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अदालत ने उसे राहत के लिए न्यायाधिकरण भेजा था, और वह बांग्लादेश में धकेल दी गई

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम सरकार को मुमताज़ बेगम को दो लाख रुपये देने का आदेश दिया है। यह पहली बार है जब किसी अदालत ने किसी को सीमा पार धकेलने पर राज्य पर ख़र्च डाला हो।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

एक अदालत ने किसी को कहा कि अपनी राहत के लिए न्यायाधिकरण के पास जाओ।

वह गई। और उसे गिरफ़्तार करके बांग्लादेश की तरफ़ धकेल दिया गया।

यह क्रम इस पूरे मामले का सार है, और गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने अब इसके लिए असम सरकार पर दो लाख रुपये का ख़र्च डाला है।

यह पहली बार है जब किसी अदालत ने किसी व्यक्ति को सीमा पार धकेलने पर राज्य से हर्जाना दिलाया हो।

मामला क्या था

मुमताज़ बेगम बंगाली मूल की मुसलमान महिला हैं और असम की रहने वाली हैं।

नगाँव के विदेशी न्यायाधिकरण ने उन्हें विदेशी नागरिक घोषित किया था।

घोषित होने के बाद उनके पास उस आदेश को चुनौती देने का अवसर था, जो क़ानून के तहत हर व्यक्ति को मिलता है। वह अवसर उन्हें नहीं मिला।

उससे पहले ही उन्हें हिरासत में लेकर बांग्लादेश की तरफ़ भेज दिया गया।

उनके परिवार ने उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, यानी वह याचिका जिसमें अदालत से यह पूछा जाता है कि हमारा आदमी कहाँ है और उसे किस अधिकार से रखा गया है।

इस याचिका की एक ख़ास बात है। इसमें अदालत राज्य से जवाब माँगती है, और सबूत का बोझ उस पर डालती है जिसने किसी को हिरासत में लिया। यही वजह है कि यह उपाय सबसे पुराने और सबसे मज़बूत उपायों में गिना जाता है।

पर वह तभी काम आता है जब कोई याचिका लगाने वाला हो।

अदालत ने क्या कहा

न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराणा और न्यायमूर्ति सुस्मिता फुकन खाउंड की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की।

अदालत ने नगाँव न्यायाधिकरण के काम करने के तरीक़े पर गंभीर टिप्पणी की। उसने कहा कि रिकॉर्ड से न्यायाधिकरण की तरफ़ से क़ानून की दृष्टि से दुर्भावना दिखती है।

यह पद अपने आप में भारी है, इसलिए उसे समझ लेना चाहिए।

क़ानून की भाषा में दुर्भावना दो तरह की होती है। एक वह जिसमें किसी ने जान-बूझकर बुरे इरादे से कुछ किया। दूसरी वह जिसमें इरादा साबित करने की ज़रूरत नहीं, बस यह दिखाना पर्याप्त है कि अधिकार का इस्तेमाल उस मक़सद से बाहर हुआ जिसके लिए वह दिया गया था।

अदालत ने दूसरी वाली बात कही है। यानी उसने यह नहीं कहा कि किसी ने बदनीयती से काम किया, बल्कि यह कि जो हुआ वह क़ानून के मक़सद के ख़िलाफ़ था।

दो निर्देश, जो अब तक नियम में नहीं थे

फ़ैसले का जो हिस्सा आगे सबसे ज़्यादा काम आएगा, वह हर्जाना नहीं है। वे दो निर्देश हैं जो अदालत ने ज़िलों के पुलिस अधीक्षकों को दिए।

पहला: किसी घोषित विदेशी नागरिक को हिरासत में लेने से पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि उसे न्यायाधिकरण का आदेश बताया गया हो।

दूसरा: उस व्यक्ति को ज़िले से बाहर ले जाने से पहले उसके परिवार के किसी वयस्क सदस्य को सूचित किया जाए।

पढ़ने में ये दोनों बातें इतनी बुनियादी लगती हैं कि यह सवाल उठता है कि इन्हें अलग से कहने की ज़रूरत क्यों पड़ी।

जवाब यह है कि अब तक ये लिखित शर्त नहीं थीं।

पहली शर्त क्यों ज़रूरी है

अगर किसी को यह नहीं बताया गया कि उसके ख़िलाफ़ आदेश हो चुका है, तो वह उसे चुनौती नहीं दे सकता।

