भारत पन्ना
देश

दिल्ली में 31,63,930 नोटिस निकले, जवाब की मियाद सात दिन, सुनवाई मंगलवार को

मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली के 19 सितंबर के प्रेस नोट में लिखा है कि अब तक 31,63,930 नोटिस बने हैं और मतदाताओं तक पहुँचाए जा रहे हैं। अख़बारों में चल रही संख्या 33,12,919 है, जो प्रशांत भूषण की दाख़िल की याचिका से आई है। फ़र्क़ 1,48,989 का है और इसे मिलाने वाला कोई काग़ज़ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की 22 सितंबर की वाद-सूची में दिल्ली मद 13 पर है और बंगाल मद 22 पर।

यह तस्वीर दिल्ली की नहीं, नागपुर की है, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के दौरान मतदाता सूची में अपना नाम खोजते लोग। दिल्ली की बूथ-स्तर की गणना का ऐसा कोई मुक्त लाइसेंस वाला दृश्य नहीं मिला, पर सूची में नाम खोजने का तरीक़ा हर जगह एक जैसा रहता है
तस्वीर: Ganesh Dhamodkar, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

शुक्रवार की रात 8 बजकर 49 मिनट पर सुप्रीम कोर्ट के अतिरिक्त रजिस्ट्रार ने 22 सितंबर की वाद-सूची जारी कर दी। मुख्य न्यायाधीश की अदालत के उस काग़ज़ पर मद 13 दिल्ली का है और मद 22 पश्चिम बंगाल का। दोनों में प्रतिवादी भारत निर्वाचन आयोग है। पीठ में मुख्य न्यायाधीश के साथ जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना बैठेंगे। सूची उस रात के बाद बदली नहीं है, यह सोमवार सुबह दोबारा उतारकर जाँचा गया।

सुनवाई मंगलवार को है।

सोमवार, 21 सितंबर के लिए सुप्रीम कोर्ट ने छह वाद-सूचियाँ छापी हैं। छहों इस डेस्क ने उतारीं और पढ़ीं। रिट याचिका (सिविल) 1089/2025 और रिट याचिका (सिविल) 1188/2026, दोनों में से कोई भी उनमें नहीं है। यह इस अख़बार की अपनी ग़लती भी सुधारता है। 18 सितंबर को हमने छापा था कि तारीख़ पर रिपोर्टें बँटी हैं, द वायर और मिलेनियम पोस्ट 21 सितंबर लिखते हैं और लॉबीट 22 सितंबर। अदालत की अपनी सूची कहती है कि लॉबीट सही था। पुरानी रिपोर्ट को छेड़ा नहीं गया है; सुधार यहाँ दर्ज है।

जिस संख्या पर यह मुक़दमा खड़ा है, उस पर भी दो सरकारी रास्ते हैं और दोनों एक अंक पर नहीं मिलते।

नोटिस की गिनती आयोग के अपने नोट में 31,63,930 है

मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली का प्रेस नोट 19 सितंबर का है, चार पन्ने का है, और उसका सातवाँ बिंदु दावे-आपत्ति की अवधि पर है। उसमें एक वाक्य ऐसा है जिस पर बाक़ी सब टिका है: "As on date, 31,63,930 Notices have been generated and are being delivered to electors concerned of NCT of Delhi." यानी उस तारीख़ तक 31,63,930 नोटिस बन चुके हैं और मतदाताओं तक पहुँचाए जा रहे हैं। यही बिंदु बताता है कि नोटिस किन्हें जा रहे हैं: उन्हें, जो पिछले पुनरीक्षण की सूची से जुड़ नहीं सके, और उन्हें, जिनके जुड़ाव में तार्किक विसंगति मिली।

अख़बारों में चल रही संख्या 33,12,919 है। वह कहाँ से आई, यह भी दर्ज है। लाइव लॉ ने 17 सितंबर की सुबह 11:50 बजे छापा कि अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने वकील प्रशांत भूषण के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल की है, और याचिका में यह संख्या दर्ज है। याचिका उसे दो हिस्सों में तोड़ती है: 13,79,785 नो-मैपिंग के और 19,33,134 तार्किक विसंगति के। जोड़ ठीक बैठता है, 33,12,919। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये आँकड़े दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट से लिए गए हैं।

