दो राज्यों के लोक सेवा आयोगों में जो गिरफ़्तार हुए, वे बाहर के लोग नहीं थे
कर्नाटक में परीक्षा नियंत्रक पद पर तैनात रहे एक आईएएस अधिकारी हिरासत में हैं। महाराष्ट्र में आयोग के अवर सचिव गिरफ़्तार हैं। दोनों जगह पर्चा उन्हीं के पास था जिनके पास होना चाहिए था।

सोमवार की सुबह पुणे में हज़ारों नौजवान ओंकारेश्वर मंदिर के पास जमा हुए और ज़िला कलेक्ट्रेट की तरफ़ चल पड़े।
ये महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के उम्मीदवार थे। उनके मोर्चे का नाम आक्रोश मोर्चा रखा गया था।
उसी दिन, सात सौ किलोमीटर दूर बेंगलुरु में, कर्नाटक लोक सेवा आयोग के निलंबित अध्यक्ष को अपराध जाँच विभाग ने दोबारा पूछताछ के लिए बुलाया।
दोनों ख़बरें एक ही दिन आईं और दोनों का ढाँचा एक जैसा है।
दो अलग राज्य, दो अलग सरकारें, दो अलग परीक्षाएँ। और एक ही तरह की नाकामी, जिसकी शक्ल इतनी मिलती-जुलती है कि उसे संयोग कहना मुश्किल हो जाता है।
कर्नाटक में क्या हुआ
कर्नाटक लोक सेवा आयोग के ज़रिए क़रीब चार सौ पशु चिकित्सा अधिकारियों की भर्ती होनी थी।
आरोप यह है कि उस परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले लीक हुआ और उम्मीदवारों को बेचा गया। जो क़ीमत बताई जा रही है, वह प्रति उम्मीदवार क़रीब चालीस लाख रुपये है।
इस मामले में दो लोग गिरफ़्तार हुए हैं और अदालत ने दोनों को दस दिन की सीआईडी हिरासत में भेजा है।
पहले हैं ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार, कर्नाटक कैडर के 2016 बैच के आईएएस अधिकारी। वे फ़रवरी 2024 से मार्च 2026 तक आयोग में परीक्षा नियंत्रक के पद पर थे। उन्हें 29 अगस्त को गिरफ़्तार किया गया।
दूसरे हैं बसवराज कन्नाले, जिन्हें जाँच एजेंसी बिचौलिया बता रही है और जो भाजपा से जुड़े रहे हैं।
आयोग के अध्यक्ष सहूकार शिवशंकरप्पा निलंबित हैं। वे इससे पहले भी सीआईडी के सामने पेश हो चुके हैं और उनसे छह से आठ घंटे पूछताछ हुई थी। सोमवार को उन्हें दूसरी बार नोटिस भेजा गया।
महाराष्ट्र में क्या हुआ
महाराष्ट्र में मामला औषधि निरीक्षक भर्ती परीक्षा का है।
पुलिस की प्रारंभिक जाँच में पाया गया कि उस परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले लीक हुआ था। परीक्षा रद्द कर दी गई।
आयोग के एक अवर सचिव, अभिजीत लेंडवे, इस मामले में गिरफ़्तार हैं।
सोमवार के प्रदर्शन में उम्मीदवारों ने दो माँगें रखीं। पहली, आयोग के अध्यक्ष विवेक भीमनवर और सचिव को हटाया जाए। दूसरी, लेंडवे के कार्यकाल में हुई सभी परीक्षाओं का फ़ॉरेंसिक ऑडिट कराया जाए।
दूसरी माँग पहली से ज़्यादा दूरगामी है, और उस पर आगे बात करेंगे।
प्रदर्शन को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार), कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) का समर्थन मिला। सुप्रिया सुले और रोहित पवार मोर्चे में शामिल हुए।
जो बात दोनों में एक जैसी है
अब उस बात पर आइए जो इन दोनों मामलों को जोड़ती है, और जो इन्हें बाक़ी भर्ती घोटालों से अलग करती है।
दोनों जगह जो गिरफ़्तार हुए, वे आयोग के भीतर के लोग हैं।
कर्नाटक में परीक्षा नियंत्रक। यह वह पद है जिसका काम ही प्रश्नपत्र की सुरक्षा है।
महाराष्ट्र में अवर सचिव। यह भी आयोग का अपना अधिकारी है।