विदेशी न्यायाधिकरण के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। इसके लिए समय-सीमा होती है और वकील चाहिए होता है।

जिस आदमी को आदेश की जानकारी ही न हो, उसके लिए यह पूरा रास्ता काग़ज़ पर रहता है।

और असम में बहुत से मामले एकतरफ़ा तय होते रहे हैं, यानी उन मामलों में जहाँ व्यक्ति न्यायाधिकरण के सामने पेश ही नहीं हुआ। पेश न होने का कारण अक्सर यह होता है कि नोटिस उस तक पहुँचा ही नहीं, क्योंकि पता पुराना था या नाम की वर्तनी अलग थी।

तो पहला निर्देश उस खाई को पाटने की कोशिश है जिसमें बहुत से लोग गिरते रहे हैं।

दूसरी शर्त क्यों ज़रूरी है

दूसरा निर्देश परिवार से जुड़ा है, और उसका कारण और सीधा है।

अगर किसी को उठाकर ज़िले से बाहर ले जाया जाए और परिवार को पता न चले, तो परिवार के पास कोई रास्ता नहीं बचता। वह न बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगा सकता है, क्योंकि उसे नहीं मालूम कि आदमी कहाँ है, और न वकील कर सकता है।

मुमताज़ बेगम के मामले में उनके परिवार ने याचिका लगाई, और तभी यह मामला अदालत तक पहुँचा।

बहुत से मामलों में यह नहीं हो पाता।

अदालत का यह निर्देश इसीलिए उन मामलों के लिए है जो कभी अदालत तक नहीं पहुँचते। जिन तक ख़बर पहुँचेगी, उनके पास कम से कम एक दरवाज़ा खुला रहेगा।

यह भी ध्यान देने लायक़ है कि यह ज़िम्मेदारी पुलिस अधीक्षकों पर डाली गई है, न कि न्यायाधिकरण पर। यानी अदालत ने उस बिंदु को चुना है जहाँ काग़ज़ी आदेश असली कार्रवाई में बदलता है।

"पुशबैक" शब्द का मतलब

इस पूरे मामले में एक शब्द बार-बार आता है, और उसका क़ानूनी दर्जा साफ़ नहीं है।

निर्वासन एक तयशुदा प्रक्रिया है। उसमें दूसरे देश से बात होती है, उस देश को यह मानना पड़ता है कि यह व्यक्ति उसका नागरिक है, और यात्रा दस्तावेज़ बनते हैं।

पुशबैक इससे अलग है। उसमें व्यक्ति को सीमा तक ले जाकर पार करा दिया जाता है, और दूसरा देश उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं होता।

इसका नतीजा यह होता है कि आदमी दोनों तरफ़ से बाहर हो जाता है। जिस देश ने उसे भेजा, वह उसे अपना नहीं मानता। जिस देश में उसे भेजा गया, उसने उसे लिया ही नहीं।

अदालत का हर्जाना इसी अंतर को दर्ज करता है। उसने यह नहीं कहा कि किसी को विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता। उसने यह कहा कि उस घोषणा के बाद जो हुआ, वह प्रक्रिया के बाहर था।

असम में यह मुद्दा कितना बड़ा है

भारत-बांग्लादेश सीमा पर लगी बाड़, दक्षिण दिनाजपुर। पुशबैक में व्यक्ति को इसी तरह की सीमा तक ले जाकर पार करा दिया जाता है
तस्वीर: Arupparia, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

असम में विदेशी न्यायाधिकरणों की व्यवस्था दशकों पुरानी है और इसका इतिहास 1985 के असम समझौते और उसके बाद के दौर से जुड़ता है।

राज्य के मुख्यमंत्री ने हाल में कहा था कि तीस हज़ार घोषित विदेशी लापता हैं और आगे और लोगों को वापस भेजा जाएगा।

यह बयान इस फ़ैसले की पृष्ठभूमि है, क्योंकि वह बताता है कि यह प्रक्रिया रुकी नहीं है, बल्कि उसे बढ़ाने की बात हो रही है।

ऐसे में अदालत के दिए दो निर्देश उस पूरी प्रक्रिया पर लागू होंगे, न कि सिर्फ़ एक मामले पर। यही इस फ़ैसले को महत्वपूर्ण बनाता है।