दोनों संख्याओं का फ़ासला 1,48,989 है। इस डेस्क ने आयोग या मुख्य निर्वाचन अधिकारी का ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं पाया जिसमें 33,12,919 या उसका बँटवारा छपा हो। न ही कोई काग़ज़ यह बताता है कि दोनों अलग-अलग दिन की या अलग-अलग चीज़ की गिनती हैं। द ट्रिब्यून ने सोमवार तड़के 5:57 बजे जो रिपोर्ट छापी, उसमें भी 33.13 लाख ही है।

अब भाग दीजिए। 31 अगस्त की मसौदा सूची में दिल्ली के 97,53,577 मतदाता हैं। 31,63,930 उसका 32.4 फ़ीसदी बनता है। सूची में दर्ज लगभग हर तीन में से एक मतदाता के पते पर काग़ज़ जा रहा है।

नोटिस के बाद सात दिन, और उसके आगे एक अपरिभाषित वाक्य

सात दिन की यह मियाद किसी नियम में नहीं है। वह मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ़्तर के पत्र में है। वोटर अधिकार मंच की सागरिका अरोड़ा और अन्य को भेजा गया यह पत्र संख्या एफ़.2(593)/सीईओ/ईआर/2026/2319 है, तारीख़ 07.09.2026, दस्तख़त उप मुख्य निर्वाचन अधिकारी (ईआर) प्रशांत कुमार प्रसाद के। पत्र तीन खानों की तालिका है: बाएँ आयोग का अपना बयान, बीच में मंच का एतराज़, दाएँ दफ़्तर का जवाब। नोटिस वाली पंक्ति के जवाब में लिखा है: "07 days time will be given to the electors for submitting their reply/requisite documents to the ERO. In case of non-submission of relevant documents, action will be taken in accordance with ECI's instructions."

वाक्य का पहला हिस्सा साफ़ है। सात दिन, जवाब और दस्तावेज़ निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के पास। दूसरा हिस्सा साफ़ नहीं है। दस्तावेज़ न आने पर कार्रवाई आयोग के निर्देशों के मुताबिक़ होगी, पर वे निर्देश किस काग़ज़ में हैं और उनमें लिखा क्या है, यह पत्र नहीं बताता। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर भी वह काग़ज़ नहीं मिला।

इसी पंक्ति के बाएँ खाने में आयोग का अपना बयान छपा है, जो 31 अगस्त के प्रेस नोट के बिंदु 17 से उठाया गया है। उसका शीर्षक है "No Deletion Without Due Process" और पाठ यह है: "The ERO/AERO shall not delete any entry/name from the draft electoral roll without issuing notice, conducting an inquiry and giving a fair and reasonable opportunity to the person concerned whose name has appeared in the draft roll. In each such case, ERO/AERO shall pass Speaking order." यानी नोटिस, जाँच, सुनवाई का उचित मौक़ा, और हर मामले में कारण बताता आदेश। जवाब न देने भर से नाम कटेगा, यह किसी काग़ज़ में नहीं लिखा।

दोनों वाक्य एक ही पंक्ति में हैं, बाएँ और दाएँ। एक अधिकार देता है, दूसरा परिणाम को अनाम छोड़ देता है। इसी खाने में दफ़्तर यह भी लिखता है कि नोटिस बीएलओ मतदाता के दर्ज पते पर ख़ुद हाथ में देंगे। पत्र स्कैन की गई तस्वीर है और यह पाठ उसी तस्वीर से पढ़ा गया।

नोटिस मिलने पर क्या देना है, इसकी सूची घोषणा पत्र और गणना प्रपत्र, दोनों के पिछले पन्ने पर छपी है, और वही सूची एसआईआर के प्रश्नोत्तर के प्रश्न 23 में भी है। उसमें बारह प्रविष्टियाँ हैं: केंद्र या राज्य सरकार या सार्वजनिक उपक्रम के नियमित कर्मचारी या पेंशनभोगी का पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश; 01.07.1987 से पहले सरकार, स्थानीय निकाय, बैंक, डाकघर, एलआईसी या सार्वजनिक उपक्रम का जारी किया कोई दस्तावेज़; सक्षम अधिकारी का जन्म प्रमाण पत्र; पासपोर्ट; मान्यता प्राप्त बोर्ड या विश्वविद्यालय का मैट्रिक या शैक्षिक प्रमाण पत्र; राज्य का स्थायी निवास प्रमाण पत्र; वन अधिकार प्रमाण पत्र; ओबीसी, एससी या एसटी सहित कोई जाति प्रमाण पत्र; जहाँ लागू हो वहाँ नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर; क़ानून या प्रशासनिक नियम के तहत सरकारी कर्मचारियों का रखा कुटुंब रजिस्टर; सरकार का कोई भूमि या मकान आवंटन प्रमाण पत्र। बारहवीं प्रविष्टि दस्तावेज़ है ही नहीं। वह आधार पर आयोग के 09.09.2025 के पत्र संख्या 23/2025-ईआरएस/खंड-2 की ओर इशारा करती है।

