सीमा के गाँवों की योजना में 3,020 करोड़ मंज़ूर हुए, राज्यों तक 953 करोड़ पहुँचे
वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम पाँच में से चौथे साल में है। गृह मंत्रालय ने 1,248 परियोजनाएँ मंज़ूर की हैं, पूरी होने की सूचना 283 की है। और मंज़ूर रक़म का 82 फ़ीसदी सिर्फ़ सड़कों का है।

अगर आप अरुणाचल, हिमाचल, सिक्किम, उत्तराखंड या लद्दाख के किसी सीमावर्ती गाँव में रहते हैं, तो पिछले तीन साल में आपके गाँव तक एक सरकारी योजना पहुँची है जिसका नाम वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम है।
शनिवार को पत्र सूचना कार्यालय ने इस योजना पर एक लंबी पृष्ठभूमि टिप्पणी जारी की। उसमें तीन आँकड़े हैं जो आमतौर पर एक ही मानकर छाप दिए जाते हैं, और तीनों अलग हैं।
गृह मंत्रालय ने जुलाई 2026 तक 1,248 परियोजनाएँ मंज़ूर कीं, जिनका परिव्यय 3,020.32 करोड़ रुपये है।
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को असल में जारी हुए 953.47 करोड़ रुपये।
और पूरी होने की सूचना 283 परियोजनाओं की है।
योजना पाँच साल की है और अभी चौथे साल में है।
योजना है क्या
भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थलीय सीमा 15,000 किलोमीटर से लंबी है और सात देशों से लगती है। सबसे लंबा हिस्सा बांग्लादेश के साथ 4,096.7 किलोमीटर का है, फिर चीन के साथ 3,488 और पाकिस्तान के साथ 3,323 किलोमीटर।
इस पूरी लंबाई पर बसे गाँवों की एक साझा शिकायत रही है: सड़क नहीं, बिजली अनियमित, मोबाइल सिग्नल नहीं, अस्पताल दूर। नतीजा पलायन, और पलायन का नतीजा यह कि सीमा के पास आबादी पतली होती चली गई।
वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम इसी को उलटने के लिए बना। सरकार की भाषा में इसका तर्क सीधा है: सीमा पर रहने वाले लोग सुरक्षा बलों की आँख और कान होते हैं, इसलिए उनका वहाँ बने रहना अपने आप में सुरक्षा का काम है।
टिप्पणी में एक उदाहरण भी दिया गया है। 1999 में करगिल सेक्टर में संदिग्ध गतिविधियों की पहली सूचना स्थानीय चरवाहों ने ही दी थी।
योजना का एक और हिस्सा भाषा का है। इन बस्तियों को सरकारी दस्तावेज़ों में अब देश का आख़िरी गाँव नहीं, पहला गाँव कहा जाता है।
दो चरण, और वे एक जैसे नहीं हैं
पहले चरण की घोषणा बजट 2022-23 में हुई और शुरुआत 10 अप्रैल 2023 को अरुणाचल प्रदेश के अंजाव ज़िले के किबिथू से।
इसमें चार राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश आए: अरुणाचल, हिमाचल, सिक्किम, उत्तराखंड और लद्दाख। 19 ज़िलों के 46 ब्लॉक चुने गए और उनमें से 662 गाँवों को प्राथमिकता दी गई। इन 662 गाँवों की कुल आबादी क़रीब 1.42 लाख है।
यह आँकड़ा अपने आप में कुछ बताता है। औसतन हर गाँव में 215 लोग।
पहले चरण का परिव्यय 4,800 करोड़ रुपये है, वित्त वर्ष 2022-23 से 2026-27 तक के लिए। इसमें से 2,500 करोड़ शुरू से ही सिर्फ़ सड़क के लिए तय थे।
दूसरा चरण अलग तरह की योजना है। कैबिनेट ने इसे 2 अप्रैल 2025 को मंज़ूरी दी और यह पूरी तरह केंद्र के पैसे से चलती है, जबकि पहला चरण राज्यों के साथ मिलकर चलता है। शुरुआत 20 फ़रवरी 2026 को असम के कछार ज़िले के नाथनपुर गाँव से हुई।
दूसरे चरण का परिव्यय 6,839 करोड़ रुपये है, 2028-29 तक। इसमें 334 ब्लॉकों के 1,954 गाँव हैं, 15 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों में। उत्तरी सीमा के जो ब्लॉक पहले चरण में आ चुके हैं, वे इसमें से बाहर रखे गए हैं।
दोनों को जोड़ दें तो कुल परिव्यय 11,639 करोड़ रुपये और दायरा 2,616 से ज़्यादा गाँव।

