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समझिए

भारत की भूतापीय क्षमता 10.6 गीगावाट आँकी गई है, पूरी दुनिया के ऐसे संयंत्र 15.67 गीगावाट के हैं

पहली संख्या ज़मीन के नीचे की गर्मी का अनुमान है। दूसरी संख्या दुनिया भर में लगी हुई मशीनों की है। सरकार की अपनी पृष्ठभूमि सामग्री मानती है कि भारत में व्यावसायिक भूतापीय बिजली अभी शुरू नहीं हुई।

भारत की भूतापीय क्षमता 10.6 गीगावाट आँकी गई है, पूरी दुनिया के ऐसे संयंत्र 15.67 गीगावाट के हैं

लद्दाख की पूगा घाटी में ज़मीन से भाप निकलती है।

वहाँ बर्फ़ के बीच पानी उबलता हुआ बाहर आता है, और यह सदियों से हो रहा है। समुद्र तल से ऊँचाई चौदह हज़ार फुट से ज़्यादा है।

जुलाई 2026 में वहाँ दो कुएँ खोदे गए और चालू किए गए। हर एक क़रीब एक हज़ार मीटर गहरा। यह काम ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र ने किया।

सरकार इसे भारत की भूतापीय यात्रा की औपचारिक शुरुआत कहती है।

तो सवाल यह बनता है कि इतनी गर्मी ज़मीन के नीचे मौजूद है, तो अब तक बिजली क्यों नहीं बनी।

पहले यह समझिए कि गर्मी आती कहाँ से है

पृथ्वी के भीतर की गर्मी दो जगह से आती है।

एक हिस्सा उस समय का बचा हुआ है जब पृथ्वी बनी थी। दूसरा हिस्सा लगातार पैदा हो रहा है, यूरेनियम, थोरियम और पोटेशियम जैसे तत्वों के रेडियोधर्मी क्षय से।

यह गर्मी नीचे से ऊपर की तरफ़ बहती है और मैंटल में विशाल संवहन धाराएँ बनाती है। गर्म पदार्थ ऊपर उठता है, ठंडा होकर नीचे बैठता है, और यही चक्र भूकंप, ज्वालामुखी और पहाड़ बनाने का काम करता है।

जहाँ ज़मीन में दरारें और भ्रंश हैं, वहाँ यह गर्म पदार्थ सतह के क़रीब आ जाता है। और जहाँ ऊपर की चट्टान पारगम्य है, वहाँ भूमिगत गर्म पानी और भाप के भंडार बन जाते हैं।

गर्म झरना उसी भंडार का ऊपरी सिरा है।

बिजली कैसे बनती है

तरीक़ा वही है जो कोयले की बिजली में है, बस ईंधन नहीं जलता।

गहरा कुआँ खोदकर नीचे का गर्म पानी और भाप ऊपर लाई जाती है। भाप टरबाइन घुमाती है, टरबाइन जनरेटर चलाता है, बिजली बनती है।

इस्तेमाल हो चुके पानी को ठंडा करके वापस उसी भंडार में डाल दिया जाता है, ताकि नीचे का पानी ख़त्म न हो और कुआँ लंबे समय तक चलता रहे।

सौर और पवन से एक बड़ा फ़र्क़ यहीं है। सूरज रात को नहीं रहता और हवा हमेशा नहीं चलती। ज़मीन के नीचे की गर्मी चौबीसों घंटे रहती है।

बिजली के अलावा इस गर्मी को सीधे भी इस्तेमाल किया जा सकता है। घर गर्म करने में, खेती में, मछली पालन में, और ठंडक पैदा करने में।

हिमाचल प्रदेश के मणिकरण में ज़मीन से निकलती भाप और गर्म पानी के कुंड, पार्वती नदी के किनारे
तस्वीर: अमन गुप्ता, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

भारत के पास है कितना

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने देश भर में 381 गर्म झरने मैप किए हैं और दस भूतापीय प्रांत पहचाने हैं।

वे दस हैं: हिमालयी, नागा-लुसाई, अंडमान और निकोबार, सोन-नर्मदा-ताप्ती, पश्चिमी तट, कैम्बे ग्रैबेन, अरावली, महानदी, गोदावरी, और दक्षिण भारत का क्रेटन क्षेत्र।