दस्तावेज़ किसके चाहिए, यह जन्म के साल से तय होता है। 01.07.1987 से पहले भारत में जन्मे व्यक्ति को सिर्फ़ अपना दस्तावेज़ देना है। 01.07.1987 और 02.12.2004 के बीच जन्मे को अपना, और माता या पिता में से किसी एक का। 02.12.2004 के बाद जन्मे को अपना, पिता का और माँ का, तीनों। ये दोनों तारीख़ें नागरिकता क़ानून में हुए बदलावों की हैं, और काग़ज़ उन्हें अपनी कसौटी बनाता है। जिसके पास इनमें से कुछ नहीं है, उसके लिए काग़ज़ में कोई रास्ता दर्ज नहीं है।

एक भारतीय पासपोर्ट, बारह स्वीकृत दस्तावेज़ों में से एक। न कोई नाम, न कोई नंबर पढ़ा जा सकता है, सिर्फ़ वह दस्तावेज़ जिसकी माँग नोटिस के जवाब में हो सकती है
तस्वीर: Gpkp, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

घोषणा पत्र अनुलग्नक चार है, और माँ का एपिक नंबर माँगता है

मसौदा सूची से बाहर रह गया कोई व्यक्ति नाम जुड़वाना चाहे तो उसे फ़ॉर्म 6 भरना है। यह फ़ॉर्म निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 का है। इसके साथ एक और काग़ज़ देना है, जिसे मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर "घोषणा पत्र" नाम से रखा गया है। उसके ऊपरी दाएँ कोने में लिखा है, अनुलग्नक-चार।

दो पन्ने का यह काग़ज़ क्या माँगता है, यह पढ़ने लायक़ है। पहली तालिका में पिछले एसआईआर की सूची में आवेदक की अपनी प्रविष्टि का ब्योरा चाहिए: नाम, एपिक नंबर, रिश्तेदार का नाम, रिश्ता, ज़िला, राज्य, विधानसभा का नाम और नंबर, भाग संख्या, क्रम संख्या। दिल्ली में पिछला एसआईआर 2002 में हुआ था, यह आयोग के अपने प्रश्नोत्तर के प्रश्न 7 में दर्ज है। दूसरी तालिका में उसी सूची में उस रिश्तेदार का पूरा ब्योरा चाहिए। उसके नीचे पिता या संरक्षक का नाम और एपिक नंबर, माँ का नाम और एपिक नंबर, और पति या पत्नी का नाम और एपिक नंबर।

यह जनगणना 2011 का पंजीकरण है, दिल्ली के एसआईआर की घोषणा नहीं; 2010 की इस तस्वीर में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ब्योरा काग़ज़ी रजिस्टर में हाथ से भरा जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे यहाँ एपिक नंबर भरे जाते हैं
तस्वीर: Prime Minister's Office, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

फिर तीन घोषणाएँ हैं। पहली, कि आवेदक ने किसी दूसरे देश की नागरिकता नहीं ली। दूसरी, कि वह फ़ॉर्म 6 से नाम जुड़वाने का आवेदन कर रहा है और उसका नाम किसी दूसरे विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में दर्ज नहीं है। तीसरी घोषणा दंड की है: झूठा बयान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत एक साल तक की क़ैद या जुर्माना या दोनों दिला सकता है। नीचे बीएलओ का वचन है। उसने ये ब्योरे पिछले एसआईआर की सूची से मिला लिए हैं, यह वह लिखकर देता है।

