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मंत्रालय ने एक ही दिन दो विज्ञप्तियाँ जारी कीं कि छात्रवृत्ति समय पर मिल रही है, और दोनों में एक भी संख्या नहीं है

सामाजिक न्याय मंत्रालय ने 7 सितंबर को अनुसूचित जाति के छात्रों की छात्रवृत्ति पर दो अलग विज्ञप्तियाँ निकालीं। मिलाकर क़रीब दस हज़ार अक्षर। न छात्रों की गिनती, न रक़म, न देरी के दिन।

एक विश्वविद्यालय का पुस्तकालय
तस्वीर: अंजनेयदास, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

सोमवार को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति जारी की जिसका शीर्षक था: सरकार ने अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्तियों के पारदर्शी और समय पर वितरण को मजबूत किया है।

उसी दिन मंत्रालय ने एक और विज्ञप्ति जारी की, जिसका शीर्षक था: सरकार ने अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए छात्रवृत्तियों की पारदर्शिता और समयबद्ध वितरण को सुदृढ़ किया है।

दोनों की विज्ञप्ति संख्या अलग है। दोनों एक ही योजना के बारे में हैं। दोनों मिलाकर क़रीब दस हज़ार अक्षर हैं।

और दोनों में मिलाकर एक भी आँकड़ा नहीं है।

किस चीज़ का आँकड़ा नहीं है

यह कहना आसान है कि किसी विज्ञप्ति में संख्याएँ नहीं थीं। यह बताना ज़्यादा काम का है कि कौन सी संख्याएँ नहीं थीं।

कितने छात्रों ने इस साल आवेदन किया, यह नहीं है।

कितनों को छात्रवृत्ति मिली, यह नहीं है।

कुल कितनी रक़म बाँटी गई, यह नहीं है।

आवेदन से भुगतान तक औसतन कितने दिन लगे, यह नहीं है।

पिछले साल के मुक़ाबले क्या बदला, यह नहीं है।

कितने आवेदन ख़ारिज हुए और किन कारणों से, यह नहीं है।

किन राज्यों का हिस्सा लंबित है, यह नहीं है।

दोनों विज्ञप्तियों में जो है, वह प्रक्रिया का विवरण है। आवेदन राज्य के पोर्टल या राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल से आते हैं। राज्य जाँच-पड़ताल और सत्यापन करते हैं। केंद्र का हिस्सा तभी जारी होता है जब राज्य अपना हिस्सा दे दे और सत्यापित लाभार्थी डेटा पोर्टल पर चढ़ा दे। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण पोस्ट-मैट्रिक में 2021-22 से लागू है और प्री-मैट्रिक में 2022-23 से।

यह सब सही है। यह सब पहले से मालूम है। और इसमें से कुछ भी यह नहीं बताता कि व्यवस्था काम कर रही है या नहीं।

फ़र्क़ समझने के लिए एक मिसाल लीजिए। अगर कोई रेलवे यह बताए कि उसके पास पटरियाँ हैं, सिग्नल हैं, टिकट की खिड़कियाँ हैं और समयसारिणी छपती है, तो उसने अपनी व्यवस्था बता दी। उसने यह नहीं बताया कि गाड़ियाँ समय पर चलती हैं या नहीं।

दूसरी बात के लिए एक ही चीज़ चाहिए: कितनी गाड़ियाँ कितनी देर से चलीं।

इन विज्ञप्तियों में पहली तरह की जानकारी भरी हुई है और दूसरी तरह की एक पंक्ति नहीं है।

प्री-मैट्रिक वाली योजना भी इसी में है

दूसरी विज्ञप्ति में एक और योजना का नाम आता है जिसका ज़िक्र पहली में नहीं है।

वह है प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति, जो दसवीं से पहले के छात्रों के लिए है और जिसमें अनुसूचित जाति के साथ कुछ दूसरे वर्ग भी शामिल हैं।

इसमें डीबीटी 2022-23 से लागू हुआ, यानी पोस्ट-मैट्रिक के एक साल बाद।

दोनों योजनाओं को एक ही विज्ञप्ति में रखने का नतीजा यह होता है कि उनके अलग-अलग हालात एक-दूसरे में घुल जाते हैं। दोनों के छात्र अलग उम्र के हैं, दोनों की रक़म अलग है, और दोनों में देरी के कारण अलग हो सकते हैं।

जब एक साझा वाक्य में यह कहा जाता है कि व्यवस्था मज़बूत हुई, तो यह नहीं पता चलता कि किसमें कितनी।