इन झरनों का सतही तापमान 35 से 89 डिग्री सेल्सियस के बीच बताया गया है।

सैद्धांतिक क्षमता का अनुमान लगभग 10.6 गीगावाट है, यानी 10,600 मेगावाट। इनमें से 42 जगहें बिजली बनाने और सीधे गर्मी के इस्तेमाल, दोनों के लिए ख़ास तौर पर संभावनाशील मानी गई हैं।

10.6 गीगावाटभारत की अनुमानित भूतापीय क्षमता। यह अनुमान है, लगी हुई मशीन नहीं

और दुनिया के पास कितना है

अब इसे पैमाने पर रखिए।

2025 के अंत तक पूरी दुनिया में लगी भूतापीय बिजली क्षमता 15.67 गीगावाट थी।

इंडोनेशिया, अमेरिका, फ़िलीपींस, तुर्किए और न्यूज़ीलैंड, इन पाँच देशों के पास उसका लगभग 67 फ़ीसदी है।

तो भारत का अनुमान अकेले पूरी दुनिया की लगी हुई क्षमता का दो-तिहाई बैठता है।

यहीं पर सावधान होना है। दोनों संख्याएँ एक जैसी दिखती हैं और एक जैसी हैं नहीं। एक अनुमान है कि नीचे कितनी गर्मी है। दूसरा हिसाब है कि ऊपर कितनी मशीन लगी है।

तेल के भंडार का अनुमान और तेल का उत्पादन जितने अलग होते हैं, ये दोनों भी उतने ही अलग हैं।

तो भारत में अभी हो क्या रहा है

पृष्ठभूमि सामग्री यह साफ़ लिखती है कि व्यावसायिक स्तर पर भूतापीय बिजली उत्पादन अभी शुरू नहीं हुआ है।

जो चल रहा है वह प्रदर्शन और शोध है।

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने जुलाई और अगस्त 2025 के बीच पाँच अनुसंधान परियोजनाएँ मंज़ूर कीं।

इनमें एक प्रदर्शन परियोजना ऐसी है जिसमें तीन कुएँ खोदे जा चुके हैं। उनसे 70 से 80 डिग्री सेल्सियस का द्रव मिल रहा है, और उससे 50 से 90 किलोवाट बिजली बनाकर दिखाई गई है।

पचास किलोवाट का मतलब समझिए। यह क़रीब उतनी बिजली है जितनी कुछ दर्जन घरों में एक साथ चलती है।

पूगा के दोनों कुएँ भंडार का आकलन करने के लिए हैं। उनसे भारत की पहली एक मेगावाट की प्रदर्शन परियोजना की नींव पड़नी है।

एक मेगावाट भी छोटा है। एक बड़ा तापीय संयंत्र इससे हज़ार गुना बनाता है।

एक और रास्ता जो खुला है

पृष्ठभूमि सामग्री में एक सुझाव है जिस पर कम बात होती है।

तेल और गैस के जो कुएँ अब कुछ नहीं दे रहे, उन्हें भूतापीय काम में लगाया जा सकता है।

तर्क सीधा है। कुआँ पहले से खुदा है, ड्रिलिंग का सबसे महँगा हिस्सा हो चुका है, और उस इलाक़े के भूगर्भ का पूरा आँकड़ा तेल कंपनी के पास पहले से है।

यह तकनीकी और परिचालन व्यवहार्यता पर निर्भर करेगा, यानी हर कुआँ इस काम का नहीं होगा।

अब आगे क्या

भूतापीय ऊर्जा पर राष्ट्रीय नीति सितंबर 2025 में अधिसूचित हुई थी और मंत्रालय उसका नोडल है। नीति खोज, आकलन, ड्रिलिंग, भंडार प्रबंधन और सीधे गर्मी के इस्तेमाल को प्राथमिकता देती है।

अगला पड़ाव पूगा की एक मेगावाट वाली परियोजना है।

उसके चलने पर ही पता चलेगा कि 10.6 गीगावाट के अनुमान में से कितना असल में निकाला जा सकता है। भंडार का अनुमान और कुएँ से मिलने वाली भाप के बीच का फ़र्क़ भूविज्ञान तय करता है, नीति नहीं।

आइसलैंड का नेस्याव्हेल्लिर भूतापीय बिजलीघर, जहाँ से निकलती भाप और ज़मीन पर बिछी पाइपलाइनें दिख रही हैं
तस्वीर: ग्रेतार ईवार्सन, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, भूतापीय ऊर्जा पर पृष्ठभूमि सामग्री, 4 सितंबर 2026, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, भूतापीय ऊर्जा पर राष्ट्रीय नीति, सितंबर 2025

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