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पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद सोमवार को अपनी अट्ठाईसवीं बैठक करेगी, और वह पहली बैठक से सत्तर साल बाद हो रही है

नेहरू ने 1956 में यह सुझाव तब दिया था जब भाषा के आधार पर राज्यों के बँटवारे की कड़वाहट चरम पर थी। मक़सद था कि राज्यों में मिलकर काम करने की आदत बने। परिषदें सलाहकार हैं, उनके फ़ैसले बाध्यकारी नहीं।

मांडवी पुल से दिखता पणजी, गोवा की राजधानी
तस्वीर: फ़्रेडरिक नोरोन्हा, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

सोमवार को पणजी में एक बैठक होगी जिसकी संख्या अट्ठाईस है।

यह पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद की अट्ठाईसवीं बैठक है। परिषद 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम से बनी थी।

सत्तर साल में अट्ठाईस बैठकें। औसत निकालिए तो ढाई साल में एक।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह इसकी अध्यक्षता करेंगे। परिषद में गोवा, गुजरात और महाराष्ट्र राज्य तथा दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव संघ राज्यक्षेत्र आते हैं। बैठक गृह मंत्रालय का अंतर-राज्य परिषद सचिवालय आयोजित कर रहा है और मेज़बानी गोवा सरकार की है।

यह विचार आया कहाँ से

क्षेत्रीय परिषदों का विचार जवाहरलाल नेहरू का था, और वह 1956 में आया।

उस समय राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट पर बहस चल रही थी। उसी बहस के दौरान नेहरू ने सुझाया कि जिन राज्यों का पुनर्गठन प्रस्तावित है, उन्हें चार या पाँच क्षेत्रों में बाँट दिया जाए और हर क्षेत्र की एक सलाहकार परिषद हो, ताकि इन राज्यों में मिलकर काम करने की आदत विकसित हो।

गृह मंत्रालय का अपना दस्तावेज़ इस सुझाव के संदर्भ को छिपाता नहीं। उसमें लिखा है कि यह सुझाव उस समय आया जब भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से पैदा हुई भाषाई शत्रुता और कड़वाहट राष्ट्र के ताने-बाने को ही ख़तरे में डाल रही थी।

यह वाक्य ध्यान देने लायक़ है, क्योंकि इसमें एक स्वीकारोक्ति है। राज्यों को भाषा के आधार पर बाँटने का फ़ैसला सरकार ने ख़ुद किया था। उस फ़ैसले का नतीजा जो कड़वाहट थी, उसे संभालने के लिए यह ढाँचा बनाया गया।

यानी क्षेत्रीय परिषदें किसी माँग का जवाब नहीं थीं। वे एक ऑपरेशन के बाद की मरहम-पट्टी थीं।

पाँच परिषदें, और एक जो इनमें नहीं है

पाँच क्षेत्रीय परिषदें हैं, और हर एक का मुख्यालय अलग है।

उत्तरी क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय नई दिल्ली में है। उसमें हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान हैं, और साथ में चंडीगढ़, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख।

दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद चेन्नई से चलती है और उसमें आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना हैं, साथ में पुडुचेरी।

मध्य क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय प्रयागराज है, और उसमें छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड हैं।

पूर्वी क्षेत्रीय परिषद कोलकाता से चलती है, जिसमें बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल हैं।

पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय मुंबई है।

अब उस नाम पर आइए जो इस सूची में नहीं है। पूर्वोत्तर के आठ राज्य इन पाँच परिषदों में कहीं नहीं हैं। उनके लिए पूर्वोत्तर परिषद है, जो 1956 के अधिनियम से नहीं, 1971 के अलग क़ानून से बनी।

यह अंतर मामूली नहीं है। पूर्वोत्तर परिषद के पास योजना और विकास के काम हैं और उसका अपना बजट रहा है। क्षेत्रीय परिषदें सिर्फ़ सलाह देती हैं।

अध्यक्ष कौन है, और यह क्यों मायने रखता है

पाँचों क्षेत्रीय परिषदों का अध्यक्ष एक ही व्यक्ति होता है: केंद्रीय गृह मंत्री।

उपाध्यक्ष सदस्य राज्यों में से किसी एक के मुख्यमंत्री होते हैं, और यह पद हर साल बारी-बारी घूमता है। इस बार गोवा के मुख्यमंत्री उपाध्यक्ष हैं।

