधन, एमएसएमई विकास संशोधन, जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन, उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश संख्या संशोधन, और राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण संशोधन। बीज विधेयक किसी में नहीं था।
बैठक की सूची में कौन नामित है
मंत्रालय की विज्ञप्ति में जिन संगठनों के नाम हैं उनमें भारतीय किसान संघ, बीकेयू के विभिन्न घटक, अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति, किसान महापंचायत, भारतीय कृषक समाज, गांव किसान उन्नयन और एसआईएफ़ए हैं। राज्यों से कर्नाटक और तेलंगाना के रैयत संघ, महाराष्ट्र का शेतकारी संगठन, गुजरात का खेदुत समाज, राजस्थान और बिहार की राष्ट्रीय किसान प्रोग्रेसिव एसोसिएशन, तमिलनाडु का व्यवसाइगल संघम, झारखंड का प्रगतिशील कृषि मंच तथा केरल के कोट्टायम का एक कृषक संगठन। संयुक्त किसान मोर्चा, अखिल भारतीय किसान सभा और भारत बीज स्वराज मंच का नाम इस सूची में नहीं है।
एक संक्षिप्त नाम, दो अलग विस्तार
एसआईएफ़ए का पूरा नाम दो जगह दो तरह से छपा है। कृषि मंत्रालय की हिंदी विज्ञप्ति उसे "सोसाइटी फ़ॉर इंडिपेंडेंट फ़ार्मर्स एसोसिएशन" लिखती है। उसी दिन जारी एएनआई की एजेंसी कॉपी में वह "साउथ इंडियन फ़ार्मर्स एसोसिएशन" है। दोनों पाठ 9 सितंबर 2026 के हैं और दोनों उसी बैठक की सूची दे रहे हैं। मंत्रालय ने इस अंतर पर कोई शुद्धिपत्र जारी नहीं किया है।
नक़ली बीज का पैमाना, और दो अलग आँकड़े
लोकसभा में कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर के लिखित उत्तर के आँकड़ों के अनुसार 2023-24 में देश भर से बीज के 1,33,588 नमूने लिए गए, जिनमें 3,630 मानक से नीचे मिले, यानी 2.7 फ़ीसदी। उसी उत्तर में उर्वरक के 1,81,153 नमूनों में 8,988 और कीटनाशक के 80,789 नमूनों में 2,222 नाकाम मिले। मोंगाबे की टिप्पणी में आँकड़ा अलग है: 2022 से 2025 के बीच लगभग छह लाख नमूनों में से क़रीब 43 हज़ार खरे नहीं उतरे। दोनों को साथ रखने पर विफलता की दर मेल नहीं खाती।
तेलंगाना की माँग

15 मार्च 2026 की डेक्कन क्रॉनिकल रिपोर्ट के अनुसार तेलंगाना के कृषि मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव ने कहा कि केंद्र राज्य के विषयों में दख़ल देकर उनके अधिकार घटा रहा है, और स्थानीय मौसम में स्थानीय क़िस्मों पर नियंत्रण राज्य सरकारों के पास रहना चाहिए। पीजेटीएसएयू के कुलपति प्रोफ़ेसर अल्दास जनैया ने 13 आपत्तियों का ज्ञापन देकर कहा कि राज्य बीज समितियाँ कम से कम एक मौसम तक स्थानीय स्तर पर परखी गई क़िस्मों का पंजीकरण करें। अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सारमपल्ली मल्लारेड्डी के अनुसार तेलंगाना में हर साल लगभग पाँच लाख एकड़ पर नक़ली बीज से नुक़सान होता है। उसी रिपोर्ट के मुताबिक़ देश के बीज उत्पादन का 40 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा तेलंगाना से आता है, जिससे राज्य की माँग का वज़न बढ़ जाता है।
बाज़ार का आकार, और उसका बँटवारा
मोंगाबे की रिपोर्ट के अनुसार भारत के बीज उद्योग का मूल्य दो दशक पहले क़रीब चार हज़ार करोड़ रुपये था और अब 60 से 70 हज़ार करोड़ रुपये के बीच है। मसौदे में प्रस्तावित केंद्रीय बीज समिति में 27 सदस्य होंगे, जिनमें राज्यों के प्रतिनिधि पाँच; 1966 के ढाँचे में राज्यों के सदस्य 22 थे। हर राज्य की समिति में 15 सदस्य प्रस्तावित हैं। यही कटौती संयुक्त किसान मोर्चा के सवालों में से एक है।
