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कर्नाटक की सरकारी गाड़ियों पर 19.23 करोड़ रुपये का जुर्माना बाक़ी है, उतनी रक़म बेंगलुरु ने आम लोगों से 14 दिन में वसूल ली

मैसूरु की एक आपात गश्ती गाड़ी पर सिर्फ़ सीट बेल्ट के 71 चालान चढ़े। राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने पूछा कि सरकारी गाड़ी का जुर्माना आख़िर भरता कौन है। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीट बेल्ट का क़ानून साफ़ है और झगड़ा पालन का है।

बेंगलुरु के एयरपोर्ट रोड पर ड्यूटी पर खड़ी बेंगलुरु यातायात पुलिस की इंटरसेप्टर गाड़ी और उसके साथ तैनात अफ़सर। यह तस्वीर 2013 की है; मैसूरु में जिस गाड़ी का नंबर वकील ने नोट किया, वह इसी तरह सरकारी नंबर प्लेट वाली पुलिस गाड़ी थी
तस्वीर: Bharathiya, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

मैसूरु की अदालत में जुर्माना जमा कराने वाले काउंटर के सामने खड़ी पुलिस गाड़ी का नंबर वकील पुनीत एन ने नोट कर लिया। KA-55-G-0433। यह मैसूरु शहर पुलिस की आपात प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली, यानी ईआरएसएस-112 की गश्ती गाड़ी है, वही जो मदद माँगने पर पहुँचती है। उस पर 71 चालान चढ़े हुए थे और सब एक ही बात के: सीट बेल्ट नहीं लगी थी। पुनीत ने काउंटर पर मौजूद अफ़सरों को बताया, जवाब नहीं मिला, तो ब्योरा एक्स पर डाल दिया।

कर्नाटक की सरकारी और पुलिस गाड़ियों पर साढ़े तीन साल में जितना जुर्माना बाक़ी है, बेंगलुरु ट्रैफ़िक पुलिस ने लगभग उतनी ही रक़म आम वाहन चालकों से इसी साल 14 दिन में वसूल ली।

गृह विभाग की रिपोर्ट के हवाले से यह बकाया 19 करोड़ 23 लाख 72 हज़ार 500 रुपये बताया गया है। बेंगलुरु में 21 जून से 4 जुलाई 2026 के बीच जमा हुई रक़म 18 करोड़ 15 लाख 42 हज़ार 200 रुपये थी।

एक गाड़ी, 71 चालान, छह कैमरे

स्टार ऑफ़ मैसूर ने 28 जून 2026 को छापा कि KA-55-G-0433 पर ये सारे चालान 5 जुलाई 2024 से 10 जून 2026 के बीच दर्ज हुए। ज़्यादातर उल्लंघन दोड्डगडियार यानी सिल्वर जुबिली क्लॉक टावर पर लगे इंटेलिजेंट ट्रैफ़िक मैनेजमेंट सिस्टम के कैमरे ने पकड़े; बाक़ी नए कोर्ट परिसर, कुवेंपुनगर, सय्याजी राव रोड, जे.के. ग्राउंड और उदयगिरि सर्कल पर।

धारा 194B का पूरा पाठ, और उसमें जो नहीं है

मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम 2019, यानी 2019 का अधिनियम संख्या 32, धारा 194 के बाद छह नई धाराएँ लाया। इनमें 194B का शीर्षक है "सुरक्षा बेल्ट का उपयोग और बच्चों को बैठाना"। उपधारा (1) के मुताबिक़ जो कोई सुरक्षा बेल्ट लगाए बिना मोटर वाहन चलाएगा या बिना बेल्ट लगी सवारियाँ ले जाएगा, उस पर एक हज़ार रुपये जुर्माना होगा। उपधारा (2) चौदह साल से कम उम्र के बच्चे के बारे में है और उसकी भाषा चलाने वाले के साथ चलवाने वाले को भी पकड़ती है। पहली उपधारा में वह विस्तार नहीं है। ये धाराएँ 28 अगस्त 2019 की अधिसूचना एस.ओ. 3110(E) से 1 सितंबर 2019 को लागू हुईं।