यह अंतर मामूली नहीं है। ज़्यादातर परीक्षा घोटालों की कल्पना इस तरह की जाती है कि कोई बाहर से सेंध लगाता है, कोई छपाई करने वाला बेच देता है, कोई ट्रक से पर्चा उड़ा लेता है।
इन दोनों मामलों में आरोप यह है कि जिनके हाथ में पर्चा सौंपा गया था, उन्हीं से वह निकला।
अंग्रेज़ी में इसके लिए एक पुराना मुहावरा है, जो पूछता है कि पहरेदारों पर पहरा कौन देगा। भारतीय भर्ती व्यवस्था में यह सवाल अब सैद्धांतिक नहीं रहा।
और यहाँ एक बात और है। परीक्षा नियंत्रक कोई मामूली पद नहीं है। उस पर आम तौर पर वरिष्ठ अधिकारी बैठाए जाते हैं, ठीक इसीलिए कि वहाँ भरोसे की ज़रूरत सबसे ज़्यादा है। जिस पद को सबसे भरोसेमंद माना गया, आरोप उसी पर है।
सुरक्षा किस चीज़ के लिए बनी है

परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था एक ख़ास तरह के ख़तरे को सोचकर बनाई जाती है।
प्रश्नपत्र सीलबंद लिफ़ाफ़े में जाता है। लिफ़ाफ़े दोहरे होते हैं। कमरे में ताला होता है और उसकी चाबी दो अलग लोगों के पास। परीक्षा केंद्र में सीसीटीवी होता है। पर्चा खोलने का समय तय होता है और उस वक़्त गवाह मौजूद रहते हैं।
यह पूरा ढाँचा एक ही धारणा पर खड़ा है: ख़तरा बाहर से आएगा।
जिस आदमी के पास दोनों चाबियाँ पहुँचाने का अधिकार है, या जो यह तय करता है कि पर्चा किस प्रेस में छपेगा और कब चलेगा, उसके लिए ये सारी दीवारें बेमानी हैं।
इसीलिए ये मामले तकनीकी सुधारों से हल नहीं होते। और इसीलिए हर घोटाले के बाद जो उपाय घोषित होते हैं, वे अगली बार काम नहीं करते।
घोषणाओं की सूची हर बार लगभग एक जैसी होती है। ज़्यादा सीसीटीवी। जैमर। बायोमेट्रिक हाज़िरी। परीक्षा केंद्रों पर उड़नदस्ते।
ये सारे उपाय उस उम्मीदवार को रोकने के लिए हैं जो परीक्षा हॉल में नक़ल करना चाहता है। जिस उम्मीदवार को पर्चा एक हफ़्ता पहले घर पर मिल गया, उस पर इनमें से किसी का असर नहीं पड़ता।
वह अकेला बैठकर परीक्षा देगा, किसी से बात नहीं करेगा, कोई पर्ची नहीं निकालेगा, और हर कैमरे में साफ़ दिखेगा।
फ़ॉरेंसिक ऑडिट वाली माँग
पुणे के प्रदर्शनकारियों की दूसरी माँग इसी समझ से निकली है।
वे यह नहीं कह रहे कि एक परीक्षा की जाँच हो। वे कह रहे हैं कि उस अधिकारी के पूरे कार्यकाल की सभी परीक्षाओं की जाँच हो।
तर्क सीधा है। अगर किसी पद पर बैठे आदमी ने एक परीक्षा में पर्चा बेचा, तो यह मान लेने की कोई वजह नहीं कि उसने बाक़ी परीक्षाओं में ऐसा नहीं किया।
कर्नाटक में यही सवाल गंगवार के कार्यकाल पर लागू होता है। फ़रवरी 2024 से मार्च 2026, यानी दो साल से ज़्यादा। उस अवधि में आयोग ने कितनी परीक्षाएँ कराईं और उनसे कितने लोग नियुक्त हुए, यह एक सूची है जो आयोग के पास है।
ऐसी जाँच की माँग करना आसान है और उसे पूरा करना कठिन, क्योंकि उसका नतीजा उन लोगों तक पहुँचेगा जो पहले से नौकरी कर रहे हैं।
यहाँ एक असली उलझन है जिसे मान लेना चाहिए। अगर जाँच में यह निकले कि किसी पुरानी परीक्षा में गड़बड़ी हुई थी, तो उसके ज़रिए चुने गए सब लोगों का क्या हो।
उनमें से ज़्यादातर ने शायद कुछ ग़लत नहीं किया। पर यह साबित करना कि किसने पर्चा ख़रीदा और किसने नहीं, बरसों बाद लगभग नामुमकिन हो जाता है।
अदालतों ने ऐसे मामलों में दोनों तरह के फ़ैसले दिए हैं। कहीं पूरी भर्ती रद्द हुई है और कहीं सिर्फ़ चिह्नित लोगों पर कार्रवाई। कोई एक तयशुदा रास्ता नहीं है, और यही वजह है कि जाँच शुरू करने में ही हिचक होती है।