"लापता" शब्द पर भी रुकना चाहिए, क्योंकि उसका मतलब साफ़ नहीं है। किसी को घोषित विदेशी माना गया और वह अपने पते पर नहीं मिला, तो वह लापता दर्ज होता है।

पर लापता होने के कई कारण हो सकते हैं। वह कहीं और काम करने चला गया हो। वह पहले ही सीमा पार जा चुका हो। या उसका पता ही ग़लत दर्ज हुआ हो और वह उसी जगह रह रहा हो जहाँ हमेशा से था।

तीनों स्थितियाँ एक ही आँकड़े में गिनी जाती हैं, और उस आँकड़े से नीति बनती है।

विदेशी न्यायाधिकरण काम कैसे करते हैं

असम में बाढ़ से घिरा एक घर। नागरिकता साबित करने के लिए जो पुराने काग़ज़ चाहिए, वे यहाँ हर साल पानी में जाते हैं
तस्वीर: Nskjnv, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

इस व्यवस्था को समझे बिना यह फ़ैसला पूरा नहीं समझ आता।

सीमा पुलिस या निर्वाचन तंत्र किसी व्यक्ति के बारे में संदेह दर्ज करता है कि वह भारतीय नागरिक नहीं है। मामला विदेशी न्यायाधिकरण को भेजा जाता है। न्यायाधिकरण उस व्यक्ति को नोटिस भेजता है और उससे कहता है कि वह अपनी नागरिकता साबित करे।

यहाँ एक बात आम अदालतों से उलटी है। ज़्यादातर मुक़दमों में आरोप लगाने वाले को साबित करना होता है। यहाँ जिस पर संदेह है, उसे साबित करना होता है।

साबित करने का मतलब है दस्तावेज़। पुरानी मतदाता सूचियाँ, ज़मीन के काग़ज़, स्कूल के प्रमाणपत्र, और यह दिखाना कि उन काग़ज़ों में जो नाम है वह उसी व्यक्ति का है।

असम जैसे राज्य में, जहाँ बाढ़ हर साल घरों में घुसती है और जहाँ बड़ी आबादी की पढ़ाई कम रही है, यह बोझ सबके लिए एक जैसा नहीं होता।

नाम की वर्तनी बदल जाना, पिता के नाम का अलग लिखा होना, या किसी काग़ज़ का पानी में बह जाना, ये सब ऐसी बातें हैं जो किसी को इस प्रक्रिया में फँसा सकती हैं।

जो सवाल अभी बचे हैं

फ़ैसले से कुछ चीज़ें तय हो गईं और कुछ नहीं।

जो तय हो गया: राज्य पर ख़र्च पड़ा, और दो प्रक्रियागत शर्तें दर्ज हुईं।

जो तय नहीं हुआ: मुमताज़ बेगम अब कहाँ हैं और वे वापस आएँगी या नहीं।

हर्जाना उस व्यक्ति को दिया जाता है जो उसे ले सके। अगर वह व्यक्ति सीमा के उस पार है और उसके पास कोई दस्तावेज़ नहीं है, तो यह सवाल बनता है कि यह रक़म उन तक पहुँचेगी कैसे।

अदालतों ने ऐसे मामलों में पहले भी आदेश दिए हैं कि व्यक्ति को वापस लाया जाए, और उनका पालन कराना हमेशा आसान नहीं रहा है।

हर्जाने का मतलब

एक अदालत भवन
तस्वीर: Gpics at English Wikipedia, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

दो लाख रुपये कोई बड़ी रक़म नहीं है, और यह बात कहनी चाहिए।

जो हुआ उसकी भरपाई इससे नहीं होती। किसी को उसके देश से निकालकर दूसरे देश में छोड़ देना ऐसा नुक़सान है जिसका कोई मूल्य नहीं लगता।

पर इस आदेश का महत्व रक़म में नहीं है। वह इस बात में है कि पहली बार यह तय हुआ कि ऐसा करने पर राज्य को क़ीमत चुकानी पड़ेगी।

अब तक इस तरह के मामलों में सबसे ज़्यादा जो होता था, वह यह था कि अदालत प्रक्रिया पर टिप्पणी करती थी और आगे के लिए निर्देश देती थी।

ख़र्च डालना अलग चीज़ है। वह फ़ाइल में दर्ज होता है और किसी को उसका जवाब देना पड़ता है।

