जनगणना का दसवाँ सवाल 'जाति' है और उसका कॉलम ख़ाली है; तमिलनाडु चाहता है कि वहाँ सूची हो
फ़रवरी 2027 में गणक जो जाति बताई जाएगी वही लिख लेगा, किसी सूची से मिलाए बिना। तमिलनाडु विधानसभा ने 8 सितंबर को प्रस्ताव पास किया कि पिछड़े वर्गों के लिए वही तरीक़ा हो जो अनुसूचित जातियों के लिए है: पहले से लदी सूची, ड्रॉप-डाउन से चुनाव। DMK को मतदान से पहले सदन से बाहर किया गया।

फ़रवरी 2027 में एक गणक आपके दरवाज़े पर आएगा और चालीस सवाल पूछेगा। दसवाँ सवाल तीन शब्दों का है: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, जाति।
पहले दो के लिए उसके पास सूची होगी। तीसरे के लिए ख़ाली जगह।
आप जो कहेंगे, वह वही लिखेगा। यही "खुला कॉलम" है, और तमिलनाडु विधानसभा ने 8 सितंबर को इसी के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास किया।
प्रस्ताव में क्या लिखा है
पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री वी. संपतकुमार ने प्रस्ताव रखा। डेक्कन क्रॉनिकल के अनुसार उसका मुख्य वाक्य यह है: केंद्र "2027 की भारत की जनगणना के दूसरे चरण में पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों और विमुक्त समुदायों की जाति का ब्यौरा उसी तरीक़े से इकट्ठा करे जैसा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए किया जाता है।"
आगे: आँकड़े सिर्फ़ आधिकारिक सूचियों में दर्ज नामों के आधार पर लिए जाएँ, और पिछड़े वर्गों के लिए "अस्पष्ट खुला-कॉलम तरीक़ा" पूरी तरह हटाया जाए। तकनीकी समाधान भी प्रस्ताव में है: जनगणना पोर्टल में सूचियाँ पहले से लदी हों और गणक ड्रॉप-डाउन मेन्यू से चुने।
मंत्री का एक और वाक्य उसी रिपोर्ट में है: "सामाजिक न्याय और समान न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह काम राज्य और केंद्र सरकारों की अधिसूचनाओं के मुताबिक़ सिर्फ़ आधिकारिक नामों पर टिका रहे।" रिपोर्ट के अनुसार प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ, यानी जो सदन में मौजूद थे उन सबकी सहमति से।
एआईएडीएमके और पीएमके के विधायकों ने समर्थन में बोला। डीएमके के विधायकों को मतदान से पहले सदन से बाहर निकाल दिया गया था।
दोनों तरीक़ों में फ़र्क़
अनुसूचित जातियों के लिए जनगणना दशकों से एक सूची पर चलती है: हर राज्य की अधिसूचित जातियों की सूची, जिसमें से गणक मिलान करता है। नाम सूची में है, तो दर्ज; नहीं है, तो नहीं।
खुले कॉलम में मिलान नहीं है। जो बोला गया, वही लिखा गया। इसका फ़ायदा यह है कि कोई जाति छूटती नहीं; नुक़सान यह कि एक ही जाति के दस नाम दस अलग प्रविष्टियाँ बन सकते हैं। गाँव में एक नाम, शहर में दूसरा, उप-जाति का तीसरा, वर्तनी का चौथा।
मंत्री का तर्क इसी नुक़सान पर था: अगर लोग एक ही जाति के लिए अलग-अलग नाम, क्षेत्रीय रूप समेत, इस्तेमाल करें तो आँकड़ा "अस्पष्ट हो सकता है", गिनती में "कठिनाई" आ सकती है, और जनगणना का "पूरा लाभ" नहीं मिलेगा।