संसद का एक हज़ार, कर्नाटक का पाँच सौ

धारा 200 का शीर्षक "कुछ अपराधों का शमन" है। सूचीबद्ध अपराध उन अधिकारियों के हाथों और उस रक़म पर शमित हो सकते हैं "जो राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना से, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे", और 2019 के संशोधन की धारा 86 ने इसी सूची में 194B को जोड़ा। पाँच सौ रुपये इसलिए घटा हुआ जुर्माना नहीं, अदालत न जाने की क़ीमत है। कर्नाटक की 21 सितंबर 2019 की अधिसूचना अपनी पहली पंक्ति में यही आधार बताती है: धारा 200 और साधारण खंड अधिनियम 1897 की धारा 21 से मिली शक्तियाँ। नीचे जाने का दूसरा रास्ता है भी नहीं: धारा 210A का गुणक "एक से कम नहीं और दस से अधिक नहीं" हो सकता। गुजरात के परिवहन आयुक्तालय की शमन-सूची में 194B के सामने पाँच सौ रुपये हैं, हेलमेट वाली 194D के सामने भी पाँच सौ, और 194C के सामने सिर्फ़ सौ। सड़क परिवहन मंत्रालय ने सितंबर 2019 में विधि कार्य विभाग से पूछा था कि राज्य इस अधिनियम के जुर्माने से नीचे जा सकते हैं या नहीं; दिसंबर 2019 में लोकसभा में उसने धारा 200 दोहरा दी।

500 कब 1,000 हुआ, यह कहीं दर्ज नहीं

डेक्कन हेराल्ड ने 21 सितंबर 2019 को छापा कि कर्नाटक ने हेलमेट और सीट बेल्ट की वसूली 1,000 से घटाकर 500 रुपये कर दी। उसी अख़बार ने 29 जनवरी 2023 को बेंगलुरु में सीट बेल्ट के चालान गिरने की एक वजह "जुर्माने का 500 से बढ़कर 1,000 रुपये होना" बताई, जो 2019 की अधिसूचना से उलटी दिशा है। मैसूरु की गाड़ी का हिसाब 500 रुपये प्रति चालान पर बैठता है। बेंगलुरु में 2022 में किस दर पर चालान बने, यह किसी प्रकाशित अधिसूचना से नहीं मिलता।

पुलिस विभाग का जवाब एक गाड़ी तक सीमित रहा

कर्नाटक राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के सदस्य मोहन कुमार दानप्पा ने 8 जुलाई 2026 को गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव को पत्र लिखा, जिसे द हिंदू ने मुख्य सचिव के नाम बताया। उनका अंग्रेज़ी में दर्ज वह वाक्य 9 सितंबर को सबसे ज़्यादा दोहराया गया कि अगर क़ानून लागू कराने वाली पुलिस ख़ुद क़ानून का पालन न करे, तो जनता से यातायात नियम मानने की उम्मीद रखना मुश्किल हो जाता है। यातायात एवं सड़क सुरक्षा आयुक्त, पुलिस उप महानिरीक्षक के. परशुराम ने 18 जुलाई को स्टार ऑफ़ मैसूर से कहा: "फ़िलहाल हमने इसी एक गाड़ी के संबंध में कार्रवाई माँगी है। दूसरी पुलिस गाड़ियों की स्थिति की भी जाँच करेंगे।"

82,478 या 85,844

कन्नड़ दैनिक संयुक्त कर्नाटक ने 4 सितंबर 2026 को गृह विभाग की रिपोर्ट के हवाले से लिखा कि साढ़े तीन साल में कुल 85,844 मामले दर्ज हुए, जिनमें पुलिस विभाग की गाड़ियों के 3,366 हैं और बाक़ी विभागों की गाड़ियों के मामले 82,478 से ऊपर चले गए। द हिंदू की 9 सितंबर की रिपोर्ट में यही 82,478 "विभिन्न विभागों की सरकारी गाड़ियों" के कुल के तौर पर आया, और 3,366 उसी के भीतर पुलिस का हिस्सा। दोनों पढ़ाइयों में अंतर ठीक 3,366 मामलों का है।