वोटर अधिकार मंच का एतराज़ ठीक इसी दूसरी घोषणा पर है, और वह मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अपने पत्र के बीच वाले खाने में छपा है। मंच लिखता है कि फ़ॉर्म 6 आवेदक से यह घोषित करवाता है कि यह उसका पहला नामांकन आवेदन है और उसका नाम किसी और सूची में दर्ज नहीं है। जिसने बार-बार वोट डाला है, जिसका एपिक बरसों पहले बना, और जिसकी प्रविष्टि प्रशासन ने ख़ुद हटाई, उसके लिए यह घोषणा अपने चेहरे पर ही झूठी है। मंच की बात यह है कि लाखों लोगों को या तो दंडनीय बयान पर दस्तख़त करने हैं या मताधिकार छोड़ना है।

दफ़्तर के जवाब वाले खाने में इसका उत्तर नहीं है। वहाँ लिखा है कि जो व्यक्ति समय पर गणना प्रपत्र नहीं दे सका, या जो ख़ुद को असली मतदाता मानता है, वह दावे-आपत्ति की अवधि में फ़ॉर्म 6 के साथ निर्धारित घोषणा पत्र दे सकता है। यानी प्रक्रिया दोहरा दी गई, एतराज़ का जवाब नहीं दिया गया।

2016 में फ़ॉर्म 6 बदला था, और वह बदलाव राजपत्र में छपा था

इस पूरी क़वायद के बारे में जो एक बात अख़बारों में बार-बार लिखी गई, वह यह है कि बिहार के बाद नियम बदल दिए गए। इस डेस्क ने निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में 2025 या 2026 का कोई संशोधन खोजा और नहीं मिला। खोज में एक पीडीएफ़ ऊपर आई जो संशोधन जैसी दिखती है। उसे उतारकर खोला गया। उसकी अपनी फ़ाइल-जानकारी में बनने की तारीख़ 23 जनवरी 2017 है, और भीतर जो दस्तावेज़ है वह 2016 का है। न मिलना यह साबित नहीं करता कि ऐसा कोई संशोधन है ही नहीं; इतना ज़रूर कहता है कि जिस राजपत्र का हवाला दिया जा रहा है, वह हाथ नहीं आया।

उसी पीडीएफ़ में यह भी है कि संशोधन होता कैसे है। भीतर भारत निर्वाचन आयोग का पत्र संख्या 3/21/ईसीआई/लेट/फ़ंक/जुड/एसडीआर/2015 है, तारीख़ 23 दिसंबर 2016, जो सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को गया। पत्र कहता है कि साथ में क़ानून एवं न्याय मंत्रालय, विधायी विभाग की अधिसूचना एस.ओ. 2968(अ), 16 सितंबर 2016 की प्रति भेजी जा रही है, जिससे फ़ॉर्म 6, 6क, 7, 8, 8क, 18 और 19 संशोधित हुए हैं। उसके आगे भारत के राजपत्र का असाधारण अंक लगा है, भाग 2, खंड 3, उपखंड (ii), नई दिल्ली, शुक्रवार, 16 सितंबर 2016। उसका पहला वाक्य बताता है कि यह शक्ति जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 से आती है।

उसी राजपत्र में छपा फ़ॉर्म 6 अपना पता ख़ुद बताता है। शीर्षक के ठीक नीचे निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के नियम 13(1) और 26 का हवाला छपा है। फ़ॉर्म नियमों का हिस्सा है, और नियम धारा 28 से बनते हैं। घोषणा पत्र इस श्रृंखला में कहीं नहीं है। वह अनुलग्नक है।

फ़ॉर्म 6 के साथ लगने वाली घोषणा कब-कब बदली, इसका ब्योरा द वायर की 19 जुलाई 2026 की रिपोर्ट में है, जो श्रावस्ती दासगुप्ता ने लिखी। उसके मुताबिक़ बदलाव तीन चरणों में हुआ: जून 2025 में बिहार की क़वायद के साथ जन्मस्थान या माता-पिता के दस्तावेज़ माँगने वाली घोषणा जुड़ी; अक्टूबर 2025 में बारह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों वाले चरण में उसमें पिछले एसआईआर से माता-पिता का ब्योरा जोड़ा गया; और मई 2026 में सोलह राज्यों वाले चरण में ऑनलाइन फ़ॉर्म 6 ऐसा कर दिया गया कि माता-पिता का ब्योरा भरे बिना आवेदन आगे नहीं बढ़ता। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने उसी रिपोर्ट में कहा है कि नियम 13 के तहत फ़ॉर्म 6 नियमों के साथ नत्थी है, और उसमें अभी माता-पिता का ब्योरा माँगने का प्रावधान नहीं है। दिल्ली इसी तीसरे चरण में है।