जो नुक़सान गिना नहीं जाता

इन मामलों में सबसे ज़्यादा नुक़सान उन लोगों का होता है जिनका नाम कभी किसी प्राथमिकी में नहीं आता।
राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में एक पद के लिए हज़ारों आवेदन आते हैं। तैयारी में साल लगते हैं। ज़्यादातर उम्मीदवार अपने घर से दूर किसी शहर में कमरा लेकर पढ़ते हैं, और उस दौरान कमाते नहीं।
उम्र की सीमा होती है। प्रयासों की संख्या सीमित होती है।
जब कोई परीक्षा रद्द होती है, तो वह सिर्फ़ एक तारीख़ का नुक़सान नहीं होता। जो उम्मीदवार अपने आख़िरी प्रयास में था, उसके लिए वह पूरे रास्ते का बंद हो जाना है।
और जब परीक्षा रद्द नहीं होती, बल्कि नतीजा आ जाता है और बाद में शक होता है, तब नुक़सान इससे भी बड़ा होता है। तब जो चुने गए वे भी संदेह में रहते हैं, चाहे उन्होंने कुछ ग़लत न किया हो।
जो उम्मीदवार पर्चा नहीं ख़रीदता
इस पूरे मामले में एक कोण ऐसा है जिस पर कम बात होती है, और वह उन उम्मीदवारों का है जिन्हें पेशकश मिली और उन्होंने मना कर दिया।
ऐसे मामलों में जाँच के दौरान अक्सर यह सामने आता है कि बिचौलिये ने कई लोगों से संपर्क किया था। सबने हाँ नहीं कहा।
जिन्होंने मना किया, उनके पास शिकायत करने की कोई सीधी जगह नहीं होती। वे यह भी नहीं जानते कि पेशकश असली थी या ठगी। और शिकायत करने पर उनका अपना नाम उस मामले में आ जाता है जिसमें वे शामिल नहीं थे।
इसलिए वे चुप रह जाते हैं, परीक्षा देते हैं, और नतीजा आने पर यह मान लेते हैं कि उनसे बेहतर किसी ने लिखा होगा।
यही चुप्पी इस धंधे को चलने देती है, और उसे तोड़ने का कोई इंतज़ाम अभी किसी आयोग के पास नहीं है।
चालीस लाख का आँकड़ा
कर्नाटक के मामले में जो क़ीमत बताई जा रही है, उस पर रुकना चाहिए।
प्रति उम्मीदवार चालीस लाख रुपये।
यह रक़म बताती है कि उस पद की क़ीमत बाज़ार में क्या आँकी गई। एक सरकारी नौकरी, स्थायी, पेंशन वाली, और उसके साथ आने वाला रुतबा। ख़रीदने वाले ने हिसाब लगाकर यह तय किया कि चालीस लाख देना घाटे का सौदा नहीं है।
यह अपने आप में एक टिप्पणी है, और वह उस बाज़ार पर है जो सरकारी नौकरी के इर्द-गिर्द बना है।
और यह भी बताता है कि जिस परिवार के पास चालीस लाख हैं, उसका बच्चा उस परिवार के बच्चे को हरा देगा जिसके पास सिर्फ़ तैयारी है।
प्रतियोगी परीक्षा का पूरा विचार इसी बात पर टिका है कि वह पैसे से नहीं जीती जा सकती। सिफ़ारिश, रसूख़ और विरासत को हटाने के लिए ही यह ढाँचा बना था।
चालीस लाख की क़ीमत उस विचार को उलट देती है। वह उसी पुरानी व्यवस्था को लौटा लाती है जिसे हटाने के लिए परीक्षा बनी थी, बस अब उसका बिल छपता नहीं।
यह सिलसिला कितना पुराना है
कर्नाटक लोक सेवा आयोग के लिए यह पहला विवाद नहीं है।
इस आयोग की पिछली भर्तियों पर भी सवाल उठे हैं और कुछ मामलों में चयन रद्द तक हुए हैं। यह इतिहास ही वह वजह है जिससे इस बार का मामला और गंभीर दिखता है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी यह सिलसिला दर्ज है। पिछले कुछ बरसों में कई राज्यों में भर्ती परीक्षाएँ रद्द हुई हैं और कुछ केंद्रीय परीक्षाओं पर भी सवाल उठे हैं।
2024 में केंद्र ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम से जुड़ा क़ानून बनाया, जिसमें पर्चा लीक पर कड़ी सज़ा का प्रावधान है।