साल-दर-साल गिनती में एक अंतर बचता है

संयुक्त कर्नाटक के अनुसार पुलिस गाड़ियों पर 2024 में 1,494 और 2025 में 1,251 मामले दर्ज हुए। दोनों जोड़ने पर 2,745 बनते हैं, जबकि कुल 3,366 बताए गए हैं। बचे 621 मामले 2023 के हिस्से और 2026 के जुलाई तक के महीनों में फैले होंगे, पर रिपोर्ट में उनका अलग ब्योरा नहीं। दूसरे विभागों की गाड़ियों पर 2024 में 35 हज़ार से ज़्यादा और 2025 में 38 हज़ार से ज़्यादा मामले दर्ज हुए, यानी कुल 82,478 में से लगभग 73 हज़ार सिर्फ़ दो सालों के।

17.48 करोड़ लगाए, 35 लाख आए

उसी रिपोर्ट का सबसे तीखा आँकड़ा 2024 का है। उस एक साल में सरकारी गाड़ियों पर 17 करोड़ 48 लाख रुपये का जुर्माना लगा और वसूली सिर्फ़ 35 लाख रुपये की हुई, लगाई गई रक़म का दो फ़ीसदी भी नहीं। जुलाई 2026 तक का कुल बकाया 19.23 करोड़ रुपये बताया गया है। अगर अकेले 2024 का बचा हिस्सा ही 17 करोड़ से ऊपर है, तो 2023, 2025 और 2026 के मामले मिलाकर कुल बकाया 19.23 करोड़ पर कैसे रुकता है, यह प्रकाशित ब्योरे से समझ नहीं आता।

चौदह दिन का दूसरा पलड़ा

मैसूरु का सिद्धार्थ नगर यातायात पुलिस थाना। यह तस्वीर 2023 की है; लंबित चालान ऐसे ही दफ़्तरों और ऑनलाइन खिड़की से निपटाए जाते हैं
तस्वीर: Timothy A. Gonsalves, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

बेंगलुरु ट्रैफ़िक पुलिस के जारी आँकड़ों के मुताबिक़ 21 जून से 4 जुलाई 2026 के बीच 6 लाख 6 हज़ार 32 लंबित मामले निपटे और 18 करोड़ 15 लाख 42 हज़ार 200 रुपये जमा हुए। प्रति मामला औसत क़रीब 300 रुपये, वह भी आधी दर पर। एक शहर से दो हफ़्ते में आम लोगों से इतनी रक़म निकल आई, जितनी पूरे राज्य की सरकारी गाड़ियों पर साढ़े तीन साल से टिकी है। फ़र्क़ रक़म का नहीं, वसूली के रास्ते का है: आम गाड़ी का मालिक एक व्यक्ति है, सरकारी गाड़ी का मालिक एक विभाग।

छूट की खिड़की और लोक अदालत

परिवहन विभाग ने 4 जून 2026 को आदेश निकालकर 21 जून से 10 जुलाई तक बीस दिन की छूट खिड़की खोली। इसमें मई 2026 तक पुलिस के दर्ज सारे ई-चालान और परिवहन विभाग के 1991 से 2022 तक के लंबित मामले शामिल थे। रियायत कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने 11 जुलाई की राष्ट्रीय लोक अदालत से पहले सुझाई थी। आदेश में वसूली योग्य लंबित रक़म 2,827 करोड़ रुपये आँकी गई, जिसमें सरकारी गाड़ियों का 19.23 करोड़ रुपये एक फ़ीसदी भी नहीं है।

मुख्यमंत्री की गाड़ी का हिसाब

पिछले साल 5 सितंबर को डेक्कन हेराल्ड ने छापा कि मुख्यमंत्री सिद्दरामैया की सरकारी टोयोटा फ़ॉर्च्यूनर 2024 की शुरुआत से सात बार आईटीएमएस कैमरों में पकड़ी गई। इनमें से छह चालान मुख्यमंत्री के आगे की सीट पर बेल्ट न लगाने के थे। पहला 24 जनवरी 2024 को पुराने एयरपोर्ट रोड पर लीला पैलेस जंक्शन पर बना, और उसी जंक्शन पर दो बार और। सातवाँ चालान 9 जुलाई को केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा एक्सप्रेस कॉरिडोर पर तेज़ रफ़्तार का था। यातायात पुलिस के एक अधिकारी ने पुष्टि की कि 50 फ़ीसदी छूट लागू करने के बाद 2,500 रुपये भरकर सारे चालान निपटा दिए गए।