हर सदस्य राज्य से मुख्यमंत्री और दो वरिष्ठ मंत्री परिषद के सदस्य होते हैं।

यहाँ एक बात रुककर देखने लायक़ है। यह मंच राज्यों के आपसी मामलों का है, पर उसकी कुर्सी पर केंद्र का एक मंत्री बैठता है। और वह मंत्री गृह मंत्री है, वित्त या योजना का मंत्री नहीं।

इसका अपना तर्क है। 1956 में जो समस्या सामने थी, वह विकास की नहीं, क़ानून-व्यवस्था और सीमा-विवाद की थी। भाषाई पुनर्गठन के बाद सीमाओं पर झगड़े थे, और वे गृह मंत्रालय का विषय हैं।

पर उसका नतीजा यह भी है कि जब दो राज्य आपस में उलझते हैं, तो जो व्यक्ति उनके बीच बैठकर सुनता है, वह तटस्थ नहीं होता। वह केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है, और अक्सर उसी दल का जिसकी सरकार किसी एक राज्य में हो।

स्थायी समिति की छलनी

परिषद के नीचे एक और परत है जिसका ज़िक्र विज्ञप्ति में है।

हर क्षेत्रीय परिषद ने मुख्य सचिवों के स्तर पर एक स्थायी समिति बना रखी है। राज्यों की ओर से उठाए गए मुद्दे पहले इसी समिति के सामने रखे जाते हैं। वहाँ चर्चा के बाद जो मुद्दे बच जाते हैं, वही परिषद की बैठक में आते हैं।

यह व्यवस्था दो तरह से पढ़ी जा सकती है।

एक तरह से यह कार्यकुशलता है। जो बातें अफ़सर सुलझा सकते हैं, उन्हें मुख्यमंत्रियों की बैठक तक लाने की ज़रूरत नहीं।

दूसरी तरह से यह एक छलनी है। जो मुद्दा स्थायी समिति में सुलझा हुआ मान लिया जाए, वह ऊपर नहीं जाता। और सुलझने और टल जाने में फ़र्क़ बताना मुश्किल होता है, ख़ासकर तब जब बैठकें ढाई साल में एक बार होती हों।

पणजी में मांडवी नदी का किनारा
तस्वीर: बालू46, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

परिषदें आजकल क्या देखती हैं

विज्ञप्ति में उन विषयों की सूची है जो अब इन बैठकों में आते हैं, और वह सूची 1956 की चिंताओं से बहुत दूर जा चुकी है।

उसमें महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ अपराधों की त्वरित जाँच और निपटान के लिए फ़ास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों का कार्यान्वयन है। आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली यानी 112 का कार्यान्वयन है। खाद्य सुरक्षा मानकों का मामला है। हर गाँव के तय दायरे में ईंट-पत्थर वाली बैंकिंग सुविधा पहुँचाने का लक्ष्य है। और पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली सुधार, शहरी नियोजन, सहकारिता, साइबर अपराध तथा डिजिटल बुनियादी ढाँचे से जुड़े मुद्दे हैं।

इस सूची को देखकर एक बात साफ़ होती है। ये विषय राज्यों के आपसी विवाद नहीं हैं। ये केंद्रीय योजनाओं के कार्यान्वयन की समीक्षा हैं।

एक मंच जो राज्यों को आपस में बात करने के लिए बना था, अब बड़ी हद तक वह जगह है जहाँ केंद्र राज्यों से अपनी योजनाओं की प्रगति पूछता है।

यह अपने-आप में बुरा नहीं है। ऐसी समीक्षा की ज़रूरत होती है। पर यह वह काम नहीं है जिसके लिए 1956 में यह ढाँचा बना था।

संख्या जो विज्ञप्ति देती है, और जो नहीं देती

सरकार ने एक आँकड़ा दिया है। सभी राज्य सरकारों, केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के सहयोग से पिछले 12 वर्षों में, यानी जून 2014 से अब तक, विभिन्न क्षेत्रीय परिषदों और उनकी स्थायी समितियों की कुल 70 बैठकें हुई हैं।

बारह साल में सत्तर बैठकें, पाँच परिषदों और उनकी पाँच स्थायी समितियों को मिलाकर। यानी साल में लगभग छह।

अब इसे उस संख्या के साथ रखिए जो इसी विज्ञप्ति के पहले वाक्य में है। पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद की यह अट्ठाईसवीं बैठक है, और परिषद सत्तर साल पुरानी है।