न्यायाधिकरणों पर सवाल

इस फ़ैसले में सबसे तीखी बात न्यायाधिकरण के बारे में कही गई है, और वह भी दर्ज रहनी चाहिए।

विदेशी न्यायाधिकरण अदालतें नहीं हैं। वे अर्ध-न्यायिक निकाय हैं और उनके सदस्य वकीलों या सेवानिवृत्त अधिकारियों में से नियुक्त होते हैं।

इन न्यायाधिकरणों के काम पर पहले भी सवाल उठे हैं। नियुक्ति का तरीक़ा, कार्यकाल की शर्तें और मामलों के निपटारे की रफ़्तार, तीनों पर।

जब कोई उच्च न्यायालय किसी न्यायाधिकरण के रिकॉर्ड में क़ानूनी दुर्भावना पाता है, तो वह टिप्पणी उस एक मामले से आगे जाती है। वह उस निकाय के काम करने के तरीक़े पर सवाल है।

और यह टिप्पणी उस अदालत से आई है जो इन न्यायाधिकरणों के फ़ैसलों की अपील सुनती है। यानी जिस संस्था के पास इनका पूरा रिकॉर्ड आता है, उसी ने यह कहा।

ऐसे मामलों में अगला क़दम आम तौर पर यह होता है कि उस निकाय की समीक्षा हो। यह फ़ैसला वह समीक्षा नहीं कराता, पर उसकी वजह दर्ज कर देता है।

इसे कैसे पढ़ा जाए

इस फ़ैसले को दो तरह से पढ़ा जा सकता है और दोनों ग़लत हैं।

पहला ग़लत पाठ यह है कि अदालत ने अवैध प्रवास पर कार्रवाई रोक दी। ऐसा नहीं है। अदालत ने विदेशी घोषित करने की व्यवस्था पर कोई रोक नहीं लगाई।

दूसरा ग़लत पाठ यह है कि यह फ़ैसला सब कुछ ठीक कर देगा। यह भी नहीं है। दो निर्देश कमी की एक परत भरते हैं, पूरी व्यवस्था नहीं बदलते।

जो सही पाठ है वह यह है: राज्य के पास किसी को विदेशी घोषित करने का अधिकार है, और उस अधिकार के साथ एक प्रक्रिया जुड़ी है। इस मामले में प्रक्रिया छोड़ दी गई, और अदालत ने कहा कि इसकी क़ीमत राज्य चुकाएगा।

एक अदालत जब यह कहती है कि उसने ही राहत के लिए भेजा था और उसके बाद यह हुआ, तो वह अपनी ही व्यवस्था के बारे में कुछ कह रही होती है।

यह फ़ैसला किस काम आएगा

इस फ़ैसले का असर आगे कहाँ दिखेगा, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

पहला, यह उन याचिकाओं में उद्धृत होगा जो ऐसे ही मामलों में लगेंगी। एक बार जब किसी उच्च न्यायालय ने हर्जाना दे दिया, तो अगली याचिका में वही माँग रखी जा सकती है।

दूसरा, दोनों निर्देश पुलिस के लिए लिखित निर्देश बन जाएँगे। जो अधिकारी उनका पालन नहीं करेगा, उस पर अवमानना का सवाल बनेगा।

तीसरा, और शायद सबसे अहम, इससे रिकॉर्ड बनेगा। अगर हर हिरासत से पहले आदेश दिखाना और परिवार को सूचित करना ज़रूरी है, तो इन दोनों का काग़ज़ बनेगा। और जहाँ काग़ज़ बनता है, वहाँ बाद में जाँच हो सकती है।

अभी इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी दिक़्क़त यही है कि उसका बड़ा हिस्सा दर्ज नहीं होता।

किसी को कब उठाया गया, कहाँ रखा गया, किस दिन सीमा तक ले जाया गया, इनमें से कुछ भी सार्वजनिक नहीं होता। इसीलिए इन मामलों की गिनती तक उपलब्ध नहीं है।

दो लाख रुपये का यह आदेश उस चुप्पी में पहला दस्तावेज़ है।

स्रोतस्क्रॉल, फ़ैसले पर रिपोर्ट, स्क्रॉल, पहले की रिपोर्ट, गुवाहाटी उच्च न्यायालय, विदेशी अधिनियम, 1946, भारत कोड

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