जैव विविधता समितियाँ 2.76 लाख हैं, मंत्रालय की हिंदी विज्ञप्ति में 27.6 लाख छपीं
चंडीगढ़ में राज्य जैव विविधता बोर्डों की 16वीं राष्ट्रीय बैठक हुई। पर्यावरण मंत्री ने इन समितियों को काम करने लायक़ बनाने की बात कही। उसी विज्ञप्ति में उनकी गिनती दस गुना ज़्यादा लिखी है।

क्या आपके गाँव या मोहल्ले में जैव विविधता प्रबंधन समिति है?
क़ानूनन होनी चाहिए। जैव विविधता अधिनियम 2002 कहता है कि हर स्थानीय निकाय, यानी हर ग्राम पंचायत और हर नगर निकाय, ऐसी एक समिति बनाएगा।
देश में ऐसी समितियाँ क़रीब 2.76 लाख हैं।
शनिवार को चंडीगढ़ में इन्हीं के बारे में एक बैठक शुरू हुई, और उसी दिन जारी हुई हिंदी विज्ञप्ति में उनकी संख्या 27.6 लाख लिखी है।
फ़र्क़ दस गुने का है।
पहले यह देख लीजिए कि गिनती हो क्या सकती है
देश में ग्राम पंचायतें क़रीब 2.55 लाख हैं। नगर निकाय क़रीब 4,800।
दोनों जोड़ दें तो स्थानीय निकाय क़रीब 2.6 लाख होते हैं। समितियाँ इन्हीं में बननी हैं, और कुछ जगहों पर वार्ड या ब्लॉक स्तर पर अतिरिक्त समितियाँ भी हैं, इसलिए 2.76 लाख का आँकड़ा ठीक बैठता है।
27.6 लाख बैठ ही नहीं सकता। इसका मतलब होता कि हर स्थानीय निकाय में दस-दस समितियाँ हैं।
उसी बैठक की ख़बर देने वाली समाचार एजेंसियों ने संख्या 2.76 लाख ही लिखी है, और राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण का अपना आँकड़ा भी यही है।
यह छपाई की चूक है, नीति की नहीं। पर यह उस दस्तावेज़ में है जिससे कल कई अख़बार अपनी ख़बर बनाएँगे, और एक बार छप जाने के बाद ऐसे आँकड़े सालों चलते हैं।
उसी विज्ञप्ति में एक और चूक है जो और साफ़ है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण का नाम एक जगह "राष्ट्रीय जैव विविधता हवाई अड्डा" लिखा गया है। अंग्रेज़ी का Authority मशीन से हिंदी में आते हुए हवाई अड्डा बन गया।
समिति करती क्या है
समिति का असली काम एक दस्तावेज़ बनाना है, जिसे जन जैव विविधता रजिस्टर कहते हैं।
इसमें दर्ज होता है कि उस गाँव या इलाक़े में कौन-कौन से पेड़, पौधे, फ़सलें, मछलियाँ, पक्षी और जानवर हैं। कौन-सी देसी क़िस्में बची हैं। कौन-सा पौधा किस बीमारी में इस्तेमाल होता है और वह जानकारी किसके पास है।
यह आख़िरी हिस्सा ही पूरे क़ानून की जड़ है।
2002 का क़ानून इसलिए बना था कि विदेशी और घरेलू कंपनियाँ भारतीय पौधों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान का व्यावसायिक इस्तेमाल करके मुनाफ़ा कमाती रहीं, और जिन समुदायों ने वह ज्ञान सैकड़ों साल तक बचाकर रखा, उन्हें कुछ नहीं मिला।
रजिस्टर उस ज्ञान का लिखित सबूत है। अगर लिखा हुआ नहीं है, तो दावा करना मुश्किल हो जाता है।

पैसा असल में आता कहाँ से है
यह हिस्सा सबसे कम जाना जाता है और सबसे ठोस है।
अगर कोई कंपनी किसी भारतीय जैविक संसाधन का व्यावसायिक इस्तेमाल करती है, तो उसे प्राधिकरण से मंज़ूरी लेनी होती है और उसके बदले एक हिस्सा देना होता है। इसे पहुँच और लाभ साझाकरण कहते हैं, अंग्रेज़ी में एक्सेस एंड बेनिफ़िट शेयरिंग।
वह पैसा फिर राज्य बोर्डों के रास्ते समितियों और समुदायों तक जाता है।
मंत्री भूपेंद्र यादव ने चंडीगढ़ में बताया कि प्राधिकरण अब तक 200 करोड़ रुपये से ज़्यादा इस तरह बाँट चुका है।
ताज़ा किश्त का ब्योरा उसी दिन आया और वह पढ़ने लायक़ है। 8.23 करोड़ रुपये 27 राज्य जैव विविधता बोर्डों और 5 केंद्रशासित प्रदेश परिषदों को मंज़ूर किए गए।