इन दोनों संख्याओं को सीधे जोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि पहली में स्थायी समितियाँ शामिल हैं और दूसरी में सिर्फ़ परिषद की अपनी बैठकें हैं। पर दिशा दोनों एक ही बताती हैं: बैठकें अब पहले से ज़्यादा होती हैं।

जो विज्ञप्ति नहीं बताती, वह 2014 से पहले का रिकॉर्ड है। पहली परिषद 1957 में बैठी थी। उन सत्तावन सालों में कुल कितनी बैठकें हुईं, यह आँकड़ा इस विज्ञप्ति में नहीं है, और इस लेख के लिए उसकी कोई ऐसी प्रति नहीं मिली जिस पर भरोसा किया जा सके। इसलिए यहाँ वह संख्या नहीं लिखी जा रही। जो चीज़ रिकॉर्ड में नहीं है, उसे अनुमान से भरना इस अख़बार का काम नहीं है।

नई दिल्ली में संसद भवन। राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 इसी सदन से पारित हुआ था
तस्वीर: डेविड कैसल, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

"सलाहकार" शब्द का वज़न

विज्ञप्ति एक बात साफ़ लिखती है: क्षेत्रीय परिषदों की भूमिका सलाहकारी है।

इसका ठोस मतलब यह है कि इन बैठकों में जो तय होता है, उसे लागू करने के लिए कोई राज्य बाध्य नहीं है। कोई अदालत इन निर्णयों को लागू नहीं करा सकती। कोई जुर्माना नहीं लगता।

फिर ये बैठकें काम कैसे करती हैं?

दो तरीक़ों से। पहला यह कि मेज़ पर बैठ जाना अपने-आप में कुछ करता है। जिन दो राज्यों के अफ़सर साल में एक बार एक कमरे में बैठते हैं, उनके बीच फ़ोन उठाना आसान हो जाता है।

दूसरा यह कि रिकॉर्ड बनता है। जो मुद्दा एक बैठक में उठा और अगली में फिर उठा, वह काग़ज़ पर दर्ज रहता है। सलाहकार मंच की ताक़त बाध्यता में नहीं, याद दिलाने में होती है।

पर सीमा भी यहीं है। जहाँ किसी राज्य का ठोस हित दाँव पर हो, जैसे नदी का पानी या सीमा की ज़मीन, वहाँ सलाह से बात नहीं बनती। ऐसे विवाद अलग अधिकरणों और अदालतों में जाते हैं, और वहाँ दशकों लगते हैं।

पश्चिमी क्षेत्र की अपनी बात

इस परिषद में तीन राज्य हैं, और तीनों की आर्थिक हैसियत अलग-अलग है।

महाराष्ट्र और गुजरात देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हैं। गोवा सबसे छोटे राज्यों में है, और उसकी आबादी महाराष्ट्र के एक ज़िले से भी कम है। दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव संघ राज्यक्षेत्र है, जिसका अपना विधानमंडल नहीं।

ऐसी परिषद में हर सदस्य को एक ही मेज़ मिलती है, पर वज़न बराबर नहीं होता।

इसमें एक और परत है। इस क्षेत्र के दो राज्यों के बीच सीमा का एक पुराना विवाद रहा है, और ऐसे मामलों में परिषद की भूमिका सुनने तक सीमित रहती है, तय करने तक नहीं। जो चीज़ अदालत में हो, उस पर सलाहकार मंच बहुत आगे नहीं जा सकता।

एक और परिषद, जो संविधान में है

क्षेत्रीय परिषदों को समझने के लिए उस संस्था को देखना ज़रूरी है जो इनसे ऊपर बैठती है और इनसे कहीं कम बैठकें करती है।

संविधान का अनुच्छेद 263 अंतर-राज्य परिषद की व्यवस्था करता है। यह राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वे ऐसी परिषद गठित करें जो राज्यों के बीच के विवादों की जाँच करे और उन विषयों पर सलाह दे जिनमें कुछ या सभी राज्यों का साझा हित हो।

यह प्रावधान 1950 से संविधान में है।

परिषद 1990 में बनी।

चालीस साल का अंतर किसी भूल का नहीं है। बीच में सरकारिया आयोग बैठा, जिसने 1983 से 1987 तक केंद्र-राज्य संबंधों की जाँच की और अनुच्छेद 263 के तहत एक स्थायी अंतर-राज्य परिषद बनाने की ज़ोरदार सिफ़ारिश की। उसी सिफ़ारिश के बाद राष्ट्रपति के आदेश से यह परिषद अस्तित्व में आई।