जनगणना दफ़्तर के भीतर से भी यही चिंता आई है। पूर्व उप-महापंजीयक के. नारायणन उन्नी, जो 2011 और 2021 की जनगणना की तकनीकी सलाहकार समिति में रहे, ने 20 अगस्त को द प्रिंट से कहा कि राज्यों के बीच आवाजाही पहले से बहुत बढ़ी है, गणक दूर के इलाक़ों की जातियों के नाम नहीं पहचान पाएगा, और लोग अक्सर मुख्य जाति की जगह उप-जाति का नाम बताते हैं। तरीक़ा कई जनगणनाओं में जाकर सधता है, इसलिए उनका आकलन है कि इस बार की जाति-गणना से "बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए"।
केंद्र ने क्या अधिसूचित किया है

14 अगस्त 2026 को महापंजीयक और जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण ने दूसरे चरण, यानी जनसंख्या गणना, के 40 प्रश्न अधिसूचित किए। जनगणना दो चरणों में है: मकान-सूचीकरण अप्रैल से सितंबर 2026 तक, जो चल रहा है, और जनसंख्या गणना फ़रवरी 2027 में। विकिपीडिया के अनुसार गणक 9 से 28 फ़रवरी के बीच आएँगे, और गणकों की संख्या 30 लाख से ऊपर है।
प्रश्न 10 का शीर्षक "अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / जाति" है। गणकों को निर्देश है कि जाति उसी तरह दर्ज हो जैसे व्यक्ति बताए, क्योंकि यह खुला कॉलम है, बिना किसी पहले से तय सूची के। पीटीआई की रिपोर्ट, जो द प्रिंट पर छपी, निर्देश का वाक्य यूँ देती है: गणक "लोगों के जवाब के आधार पर जाति का ब्यौरा दर्ज करेंगे और इसमें कोई ड्रॉप-डाउन या टिक-मार्क विकल्प नहीं होगा।"
स्व-गणना का विकल्प भी है, सरकारी पोर्टल पर, 16 भाषाओं में। वहाँ भी कॉलम खुला ही है। भाषाओं में तमिल है, और असमिया, बांग्ला, अंग्रेज़ी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओड़िया, पंजाबी, तेलुगु और उर्दू भी।
पैसे का हिसाब 12 अगस्त को राज्यसभा में आया। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के लिखित उत्तर के अनुसार पहला चरण 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पूरा हो चुका है, राज्यों को अब तक 4,102 करोड़ रुपये जारी हुए हैं, और लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के बर्फ़ीले इलाक़ों में दूसरा चरण 1 से 30 सितंबर 2026 में ही हो रहा है, जिसके लिए 17 से 31 अगस्त तक स्व-गणना खुली थी। जनगणना का कुल बजट 11,718.24 करोड़ रुपये अधिसूचना की रिपोर्टों में दर्ज है।
आज़ादी के बाद यह पहली जनगणना है जिसमें हर व्यक्ति की जाति पूछी जाएगी। 1931 के बाद से सिर्फ़ अनुसूचित जातियों और जनजातियों की गिनती होती रही है।
अप्रैल 2025 का फ़ैसला और उसकी भाषा
जाति गिनने का फ़ैसला 30 अप्रैल 2025 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने लिया। पीआईबी की उस दिन की विज्ञप्ति में तर्क दर्ज है: कुछ राज्यों ने जाति सर्वे किए हैं जो "पारदर्शिता और मंशा में अलग-अलग" रहे, "कुछ पूरी तरह राजनीतिक कोण से", इसलिए गिनती अलग सर्वे की बजाय मुख्य जनगणना में हो, "ताकि हमारा सामाजिक ताना-बाना राजनीतिक दबाव में न आए।"
विज्ञप्ति तीन और बातें कहती है। संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत जनगणना संघ सूची की प्रविष्टि 69 है। 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकसभा में जाति जनगणना पर विचार का भरोसा दिया था और मंत्रियों का समूह बना था। और तब की सरकार ने जनगणना की जगह सर्वे चुना, जिसे SECC कहा गया। गृह मंत्री अमित शाह ने उसी दिन एक्स पर लिखा कि समिति ने "एक ऐतिहासिक भूल सुधारी" है।
विज्ञप्ति में यह कहीं नहीं है कि जाति का नाम किस तरह दर्ज होगा। वह 14 अगस्त 2026 की अधिसूचना में तय हुआ, और तमिलनाडु का प्रस्ताव उसी एक तय बात को बदलवाना चाहता है।
स्टालिन का आँकड़ा, उनके दावे के रूप में

एक दिन पहले, 7 सितंबर को, डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने बयान जारी किया। हंस इंडिया के अनुसार उन्होंने कहा कि गणकों को हाथ से जाति के नाम लिखने देना "गंभीर विसंगतियाँ" पैदा करेगा; खुली प्रविष्टियाँ "46 लाख अलग-अलग जातियों के होने का झूठा संकेत" दे सकती हैं; और इससे "लगभग 12,000 करोड़ रुपये का सार्वजनिक धन" बर्बाद होगा। डीटी नेक्स्ट ने यही बयान 6 सितंबर को छापा था, जिसमें स्टालिन ने खुले फ़ॉर्मेट को "निराशाजनक" कहा; बयान किस दिन जारी हुआ, इस पर दोनों रिपोर्टें एक नहीं हैं।
46 लाख का आँकड़ा उनका है, और बयान में उसका स्रोत नहीं है। पर यह संख्या एक जगह मिलती है। 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना, SECC, में विकिपीडिया के अनुसार गणकों ने जाति वही लिखी जो बताई गई, और नतीजा जाति, उप-जाति, पर्यायवाची, उपनाम और गोत्र की 46,73,034 प्रविष्टियाँ था। उसी पन्ने के अनुसार जाति के आँकड़ों में 8.19 करोड़ त्रुटियाँ मिलीं, 6.74 करोड़ सुधारी गईं, 28 जुलाई 2015 तक 1.46 करोड़ बची थीं, और जाति का आँकड़ा कभी प्रकाशित नहीं हुआ। जनगणना के बजट का 12,000 करोड़ वाला आँकड़ा भी उन्हीं के बयान का है; अधिसूचित बजट 11,718.24 करोड़ रुपये है।
स्टालिन ने केंद्र की एक सफ़ाई को "पूरी तरह अस्वीकार्य" भी कहा: यह कि ओबीसी सूची में दर्ज नाम जातियों के नहीं, "वर्गों" के हैं। यह बहस पुरानी है; विकिपीडिया के ओबीसी पन्ने के अनुसार सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि ओबीसी का तीसरा शब्द "वर्ग" है, "जाति" नहीं।
दिलचस्प यह है कि स्टालिन की माँग और सदन के प्रस्ताव की भाषा लगभग एक है: राज्यों से उनकी पिछड़ा और अति-पिछड़ा सूचियाँ ली जाएँ, नागरिक सूची से चुनें। फिर भी उनका दल मतदान के वक़्त सदन में नहीं था।
तमिलनाडु के लिए यह सवाल क्यों बड़ा है
क्योंकि यहाँ आरक्षण 69 फ़ीसदी है, और वह तीन सूचियों पर टिका है।
ढाँचा यह है: पिछड़ा वर्ग 30 फ़ीसदी, जिसमें 26.5 सामान्य और 3.5 मुस्लिम; अति पिछड़ा वर्ग 13; विमुक्त समुदाय 7; अनुसूचित जाति 18, जिसमें 3 अरुंथथियार; अनुसूचित जनजाति 1। बाक़ी 31 सामान्य।
यह 1993 के विधेयक से बना, जो 1994 का अधिनियम 45 बना और उसी साल संविधान की नौवीं अनुसूची में डाला गया, ताकि अदालतों में उसे चुनौती न दी जा सके।
हर श्रेणी की अपनी सूची है। अगर जनगणना उन्हीं सूचियों के नामों से गिनती करे, तो हर श्रेणी की जनसंख्या सीधे निकलेगी और 69 फ़ीसदी के हर हिस्से का हिसाब मिलेगा। अगर खुले कॉलम से गिनती हो, तो हर नाम को बाद में किसी सूची से मिलाना पड़ेगा, और मिलान की मेज़ पर ही सारे झगड़े होंगे।
69 की सीढ़ियाँ
यह संख्या एक झटके में नहीं बनी। विकिपीडिया के अनुसार 1921 में शुरू हुआ और 1927 में लागू "सांप्रदायिक शासनादेश" 44 फ़ीसदी ग़ैर-ब्राह्मण हिंदुओं को, 8 अनुसूचित जातियों को और 16-16 ब्राह्मणों, मुसलमानों, ईसाइयों और एंग्लो-इंडियनों को देता था। 1950 में मद्रास हाई कोर्ट ने उसे असंवैधानिक ठहराया और सुप्रीम कोर्ट ने वह फ़ैसला बरक़रार रखा; उसके बाद संविधान संशोधन से राज्यों को कोटा तय करने का रास्ता मिला।
1951 में पिछड़े वर्गों को 25 फ़ीसदी मिला। 1971 में डीएमके सरकार ने उसे 31 किया और अनुसूचित जाति-जनजाति को 16 से 18, कुल 49। 1980 में पिछड़ा वर्ग 31 से 50 हुआ, कुल 68। 1989 में 50 का बँटवारा 30 और 20 में हुआ, और 1990 में अनुसूचित जाति-जनजाति के बँटवारे से कुल 69 बना। 1970 के सत्तनाथन आयोग ने "क्रीमी लेयर" की बात उठाई थी और अति पिछड़ा वर्ग की अलग श्रेणी सुझाई थी; वह श्रेणी 19 साल बाद बनी।
वन्नियार का सबक़: आँकड़ा नहीं तो कोटा नहीं

तमिलनाडु के पास यह सवाल पूछने की एक ताज़ा वजह है, और वह अदालत से आई है।
2021 में राज्य ने अति पिछड़ा वर्ग के 20 फ़ीसदी में से 10.5 फ़ीसदी वन्नियार समुदाय के लिए अलग किया। मद्रास हाई कोर्ट ने नवंबर 2021 में उसे रद्द किया, और सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में हाई कोर्ट का फ़ैसला बरक़रार रखा। दोनों अदालतों का आधार एक था: राज्य के पास यह दिखाने के लिए जाति-वार आँकड़ा नहीं था कि वन्नियार बाक़ी अति पिछड़े वर्गों से ज़्यादा पिछड़े हैं। पुराना आँकड़ा 1980 के दशक का था, और वह भी सर्वे, जनगणना नहीं।
ब्यौरे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के पाठ में हैं। क़ानून को राज्यपाल की मंज़ूरी 26 फ़रवरी 2021 को मिली; उसने 20 फ़ीसदी को 10.5 (वन्नियार), 7 (विमुक्त समुदाय) और 2.5 (बाक़ी) में बाँटा। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने 1 नवंबर 2021 को उसे रद्द किया, और न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और बी.आर. गवई ने 31 मार्च 2022 को वह फ़ैसला बरक़रार रखा। फ़ैसले का पैरा 65 कहता है कि "115 समुदायों के सदस्यों के अधिकारों पर असर डालने वाला आरक्षण का फ़ैसला समकालीन जानकारी के आधार पर होना चाहिए, पुराने और बासी आँकड़ों पर नहीं।"
आँकड़ा कितना पुराना था, यह भी फ़ैसले में है। 2012 के जनार्दनम आयोग ने वन्नियारों की आबादी 65,04,855, यानी 13.012 फ़ीसदी, 1985 की अंबाशंकर रिपोर्ट से ली थी। राज्य ने 21 दिसंबर 2020 को कुलशेखरन आयोग बनाया था कि वह आज की तारीख़ के जाति-वार आँकड़े जुटाए, पर क़ानून बनने तक उसकी रिपोर्ट नहीं आई थी। सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर के सार में नतीजा एक वाक्य में है: जब तक राज्य समकालीन और भरोसेमंद आँकड़े नहीं जुटाता, वह वन्नियारों के लिए आंतरिक आरक्षण नहीं बना सकता।
यानी सूची से गिनती का सवाल तमिलनाडु के लिए सिद्धांत का नहीं, मुक़दमे का है। अगली बार जब कोई उप-कोटा अदालत में जाएगा, तो सबूत 2027 की गिनती होगी, और सबूत की क़ीमत इस पर टिकी है कि गिनती किस नाम से हुई।
50 फ़ीसदी की दीवार और नौवीं अनुसूची
1992 में, 16 नवंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में आरक्षण की सीमा 50 फ़ीसदी तय की थी। तमिलनाडु का 69 फ़ीसदी उससे 19 अंक ऊपर है, और वह इसीलिए टिका है कि 1994 में उसका अधिनियम संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया गया, जहाँ रखे क़ानूनों को मूल अधिकारों के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।
2007 में, 11 जनवरी को, सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने आई.आर. कोएल्हो मामले में कहा कि नौवीं अनुसूची के क़ानून भी संविधान के मूल ढाँचे की कसौटी पर परखे जा सकते हैं। तमिलनाडु का अधिनियम तब से उस कसौटी की प्रतीक्षा में है। अगर कभी वह परीक्षा हुई, तो राज्य को यह दिखाना होगा कि 69 फ़ीसदी किस आबादी पर आधारित है। खुले कॉलम की गिनती से वह हिसाब निकलेगा, पर मिलान के बाद; सूची की गिनती से सीधे।
सूचियों में कितने नाम हैं
यहाँ हमें आपको एक असुविधाजनक बात बतानी है: यह संख्या स्रोत-दर-स्रोत अलग है।
एक संकलन कहता है कि तमिलनाडु की पिछड़ा वर्ग सूची की 85 प्रविष्टियाँ केंद्रीय सूची से मेल खाती हैं, अति पिछड़ा सूची में 41 और विमुक्त में 27 हैं। एक दूसरा हिसाब पिछड़ा वर्ग में 139 और अति पिछड़ा व विमुक्त मिलाकर 106 जातियाँ गिनता है। तीसरी संख्या विकिपीडिया के ओबीसी पन्ने पर है: तमिलनाडु की केंद्रीय ओबीसी सूची में 182 जातियाँ। चौथी सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फ़ैसले में: अति पिछड़ा और विमुक्त सूचियों में वन्नियारों के अलावा 115 समुदाय, जबकि 1989 में यह गिनती 106 थी। राज्य सरकार की अपनी सूची वाला पन्ना हमारे लिए नहीं खुला।
फ़र्क़ इसलिए है कि सूचियों में मुख्य प्रविष्टि के नीचे उप-नाम और पर्यायवाची दर्ज हैं, और गिनने वाला उन्हें अलग गिनता है या साथ। यही समस्या, बड़े पैमाने पर, खुले कॉलम की है। सूची में ही सौ से ऊपर मुख्य नाम हैं; उनके पर्याय सैकड़ों में जाते हैं।
बाक़ी 39 सवाल
जाति अकेला नया सवाल नहीं है। 14 अगस्त की अधिसूचना में जो 40 प्रश्न हैं, उनमें पहली बार आधार संख्या, मोबाइल नंबर, मतदाता पहचान-पत्र, बैंक खाता और कोविड-19 टीकाकरण का ब्यौरा भी पूछा जाएगा। नाम, लिंग, उम्र, वैवाहिक स्थिति, धर्म, मातृभाषा, साक्षरता, शिक्षा, काम, प्रवास: ये पुराने सवाल हैं।
धर्म का कॉलम भी खुला ही रहता आया है; गणक जो बताया जाए वही लिखता है, और आँकड़ा बाद में वर्गीकृत होता है। जाति के लिए यही तरीक़ा प्रस्तावित है। फ़र्क़ यह है कि धर्म के लिए वर्गीकरण की श्रेणियाँ छह-सात हैं और जाति के लिए हज़ारों।
मातृभाषा का सवाल बताता है कि यह वर्गीकरण कितना बड़ा काम है। विकिपीडिया के अनुसार 2011 की जनगणना में लोगों ने मातृभाषा के 19,569 कच्चे नाम बताए; जनगणना दफ़्तर ने उन्हें 1,369 वर्गीकृत और 1,474 अवर्गीकृत मातृभाषाओं में समेटा, और उनसे 121 भाषाएँ निकलीं जिनके 10,000 से ज़्यादा बोलने वाले थे। बताए गए नामों और छपे आँकड़े के बीच का यह फ़ासला दफ़्तर के मिलान से आया। जाति के लिए भी वही मिलान होगा, बस यहाँ हर नाम के पीछे आरक्षण की एक सूची खड़ी है।
मिलान का काम असल में क्या है
मान लीजिए खुले कॉलम में एक ज़िले से एक ही समुदाय के लिए बारह वर्तनियाँ आती हैं। जनगणना कार्यालय उन्हें बाद में एक श्रेणी में डालेगा; इसके लिए उसे राज्य की सूची चाहिए, और यह तय करने का अधिकार कि कौन-सा नाम किस प्रविष्टि का पर्याय है। यह फ़ैसला तकनीकी दिखता है और राजनीतिक है: एक नाम को पिछड़ा वर्ग में डालना या अति पिछड़ा में, दो सूचियों के हिस्से बदल देता है।
सूची से गिनती में यह फ़ैसला पहले होता है, गणक के हाथ में, राज्य की अधिसूचित सूची के आधार पर। खुले कॉलम में यह बाद में होता है, केंद्र के दफ़्तर में। प्रस्ताव असल में यही पूछ रहा है: फ़ैसला पहले हो या बाद में, और किसके हाथ में।
बिहार ने सूची से गिना था
जिस तरीक़े की माँग तमिलनाडु कर रहा है, बिहार उसे कर चुका है। विकिपीडिया के अनुसार बिहार का जाति सर्वे 6 जून 2022 को अधिसूचित हुआ; पहला चरण 7 से 21 जनवरी 2023 तक चला और दूसरा 15 अप्रैल से 31 मई 2023 तक, 17 सवालों के साथ। जाति के लिए राज्य की सूची की 214 जातियों के कोड थे और एक "अन्य" का खाना। नतीजे 2 अक्टूबर 2023 को आए: 13,07,25,310 लोग; अति पिछड़ा वर्ग 36.01 फ़ीसदी, पिछड़ा वर्ग 27.13, अनुसूचित जाति 19.65, अनुसूचित जनजाति 1.68, सामान्य 15.52। ख़र्च क़रीब 500 करोड़ रुपये, आकस्मिकता निधि से।
सूची से गिनती ने आँकड़ा दिया; उस पर नवंबर 2023 में बना 65 फ़ीसदी आरक्षण पटना हाई कोर्ट ने जून 2024 में रद्द कर दिया।
खुले कॉलम पर सवाल उठाने वाला तमिलनाडु अकेला भी नहीं है। ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी ने 30 अगस्त को द प्रिंट से कहा कि "जाति जनगणना के लिए जिस तरह की 'खुली' प्रश्नावली बनी है, वह साबित करती है कि इस बार भी 2011 की जनगणना वाला हश्र होगा।" उनकी माँग भी वही है: सवाल के साथ राज्य और केंद्र की जाति-सूचियाँ हों, और बिहार का तरीक़ा अपनाया जाए।
1931 से 2027
पिछली बार हर जाति की गिनती 1931 की जनगणना में हुई थी। 1941 में गिनती हुई पर आँकड़े युद्ध की वजह से लगभग नहीं छपे, और उसी गिनती में जाति-समूहों को एक "हिंदू" श्रेणी में मिला दिया गया था। आज़ादी के बाद 1951 से हर जनगणना ने सिर्फ़ अनुसूचित जातियों और जनजातियों को गिना।
1980 की मंडल आयोग रिपोर्ट ने पिछड़े वर्गों की आबादी 52 फ़ीसदी बताई थी, और वह अनुमान 1931 के आँकड़ों से निकाला गया था; आयोग ने 3,743 जातियों और समुदायों को पिछड़ा माना। तमिलनाडु ने अपने लिए 1982 में अंबाशंकर आयोग बनाया, जिसने पिछड़े वर्गों की आबादी 67 फ़ीसदी पाई और यह भी दर्ज किया कि लगभग 11 जातियों के पास लोक सेवा आयोग की 50.7 फ़ीसदी नौकरियाँ, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की 62.7 फ़ीसदी सीटें और 53.4 फ़ीसदी छात्रवृत्तियाँ थीं।
अंबाशंकर आयोग की एक और बात दर्ज करने लायक़ है: उसने पिछड़ा वर्ग सूची में 17 समूह जोड़ने और 34 हटाने की सिफ़ारिश की थी; सरकार ने 29 नए समूह जोड़े और किसी को नहीं हटाया। सूची बढ़ती है, घटती नहीं, यह उसी समय से तय हो गया था।
अति पिछड़ा वर्ग की श्रेणी 1989 में बनी, जब 1987 के वन्नियार आंदोलन ने 20 फ़ीसदी अलग आरक्षण माँगा था और डीएमके सरकार ने वन्नियारों को 106 अन्य जाति-समूहों के साथ एक नई अति-पिछड़ा श्रेणी में रखकर 20 फ़ीसदी दिया। वही 106 का आँकड़ा आज "एमबीसी और डीएनसी में 106" की गिनती में लौटता है।
इन सब आँकड़ों में एक बात समान है: वे अनुमान हैं, गिनती नहीं। 2027 पहली गिनती होगी, और तमिलनाडु चाहता है कि गिनती उसकी सूची से हो।
डीएमके सदन से बाहर क्यों था
प्रस्ताव पर बहस के दौरान डीएमके के विधायकों को सदन से निकाला गया; प्रस्ताव वाली डेक्कन क्रॉनिकल की रिपोर्ट में कारण विस्तार से नहीं है, पर उसी दिन की दो और रिपोर्टों में है। डीटी नेक्स्ट के अनुसार डीएमके के सचेतक ई.वी. वेलु ने माँग की कि मुख्यमंत्री के सोमवार के भाषण के वे हिस्से कार्यवाही से हटाए जाएँ जिनमें प्रवर्तन निदेशालय के लंबित मामलों, मीसा के तहत गिरफ़्तारियों और दिवंगत मुरासोली मारन का ज़िक्र था; उनका तर्क नियम 92 का था, जो अदालत में लंबित मामलों की चर्चा रोकता है। अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर ने माँग ठुकरा दी, यह कहकर कि मुख्यमंत्री ने प्रवर्तन निदेशालय के सार्वजनिक दस्तावेज़ों का हवाला दिया था। इसके बाद डीएमके विधायक सदन के बीच में आ गए; डेक्कन क्रॉनिकल के शब्दों में उन्होंने अध्यक्ष के आसन को "घेर लिया"। अध्यक्ष ने मार्शल बुलाए, और कुछ विधायकों को उठाकर बाहर ले जाया गया। उस समय मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन, दोनों सदन में नहीं थे।
सत्र इस समय तनाव में है: 7 सितंबर को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ़ विजय ने गृह विभाग की अनुदान-माँगों की बहस में 1976 के सरकारिया जाँच आयोग के हवाले से डीएमके पर भ्रष्टाचार के पुराने आरोप दोहराए थे, जिस पर द हिंदू ने अगले दिन व्याख्या छापी। बाहर आकर स्टालिन ने कहा: "विधानसभा की गरिमा ऐसी है कि पूछना पड़ रहा है कि क्या वह गरिमा से चल रही है।"
नतीजा यह कि जिस प्रस्ताव पर सत्ता और मुख्य विपक्ष की माँग लगभग एक थी, वह विपक्ष की ग़ैर-मौजूदगी में पास हुआ।
केंद्र क्या कर सकता है
जनगणना संघ सूची का विषय है; प्रश्नावली महापंजीयक तय करता है। राज्य का प्रस्ताव एक अनुरोध है, आदेश नहीं।
तकनीकी रूप से दोनों माँगें एक साथ पूरी हो सकती हैं: पोर्टल में राज्य की सूचियाँ ड्रॉप-डाउन के रूप में हों और साथ में "अन्य" का खुला कॉलम भी रहे, ताकि जो सूची में नहीं है वह छूटे नहीं। यह हमारा सुझाव नहीं, दोनों तरीक़ों का मेल है जो कई देशों की जनगणनाएँ करती हैं। अधिसूचित प्रश्नावली में अभी सिर्फ़ खुला कॉलम है, और फ़रवरी में पाँच महीने बचे हैं।
फ़रवरी में गणक से क्या कहें
अगर आप तमिलनाडु में हैं और किसी पिछड़ा, अति-पिछड़ा या विमुक्त सूची में हैं, तो फ़रवरी में गणक से कहते वक़्त वही नाम बताइए जो आपके जाति प्रमाणपत्र पर है। खुले कॉलम में वही नाम दर्ज होगा, और बाद में वही नाम सूची से मिलाया जाएगा।
अगर आप कहीं और हैं, तो भी यही लागू है। खुला कॉलम पूरे देश के लिए है, और सूची से मिलान का काम हर राज्य के लिए बाद में होगा।
केंद्र की मेज़ पर क्या पड़ा है
केंद्र ने प्रस्ताव पर कोई जवाब नहीं दिया है। प्रश्नावली अधिसूचित हो चुकी है; उसे बदलने के लिए नई अधिसूचना चाहिए। तमिलनाडु अकेला नहीं है जिसने खुले कॉलम पर सवाल उठाया है, पर 8 सितंबर तक वह अकेला राज्य है जिसकी विधानसभा ने इस पर प्रस्ताव पास किया; किसी और विधानसभा के ऐसे प्रस्ताव की रिपोर्ट हमें नहीं मिली।
गणक फ़रवरी में आएगा। तब तक यह तय होना है कि उसके हाथ में सूची होगी या ख़ाली जगह।
स्रोतडेक्कन क्रॉनिकल, विधानसभा का प्रस्ताव, 8 सितंबर 2026, हंस इंडिया, स्टालिन का बयान, 7 सितंबर 2026, डीटी नेक्स्ट, स्टालिन का बयान, 6 सितंबर 2026, जनगणना 2027 के 40 प्रश्नों की अधिसूचना, 14 अगस्त 2026, द प्रिंट पर पीटीआई, 40 प्रश्नों की अधिसूचना और गणकों को निर्देश, 14 अगस्त 2026, पीआईबी, मंत्रिमंडलीय समिति का जाति-गणना का फ़ैसला, 30 अप्रैल 2025, पीआईबी, गृह मंत्री अमित शाह का बयान, 30 अप्रैल 2025, पीआईबी, जनगणना 2027 की तैयारी पर राज्यसभा में लिखित उत्तर, 12 अगस्त 2026, विकिपीडिया, 2027 की जनगणना: चरण, तारीख़ें, स्व-गणना की भाषाएँ, तमिलनाडु में आरक्षण का ढाँचा, 1994 का अधिनियम, सुप्रीम कोर्ट, पट्टाली मक्कल कच्ची बनाम ए. मयिलेरुमपेरुमल, फ़ैसला 31 मार्च 2022, सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर, वन्नियार फ़ैसले का सार, 2022, सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर, वन्नियार मामले की पृष्ठभूमि, सुप्रीम कोर्ट, आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य, 11 जनवरी 2007, विकिपीडिया, मंडल आयोग और इंदिरा साहनी फ़ैसला, विकिपीडिया, अन्य पिछड़ा वर्ग: केंद्रीय सूची की गिनती, विकिपीडिया, सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना 2011, विकिपीडिया, 2011 की जनगणना: मातृभाषा और धर्म का वर्गीकरण, विकिपीडिया, 1941 की जनगणना, विकिपीडिया, बिहार का जाति सर्वे 2022-23, द प्रिंट, पसमांदा मुस्लिम महाज़ के अध्यक्ष का खुली प्रश्नावली पर बयान, 30 अगस्त 2026, द प्रिंट, पूर्व उप-महापंजीयक के. नारायणन उन्नी का साक्षात्कार, 20 अगस्त 2026, डीटी नेक्स्ट, डीएमके विधायकों का निष्कासन, 8 सितंबर 2026, डेक्कन क्रॉनिकल, सदन में हंगामा और निष्कासन, 8 सितंबर 2026, डेक्कन क्रॉनिकल, निष्कासन पर स्टालिन का बयान, 8 सितंबर 2026