कैमरा नंबर प्लेट देखता है, बोर्ड नहीं

बेंगलुरु के अशोक नगर पुलिस केंद्र में यातायात प्रबंधन केंद्र का भीतरी हिस्सा, जहाँ शहर भर के कैमरों की तस्वीरें आकर गिरती हैं। यह तस्वीर 2013 की है
तस्वीर: Bharathiya, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

सरकारी गाड़ियाँ अचानक आँकड़ों में क्यों दिखने लगीं, इसका जवाब मशीन में है। बेंगलुरु के तत्कालीन विशेष पुलिस आयुक्त एम.ए. सलीम के अनुसार पाँच साल में दर्ज सीट बेल्ट उल्लंघनों में से 61.4 फ़ीसदी सड़क पर रोककर की गई जाँच से पकड़े गए थे। संपर्करहित तरीक़े से दर्ज मामले 2021 में सिर्फ़ 180 थे, जो 2022 में 32,500 से ऊपर चले गए। सलीम ने तब अनुमान लगाया कि आगे 90 से 95 फ़ीसदी मामले कैमरों से बनेंगे। जिसे सिपाही हाथ देकर नहीं रोकता, उसे कैमरा नहीं छोड़ता।

चालान मालिक के नाम बनता है, वसूली किसी नाम पर नहीं

केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में नियम 167A 11 अगस्त 2021 की अधिसूचना जी.एस.आर. 575(E) से जोड़ा गया। उसकी उपधारा (7) कहती है कि कैमरे से बने चालान "वाहन के पंजीकृत स्वामी के नाम पर" जारी होंगे। उपधारा (10) मालिक को रास्ता देती है: वह गाड़ी नहीं चला रहा था तो पुलिस अधिकारी के सामने सबूत रखकर बता सकता है कि चालक कोई और था। धारा 133 मालिक पर यह भार डालती है कि माँगे जाने पर चालक का नाम और लाइसेंस का ब्योरा बताए। सरकारी गाड़ी का पंजीकृत मालिक कोई व्यक्ति नहीं, विभाग होता है, और विभाग का बजट सार्वजनिक धन है। नाम बता देने के बाद रक़म उसी चालक से निकलेगी, ऐसा कोई प्रावधान अधिनियम में नहीं है, और जुलाई से सितंबर के बीच ऐसा कोई परिपत्र भी नहीं आया। धारा 199A मालिक को दोषी तभी ठहराती है जब अपराध नाबालिग ने किया हो।

दोगुनी शास्ति वाली धारा का नाम कहीं नहीं आया

धारा 210 के बाद 2019 में जो धाराएँ जुड़ीं, उनमें एक 210B है, शीर्षक "प्रवर्तन प्राधिकारी के किए अपराध के लिए शास्ति"। पाठ इतना ही है कि जो प्राधिकारी इस अधिनियम को लागू कराने के लिए सशक्त है, वह अगर ख़ुद इसी अधिनियम के तहत अपराध करे तो उस अपराध की दोगुनी शास्ति का भागी होगा। पीआईबी की 28 अगस्त 2019 वाली सूची में यह धारा क्रम संख्या 61 पर है और 1 सितंबर 2019 से लागू है। मैसूरु की गाड़ी पर जून से सितंबर के बीच छपी किसी रिपोर्ट में इसका नाम नहीं आया।

दिल्ली में उसी दोपहर

सीट बेल्ट का दूसरा सिरा उसी दिन सुप्रीम कोर्ट में खुला। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय से कहा कि सीट बेल्ट और बच्चों की सुरक्षा के नियमों के कमज़ोर पालन की जाँच करे। याचिका डॉक्टर और शोधकर्ता जोथीदेव केशवदेव की थी, पैरवी अधिवक्ता विल्स मैथ्यूज़ ने की। याचिका के मुताबिक़ बच्चों की सीट और पिछली सीट की बेल्ट जैसे साधारण उपाय क़ानून में दर्ज होने के बावजूद अनदेखे रहते हैं।