घोषणा पत्र की फ़ाइल दिल्ली की वेबसाइट पर 17 जून 2026 को बनी। एसआईआर 30 जून को शुरू हुआ।

एसआईआर शुरू होने से पहले 11,03,701 नाम सूची से जा चुके थे

7 सितंबर के उसी पत्र की पहली पंक्ति अलग सवाल उठाती है, और यह सवाल नोटिस से पुराना है। मंच के खाने में तीन संख्याएँ हैं। 31 जनवरी 2025 के प्रेस नोट के मुताबिक़ दिल्ली में 1,56,14,000 मतदाता थे। 12 मई 2026 को एसआईआर के तीसरे चरण की घोषणा वाले आयोग के नोट में 1,48,23,234। और एसआईआर शुरू होते समय 1,45,10,299, जो मुख्य निर्वाचन अधिकारी का अपना आँकड़ा है।

घटाइए तो पहला फ़ासला 7,90,766 का है और दूसरा 3,12,935 का। जोड़ 11,03,701। यानी एसआईआर का पहला बीएलओ घर से निकलने से पहले ही सूची इतनी छोटी हो चुकी थी।

दफ़्तर का जवाब इन संख्याओं से झगड़ता नहीं। वह कहता है कि पुनरीक्षण चुनाव के समय को छोड़कर साल भर चलने वाली प्रक्रिया है, इसलिए फ़ॉर्म 6, 7 और 8 पर नाम जुड़ते, कटते और बदलते रहते हैं। वह यह भी कहता है कि एसआईआर से पहले बीएलओ 2025 की सूची को 2002 की सूची से मिलाने के लिए मतदाताओं के पास गए थे, और उस क़वायद में जो लोग अपने दर्ज पते से हटे मिले उन्हें स्पीड पोस्ट से नोटिस भेजा गया। जवाब में यह भी दर्ज है कि जोड़ने, काटने और बदलने की सूची हर महीने वेबसाइट पर डाली जाती है।

तीसरे लिंग वाली पंक्ति पर दोनों खाने आमने-सामने हैं। मंच का आँकड़ा है कि 31 जनवरी 2025 को दिल्ली में 83,76,173 पुरुष, 72,36,560 महिला और 1,267 तीसरे लिंग के मतदाता थे। तीनों का जोड़ ठीक 1,56,14,000 है। मसौदा सूची में ये संख्याएँ 49,88,993, 47,64,137 और 447 हैं, और इनका जोड़ 97,53,577। पूरी सूची 37.5 फ़ीसदी सिकुड़ी, तीसरे लिंग की गिनती लगभग 65 फ़ीसदी। यह भाग इस डेस्क ने दोहराया और दोनों आँकड़े सही बैठते हैं। दफ़्तर का जवाब इस अनुपात पर कुछ नहीं कहता; वह इतना कहता है कि नाम न हो तो फ़ॉर्म 6 से दावा किया जा सकता है।

नोटिस पाने वालों में आयोग का अपना सदस्य है

19 सितंबर के प्रेस नोट का बिंदु 7 एक बात ऐसी कहता है जो बाक़ी ख़बरों में नहीं आई। आयोग के 14.05.2026 के निर्देश के पैराग्राफ़ 4(ख) का हवाला देकर नोट लिखता है कि न्यायपालिका के सदस्यों, जनप्रतिनिधियों, घोषित पदों पर बैठे लोगों और कला, संस्कृति, पत्रकारिता, खेल तथा लोकसेवा से जुड़ी हस्तियों के जो नाम पहले मतदाता डेटाबेस में चिह्नित थे, उन सबको मसौदा सूची में शामिल किया गया है, ताकि दावे-आपत्ति की अवधि में उनसे भी ज़रूरी दस्तावेज़ जुटाए जा सकें। यह अपवाद नहीं है। सूची में इन नामों का होना क़वायद का अपना डिज़ाइन है।

नाम कौन-कौन से हैं, यह मुख्य निर्वाचन अधिकारी की 19 सितंबर को जारी बूथवार सूची से अख़बारों ने निकाला। द ट्रिब्यून ने सोमवार तड़के छापा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, निर्वाचन आयुक्त एस.एस. संधू और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नाम मसौदा सूची में नाम-बेमेल और मैपिंग के मिलान पर चिह्नित हुए हैं। उसी रिपोर्ट में पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी, विदेश सचिव विक्रम मिस्री और सांसद बांसुरी स्वराज के नाम हैं। उसमें बिबेक देबरॉय का नाम भी है, जिनका निधन उसी रिपोर्ट के मुताबिक़ नवंबर 2024 में हो चुका है।