इसकी बैठकों का रिकॉर्ड बताने लायक़ है। नियम कहते हैं कि परिषद साल में कम से कम तीन बार बैठ सकती है। 1990 से अब तक उसकी बैठकें एक दर्जन के आसपास हुई हैं। ग्यारहवीं पूर्ण बैठक जुलाई 2016 में हुई थी, उससे पहले क़रीब दस साल का अंतराल रहा। बारहवीं जुलाई 2022 में।

अलग-अलग स्रोत यहाँ अलग संख्या देते हैं, कोई दस, कोई ग्यारह, कोई बारह। यह अंतर इस पर निर्भर करता है कि पूर्ण बैठक और स्थायी समिति की बैठक को अलग गिना जाए या साथ।

अब तुलना कीजिए। जो परिषद संविधान से निकलती है, वह छत्तीस साल में एक दर्जन बार बैठी। जो परिषदें एक साधारण क़ानून से निकलती हैं, उनकी और उनकी समितियों की बैठकें बारह साल में सत्तर हुईं।

इसका सीधा सबक़ यह है कि किसी मंच की सक्रियता उसके क़ानूनी दर्जे से तय नहीं होती। संविधान में लिखा होना उसे चलाता नहीं।

विजय चौक से सचिवालय की इमारतें, नई दिल्ली। अंतर-राज्य परिषद सचिवालय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है
तस्वीर: कार्तिकेय कौल, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

जो शब्द विज्ञप्ति में हैं

सरकारी विज्ञप्तियों की शब्दावली अपने-आप में एक सूचना होती है, और इस विज्ञप्ति में दो पद ध्यान खींचते हैं।

पहला अंग्रेज़ी में है और बड़े अक्षरों में लिखा गया है: टीम भारत। विज्ञप्ति कहती है कि प्रधानमंत्री ने सहकारी संघवाद के आधार पर देश के सामने यह कल्पना रखी है और क्षेत्रीय परिषदें इस दिशा में योगदान दे रही हैं।

दूसरा पद जोड़े में आता है: सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद।

ये दोनों एक साथ नहीं चलते, और यह विरोधाभास नहीं बल्कि नीति है। सहकारी संघवाद का अर्थ है राज्य मिलकर काम करें। प्रतिस्पर्धी संघवाद का अर्थ है राज्य आपस में होड़ करें, निवेश के लिए, रैंकिंग के लिए, योजनाओं के प्रदर्शन के लिए।

एक ही मंच पर दोनों रखने का नतीजा यह होता है कि बैठक का स्वर तय करना मुश्किल हो जाता है। जिस मेज़ पर राज्यों की रैंकिंग पढ़ी जाती है, उस पर सहयोग की बात अलग ढंग से सुनी जाती है।

विज्ञप्ति में एक वाक्य और है, जो इस पूरे ढाँचे का सबसे साफ़ सारांश है: मज़बूत राज्य ही मज़बूत राष्ट्र बनाते हैं। यह 1956 वाली सोच का ही आधुनिक रूप है।

आख़िर में

सोमवार की बैठक एक दिन चलेगी। उसमें कुछ मुद्दे उठेंगे, कुछ निपटेंगे, और एक विज्ञप्ति निकलेगी।

उसे पढ़ते समय एक बात याद रखने लायक़ है। यह मंच 1956 में इसलिए बना था कि भाषा के नाम पर बँटे राज्य आपस में बात करना सीखें।

सत्तर साल बाद जो बात होती है, वह ज़्यादातर योजनाओं के कार्यान्वयन की होती है। और यह अपने-आप में एक तरह की सफलता का सबूत भी है, क्योंकि जिस कड़वाहट के लिए यह ढाँचा बना था, वह अब बैठक के एजेंडे में नहीं है।

अगली बैठक कब होगी, यह पिछली अट्ठाईस के औसत से तय नहीं होगा। पर अगर वह औसत बना रहा, तो वह 2028 के आसपास होगी।

स्रोतगृह मंत्रालय की विज्ञप्ति, 5 सितंबर 2026, क्षेत्रीय परिषदों की सदस्यता और मुख्यालय, अंतर-राज्य परिषद सचिवालय, गृह मंत्रालय का नागरिक चार्टर, अंतर-राज्य परिषद, अनुच्छेद 263 और उसकी बैठकें

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