यह पैसा किन चीज़ों के इस्तेमाल से आया, यह भी बताया गया: करेला, भिंडी, मिर्च और प्याज़।
यानी चार आम सब्ज़ियाँ। इनकी देसी क़िस्मों तक पहुँच के बदले कंपनियों ने जो दिया, वह अब उन्हीं राज्यों को लौट रहा है।
पैसे का इस्तेमाल किन कामों में होगा, यह भी तय है: रजिस्टरों का दस्तावेज़ीकरण और उन्हें अद्यतन रखना, प्राकृतिक आवास में और उससे बाहर संरक्षण, बिगड़े पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली, जैव विविधता विरासत स्थलों को मज़बूत करना, समितियों की क्षमता बढ़ाना और समुदायों की आजीविका।
2023 में क़ानून बदला, और उस पर झगड़ा हुआ
मंत्री ने विज्ञप्ति में कहा कि जैव विविधता (संशोधन) अधिनियम 2023 और जैव विविधता नियम 2024 ने ढाँचे को मज़बूत और सुव्यवस्थित बनाया है, और राज्यों से कहा कि वे अपने नियम इसी के अनुरूप करें।
संशोधन का रास्ता यह रहा: लोकसभा ने 25 जुलाई 2023 को और राज्यसभा ने 1 अगस्त 2023 को इसे पारित किया, और यह अप्रैल 2024 से लागू हुआ।
इसमें दो बड़े बदलाव हुए, और दोनों पर आपत्तियाँ दर्ज हुईं।
पहला, पंजीकृत आयुष चिकित्सकों और संहिताबद्ध पारंपरिक ज्ञान को लाभ साझाकरण के दायरे से बाहर कर दिया गया। खेती की गई औषधीय वनस्पतियों और उनके उत्पादों के लिए राज्य बोर्ड को पहले से सूचना देने की ज़रूरत भी हटा दी गई।
दूसरा, क़ानून के अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाकर जुर्माने में बदल दिया गया। पहले जिन उल्लंघनों पर आपराधिक कार्रवाई होती थी, अब उन पर एक लाख से पचास लाख रुपये तक का जुर्माना लगता है, जो एक सरकारी अधिकारी जाँच करके तय करता है।
समर्थकों का तर्क यह रहा कि इससे आयुष उद्योग और घरेलू शोध पर से बेवजह का बोझ हटा और अनुपालन आसान हुआ।
आपत्ति करने वालों का तर्क यह रहा कि छूट का दायरा इतना चौड़ा है कि लाभ साझाकरण का ढाँचा ही कमज़ोर पड़ जाता है, और जुर्माने में बदलने से रोकथाम की ताक़त घटती है। यह भी कहा गया कि इसका सबसे ज़्यादा असर आदिवासी और स्थानीय समुदायों पर पड़ेगा, जिनके ज्ञान की हिफ़ाज़त के लिए क़ानून बना था।
यह विवाद चालू है और इस पर किसी अदालत का अंतिम फ़ैसला नहीं आया है।


यह क़ानून हल्दी और नीम से निकला है
2002 का क़ानून अचानक नहीं आया। उससे पहले नब्बे के दशक में दो मुक़दमे लड़े गए जिन्होंने भारत में इस पूरे सवाल को खड़ा किया।
1995 में अमेरिकी पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय ने मिसिसिपी विश्वविद्यालय को घाव भरने में हल्दी के इस्तेमाल का पेटेंट दे दिया।
वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने इसे चुनौती दी और सबूत में संस्कृत की पुरानी पांडुलिपियाँ तथा दूसरे दस्तावेज़ रखे, जिनसे साबित होता था कि यह जानकारी भारत में सदियों से मौजूद है। पेटेंट 1997 में रद्द हुआ।
दूसरा मुक़दमा नीम का था। यूरोपीय पेटेंट कार्यालय ने नीम के तेल से बने एक फफूँदनाशक का पेटेंट डब्ल्यू आर ग्रेस एंड कंपनी को दिया था। भारत सरकार की एजेंसियों और कुछ संगठनों ने विरोध दर्ज कराया कि नीम का यह गुण भारतीय खेती में आम जानकारी है। पेटेंट 2000 में रद्द हुआ, नवीनता के अभाव में।