इनमें एक नाम बाक़ी सबसे अलग है। आयोग की अपनी अधिकारी-निर्देशिका में तीन नाम दर्ज हैं: मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार, और निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू तथा डॉ. विवेक जोशी। यानी नोटिस उस तीन सदस्यीय संस्था के एक सदस्य को गया है जिसने यह क़वायद चलाई है। निर्देशिका में उनका नाम "डॉ. सुखबीर सिंह संधू" लिखा है और मतदाता सूची में सुखबीर सिंह संधू, और अख़बारों की रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रविष्टि इसी अंतर पर चिह्नित हुई। द ट्रिब्यून के मुताबिक़ आयोग ने बताया है कि उनकी प्रविष्टि जाँच के बाद दिल्ली कैंट विधानसभा की अंतिम सूची में शामिल रखने के लिए रख दी गई है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के मामले में आयोग के अधिकारियों ने उसी रिपोर्ट में कहा है कि उनके गणना प्रपत्र में उम्र से जुड़ी विसंगति चिह्नित हुई थी और दस्तावेज़ जाँचने के बाद प्रविष्टि मान ली गई।

यह मज़ाक़ नहीं है, यह सबूत है। सूची में दर्ज लगभग एक तिहाई नाम जिस तरक़ीब से छँटे हैं, वह तरक़ीब नाम की वर्तनी, उम्र के अंतर और रिश्ते के मिलान पर चलती दिखती है। आउटलुक ने 20 सितंबर की सुबह छापा कि अरविंद केजरीवाल, उनके माता-पिता, पत्नी और बेटे को नो-मैपिंग श्रेणी में रखा गया है, जबकि मंत्री प्रवेश साहिब सिंह की प्रविष्टि नाम-बेमेल के लिए चिह्नित है। तार्किक विसंगति की कसौटी क्या है, यह किसी सार्वजनिक काग़ज़ में नहीं है। याचिका का मुख्य सवाल यही है।

दावे-आपत्ति के दो हफ़्तों में 1,425 फ़ॉर्म निपटे

नोटिस की गिनती के सामने एक और गिनती रखिए। मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर विधानसभावार फ़ॉर्म निपटान रिपोर्ट है, जिसमें अभी दो हफ़्ते दर्ज हैं। 31 अगस्त से 6 सितंबर के हफ़्ते में सत्तर विधानसभाओं में फ़ॉर्म 6 के 241, फ़ॉर्म 6क के 2, फ़ॉर्म 7 के 64 और फ़ॉर्म 8 के 740 आवेदन निपटे, कुल 1,047। 7 से 13 सितंबर के हफ़्ते में यह संख्या गिरकर 378 रह गई: फ़ॉर्म 6 के 34, फ़ॉर्म 6क के शून्य, फ़ॉर्म 7 के 274 और फ़ॉर्म 8 के 70।

दो हफ़्तों का जोड़ 1,425 है। दोनों हफ़्तों की सत्तर-सत्तर पंक्तियाँ इस डेस्क ने जोड़ीं और दोनों जोड़ रिपोर्ट में छपे कुल से मिलते हैं। दूसरे हफ़्ते सत्तर में से 61 विधानसभाओं में फ़ॉर्म 6 का एक भी आवेदन नहीं निपटा।

दिशा भी पलटी है। पहले हफ़्ते नाम जोड़ने वाले आवेदन आपत्ति वाले आवेदनों से लगभग चार गुना ज़्यादा निपटे। दूसरे हफ़्ते आपत्ति वाले आवेदन जोड़ने वालों से आठ गुना हो गए।

यह रिपोर्ट निपटान की है, आवेदन की नहीं। कितने फ़ॉर्म आए, यह इसमें नहीं है। फ़ाइल 17 सितंबर की शाम 4:17 बजे बदली गई थी और तीसरे हफ़्ते का ख़ाना अब तक उसमें नहीं है।