पीठ ने याचिका उसी दिन निपटा दी

पीठ ने लापरवाही से होने वाली मौतों और अपंग कर देने वाली चोटों को "highly deplorable" कहा, और यह भी कि सीट बेल्ट पर क़ानून बिलकुल साफ़ है, सवाल पालन का है, तथा पालन कराना क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों का काम है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा: "This is the job of the law enforcement authorities. They have to implement and give effect to the rules." अदालत ने याचिका निपटा दी और याचिकाकर्ता को सिफ़ारिशें सक्षम प्राधिकरण के सामने रखने की छूट दी। केशवदेव 16 फ़रवरी को ज्ञापन भेज चुके थे, जिस पर जवाब नहीं आया।

नियम 138(3) पिछली सीट को कहाँ रखता है

कार के भीतर तीन बिंदु वाली सीट बेल्ट का बकल और कंधे की पट्टी। यह तस्वीर 2014 की है और उदाहरण भर है; नियम 138(3) आगे बैठे व्यक्ति और आगे की ओर मुँह करके पीछे बैठे लोगों, दोनों के लिए यही बेल्ट माँगता है
तस्वीर: Beademung, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0 de

अदालत में जिस प्रावधान का हवाला आया, वह केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 का नियम 138(3) है। इसकी भाषा के अनुसार आगे की सीट पर बैठे व्यक्ति और आगे की ओर मुँह करके पीछे बैठे व्यक्तियों, दोनों के लिए बेल्ट ज़रूरी है। दिल्ली में इसका पहला अभियान सितंबर 2022 में साइरस मिस्त्री की मौत के बाद चला। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार 14 सितंबर को बाराखंबा रोड पर सुबह 11 से दोपहर 1 बजे तक धारा 194B के तहत 17 अदालती चालान काटे गए। दो घंटे में 17।

बच्चों वाली अधिसूचना कार की नहीं, दोपहिया की है

सीट बेल्ट की बहस में 2022 की जिस अधिसूचना का नाम सबसे ज़्यादा लिया जाता है, वह कार की बाल संयम सीट के बारे में नहीं है। पीआईबी की 16 फ़रवरी 2022 की विज्ञप्ति के अनुसार सड़क परिवहन मंत्रालय ने एक दिन पहले केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के नियम 138 में संशोधन किया, और वह चार साल से कम उम्र के उन बच्चों के लिए है जो मोटरसाइकिल पर बैठाए जाते हैं। इसमें सुरक्षा हार्नेस और क्रैश हेलमेट अनिवार्य हुआ और ऐसी मोटरसाइकिल की रफ़्तार 40 किलोमीटर प्रति घंटा तक सीमित की गई।

पीछे की सीट पर बेल्ट कौन लगाता है

सेवलाइफ़ फ़ाउंडेशन के 2019 के अध्ययन का हवाला बिज़नेस स्टैंडर्ड ने दिया था। उसके अनुसार भारत में एक फ़ीसदी से भी कम लोग पिछली सीट की बेल्ट लगाते हैं। सर्वे में शामिल 37.8 फ़ीसदी लोगों को पता ही नहीं था कि ऐसी कोई क़ानूनी बाध्यता है, और 23.9 फ़ीसदी को यह नहीं मालूम था कि पिछली सीट पर बेल्ट होती भी है। पीछे बैठकर सफ़र करने वाले बच्चों में से 77 फ़ीसदी ने बेल्ट नहीं लगाई थी। केशवदेव की याचिका इसी हिस्से पर थी।

2024 में सीट बेल्ट न लगाने से 14,466 मौतें

सड़क परिवहन मंत्रालय की "रोड ऐक्सिडेंट्स इन इंडिया 2024" रिपोर्ट के सुरक्षा-उपकरण वाले हिस्से के अनुसार उस साल सीट बेल्ट न लगाने से 14,466 लोग मारे गए और 37,153 घायल हुए। मरने वालों में 7,489 चालक थे और 6,977 सवारियाँ, यानी 51.8 और 48.2 फ़ीसदी। घायलों में उलटा है: 15,695 चालक और 21,458 सवारियाँ। हेलमेट न पहनने से उसी साल 54,122 लोग मारे गए। कुल सड़क मौतें 1,77,175 रहीं और दुर्घटनाएँ 4,87,707।