इन दोनों के बाद भारत ने एक बचाव का ढाँचा बनाया, जिसे पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय कहते हैं। इसमें आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और दूसरी पद्धतियों का ज्ञान ऐसे रूप में दर्ज है जिसे दुनिया भर के पेटेंट परीक्षक खोजकर देख सकें। यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों के पेटेंट कार्यालयों को इसकी पहुँच दी गई है।
पुस्तकालय पुरानी और लिखित परंपराओं के लिए है। जन जैव विविधता रजिस्टर उससे अलग काम करता है, क्योंकि वह उस ज्ञान के लिए है जो किसी किताब में नहीं, किसी गाँव में है।
एक फ़ैसला जिसने दायरा तय किया
2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट का एक फ़ैसला आया जिसने इस क़ानून का सबसे बड़ा सवाल तय किया।
दिव्य फ़ार्मेसी नाम की कंपनी, जो आयुर्वेदिक दवाएँ बनाती है, से उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड ने लाभ साझाकरण की माँग की थी।
कंपनी अदालत गई। उसका तर्क यह था कि वह पूरी तरह भारतीय कंपनी है, उसमें कोई विदेशी हिस्सेदारी नहीं है, और क़ानून की धाराएँ 19 और 20 सिर्फ़ विदेशी संस्थाओं पर लागू होती हैं।
21 दिसंबर 2018 को अदालत ने यह दलील ख़ारिज कर दी। फ़ैसले में कहा गया कि जैविक संसाधन राष्ट्र की संपत्ति हैं, और भारतीय कंपनियाँ भी उतनी ही बाध्य हैं। कंपनी को 2014 के दिशानिर्देशों की दरों से बोर्ड को भुगतान करना होगा।
इस फ़ैसले के बिना यह पूरा तंत्र आधा रह जाता, क्योंकि भारतीय जैविक संसाधनों का व्यावसायिक इस्तेमाल करने वाली अधिकतर कंपनियाँ भारतीय ही हैं।
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें 2023 के संशोधन की छूटों पर आपत्ति उठी।
बैठक में और क्या हुआ
राज्य जैव विविधता बोर्डों और केंद्रशासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों की यह 16वीं राष्ट्रीय बैठक है। यह चंडीगढ़ में 6 और 7 सितंबर को हो रही है और इसका आयोजन राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने किया है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और हरियाणा के पर्यावरण मंत्री राव नरबीर सिंह ने की।
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर दो दस्तावेज़ों का ज़िक्र हुआ। भारत ने जैव विविधता पर सम्मेलन को अपनी सातवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट सौंपी है, और नागोया प्रोटोकॉल पर अपनी पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट भी।
नागोया प्रोटोकॉल का नाम अक्सर आता है और शायद ही समझाया जाता है। यह 2010 में जापान के नागोया शहर में हुआ वह अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो तय करता है कि एक देश के जैविक संसाधन और उनसे जुड़ा पारंपरिक ज्ञान दूसरे देश की संस्थाएँ किन शर्तों पर इस्तेमाल कर सकती हैं, और उसका लाभ मूल देश और समुदाय तक कैसे लौटेगा। भारत ने इसे 2012 में मंज़ूरी दी थी। 2014 के एबीएस दिशानिर्देश, जिनके तहत दिव्य फ़ार्मेसी से भुगतान माँगा गया था, इसी के बाद बने।
राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना 2024-2030 का हवाला दिया गया, जो कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचे के अनुरूप बनाई गई है। राज्यों से 30-बाय-30 लक्ष्य में भागीदारी की अपील की गई, यानी 2030 तक धरती और समुद्र का 30 फ़ीसदी हिस्सा संरक्षित करने का वैश्विक लक्ष्य।
जैव विविधता विरासत स्थल
एबीएस के पैसे के जिन कामों की सूची दी गई है, उनमें एक नाम आता है जो कम सुना जाता है।