दो विज्ञप्तियाँ एक ही दिन क्यों

सरकारी दफ़्तर में फ़ाइलों की अलमारी
तस्वीर: गणेश धामोदकर, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

इसका सबसे संभावित कारण यह है कि दोनों संसद में पूछे गए अलग-अलग प्रश्नों के उत्तर से बनी हैं।

मंत्रालय अक्सर संसदीय उत्तरों को विज्ञप्ति की शक्ल में जारी करते हैं। दो सांसदों ने मिलती-जुलती बात पूछी हो तो दो उत्तर बनते हैं, और दोनों अलग-अलग छपते हैं।

इससे यह भी समझ आता है कि इनमें आँकड़े क्यों नहीं हैं। संसदीय उत्तर में मंत्रालय उतना ही देता है जितना पूछा गया हो। अगर प्रश्न यह था कि सरकार पारदर्शिता के लिए क्या कर रही है, तो उत्तर उपायों की सूची होगा, आँकड़ों की नहीं।

पर विज्ञप्ति और संसदीय उत्तर में एक फ़र्क़ है। संसदीय उत्तर एक सांसद के प्रश्न का जवाब है। विज्ञप्ति देश के सामने रखा गया बयान है।

जब वही उत्तर विज्ञप्ति बनकर निकलता है, तो उसका शीर्षक दावे में बदल जाता है। "मजबूत किया है" और "सुदृढ़ किया है" दोनों उपलब्धि की भाषा हैं।

और उपलब्धि का दावा बिना आँकड़े के अधूरा रहता है।

दोनों विज्ञप्तियों की भाषा पर ध्यान दीजिए तो एक और बात दिखती है। उनमें क्रियाएँ पूर्ण काल में हैं। मजबूत किया है। सुदृढ़ किया है। यानी काम हो चुका।

अगर काम हो चुका है तो उसका कोई नाप होगा। जो चीज़ पहले एक स्तर पर थी और अब बेहतर स्तर पर है, उसके दोनों स्तर बताए जा सकते हैं।

पूर्ण काल की क्रिया और शून्य आँकड़ा एक साथ नहीं चल सकते। एक दावा करती है, दूसरा उसे जाँचने से रोकता है।

जो आँकड़े मौजूद हैं

यह मान लेना ग़लत होगा कि ये संख्याएँ किसी के पास नहीं हैं। हैं, और कुछ सार्वजनिक भी हैं।

दिसंबर 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना का पुनर्गठन मंज़ूर किया था। उसका कुल परिव्यय 59,048 करोड़ रुपये तय हुआ, केंद्र और राज्य का हिस्सा 60 और 40 के अनुपात में रखा गया, और अवधि 2021 से 2026 तक की रखी गई।

यानी यह पाँच साल का दौर इसी वित्त वर्ष में ख़त्म हो रहा है।

यह अपने आप में एक ख़बर है। जिस योजना का पाँच साल का चक्र पूरा हो रहा हो, उस पर सितंबर में दो विज्ञप्तियाँ आएँ और उनमें यह न बताया जाए कि पाँच साल में क्या हुआ, यह चूक मामूली नहीं है।

पात्रता की शर्त भी दर्ज है। माता-पिता या अभिभावक की सालाना आय ढाई लाख रुपये से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए।

राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल पर आवेदन और भुगतान का ब्योरा दर्ज होता है, और वही ब्योरा इन सवालों का जवाब दे सकता है। पोर्टल मंत्रालय का अपना है और उसमें राज्यवार आँकड़े रहते हैं।

यानी जिस विज्ञप्ति में यह लिखा है कि पोर्टल से निगरानी होती है, उसी विज्ञप्ति में उस निगरानी का कोई नतीजा नहीं है।

निगरानी की व्यवस्था बताना और निगरानी में क्या मिला यह बताना, दो अलग काम हैं। पहला किया गया, दूसरा नहीं।

और जो रिपोर्ट पहले से छपी है

नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ने इसी योजना पर एक पूरा अध्याय लिखा है।

लेखा परीक्षा की जाँच और सूचना के अधिकार से मिले जवाबों में इस योजना में कई साल की देरी दर्ज है। राज्यों पर बकाया रहा, और उस बकाये का एक नतीजा यह हुआ कि निजी संस्थान अनुसूचित जाति के छात्रों को दाख़िला देने से हिचकने लगे।

यह आख़िरी बात ध्यान देने लायक़ है, क्योंकि यह छात्रवृत्ति की देरी को उसकी असली शक्ल दिखाती है।