मंगलवार को अदालत के सामने क्या है

मद 13 ताज़ा मुक़दमा है और सूची में उसके आगे "FOR ADMISSION" लिखा है। यह रिट याचिका (सिविल) 1188/2026 है, अंजलि भारद्वाज और एक अन्य बनाम भारत निर्वाचन आयोग और एक अन्य, वकील प्रशांत भूषण। लाइव लॉ की 17 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़ याचिका अनुच्छेद 32 के तहत है और माँगती है कि नोटिस पाने वाले सब मतदाताओं की खोजी जा सकने वाली सूची पतों और श्रेणी के साथ छापी जाए, और तार्किक विसंगति की परिभाषा, कसौटी तथा एल्गोरिद्म के मानक सार्वजनिक किए जाएँ। याचिका में यह भी दर्ज है कि आयोग के 14 मई 2026 के पत्र का पैराग्राफ़ 2(च) ऐसी सूची छापने को कहता ही है।

सुप्रीम कोर्ट की पूरी इमारत का चौड़ा दृश्य। मंगलवार को यहीं मद 13 और मद 22 पर सुनवाई होनी है
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

मद 22 पुराना बंगाल वाला ढेर है। रिट याचिका (सिविल) 1089/2025, मोस्तरी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग, और सूची में उसके नीचे कोष्ठक में लिखा है कि ये पश्चिम बंगाल राज्य से जुड़े एसआईआर मामले हैं। उसके साथ नौ मुक़दमे नत्थी हैं, जिनमें डेरेक ओ'ब्रायन, डोला सेन, सुभंकर सरकार और ममता बनर्जी की याचिकाएँ शामिल हैं। मद 22 के नीचे बीस अंतरिम अर्ज़ियाँ सूचीबद्ध हैं।

बंगाल में इन्हीं दो श्रेणियों से 60,06,675 नाम विचाराधीन ख़ाने में गए थे। इस अख़बार ने 18 सितंबर को आयोग के 16 सितंबर वाले हलफ़नामे से छापा था कि उस राज्य में दाख़िल 38,20,683 अपीलों में से 37,18,452 उस दिन तक लंबित थीं। दिल्ली में अभी कोई अपीलीय अधिकरण नहीं है। 31 अगस्त के प्रेस नोट का बिंदु 18 अपील का जो रास्ता बताता है, वह साधारण है: निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के आदेश के 15 दिन के भीतर ज़िलाधिकारी के पास धारा 24(क) में पहली अपील, और उससे असंतुष्ट होने पर 30 दिन के भीतर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास धारा 24(ख) में दूसरी।

घड़ी दोनों तरफ़ चल रही है। दावे-आपत्ति की अवधि 30 सितंबर को ख़त्म होती है, यानी सोमवार के बाद नौ दिन बचे हैं। नोटिस निपटाने की आख़िरी तारीख़ 29 अक्टूबर है और अंतिम सूची 4 नवंबर को छपनी है। मई में तय पहला कार्यक्रम अंतिम सूची 7 अक्टूबर को छापने का था, यानी यह तारीख़ अट्ठाईस दिन खिसक चुकी है। रविवार को दिल्ली के सब मतदान केंद्रों पर विशेष शिविर लगे थे और अगला 27 सितंबर को है; उन शिविरों में कितने फ़ॉर्म आए, यह सोमवार सुबह तक मुख्य निर्वाचन अधिकारी की प्रेस विज्ञप्तियों की सूची में नहीं आया था। उस सूची में 19 सितंबर के बाद कुछ नहीं है। द ट्रिब्यून जिस रविवार शाम की सफ़ाई का हवाला देता है, और जिसमें दफ़्तर कहता है कि सुनवाई के मौक़े और कारण बताते अपीलीय आदेश के बिना कोई नाम नहीं कट सकता, वह भी उस सूची में नहीं है।