पर वह क़ानून केंद्रीय परीक्षाओं पर लागू होता है। राज्य आयोगों की परीक्षाएँ राज्य के क़ानूनों के दायरे में आती हैं, और हर राज्य में वह ढाँचा एक जैसा नहीं है।
आयोग किस चीज़ के लिए बने थे

राज्य लोक सेवा आयोगों की जड़ संविधान में है। अनुच्छेद 315 हर राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग की व्यवस्था करता है, और आगे के अनुच्छेद उसे वह स्वायत्तता देते हैं जिससे वह सरकार के दबाव से बचा रहे।
अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल तय है। उन्हें हटाने की प्रक्रिया कठिन रखी गई है, और वह राष्ट्रपति के आदेश से ही हो सकती है।
यह सुरक्षा इसलिए दी गई थी कि आयोग किसी मंत्री के इशारे पर भर्ती न करे।
पर यही सुरक्षा उस वक़्त उलटी पड़ती है जब गड़बड़ी आयोग के भीतर से हो। तब हटाने की वही कठिन प्रक्रिया कार्रवाई को धीमा कर देती है, और पुणे में जो लोग अध्यक्ष को हटाने की माँग कर रहे थे, वे इसी दीवार से टकराएँगे।
स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच का यह तनाव किसी एक आयोग की समस्या नहीं है। यह हर उस संस्था में है जिसे जान-बूझकर सरकार की पहुँच से दूर रखा गया।
जो बदलना पड़ेगा
अगर समस्या भीतर की है, तो हल भी भीतर का होना चाहिए।
पहला उपाय यह है कि किसी एक अधिकारी के पास पूरी शृंखला का नियंत्रण न रहे। पर्चा तय करने वाला, छपवाने वाला और भेजने वाला अलग-अलग हों, और किसी एक को पूरी तस्वीर न दिखे।
दूसरा, प्रश्नपत्रों का बड़ा भंडार बनाया जाए और परीक्षा से कुछ घंटे पहले उसमें से चुनाव हो। तब लीक होने पर भी उसका मूल्य नहीं रहेगा, क्योंकि लीक होने वाले को यह पता नहीं होगा कि कौन सा सेट चलेगा।
तीसरा, आयोगों में नियुक्तियों की अपनी जाँच। जिन पदों पर परीक्षा की सुरक्षा टिकी है, उन पर तैनाती किस आधार पर होती है, यह सवाल इन दोनों मामलों के बाद अपने आप खड़ा हो जाता है।
चौथा, हर परीक्षा के बाद एक स्वतंत्र लेखा परीक्षा, न कि सिर्फ़ तब जब शिकायत आए।
जो सोमवार को सड़क पर थे
पुणे में जो हज़ारों लोग निकले, उनमें से ज़्यादातर का इस पूरे मामले में कोई नाम नहीं आएगा।
वे न आरोपी हैं, न गवाह, न शिकायतकर्ता। वे सिर्फ़ वे लोग हैं जिन्होंने उस व्यवस्था पर भरोसा करके अपने कुछ साल लगा दिए।
उनकी माँग किसी को सज़ा दिलाने की नहीं थी। वह इस बात की थी कि जिन परीक्षाओं में वे बैठ चुके हैं, उनकी जाँच हो।
यह माँग अपने आप में बताती है कि भरोसा किस हद तक टूटा है। उम्मीदवार अब यह नहीं पूछ रहे कि अगली परीक्षा साफ़ होगी या नहीं। वे पिछली परीक्षाओं के बारे में पूछ रहे हैं।
यह भरोसा लौटाना किसी गिरफ़्तारी से नहीं होगा। गिरफ़्तारियाँ ज़रूरी हैं और वे हो रही हैं। पर उम्मीदवार जो पूछ रहा है, वह अपराध का नहीं, व्यवस्था का सवाल है।
उसे यह जानना है कि जिस परीक्षा में वह अगले महीने बैठेगा, उसका पर्चा इस वक़्त किसके पास है, और उस आदमी पर नज़र कौन रख रहा है।
अभी इन दोनों राज्यों में उस सवाल का कोई जवाब नहीं है।
स्रोतहंस इंडिया, केपीएससी मामले में हिरासत पर रिपोर्ट, बिज़नेस स्टैंडर्ड, पुणे प्रदर्शन पर रिपोर्ट, 7 सितंबर 2026, कर्नाटक लोक सेवा आयोग, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग