भारत पन्ना
सियासतनामा

सरकारिया आयोग ने 1988 में अनुच्छेद 356 पर जो लगाम माँगी थी, वह सरकार ने नहीं, 1994 में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों ने लगाई; और उसकी अंतर-राज्य परिषद 36 साल में बारह बार से ज़्यादा नहीं बैठी

'सरकारिया आयोग' नाम के दो आयोग हुए। 7 सितंबर को तमिलनाडु विधानसभा में जिसका हवाला दिया गया, वह 1976 की जाँच है; केंद्र-राज्य संबंधों वाला आयोग 1983 में बना और उसकी 247 सिफ़ारिशों में से सरकार 180 को 'स्वीकृत' गिनती है। हमने आयोग के अपने अध्याय, 1990 का राष्ट्रपति-आदेश, परिषद की अपनी बैठक-सूची और लोकसभा का उत्तर पढ़कर मिलाया कि क्या सिफ़ारिश हुआ था और क्या हुआ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 16 जुलाई 2016 को राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में अंतर-राज्य परिषद की ग्यारहवीं बैठक में। परिषद सचिवालय की वेबसाइट की सूची में यह आख़िरी बैठक है
तस्वीर: प्रधानमंत्री कार्यालय GODL-India

आज़ादी से अक्टूबर 1984 तक नियुक्त राज्यपालों में 60 फ़ीसदी से ज़्यादा सक्रिय राजनीति से आए थे, और "किसी क्षेत्र में प्रतिष्ठित" व्यक्ति आधे से कम।

गिनती किसी विपक्षी दल की नहीं, केंद्र-राज्य संबंध आयोग की अपनी है। चौथे अध्याय (पैरा 4.6.06) में यह नतीजा इस टिप्पणी के साथ दर्ज है कि 1980 के बाद के आँकड़े नेहरू-काल (अगस्त 1947 से मई 1964) से "तीखी गिरावट" दिखाते हैं। उसी अध्याय में जवाबों का सार: सत्ताधारी दल के "छँटे हुए और असंतुष्ट राजनेता, जिन्हें कहीं और नहीं खपाया जा सकता", राज्यपाल बना दिए जाते हैं और पद पर "निष्पक्ष संवैधानिक पदाधिकारी के बजाय केंद्र सरकार के एजेंट" की तरह चलते हैं।

7 सितंबर को तमिलनाडु विधानसभा में मुख्यमंत्री विजय ने जिस "सरकारिया रिपोर्ट" का हवाला दिया, वह यह दस्तावेज़ नहीं था।

एक नाम, दो आयोग

जस्टिस रणजीत सिंह सरकारिया के नाम से दो आयोग चले। पहला 1976 का जाँच आयोग: आपातकाल में बर्ख़ास्त डीएमके सरकार पर लगे आरोपों की एक-सदस्यीय जाँच। द न्यूज़ मिनट, द साउथ फ़र्स्ट और द वीक की 7 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार मुख्यमंत्री ने सदन में, 40 मिनट के भाषण में, उसी का ज़िक्र किया। दूसरा 1983 का केंद्र-राज्य संबंध आयोग: तीन सदस्य, 1,600 पृष्ठों के आसपास की रिपोर्ट, 247 सिफ़ारिशें, जिनका हिसाब सरकार ने 2013 में संसद को दिया। साझा सिर्फ़ अध्यक्ष है। यह लेख ज़्यादातर दूसरे पर है, क्योंकि उसकी सिफ़ारिशों की क़िस्मत सरकारी काग़ज़ों में दर्ज है।

24 मार्च की घोषणा, 9 जून की अधिसूचना, 1988 की रिपोर्ट

सचिवालय की साइट पर 'Introduction' नाम की भूमिका-फ़ाइल के अनुसार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 24 मार्च 1983 को संसद में घोषणा की: आयोग "केंद्र और राज्यों के बीच मौजूदा व्यवस्थाओं की समीक्षा करेगा" और "मौजूदा संवैधानिक ढाँचे के भीतर" बदलाव सुझाएगा। गृह मंत्रालय की अधिसूचना IV/11017/1/83-CSR, 9 जून 1983, से वह बना। अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज आर.एस. सरकारिया; सदस्य बी. शिवरामन (7 जुलाई) और डॉ. एस.आर. सेन (27 जुलाई 1983)। भूमिका के अंत में इन्हीं तीन के हस्ताक्षर हैं, तारीख़ नहीं।

जनवरी 1984 में 109 सवालों की प्रश्नावली गई; जवाब 405 आए और आयोग ने 850 से ज़्यादा लोगों से बात की। राज्यों के जवाब, आयोग के शब्दों में, "बहुत धीरे-धीरे टपके": पंजाब का 24 अप्रैल 1987 को आया और 11 मई 1987 से वहाँ राष्ट्रपति शासन लग गया, इसलिए बात पूर्व मुख्यमंत्री एस.एस. बरनाला से हुई।

सौंपने की तारीख़ पर स्रोत बँटे हैं। लीगेसी आईएएस: 27 अक्टूबर 1987 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी को, प्रकाशन 1988 में। गृह मंत्रालय का 2013 का लोकसभा उत्तर: "1988 में सौंपी गई रिपोर्ट"। सचिवालय की वेबसाइट: "जनवरी 1988 की रिपोर्ट"। संख्या पर सब सहमत हैं: 247। अध्याय 19 बताए जाते हैं, पर साइट पर रिपोर्ट 22 फ़ाइलों में है।

राजभवन पर शिकायत, आयोग की क़लम से

कोलकाता का राजभवन, 2007 की तस्वीर। आयोग ने लिखा कि कार्यकाल पूरा होने से पहले राज्यपालों के "बार-बार हटाए और बदले जाने" से इस पद की प्रतिष्ठा घटी है
तस्वीर: Jayantanth, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

पैरा 4.1.02: राज्यपालों पर आरोप है कि उन्होंने "अपेक्षित निष्पक्षता और विवेक" नहीं दिखाई; राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश करने और राज्य के विधेयक राष्ट्रपति के लिए रोक लेने में उनकी भूमिका "तीखे आक्रोश" का कारण बनी। फिर यह वाक्य: "कई राज्यपाल, केंद्र में आगे कोई पद या राजनीति में सक्रिय भूमिका की आस में, ख़ुद को केंद्र का एजेंट मानने लगे।" पैरा 4.4.02 में शिकायत का सार: राज्यपाल अपने "राजनीतिक झुकाव और पूर्वाग्रह" नहीं छोड़ पाते, ख़ासकर अगर वे पहले सक्रिय राजनीति में थे या बाद में उसमें लौटना चाहते हैं। 4.6.01 में यह भी कि सही लोग चुने जाएँ तो शिकायत की गुंजाइश कम रह जाएगी।

चार कसौटियाँ, और वे नेहरू की थीं

चार मानदंड आयोग ने ख़ुद नहीं गढ़े। पैरा 4.6.03 में वह संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू का भाषण उद्धृत करता है, और 4.6.08 में लिखता है: "हम नेहरू की तय की हुई कसौटियों को दोहराने से बेहतर कुछ नहीं कर सकते।"

सिफ़ारिश 4.6.09 इसी से बनी। राज्यपाल (i) "किसी क्षेत्र में प्रतिष्ठित" हो (eminent in some walk of life), (ii) "राज्य के बाहर का" हो (from outside the State), (iii) "निर्लिप्त व्यक्ति हो और राज्य की स्थानीय राजनीति से बहुत घनिष्ठ रूप से जुड़ा न हो", (iv) ऐसा हो "जिसने राजनीति में, आम तौर पर और ख़ासकर हाल के वर्षों में, बहुत बड़ा हिस्सा न लिया हो"; अल्पसंख्यक समूहों को "पहले की तरह" मौक़ा मिलता रहे। 4.6.05 के अनुसार प्रशासनिक सुधार आयोग की इसी आशय की सिफ़ारिश सरकार पहले ही "स्वीकार" कर चुकी थी।

मुख्यमंत्री को बताया जाता था, पूछा नहीं जाता था

पैरा 4.6.21: केंद्र का पक्ष था कि राज्यपाल "संबंधित मुख्यमंत्री से परामर्श के बाद" नियुक्त होते हैं। 4.6.22 इसे काटता है: "जहाँ तक हम पता लगा पाए, हाल के वर्षों में मुख्यमंत्री से परामर्श हमेशा नहीं होता रहा है। कुछ मुख्यमंत्रियों ने हमें बताया कि केंद्र सरकार ने उनके राज्य में राज्यपाल नियुक्त करने से पहले उनकी राय नहीं ली।" चलन यह था कि केंद्र मुख्यमंत्री को "सिर्फ़ सूचित" कर देता है, "कभी-कभी यह पूर्व सूचना भी नहीं"। 4.6.23: सूचना देना 'परामर्श' नहीं, वह उसे "एक खोखली औपचारिकता" बनाता है।

इसीलिए सिफ़ारिश 4.16.03 परंपरा पर नहीं टिकी: परामर्श अनुच्छेद 155 में संशोधन करके "संविधान में ही" लिखा जाए। 4.16.02: सत्ताधारी दल का राजनेता वहाँ राज्यपाल न बने जहाँ किसी और दल की सरकार हो। 4.16.05 और 4.16.06: पाँच साल का कार्यकाल सख़्त मजबूरी में ही तोड़ा जाए, और हटाए जाने वाले को सफ़ाई का मौक़ा मिले। 4.16.08: पद छोड़ने के बाद वह लाभ के किसी पद पर न जाए और "सक्रिय दलगत राजनीति में न लौटे"।

बहुमत सदन के पटल पर, राजभवन में नहीं

सिफ़ारिश 4.16.11 आगे एक फ़ैसले का आधार बनी: "राज्यपाल को बहुमत के समर्थन का सवाल अपने आप, विधानसभा के बाहर, तय करने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए। उसके लिए विवेकपूर्ण रास्ता यह है कि प्रतिद्वंद्वी दावों की परख सदन के पटल पर कराए।" 4.16.10 में मुख्यमंत्री चुनने का क्रम है: पूर्ण बहुमत वाले दल का नेता "स्वतः", उसके बाद चुनाव-पूर्व गठबंधन, फिर बाक़ी दावेदार। ऐसा मुख्यमंत्री 30 दिन में विश्वास मत ले, और यह "क़ानून के नियम की पवित्रता के साथ" निभाया जाए। 4.16.12: जब तक मंत्रिपरिषद के पास सदन में बहुमत है, राज्यपाल उसे बर्ख़ास्त नहीं कर सकता।

356: 37 साल में 75 बार, और आंबेडकर का 'मृत अक्षर'

पैरा 6.1.03 में आयोग की गिनती: संविधान लागू होने से तब तक अनुच्छेद 356 "पचहत्तर बार" लगा; 1967 के अंत तक 12 बार, अगले 18 सालों में 62। पहला ही इस्तेमाल, पंजाब 1951, "सत्ताधारी दल के भीतरी संकट" सुलझाने के लिए हुआ; उसमें "भविष्य के दुरुपयोग के बीज" थे। पैरा 6.6.04 और 6.6.03: 1977 और 1980 में नौ-नौ राज्यों में एक साथ राष्ट्रपति शासन लगा; 18 अप्रैल 1977 को केंद्रीय गृह मंत्री ने उन मुख्यमंत्रियों को विधानसभा भंग करने की "आग्रहपूर्वक अनुशंसा" लिखी थी।

पैरा 6.2.13 में आयोग संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर का वह वक्तव्य उद्धृत करता है: "मैं इस संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं करता कि इन अनुच्छेदों का दुरुपयोग हो सकता है या इन्हें राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है... मैं इस भावना में शामिल हूँ कि ऐसे अनुच्छेद कभी लागू ही नहीं होंगे और मृत अक्षर (dead letter) बने रहेंगे।" लागू करना ही पड़े तो, आंबेडकर के अनुसार, राष्ट्रपति पहले "ग़लती करने वाले प्रांत को सिर्फ़ चेतावनी" दे।

आयोग की टिप्पणी (6.2.14) सूखी है: संविधान-निर्माताओं की "इतनी ज़ोरदार आशाओं के बावजूद, पिछले 37 सालों में अनुच्छेद 356 कम से कम 75 बार लागू हुआ।"

356 पर बारह सिफ़ारिशें

छठे अध्याय के अंत में 6.8.01 से 6.8.12 तक बारह सिफ़ारिशें हैं। पहली: 356 "बहुत कम, चरम मामलों में, अंतिम उपाय के तौर पर" लगे, जब "सभी उपलब्ध विकल्प" नाकाम हो जाएँ। दूसरी: राज्य को "स्पष्ट शब्दों में चेतावनी" मिले और उसका जवाब सुना जाए। 6.8.04: राज्यपाल पहले बहुमत वाली सरकार की "सभी संभावनाएँ" टटोले। 6.8.06: विधानसभा को न राज्यपाल भंग करे न राष्ट्रपति, जब तक उद्घोषणा संसद के सामने न रखी जाए; इसके लिए "अनुच्छेद 356 में उपयुक्त संशोधन" हो। 6.8.08: जिन तथ्यों और आधारों पर 356 लगा, वे अनुच्छेद 74(2) के बावजूद उद्घोषणा का "अभिन्न हिस्सा" हों, ताकि न्यायिक समीक्षा "थोड़ा और सार्थक" हो। 6.8.09 और 6.8.10: राज्यपाल की रिपोर्ट "बोलता हुआ दस्तावेज़" हो और पूरी छपे। संविधान संशोधन दो जगह माँगा गया: 356 में, और 74(2) के असर में। इनका कोई रिकॉर्ड हमें उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिला; जो नियम आए, वे 1994 में अदालत से आए।

अखिल भारतीय सेवाएँ और पैसा

बाक़ी 19 अध्याय विधायी संबंध, केंद्रीय बलों की तैनाती, वित्तीय संबंध, कृषि, वन, नदी-जल विवाद और संचार-माध्यम तक फैले हैं। वाजीराम एंड रवि के सार के अनुसार आयोग ने अखिल भारतीय सेवाओं को "अनिवार्य" और उन्हें भंग करने के सुझाव को "प्रतिगामी" कहा। इन अध्यायों की सिफ़ारिशों का अलग हिसाब सरकार के उत्तर में नहीं है, इसलिए यह लेख उन तीन अध्यायों पर टिका है जिनका अमल दस्तावेज़ों से जाँचा जा सकता है।

अनुच्छेद 263, जो चालीस साल ख़ाली रहा

नौवें अध्याय (9.3.01) में "आम शिकायत" दर्ज है कि राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 263 की उस शक्ति का "पर्याप्त इस्तेमाल नहीं किया" जिससे स्थायी मंच बनता। 263 के तहत सीमित निकाय ज़रूर बने, पर "ऐसे क्षेत्रीय निकाय समग्र समन्वय का काम शायद ही कर सकते हैं" (9.3.02); राष्ट्रीय विकास परिषद भी 263 के बजाय कार्यकारी आदेश से बनी (9.2.04)। आयोग का वाक्य: "स्थायी निकाय एक अनिवार्य ज़रूरत है और उसका गठन देर से हो रहा है" (9.3.06)।

सिफ़ारिश 9.10.01: 'अंतर-सरकारी परिषद' (Inter-Governmental Council), जिसकी आम सभा में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), सभी मुख्यमंत्री और सभी केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हों; वह "साल में कम से कम दो बार" और स्थायी समिति "कम से कम चार बार" बैठे (9.10.04)। पैरा 9.7.02 आगे काम आएगा: "स्वतंत्र स्थायी सचिवालय के बिना परिषद अपनी विश्वसनीयता स्थापित नहीं कर पाएगी।" वह "केंद्रीय कैबिनेट सचिवालय की तर्ज़ पर" हो, यह 9.10.09 में अलग दर्ज है।

28 मई 1990 का आदेश

भारत के राजपत्र (असाधारण, संख्या 209) में गृह मंत्रालय के आदेश G.S.R. 512(E), 28 मई 1990, के साथ राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण का 'अंतर-राज्य परिषद आदेश, 1990' छपा; उस पर "कैंप शिमला, 25 मई 1990" और गृह सचिव नरेश चंद्र का नाम है। परिषद में प्रधानमंत्री, सभी मुख्यमंत्री, केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री या प्रशासक, और छह कैबिनेट-स्तर के नामित मंत्री हैं। आयोग ने सभी कैबिनेट मंत्री और 'अंतर-सरकारी परिषद' नाम सुझाया था; आदेश ने छह मंत्री और संविधान वाला नाम रखा।

धारा 5(ख): परिषद "हर साल कम से कम तीन बार" बैठेगी, बंद कमरे में, गणपूर्ति दस सदस्यों की। धारा 4 उसे "अनुशंसात्मक निकाय" कहती है। धारा 6 सचिवालय पर सिर्फ़ इतना कि उसमें "ऐसे अधिकारी और कर्मचारी होंगे जिन्हें अध्यक्ष उचित समझे"; 'स्वतंत्र' शब्द उसमें नहीं है।

बैठकों का रजिस्टर

सचिवालय की सूची: पहली बैठक 10 अक्टूबर 1990, एजेंडे में सरकारिया रिपोर्ट; दूसरी 15 अक्टूबर 1996; तीसरी 17 जुलाई 1997; चौथी 28 नवंबर 1997 और सातवीं 16 नवंबर 2001, राज्यपाल की भूमिका पर; पाँचवीं 22 जनवरी 1999, आपात प्रावधान; छठी 20 मई 2000; आठवीं 27–28 अगस्त 2003; नौवीं 28 जून 2005; दसवीं 9 दिसंबर 2006; ग्यारहवीं 16 जुलाई 2016, पुंछी आयोग की सिफ़ारिशों पर।

विकिपीडिया की तालिका दो तारीख़ों पर अलग है (आठवीं बैठक मार्च बनाम अगस्त 2003; दसवीं 12 बनाम 9 दिसंबर 2006) और 25 नवंबर 2017 की बारहवीं बैठक भी गिनती है, जिसे पीआईबी की 25 मई 2018 की विज्ञप्ति स्थायी समिति की बारहवीं बैठक कहती है। 2017 के बाद पूर्ण परिषद की किसी बैठक का रिकॉर्ड नहीं मिला। द प्रिंट, 11 नवंबर 2024: परिषद का पुनर्गठन हुआ, प्रधानमंत्री अध्यक्ष, सभी मुख्यमंत्री और नौ केंद्रीय मंत्री सदस्य, 13 स्थायी आमंत्रित।

सूची यहीं ख़त्म होती है।

आदेश की अपनी शर्त पर 1990 से 2026 के 36 सालों में कम से कम 108 बैठकें होनी थीं; हुईं 11 या 12।

जो सचिवालय स्वतंत्र नहीं हुआ

फ़ोरम ऑफ़ फ़ेडरेशंस के दस्तावेज़ों में 22 अप्रैल 2002 की एक गोलमेज़ का लेख है, हमदर्द विश्वविद्यालय के संघीय अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफ़ेसर अख़्तर मजीद का। निष्कर्ष एक वाक्य में: "अंतर-सरकारी सहयोग का ठोस संस्थागत ढाँचा इसलिए नहीं उभर सका क्योंकि अंतर-राज्य परिषद के पास कभी कोई स्थायी और स्वतंत्र सचिवालय था ही नहीं।" परिषद "गृह मंत्रालय का सिर्फ़ एक उपांग, एक अनुलग्नक" बनी रही। विकिपीडिया के अनुसार सचिवालय 1991 में बना और स्थायी समिति 1996 में। पीआईबी की 15 जुलाई 2016 की विज्ञप्ति ख़ुद उसे "गृह मंत्रालय के अधीन अंतर-राज्य परिषद सचिवालय" लिखती है।

180, 65 और 2: सरकार का हिसाब

7 मई 2013 को लोकसभा में अतारांकित प्रश्न 6612 के उत्तर में गृह राज्य मंत्री आर.पी.एन. सिंह ने लिखा: "247 सिफ़ारिशों में से 180 अंतर-राज्य परिषद ने स्वीकार कीं और 65 परिषद/मंत्रालयों आदि ने स्वीकार नहीं कीं। दो सिफ़ारिशें अब भी हितधारकों से परामर्श में क्रियान्वयन के अधीन हैं।" कहीं यह नहीं कि 180 कौन-सी हैं और 65 कौन-सी; 'स्वीकृत' और 'लागू' का फ़र्क़ भी नहीं। अतारांकित प्रश्न 3821, जिस पर यही आँकड़ा दर्ज बताया जाता है, इस मशीन से खुला नहीं। लीगेसी आईएएस के अनुसार जनवरी 1999 में परिषद ने 124 सिफ़ारिशें स्वीकारीं, राज्यपाल वाली उनमें थीं।

सिफ़ारिश बनाम अमल

नीचे की तालिका आठ प्रमुख सिफ़ारिशों को उनके पैरा-नंबर के साथ रखती है, और हर एक के सामने वह जो उपलब्ध दस्तावेज़ों में मिला। तीसरा ख़ाना सबसे ज़्यादा बताता है: चार पंक्तियों में वहाँ सरकार का नाम नहीं, अदालत का है। 'रिकॉर्ड नहीं' का मतलब इतना ही है कि हमें प्रमाण नहीं मिला; सरकार की अपनी सूची, कि 180 में कौन-सी हैं, हमारे सामने नहीं थी।

आयोग ने कहा (पैरा)क्या हुआकिसने किया
राज्यपाल की चार कसौटियाँ (4.6.09)1999 में परिषद ने स्वीकारीं (लीगेसी आईएएस); बाध्यकारी क़ानून नहींपरिषद (स्वीकृति)
परामर्श 155 में लिखा जाए (4.6.25)संशोधन का रिकॉर्ड नहींकोई नहीं
बहुमत सदन के पटल पर (4.16.11)11 मार्च 1994 का बोम्मई फ़ैसलासुप्रीम कोर्ट
संसद की मंज़ूरी से पहले भंग नहीं (6.8.06)संशोधन नहीं; बोम्मई ने यही ठहरायासुप्रीम कोर्ट
356 के आधार उद्घोषणा का हिस्सा हों (6.8.08)बोम्मई: उद्घोषणा समीक्षा योग्यसुप्रीम कोर्ट
263 के तहत स्थायी परिषद (9.10.01)28 मई 1990 का राष्ट्रपति-आदेशसरकार
आम सभा साल में दो बार (9.10.04)आदेश ने तीन लिखीं; 36 साल में 11 या 12 बैठकेंसरकार (काग़ज़ पर)
स्वतंत्र स्थायी सचिवालय (9.7.02)1991 से गृह मंत्रालय के अधीनसरकार (आंशिक)

बोम्मई: जो सरकार ने नहीं किया, वह नौ जजों ने

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट का परिसर। 11 मार्च 1994 को नौ जजों की पीठ ने अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा के दायरे में माना
तस्वीर: सुभाशीष पाणिग्रही, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

विकिपीडिया के अनुसार एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ का फ़ैसला 11 मार्च 1994 को नौ जजों से आया: एस. रत्नवेल पांडियन, ए.एम. अहमदी, कुलदीप सिंह, जे.एस. वर्मा, पी.बी. सावंत, के. रामास्वामी, एस.सी. अग्रवाल, योगेश्वर दयाल और बी.पी. जीवन रेड्डी। मामलों में कर्नाटक (अप्रैल 1989, जनता दल की बोम्मई सरकार), मेघालय (11 अक्टूबर 1991), नागालैंड (7 अगस्त 1988) और बाबरी विध्वंस के बाद 15 दिसंबर 1992 को बर्ख़ास्त तीन भाजपा सरकारें थीं। कर्नाटक में राज्यपाल ने बोम्मई को सदन में बहुमत साबित करने का मौक़ा नहीं दिया था।

आयोग की सिफ़ारिशों पर बैठने वाले नियम, उसी सार में: 356(1) की उद्घोषणा की वैधता "न्यायिक समीक्षा योग्य है"; बहुमत सदन के पटल पर परखा जाए, राज्यपाल की राय से नहीं; और "जब तक संसद उद्घोषणा को मंज़ूरी न दे, राष्ट्रपति कोई अपरिवर्तनीय क़दम न उठाए।" विकिपीडिया के अनुसार फ़ैसले ने सरकारिया रिपोर्ट का स्पष्ट हवाला दिया; दृष्टि आईएएस के सार में वह इस सिफ़ारिश से भी मेल खाता है कि 356 से पहले "बाक़ी सभी विकल्प" देखे जाएँ। आयोग के दो संशोधन-प्रस्ताव, जो संसद से नहीं गुज़रे, यहाँ अदालत के नियम बनकर लौटे।

गिनती, जो किन्हीं दो जगह एक जैसी नहीं

356 कितनी बार लगा, इसका कोई एक सरकारी आँकड़ा नहीं मिला। आयोग ने 1987 तक 75 गिने थे। द क्विंट का अप्रैल 2016 का विश्लेषण "1950 से राष्ट्रपति शासन के 113 मामले" गिनता है; विकिपीडिया का 'President's rule' पन्ना 134 बार कहता है, मणिपुर में 13 फ़रवरी 2025 से 3 फ़रवरी 2026 तक का शासन समेत। कोचिंग-साइटों के संकलन कुल को 115 से 134 के बीच रखते हैं; फ़र्क़ गिनने के तरीक़े का है। विकिपीडिया का बोम्मई लेख फ़ैसले से पहले "90 से ज़्यादा बार" कहता है।

पुंछी: वही सवाल, दूसरा आयोग

केंद्र-राज्य संबंधों पर दूसरा आयोग जस्टिस मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में बना। गठन की तारीख़ पर स्रोत बँटे हैं: वाजीराम जैसे सार 27 अप्रैल 2007 कहते हैं, पीआईबी की 25 मई 2018 की विज्ञप्ति "2005 में अधिसूचित"। रिपोर्ट 30 मार्च 2010 को सात खंडों में आई, 273 सिफ़ारिशों के साथ। स्थायी समिति ने उन्हें तीन बैठकों में देखा: 9 अप्रैल 2017 की 11वीं में 67, 25 नवंबर 2017 की 12वीं में 118, 25 मई 2018 की 13वीं में 88। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने "सभी 273 सिफ़ारिशों पर विचार पूरा" होने पर संतोष जताया। पूर्ण परिषद ने क्या तय किया, इसका रिकॉर्ड नहीं मिला; पुंछी रिपोर्ट का पाठ भी हम खोल नहीं सके।

1976 का सरकारिया आयोग: 3 फ़रवरी की अधिसूचना

मद्रास हाई कोर्ट, चेन्नई। 29 अप्रैल 1976 को मुख्य न्यायाधीश पी.एस. कैलासम ने जाँच आयोग की अधिसूचना के ख़िलाफ़ एम. करुणानिधि की याचिका यहीं ख़ारिज की
तस्वीर: योग बालाजी, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

मद्रास हाई कोर्ट के 29 अप्रैल 1976 के फ़ैसले (एम. करुणानिधि बनाम भारत संघ, इंडियन कानून पर उपलब्ध) के अनुसार राज्यपाल की 29 जनवरी 1976 की रिपोर्ट पर 31 जनवरी 1976 को तमिलनाडु में अनुच्छेद 356 लगा; उसी रिपोर्ट में जाँच आयोग की सिफ़ारिश भी थी। कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग की अधिसूचना SO-74(E), 3 फ़रवरी 1976, ने जाँच आयोग अधिनियम 1952 की धारा 3 के तहत सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज आर.एस. सरकारिया का एक-सदस्यीय आयोग बनाया, 1967 से 31 जनवरी 1976 तक की डीएमके सरकार पर लगे आरोपों के लिए; रिपोर्ट "1 फ़रवरी 1977 को या उससे पहले" देनी थी।

करुणानिधि की दलील थी कि संघीय ढाँचे में केंद्र राज्य के मंत्रियों की जाँच नहीं बैठा सकता। मुख्य न्यायाधीश पी.एस. कैलासम ने याचिका में "कोई सार नहीं" पाया: राज्यों के पास ऐसी कोई "अंतर्निहित या स्वायत्त शक्ति" नहीं "जिस पर केंद्र अतिक्रमण न कर सके"।

27 आरोप या 28

आरोप कितने थे, इस पर दस्तावेज़ और अख़बार अलग हैं; फ़र्क़ की वजह आयोग ने ख़ुद लिखी है। हाई कोर्ट का फ़ैसला अनुलग्नक में 27 आरोपों और 1 दिसंबर 1975 तथा 1972 के तीन ज्ञापनों की बात कहता है। प्रारंभिक रिपोर्ट (archive.org पर 275 पृष्ठों का पहला खंड) के अनुसार उसमें एम.जी. रामचंद्रन और एम. कल्याणसुंदरम के ज्ञापन से "27 आरोपों" के अंश थे, और "बाद में के. मनोहरन और जी. विश्वनाथन के ज्ञापन, जिसमें सिर्फ़ एक आरोप था, को भी साइक्लोस्टाइल करके इस अनुलग्नक में जोड़ दिया गया"। आयोग की अपनी सूची में इसलिए 28 आरोप हैं, जिनमें दसवाँ 'वीरनम' है। द न्यूज़ मिनट "28 आरोप" लिखता है; दोनों संख्याएँ सही हैं, बस अलग दस्तावेज़ों की।

जो निष्कर्ष छपे, और वीरनम

प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार आरोप 10 (वीरनम) पर हलफ़नामे टालने की छूट मिली और कार्यवाही "पहले चरण में नौ आरोपों तक सीमित" रही। 'निष्कर्षों के सार' के जो हिस्से हमने पढ़े: आरोप 3 (ट्रैक्टर) और 22(ग) "सिद्ध नहीं"; 11(क) में नाथन पब्लिकेशंस का पाठ्यपुस्तक ठेका "नियमों के विरुद्ध" ठहरा; 11(ख) हवाई छिड़काव के ठेकों में आरोप "ठोस, विश्वसनीय और भरोसेमंद साक्ष्य से स्थापित" हुए, 17 नवंबर 1970 को निजी सचिव के ज़रिये 25,000 रुपये लेने के निष्कर्ष समेत। द न्यूज़ मिनट के अनुसार आयोग ने 28 में से सात आरोपों पर निष्कर्ष दिए, छह "सही या आंशिक रूप से सही" और एक "ग़लत"। ये जाँच आयोग के निष्कर्ष हैं, अदालत के नहीं।

वीरनम पर स्थिति उलझी है। द न्यूज़ मिनट के अनुसार उस परियोजना पर "कोई निष्कर्ष प्रकाशित नहीं हुआ"। archive.org पर उपलब्ध 'अंतिम रिपोर्ट' का दूसरा खंड सिर्फ़ आरोप 14 (समयनल्लूर बिजलीघर) और 17 (चीनी) पर है, पर विषय-सूची में "10 वीरनम परियोजना" दर्ज है। द साउथ फ़र्स्ट के अनुसार मुख्यमंत्री ने सदन में कहा कि रिपोर्ट में करुणानिधि के एक रिश्तेदार के 2.5 फ़ीसदी कमीशन माँगने का ज़िक्र है, और यह कि करुणानिधि ने सत्यनारायण ब्रदर्स को टेंडर दिलाने के लिए तत्कालीन मुख्य अभियंता हुसैन पर दबाव डाला। प्रारंभिक रिपोर्ट के परिशिष्ट 'क' में नौवें नंबर पर "मेसर्स सत्यनारायण ब्रदर्स" दर्ज है। जिस दस्तावेज़ से मुख्यमंत्री ने पढ़ा, वह हम देख नहीं सके, इसलिए ये दावे उनके कथन के रूप में हैं।

जो काग़ज़ हम नहीं खोल सके

लोकसभा के प्रश्न 3821 का उत्तर, 180-65-2 का दूसरा स्रोत, नहीं खुला; सामने सिर्फ़ 7 मई 2013 का उत्तर था। सचिवालय ने परिषद को "छह मौक़ों पर" जो कार्रवाई-रिपोर्टें दीं, वे सार्वजनिक नहीं मिलीं, इसलिए 180 स्वीकृत सिफ़ारिशों की सूची बाहर किसी ने नहीं देखी। 1976 की अंतिम रिपोर्ट का वीरनम वाला खंड archive.org पर नहीं है, और पुंछी रिपोर्ट का पाठ नहीं खुला। परिषद की अपनी वेबसाइट 16 जुलाई 2016 के बाद चुप है, जबकि उसी दिन की तस्वीर इस लेख के ऊपर है।

स्रोत: सरकारिया आयोग की रिपोर्ट, भूमिका और अध्याय चार, छह, नौ; भारत का राजपत्र, अंतर-राज्य परिषद आदेश 1990; परिषद सचिवालय की बैठक-सूची और उत्पत्ति-पृष्ठ; लोकसभा अतारांकित प्रश्न 6612 का उत्तर, 7 मई 2013; पीआईबी की 15 जुलाई 2016 और 25 मई 2018 की विज्ञप्तियाँ; फ़ोरम ऑफ़ फ़ेडरेशंस की 22 अप्रैल 2002 की गोलमेज़ का लेख (अख़्तर मजीद); मद्रास हाई कोर्ट, एम. करुणानिधि बनाम भारत संघ, 29 अप्रैल 1976; सरकारिया जाँच आयोग (1976) की प्रारंभिक और अंतिम रिपोर्ट (archive.org); विकिपीडिया के अंतर-राज्य परिषद, एस.आर. बोम्मई और राष्ट्रपति शासन पृष्ठ; द क्विंट; द प्रिंट; लीगेसी आईएएस, वाजीराम और दृष्टि आईएएस के सार; द न्यूज़ मिनट, द साउथ फ़र्स्ट और द वीक की 7 सितंबर 2026 की रिपोर्टें।

स्रोतअंतर-राज्य परिषद सचिवालय, सरकारिया आयोग की रिपोर्ट, 22 अध्याय-फ़ाइलें, सरकारिया आयोग की रिपोर्ट, भूमिका, सरकारिया आयोग की रिपोर्ट, अध्याय चार, राज्यपाल की भूमिका, सरकारिया आयोग की रिपोर्ट, अध्याय छह, आपात प्रावधान, सरकारिया आयोग की रिपोर्ट, अध्याय नौ, अंतर-सरकारी परिषद, भारत का राजपत्र, अंतर-राज्य परिषद आदेश 1990, 28 मई 1990, अंतर-राज्य परिषद सचिवालय, बैठकों की सूची, अंतर-राज्य परिषद सचिवालय, परिषद की उत्पत्ति, गृह मंत्रालय, लोकसभा अतारांकित प्रश्न 6612 का उत्तर, 7 मई 2013, फ़ोरम ऑफ़ फ़ेडरेशंस, अंतर-सरकारी संबंधों पर गोलमेज़, 22 अप्रैल 2002, विकिपीडिया, अंतर-राज्य परिषद, विकिपीडिया, एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, दृष्टि आईएएस, बोम्मई फ़ैसले का सार, विकिपीडिया, राष्ट्रपति शासन की सूची, द क्विंट, राष्ट्रपति शासन के इस्तेमाल का विश्लेषण, अप्रैल 2016, लीगेसी आईएएस, सरकारिया आयोग का सार, वाजीराम एंड रवि, सरकारिया आयोग का सार, पीआईबी, अंतर-राज्य परिषद की स्थायी समिति की 13वीं बैठक, 25 मई 2018, पीआईबी, परिषद की ग्यारहवीं बैठक की पूर्व-सूचना, 15 जुलाई 2016, द प्रिंट, परिषद का पुनर्गठन, 11 नवंबर 2024, मद्रास हाई कोर्ट, एम. करुणानिधि बनाम भारत संघ, 29 अप्रैल 1976, सरकारिया जाँच आयोग (1976) की प्रारंभिक और अंतिम रिपोर्ट, archive.org, द न्यूज़ मिनट, सरकारिया रिपोर्ट और मुख्यमंत्री का हवाला, 7 सितंबर 2026, द साउथ फ़र्स्ट, विधानसभा में मुख्यमंत्री के आरोप, 7 सितंबर 2026, द वीक, विधानसभा में मुख्यमंत्री का भाषण, 7 सितंबर 2026

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