जैव-विविधता का यह पैसा किसी किसान या गाँव तक नहीं पहुँचा, और विज्ञप्ति ख़ुद यही कहती है
राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण ने 5.68 करोड़ रुपये जारी किए। यह रक़म बीज कंपनियों से भिंडी, खीरे और तरबूज़ की क़िस्मों के बदले वसूली गई थी। सामग्री बाज़ार और व्यापारियों से ली गई थी, इसलिए उसका सिरा किसी गाँव से नहीं जुड़ सका।
राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण ने 30 अगस्त को 5.68 करोड़ रुपये जारी किए।
यह लाभ-साझाकरण का पैसा है। इसका पूरा विचार यह है कि जो कंपनी भारत के जैविक संसाधनों से कमाई करे, वह उसका एक हिस्सा उन लोगों तक पहुँचाए जिनके इलाक़े से वह संसाधन आया था।
यह रक़म बीज कंपनियों से ली गई थी, भिंडी, खीरे और तरबूज़ की क़िस्मों के बदले।
इनमें से एक भी रुपया किसी किसान, किसी समुदाय या किसी जैव-विविधता प्रबंधन समिति को नहीं मिला।
विज्ञप्ति यह ख़ुद बताती है
यह हमारा आरोप नहीं है। सरकारी विज्ञप्ति में यही लिखा है।
उसके शब्द हैं कि इन मामलों में जैविक संसाधनों तक बाज़ारों और व्यापारियों के माध्यम से पहुँच प्राप्त की गई थी, इसलिए उन्हें किसी विशिष्ट किसान, समुदाय या एक निश्चित भौगोलिक स्रोत से जोड़ना संभव नहीं था।
बीज कंपनी ने मंडी से बीज ख़रीदा। मंडी यह नहीं लिखती कि वह बीज किस गाँव से आया।
तो पैसा गया कहाँ।
वह 32 राज्य जैव-विविधता बोर्डों और संघ राज्य क्षेत्र जैव-विविधता परिषदों में बाँट दिया गया, इस अनुपात में कि वे फ़सलें कहाँ-कहाँ उगाई जाती हैं।
और यह व्यवस्था की नाकामी नहीं है
यहाँ एक बात साफ़ करनी ज़रूरी है, क्योंकि इसे घोटाला समझ लेना आसान है।
यह क़ानून के मुताबिक़ हुआ।
जैविक विविधता अधिनियम में 2023 में संशोधन हुआ, जो 1 अप्रैल 2024 से लागू है। उस संशोधन ने धारा 27 में एक परंतुक जोड़ा, जो कहता है कि जहाँ स्रोत-क्षेत्र की पहचान न हो सके, वहाँ राष्ट्रीय जैव-विविधता निधि का इस्तेमाल उस इलाक़े के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए किया जाएगा जहाँ वे संसाधन पाए जाते हैं।
एक सावधानी। विज्ञप्ति में इस परंतुक का हवाला नहीं दिया गया है। वह विशेषज्ञ समिति की सिफ़ारिश और धारा 32 का ज़िक्र करती है। परंतुक से जोड़ना हमारा पढ़ना है, क्योंकि उसमें जो शर्त लिखी है और विज्ञप्ति में जो समस्या बताई गई है, दोनों एक ही हैं।
यह तीन हफ़्ते में दूसरी बार हुआ है। 9 अगस्त को 3.79 करोड़ रुपये इसी तरीक़े से बाँटे गए थे।
बायोपाइरेसी रोकने के लिए जमा किया गया पैसा, इन मामलों में, राज्य सरकार का अनुदान बन गया।
अठारह साल का हिसाब
अब पूरे ढाँचे का आकार देखिए।
सरकार के अपने आँकड़े के मुताबिक़ 2008 से अब तक इस व्यवस्था ने 266 करोड़ रुपये से ज़्यादा वसूले हैं, और लगभग 145 करोड़ रुपये बाँटे हैं।
पर इसमें एक बात छिपी है, जो तारीख़ें अलग करने पर दिखती है।
31 मार्च 2025 तक, यानी लगभग सत्रह साल में, वसूली लगभग 244.74 करोड़ थी और बँटवारा लगभग 67 करोड़। यानी जितना लिया, उसका सत्ताईस फ़ीसदी बाँटा।
अकेले 2025-26 के एक साल में 78 करोड़ रुपये बाँटे गए।
इस व्यवस्था ने अब तक जितना पैसा बाँटा है, उसका आधे से ज़्यादा एक ही वित्त वर्ष में बाँटा गया है।
यह गणना सरकार के दो आँकड़ों को घटाकर निकाली गई है, ताकि कोई इसे जाँच सके।
और सबसे बड़ा स्रोत बायोप्रॉस्पेक्टिंग है ही नहीं
अब वह तथ्य जो इस पूरी कहानी को बदल देता है।
लाभ-साझाकरण की जितनी रक़म आज तक वसूली गई है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा किसी दवा कंपनी की रॉयल्टी से नहीं आया।
वह लाल चंदन से आया है। अकेले लाल चंदन का हिस्सा 120 करोड़ रुपये है, यानी कुल वसूली का पैंतालीस फ़ीसदी।
और वह पैसा आया कहाँ से। सरकार की अपनी विज्ञप्ति बताती है कि 87.68 करोड़ रुपये आंध्र प्रदेश वन विभाग द्वारा नीलाम किए गए या ज़ब्त किए गए लाल चंदन की लकड़ी तक पहुँच से पैदा हुए।
यानी यह तस्करी के माल की नीलामी से आई रक़म है।
लाल चंदन से आए इस पैसे का बँटवारा भी देखने लायक़ है। उनतालीस करोड़ से ज़्यादा वन विभागों और एक राज्य बोर्ड को गया। 3.55 करोड़ रुपये उन 216 किसानों और एक विश्वविद्यालय को गए जिन्होंने वे पेड़ असल में उगाए थे।
अनुपात लगभग चौदह और एक का है।
जो सवाल बचता है
क़ानून कहता है कि जहाँ स्रोत का पता न चले, वहाँ पैसा उस इलाक़े के विकास पर ख़र्च हो।
पर स्रोत का पता न चलना कोई प्राकृतिक बात नहीं है। वह इसलिए नहीं चलता कि बीज मंडी से ख़रीदा गया और मंडी में यह दर्ज नहीं होता कि माल किस गाँव से आया।
यानी जिस दिन यह दर्ज होने लगेगा, उसी दिन यह पैसा सीधे उन तक जा सकेगा जिनके लिए यह क़ानून बना था।
तब तक यह राज्य बोर्डों के खाते में जाता रहेगा, क़ानून के मुताबिक़।
स्रोतपर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण, जैविक विविधता अधिनियम, 2002 और 2023 का संशोधन