क़ानून की धारा 37 राज्य सरकारों को यह अधिकार देती है कि वे स्थानीय निकायों से सलाह करके जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाक़ों को अधिसूचित करें। इन्हें जैव विविधता विरासत स्थल कहा जाता है।
पहला ऐसा स्थल 2007 में घोषित हुआ था: बेंगलुरु ज़िले के देवनहल्ली तालुक में नल्लूर का इमली का बाग़, जो 54 एकड़ में फैला है। ये पेड़ सैकड़ों साल पुराने हैं।
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार मार्च 2026 तक देश में ऐसे 54 स्थल हैं।
यह संख्या अपने आप में एक बात कहती है। अठारह साल में 54, यानी साल में तीन से भी कम। संरक्षित क्षेत्रों के मुक़ाबले यह बहुत छोटा आँकड़ा है, और इसकी वजह यह है कि इन स्थलों की घोषणा राज्य को करनी होती है और उसमें स्थानीय सहमति चाहिए।
समिति अपना पैसा भी जुटा सकती है
एक प्रावधान ऐसा है जिसका इस्तेमाल शायद ही होता है।
क़ानून की धारा 41 की उपधारा 3 समितियों को यह अधिकार देती है कि वे अपने इलाक़े से व्यावसायिक मक़सद के लिए जैविक संसाधन ले जाने वालों से संग्रहण शुल्क वसूल सकें।
यानी अगर कोई कंपनी किसी गाँव के जंगल से औषधीय जड़ी ले जा रही है, तो उस गाँव की समिति उससे सीधे शुल्क ले सकती है, बिना राज्य बोर्ड या दिल्ली के प्राधिकरण तक जाए।
व्यवहार में यह लगभग नहीं होता। इसकी वजहें साफ़ हैं: बहुत सी समितियाँ काग़ज़ पर हैं, जिनके पास न बैंक खाता है न कोई ऐसा व्यक्ति जिसे यह मालूम हो कि उसे यह अधिकार है।
यही वह अंतर है जिस पर चंडीगढ़ की बैठक का दूसरा दिन टिका है।
जो नहीं बताया गया
तीन बातें ऐसी हैं जिनके बिना यह तस्वीर अधूरी रहती है।
पहली, समितियाँ 2.76 लाख हैं, पर उनमें से कितनी सचमुच काम कर रही हैं, यह नहीं बताया गया। मंत्री की अपनी भाषा इस पर संकेत देती है। उन्होंने समितियों को बनाने की नहीं, उन्हें कार्यशील और प्रभावी बनाने की अपील की। यह अपील तभी की जाती है जब बहुत सारी समितियाँ काग़ज़ पर हों।
दूसरी, जन जैव विविधता रजिस्टर कितने बन चुके हैं और उनमें से कितने पिछले पाँच साल में अद्यतन हुए, यह आँकड़ा नहीं है। रजिस्टर एक बार बनाकर रख देने से काम नहीं चलता, क्योंकि उसका पूरा मक़सद दावे का सबूत होना है। मंत्री ने भी यही कहा कि इन्हें स्थानीय निकायों के लिए ज़िंदा नियोजन उपकरण बनना चाहिए।
तीसरी, 200 करोड़ रुपये किस अवधि में बँटे, यह नहीं बताया गया। प्राधिकरण 2003 से काम कर रहा है। अगर यह रक़म बाईस साल की है, तो सालाना औसत नौ करोड़ रुपये से थोड़ा ऊपर बैठता है, जो 2.76 लाख समितियों के देश के लिए बहुत बड़ी रक़म नहीं है।
चौथी, 2023 के संशोधन के बाद एबीएस की वसूली पर क्या असर पड़ा, इसका कोई तुलनात्मक आँकड़ा नहीं दिया गया। छूटों का दायरा बढ़ा है, इसलिए यह देखने की चीज़ है कि संशोधन से पहले और बाद के सालों में वसूली कितनी रही।
बैठक दो दिन की है। रविवार को जो हुआ वह उद्घाटन था। असली काम, यानी राज्यों के अनुभव और अड़चनें, सोमवार को सामने आएँगे। और जो आँकड़ा कल छपेगा, वह 2.76 लाख होना चाहिए।
स्रोतपर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विज्ञप्ति, 6 सितंबर 2026, एएनआई, एबीएस निधि के 200 करोड़ पार करने पर रिपोर्ट, 6 सितंबर 2026, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, जैव विविधता (संशोधन) अधिनियम 2023 पर विधिक टिप्पणी