स्रोतमुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली, प्रेस नोट 19.09.2026, चार पन्ने: बिंदु 7 में 31,63,930 नोटिस, बिंदु 4 में मसौदा सूची के आँकड़े, बिंदु 10 में विशेष शिविर और बेला एस्टेट के 309 फ़ॉर्म, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली, प्रेस नोट 31.08.2026: 1,45,10,299 मतदाता, 97,53,577 गणना प्रपत्र, 47,56,722 का तीन-हिस्सा ब्योरा, बिंदु 16 का नोटिस चरण, बिंदु 17 का बिना प्रक्रिया विलोपन निषेध और बिंदु 18 की अपील, मुख्य निर्वाचन अधिकारी (ईआर शाखा), दिल्ली, पत्र संख्या एफ़.2(593)/सीईओ/ईआर/2026/2319, दिनांक 07.09.2026, और उसी फ़ाइल में पत्र संख्या 2264, दिनांक 02.09.2026: वोटर अधिकार मंच के एतराज़ और दफ़्तर का जवाब, आठ स्कैन पन्ने, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली की एसआईआर 2026 वेबसाइट पर घोषणा पत्र (अनुलग्नक-चार), दो पन्ने, फ़ाइल 17 जून 2026 को बनी, उसी वेबसाइट पर गणना प्रपत्र (अनुलग्नक-तीन), दो पन्ने: जन्म-वर्ष की तीन श्रेणियाँ और बारह दस्तावेज़ों की सूची, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली: विधानसभावार फ़ॉर्म निपटान रिपोर्ट, चार पन्ने, 31 अगस्त से 6 सितंबर और 7 से 13 सितंबर के दो हफ़्ते; फ़ाइल 17 सितंबर 2026 को शाम 4:17 बजे बदली गई, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली: एसआईआर 2026 पर प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न, पाँच पन्ने: प्रश्न 7 में दिल्ली का पिछला एसआईआर 2002, प्रश्न 23 में बारह दस्तावेज़, प्रश्न 32 में अपील, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली, प्रेस नोट 15.05.2026: आयोग के 14.05.2026 के पत्र से शुरू हुई क़वायद का मूल कार्यक्रम, अंतिम सूची 07.10.2026, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली, प्रेस नोट 03.09.2026: फ़ॉर्म 6 के साथ निर्धारित घोषणा पत्र और एएसडीडी सूची पर सफ़ाई, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली, प्रेस नोट 08.09.2026: फ़ॉर्म 6, 7 और 8 का निपटारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 और आयोग के निर्देशों के तहत, सुप्रीम कोर्ट, 22-09-2026 की दैनिक वाद-सूची, मुख्य न्यायाधीश की अदालत, 385 पन्ने, 18-09-2026 को रात 8:49:25 बजे जारी: मद 13 पर रिट याचिका (सिविल) 1188/2026 और मद 22 पर 1089/2025 तथा उससे जुड़े नौ मुक़दमे, सुप्रीम कोर्ट की वाद-सूची अनुक्रमणिका: 21-09-2026 के लिए छह सूचियाँ (M_C_1, M_J_1, M_J_2, M_R_1, M_S_1, M_S_2), जो सब उतारकर पढ़ी गईं, भारत निर्वाचन आयोग का पत्र संख्या 3/21/ईसीआई/लेट/फ़ंक/जुड/एसडीआर/2015, 23 दिसंबर 2016, और उसके साथ लगा भारत का राजपत्र: क़ानून एवं न्याय मंत्रालय की अधिसूचना एस.ओ. 2968(अ), 16 सितंबर 2016, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) नियम 2016; फ़ाइल 23 जनवरी 2017 को बनी, लाइव लॉ, डेबी जैन, 17 सितंबर 2026, सुबह 11:50: अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी की याचिका, 33,12,919 का बँटवारा, आयोग के 14 मई 2026 के पत्र का पैराग्राफ़ 2(च), और 19 जनवरी 2026 का मोस्तरी बानू आदेश, द वायर, श्रावस्ती दासगुप्ता, 19 जुलाई 2026 शाम 4:00 (पन्ने की अपनी मेटा तारीख़): फ़ॉर्म 6 की घोषणा में तीन चरणों का बदलाव और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत का बयान, द ट्रिब्यून, अनिमेष सिंह, 21 सितंबर 2026 सुबह 5:57 पर प्रकाशित और 6:31 पर संशोधित: रविवार शाम मुख्य निर्वाचन अधिकारी की सफ़ाई, नोटिस पाने वाले नाम, और 33.13 लाख की संख्या, आउटलुक, 20 सितंबर 2026 सुबह 8:56 पर प्रकाशित: 19 सितंबर को जारी बूथवार सूची, केजरीवाल परिवार की नो-मैपिंग श्रेणी, प्रवेश साहिब सिंह का नाम-बेमेल और रेखा गुप्ता की प्रविष्टि, भारत निर्वाचन आयोग की अपनी अधिकारी-निर्देशिका सेवा, 21 सितंबर 2026 को पढ़ी गई: मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार, निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार का मुख्यमंत्री कार्यालय पृष्ठ, 19/09/2026 को अद्यतन: मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।