संस्थान फ़ीस का इंतज़ार करता है। छात्रवृत्ति देर से आती है। संस्थान अगली बार ऐसे छात्रों को लेने से बचता है, क्योंकि उसका पैसा फँसता है।

तो देरी सिर्फ़ एक छात्र का नुक़सान नहीं करती। वह अगले साल के छात्रों के लिए दरवाज़ा थोड़ा और सँकरा कर देती है।

पैसा रुकता कहाँ है

गाँव में एक बैंक शाखा। छात्रवृत्ति सीधे आधार से जुड़े खाते में भेजी जाती है
तस्वीर: Fredericknoronha, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

विज्ञप्ति में जो प्रक्रिया बताई गई है, उसी में यह जवाब छिपा है, बशर्ते उसे ध्यान से पढ़ा जाए।

लिखा है कि केंद्र सरकार द्वारा छात्रवृत्ति का वितरण इस बात से जुड़ा है कि राज्य अपने हिस्से का भुगतान कर दे और सत्यापित लाभार्थी डेटा पोर्टल पर भेज दे।

इसका मतलब यह है कि केंद्र का साठ फ़ीसदी तब तक नहीं चलता जब तक राज्य अपना चालीस फ़ीसदी न दे दे।

यह शर्त वाजिब है, क्योंकि इसके बिना राज्य अपना हिस्सा टालते रहेंगे। पर इसका नतीजा छात्र पर पड़ता है। राज्य का बजट अटका, तो केंद्र का पैसा भी अटका, और दोनों में से किसी की सूची में वह छात्र नहीं है जिसकी फ़ीस बाक़ी है।

इसी वजह से इस योजना में देरी का पैटर्न राज्यवार बहुत अलग-अलग रहा है। कुछ राज्यों में भुगतान समय पर होता है और कुछ में सालों खिंचता है।

और यही वह आँकड़ा है जो दोनों विज्ञप्तियों में नहीं है।

एक विज्ञप्ति में यह ज़रूर लिखा है कि कार्यान्वयन से जुड़ी शिकायतें संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को अग्रेषित कर दी जाती हैं, जहाँ उन पर उचित प्रशासनिक कार्रवाई होती है।

यह वाक्य पढ़ने में सामान्य लगता है। उसका मतलब यह है कि केंद्र शिकायत लेकर उसे राज्य को भेज देता है।

छात्र के नज़रिये से देखिए तो इसका अर्थ बदल जाता है। उसकी छात्रवृत्ति दो सरकारों के बीच अटकी है, और शिकायत करने पर वह शिकायत भी उन्हीं दोनों के बीच घूमने लगती है।

किस तारीख़ तक जवाब देना है, यह किसी विज्ञप्ति में नहीं है।

डीबीटी से क्या बदला और क्या नहीं

विज्ञप्तियों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को बड़ी उपलब्धि की तरह रखा गया है, और वह है भी।

इससे पैसा सीधे छात्र के आधार से जुड़े बैंक खाते में जाता है। बीच के हाथ हट गए, दोहराव पकड़ में आने लगा, और फ़र्ज़ी लाभार्थियों की गुंजाइश घटी।

पर डीबीटी उस समस्या को हल नहीं करता जो पैसे के चलने से पहले की है।

अगर आवेदन सत्यापित होने में महीनों लगें, या राज्य का हिस्सा न आया हो, तो हस्तांतरण कितना भी सीधा हो, वह शुरू ही नहीं होगा। डीबीटी आख़िरी क़दम को तेज़ करता है, पहले क़दमों को नहीं।

इसलिए "डीबीटी लागू है" और "छात्रवृत्ति समय पर मिल रही है" दो अलग बयान हैं। विज्ञप्तियों में पहला है, और उससे दूसरा साबित नहीं होता।

आधार से जोड़ने का एक और पहलू है जिस पर कम बात होती है। अगर छात्र के दस्तावेज़ों में नाम की वर्तनी अलग हो, या बैंक खाता आधार से न जुड़ा हो, तो भुगतान रुक जाता है और उसे ठीक कराना छात्र की ज़िम्मेदारी बन जाती है।

ऐसे मामलों की संख्या कितनी है, यह भी एक आँकड़ा है जो पोर्टल में मौजूद होगा और विज्ञप्ति में नहीं है।

तकनीक ने बिचौलिया हटाया, यह सच है। उसने कुछ नई रुकावटें भी बनाईं, और उनका हिसाब अलग से रखना पड़ता है।