एक आँकड़ा उलटी दिशा में गया

2023 की रिपोर्ट में सीट बेल्ट न लगाने से मरने वालों की संख्या 16,025 थी, जिनमें 8,441 चालक और 7,584 सवारियाँ। 2024 में यह घटकर 14,466 हो गई, यानी 1,559 कम। उसी अवधि में कुल सड़क मौतें 1,72,890 से बढ़कर 1,77,175 हुईं। कुल मौतें बढ़ रही हैं और सीट बेल्ट वाली श्रेणी घट रही है। सवारियों का हिस्सा फिर भी बढ़ा, 47.3 से 48.2 फ़ीसदी। यह वर्गीकरण दुर्घटना स्थल पर पुलिस की प्रविष्टि पर टिका है, इसलिए गिरावट व्यवहार की है या दर्ज करने की, रिपोर्ट नहीं बताती।

कर्नाटक का अपना पलड़ा

उसी रिपोर्ट के राज्यवार आँकड़े में कर्नाटक में 2024 में 12,390 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए, जो देश में पाँचवाँ स्थान है। 2023 में यह संख्या 12,321 थी। उत्तर प्रदेश 24,118 मौतों के साथ पहले नंबर पर है, तमिलनाडु 18,449 के साथ दूसरे और महाराष्ट्र 15,715 के साथ तीसरे। दिल्ली में 1,551 मौतें दर्ज हुईं। जिस राज्य में हर साल बारह हज़ार से ज़्यादा लोग सड़क पर मरते हैं, उसी की सरकारी गाड़ियों का बकाया अब गृह विभाग की रिपोर्ट का विषय है।

पूरे देश में वसूली का ढलान

फैक्टली ने मार्च 2025 में ई-चालान पोर्टल के आँकड़ों का विश्लेषण छापा। 2015 से 2024 के बीच देश में कुल ई-चालान रक़म 43,892 करोड़ रुपये बनी, जिसमें से 17,425 करोड़ रुपये यानी लगभग 40 फ़ीसदी वसूला गया। 2015 में वसूली 19 फ़ीसदी थी, 2019 में चढ़कर 77 फ़ीसदी पर पहुँची, 2023 में 35 फ़ीसदी रह गई और 2024 में 24 फ़ीसदी। इसी दौर में औसतन 35 फ़ीसदी चालान अदालतों को भेजे गए, और अदालतों ने उनका औसतन 14 फ़ीसदी ही निपटाया, 2024 में सिर्फ़ पाँच फ़ीसदी।

एक ही मंत्रालय, दो अलग संख्याएँ

फैक्टली ने यह भी दर्ज किया कि पोर्टल दो श्रेणियों में आँकड़े छापता है और दोनों मेल नहीं खातीं। 2024 के लिए अखिल भारतीय श्रेणी में जारी चालान 7,91,91,679 हैं, जबकि राज्यवार श्रेणी में वही संख्या 7,42,47,150 है। अंतर लगभग 49 लाख चालानों का। 2020 में खाई और चौड़ी थी: 4,11,82,104 के सामने 2,89,11,924। राज्यवार आँकड़ों में अदालतों में लंबित चालान शामिल ही नहीं किए जाते। सरकारी गाड़ी का बकाया गिनने से पहले कुल चालान की संख्या ही एक जगह दो तरह से छपी मिलती है।

जिस मुहावरे से कन्नड़ अख़बार ने बात शुरू की

संयुक्त कर्नाटक ने अपनी रिपोर्ट की शुरुआत एक कन्नड़ कहावत से की: "ಬೇಲಿಯೇ ಎದ್ದು ಹೊಲ ಮೇಯ್ದಂತೆ", यानी बाड़ ही उठकर खेत चर गई। अख़बार ने लिखा कि आम नागरिक हेलमेट न पहने या सिग्नल तोड़े तो जुर्माना तुरंत वसूलने वाली व्यवस्था सरकारी गाड़ियों के सामने लंगड़ाने लगती है। छूट की खिड़की 10 जुलाई 2026 को बंद हो गई। मैसूरु की गाड़ी KA-55-G-0433 पर चढ़े 36,500 रुपये के बारे में किसी अधिकारी ने अब तक नहीं बताया कि वे भरे गए या नहीं।

स्रोतद हिंदू, कर्नाटक संस्करण की रिपोर्ट, 9 सितंबर 2026, संयुक्त कर्नाटक (कन्नड़ दैनिक), गृह विभाग की रिपोर्ट पर ख़बर, 4 सितंबर 2026, स्टार ऑफ़ मैसूर, मैसूरु पुलिस गाड़ी के 71 चालानों का ख़ुलासा, 28 जून 2026, स्टार ऑफ़ मैसूर, केएसपीसीए सदस्य के पत्र पर रिपोर्ट, 16 जुलाई 2026, स्टार ऑफ़ मैसूर, डीआईजीपी के परशुराम का बयान, 18 जुलाई 2026, कंट्री एंड पॉलिटिक्स, वकील पुनीत एन और 8 जुलाई के पत्र का ब्योरा, 11 जुलाई 2026, फ़्री प्रेस जर्नल, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई की रिपोर्ट, 9 सितंबर 2026, वर्डिक्टम, सुप्रीम कोर्ट पीठ और आदेश का ब्योरा, 9 सितंबर 2026, सड़क परिवहन मंत्रालय की 'रोड ऐक्सिडेंट्स इन इंडिया 2024' रिपोर्ट का सुरक्षा-उपकरण आँकड़ा, ओपनसिटी पर प्रकाशित, फैक्टली, ई-चालान पोर्टल के आँकड़ों का विश्लेषण, 21 मार्च 2025, डेक्कन हेराल्ड, बेंगलुरु ट्रैफ़िक पुलिस की वसूली के आँकड़े, 6 जुलाई 2026, डेक्कन हेराल्ड, मुख्यमंत्री की सरकारी गाड़ी के सात चालानों पर रिपोर्ट, 5 सितंबर 2025, डेक्कन हेराल्ड, कर्नाटक की 21 सितंबर 2019 की अधिसूचना पर रिपोर्ट, डेक्कन हेराल्ड, बेंगलुरु में सीट बेल्ट चालान और आईटीएमएस पर रिपोर्ट, 29 जनवरी 2023, कंट्री एंड पॉलिटिक्स, परिवहन विभाग की छूट योजना के आदेश पर रिपोर्ट, 4 जून 2026, पीआईबी, सड़क परिवहन मंत्रालय की विज्ञप्ति, बच्चों की सुरक्षा की अधिसूचना, 16 फ़रवरी 2022, बिज़नेस स्टैंडर्ड, नियम 138(3) और सेवलाइफ़ फ़ाउंडेशन के सर्वे पर रिपोर्ट, 5 सितंबर 2022, बिज़नेस स्टैंडर्ड, दिल्ली में पिछली सीट की बेल्ट पर चालान अभियान, 15 सितंबर 2022, भारत का राजपत्र, मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम 2019 (अधिनियम संख्या 32), 9 अगस्त 2019; धारा 194B, 199A, 200 और 210B का मूल पाठ, इंडिया कोड पर मोटर वाहन अधिनियम 1988 का पाठ; धारा 133 और धारा 200, पीआईबी, अधिसूचना एस.ओ. 3110(E) की घोषणा, 28 अगस्त 2019, पीआईबी की उसी विज्ञप्ति के साथ लगी सूची: 1 सितंबर 2019 से लागू 63 प्रावधान, क्रम संख्या 52 और 61, राजपत्र अधिसूचना जी.एस.आर. 575(E), 11 अगस्त 2021; केंद्रीय मोटर वाहन नियमों का नियम 167A, पीआईबी, नियम 167A और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी पर विज्ञप्ति, 19 अगस्त 2021, गुजरात परिवहन आयुक्तालय की शमन रक़म की सूची, वियोन, कर्नाटक की 21 सितंबर 2019 की अधिसूचना की पहली पंक्ति, 22 सितंबर 2019, बिज़नेस टुडे, सड़क परिवहन मंत्रालय के विधि राय माँगने पर रिपोर्ट, 12 सितंबर 2019, पीआईबी, लोकसभा में सड़क परिवहन मंत्रालय का जवाब, 5 दिसंबर 2019

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