अगस्त 2026 में सांसदों के सामने
6 अगस्त 2026 को भारत बीज स्वराज मंच और इंडिया सीड सॉवरेन्टी अलायंस के प्रतिनिधि सांसद जॉन ब्रिटास, डॉ. वी. शिवदासन और अमरा राम से मिले। मंच के संयोजक जैकब नेल्लीथानम ने कहा कि मुख्य चिंता बौद्धिक संपदा व्यवस्था को मज़बूत करने की है, बिना विविधता और किसानों के ज्ञान की रक्षा किए। मंच "सामान्य ज्ञान की क़िस्मों" की अलग पंजी माँग रहा है। राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के पास परंपरागत बीजों के चार लाख साठ हज़ार से ज़्यादा नमूने हैं।
जिन सवालों के जवाब बैठक से पहले नहीं मिले
संयुक्त किसान मोर्चा ने फ़रवरी 2026 में मंत्री के सामने दस सवाल रखे थे: कृषि राज्य का विषय है तो केंद्र यह क़ानून क्यों ला रहा है, राज्यों से सलाह हुई या नहीं, केंद्रीय बीज समिति में सब राज्यों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं, क़ीमत नियंत्रण का प्रावधान क्यों नहीं, फ़सल बर्बाद होने पर अनिवार्य मुआवज़ा क्यों नहीं, और जिन छोटे उत्पादकों के पास इंटरनेट नहीं है उन पर क्यूआर कोड की शर्त क्यों। विदेश में परखे गए बीजों पर स्पष्ट रोक न होने पर भी सवाल था।
जो 10 सितंबर की बैठक में तय होना है
विज्ञप्ति के अनुसार बैठक का मक़सद मसौदे पर किसानों के ज़मीनी अनुभव और सुझाव शामिल करना है। मसौदा किन बिंदुओं पर बदला जा चुका है, यह मंत्रालय ने सार्वजनिक नहीं किया, और 11 दिसंबर 2025 के बाद संशोधित पाठ जारी नहीं हुआ है। नौ हज़ार सुझावों में से कितने माने गए, इसका ब्योरा भी सार्वजनिक नहीं है। बैठक के दिन तक 1966 के अधिनियम की धारा 19 में पहली बार पकड़े जाने का जुर्माना पाँच सौ रुपये ही रहेगा।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की विज्ञप्ति (रिलीज़ आईडी 2308337), 9 सितंबर 2026, दिल्ली सरकार, विकास विभाग: बीज अधिनियम 1966, बीज नियम 1968 और बीज (नियंत्रण) आदेश 1983 का संकलित पाठ, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: बीज विधेयक, 2004 का मूल पाठ (राज्यसभा में पेश), पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: बीज विधेयक 2004 का विधायी ब्यौरा, इंडियन कानून: पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम 2001 की धारा 39, इंडियन कानून: आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा 7, आशा-किसान स्वराज: बीज विधेयक 2025 के मसौदे पर धारावार सुझाव, 10 दिसंबर 2025, मोंगाबे इंडिया: बीज विधेयक 2025 के मसौदे पर रिपोर्ट, जनवरी 2026, मोंगाबे इंडिया: श्रीधर राधाकृष्णन की टिप्पणी, 5 जनवरी 2026, द फ़ेडरल: कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी का पीटीआई से कथन, 7 जनवरी 2026, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: बजट सत्र 2026 की सत्र-सूचना, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: मानसून सत्र 2026 की सत्र-सूचना, डाउन टू अर्थ: भारत बीज स्वराज मंच की सांसदों से मुलाक़ात पर रिपोर्ट, 6 अगस्त 2026, डेक्कन क्रॉनिकल: तेलंगाना सरकार और कृषि विशेषज्ञों की आपत्तियों पर रिपोर्ट, 15 मार्च 2026, काउंटरव्यू: संयुक्त किसान मोर्चा के दस सवालों पर रिपोर्ट, 12 फ़रवरी 2026, ग्लोबल एग्रीकल्चर: लोकसभा में कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर के लिखित उत्तर के आँकड़े, लेटेस्टली पर एएनआई की एजेंसी कॉपी, 9 सितंबर 2026, द वायर: श्रुति जैन की बीज विधेयक 2019 पर व्याख्या, 1 अप्रैल 2021