यह क्यों मायने रखता है

एक विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह
तस्वीर: राष्ट्रपति सचिवालय GODL-India

पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति उन छात्रों के लिए है जो दसवीं के बाद पढ़ाई जारी रखते हैं।

यही वह मोड़ है जहाँ पढ़ाई सबसे ज़्यादा छूटती है, और सबसे ज़्यादा पैसे की वजह से छूटती है। ढाई लाख सालाना की आय सीमा बताती है कि यह योजना किन परिवारों के लिए बनी है। उस आय में एक बच्चे की कॉलेज फ़ीस, हॉस्टल और किताबें अपने बल पर उठाना मुश्किल होता है।

ऐसे परिवार के लिए छात्रवृत्ति का समय पर आना अकादमिक सवाल नहीं है। वह इस बात का सवाल है कि बच्चा अगला सत्र भरेगा या नहीं।

इसीलिए इस योजना पर आने वाली हर विज्ञप्ति में समय का हिसाब होना चाहिए, और वही सबसे पहले ग़ायब रहता है।

यह चूक अकेली नहीं है

इस अख़बार ने इसी हफ़्ते एक और मामला दर्ज किया था जिसमें इसी मंत्रालय की हिंदी विज्ञप्ति में जैव विविधता समितियों की संख्या दस गुना ज़्यादा छप गई थी।

दोनों बातों को साथ रखिए तो एक पैटर्न दिखता है। विज्ञप्तियों में या तो संख्या ग़लत होती है, या होती ही नहीं।

इसका कारण शायद बदनीयती नहीं है। सरकारी विज्ञप्ति लिखने की प्रक्रिया में जो चीज़ सबसे आसानी से जुड़ती है वह उपायों की सूची है, क्योंकि वह हर विभाग के पास तैयार रहती है। आँकड़ा जोड़ने के लिए किसी और से पूछना पड़ता है और उसकी ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है।

नतीजा यह होता है कि जो विज्ञप्ति सबसे लंबी होती है, वह अक्सर सबसे कम बताती है।

पाठक के लिए इसका एक व्यावहारिक नुस्ख़ा है। किसी भी सरकारी विज्ञप्ति को पढ़ते वक़्त पहले उसमें संख्याएँ ढूँढ़िए। अगर एक भी न मिले, तो शीर्षक चाहे जो दावा करता हो, उसे जाँचा नहीं जा सकता।

जो पूछा जाना चाहिए

इन दो विज्ञप्तियों के बाद जो सवाल बनते हैं, वे सीधे हैं और उनके जवाब मंत्रालय के पास हैं।

पाँच साल की अवधि में 59,048 करोड़ के परिव्यय में से कितना ख़र्च हुआ।

हर साल कितने छात्रों को छात्रवृत्ति मिली, और यह संख्या बढ़ी या घटी।

आवेदन से भुगतान तक का औसत समय कितना है, और राज्यवार वह कितना अलग है।

कितने राज्यों का हिस्सा इस समय लंबित है और कितने का कितने महीनों से।

इनमें से कोई सवाल नया नहीं है। ये सब उसी योजना के बारे में हैं जिस पर मंत्रालय ने एक ही दिन दो बार बोला।

दस हज़ार अक्षरों में इनमें से एक का भी जवाब नहीं था।

और एक बात जो दर्ज रहनी चाहिए

इस लेख का मतलब यह नहीं है कि योजना नाकाम है। ऐसा कहने के लिए भी वही आँकड़े चाहिए जिनकी कमी की शिकायत यहाँ की जा रही है।

हो सकता है भुगतान पहले से तेज़ हुआ हो। हो सकता है डीबीटी ने सचमुच बड़ा फ़र्क़ डाला हो। हो सकता है इस साल का रिकॉर्ड पिछले सालों से बेहतर हो।

यह सब संभव है, और अगर सच है तो मंत्रालय के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं होगा कि वह इसे संख्याओं में रखे।

असली शिकायत यह है कि दावा और सबूत एक साथ नहीं चल रहे। जिस दिन दो विज्ञप्तियाँ निकालने का फ़ैसला हुआ, उसी दिन उनमें एक तालिका जोड़ी जा सकती थी।

वह तालिका पोर्टल पर पहले से मौजूद है।

स्रोतसामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की विज्ञप्ति, 7 सितंबर 2026, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की दूसरी विज्ञप्ति, उसी दिन, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक, पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति पर अध्याय, सामाजिक न्याय विभाग, योजना का विवरण

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