किबिथू क्यों चुना गया
शुरुआत की जगह अपने आप में एक बयान थी।
किबिथू अरुणाचल प्रदेश के अंजाव ज़िले में है और भारत के सबसे पूरब में बसे गाँवों में से एक है। 1962 के भारत-चीन युद्ध में इसी इलाक़े में भीषण लड़ाई हुई थी।
उसके बाद के साठ साल में वहाँ वही हुआ जो पूरी उत्तरी सीमा पर हुआ। रास्ता कठिन रहा, संपर्क पतला रहा, और लोग नीचे की ओर जाते रहे।
योजना की शुरुआत के लिए इस गाँव को चुनना यह कहने का तरीक़ा था कि सरकार सबसे पहले सीमा पर पहुँचना चाहती है, बीच से शुरू करके किनारे तक नहीं।
तीन आँकड़े, और उनके बीच का फ़ासला
यहीं टिप्पणी सबसे ज़्यादा बताती है, हालाँकि वह बताने के इरादे से नहीं लिखी गई।
पहला आँकड़ा मंज़ूरी का है। गृह मंत्रालय ने जुलाई 2026 तक 1,248 परियोजनाओं को हरी झंडी दी, कुल 3,020.32 करोड़ रुपये की। इनसे अलग, केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों ने अपनी तरफ़ से 1,655 और परियोजनाएँ मंज़ूर कीं।
दूसरा आँकड़ा पैसे का है। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को जारी हुए 953.47 करोड़ रुपये। यह मंज़ूर रक़म का 31.6 फ़ीसदी है।
तीसरा आँकड़ा काम का है। 283 परियोजनाएँ पूरी होने की सूचना राज्यों ने दी है। यह मंज़ूर परियोजनाओं का 22.7 फ़ीसदी है।
इन तीनों को एक साथ रखने पर तस्वीर यह बनती है: योजना अपने पाँच में से चौथे साल में है, और उसके पहले चरण की समयसीमा वित्त वर्ष 2026-27 पर ख़त्म हो रही है।
मंज़ूरी और जारी रक़म का फ़ासला हर योजना में होता है, क्योंकि पैसा किश्तों में जाता है और उपयोगिता प्रमाणपत्र के बाद ही अगली किश्त आती है। पर 31.6 फ़ीसदी चौथे साल में कम है, और यह अपने आप में एक सवाल है जिसका जवाब टिप्पणी में नहीं है।
मंज़ूर पैसे का 82 फ़ीसदी सड़क है
टिप्पणी में एक और आँकड़ा है जिसे उसने अपनी उपलब्धियों की सूची में रखा है, पर वह उससे ज़्यादा बताता है।
सड़क की 111 परियोजनाएँ मंज़ूर हुई हैं, कुल 2,481.93 करोड़ रुपये की। इनमें 35 लंबे पुल भी हैं। ये सड़कें 134 ऐसे गाँवों तक जाएँगी जहाँ पहले कोई सड़क नहीं थी।
अब इसे मंज़ूर कुल रक़म के सामने रखिए। गृह मंत्रालय की मंज़ूर की गई कुल 3,020.32 करोड़ में से 2,481.93 करोड़ सड़कें हैं।
यानी 82 फ़ीसदी।
बाक़ी 538 करोड़ में पेयजल, बिजली, मोबाइल और इंटरनेट, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, सामुदायिक भवन, आजीविका, सहकारी समितियाँ और पर्यटन, सब आते हैं।
पर्यटन का हिस्सा अलग से गिना गया है: 327 परियोजनाएँ, 145 करोड़ रुपये। इनमें व्यूप्वाइंट, ट्रेक रूट, इको-रिसॉर्ट और पर्यटक केंद्र हैं।
यह ज़रूरी नहीं कि ग़लत हो। दुर्गम पहाड़ी इलाक़े में एक किलोमीटर सड़क की लागत मैदान के मुक़ाबले कई गुना होती है, और 35 पुल सस्ते नहीं हो सकते। पर योजना जिन आठ-दस कामों के नाम पर बनी थी, ज़मीन पर वह अभी मोटे तौर पर सड़क बनाने की योजना है।

गतिविधियाँ, जो परियोजनाएँ नहीं हैं
31 जुलाई 2026 तक 8,800 से ज़्यादा गतिविधियाँ हुईं। इनमें जागरूकता अभियान, सेवा वितरण शिविर, स्वास्थ्य और पशु चिकित्सा शिविर और कौशल प्रशिक्षण शामिल हैं।
राज्यवार गिनती इस तरह है: अरुणाचल प्रदेश में 2,990, लद्दाख में 2,221, उत्तराखंड में 2,038, हिमाचल प्रदेश में 1,037 और सिक्किम में 530।
गतिविधि और परियोजना दो अलग चीज़ें हैं, और उन्हें एक साथ पढ़ने से ग़लतफ़हमी होती है। एक स्वास्थ्य शिविर एक दिन का काम है। एक पुल पाँच साल का। दोनों को उपलब्धियों की एक ही सूची में रखने से यह लगता है कि काम बहुत हुआ, जबकि 283 पूरी हुई परियोजनाओं का आँकड़ा पास ही में लिखा है।
2026 में एक और काम हुआ जिसका ज़िक्र टिप्पणी करती है। हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश से चुने गए 400 से ज़्यादा स्वयंसेवकों ने लद्दाख, हिमाचल और उत्तराखंड के 74 सीमावर्ती गाँवों में एक-एक हफ़्ता बिताया।
आईटीबीपी दूध और सब्ज़ी ख़रीदती है
टिप्पणी में एक छोटी जानकारी है जो योजना के बाक़ी हिस्से से ज़्यादा ठोस है।
अरुणाचल प्रदेश में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस अब सीधे इन गाँवों से दूध, सब्ज़ियाँ, अंडे और अनाज ख़रीदती है।
इसका असर समझने लायक़ है। सीमावर्ती गाँव में खेती की सबसे बड़ी दिक़्क़त यह नहीं होती कि उपज नहीं होती, बल्कि यह कि उपज बेचने के लिए बाज़ार पचास किलोमीटर दूर है और सड़क आधे साल बंद रहती है। एक सीमा चौकी जो हर महीने तय मात्रा में ख़रीदती है, वह गाँव के भीतर ही एक पक्का ग्राहक है।
आजीविका का बाक़ी ढाँचा हब और स्पोक के मॉडल पर बनाया गया है, जिसमें सामाजिक उद्यमिता, महिलाओं और युवाओं के समूह, पर्यटन और एक-ब्लॉक-एक-उत्पाद की तर्ज़ पर बने उद्यम आते हैं।
दूसरे चरण में इसमें कुछ और चीज़ें जुड़ी हैं: सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए मूल्य शृंखलाएँ, स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम, पर्यटन सर्किट, वित्तीय समावेशन और कौशल विकास।
दोनों चरणों के मक़सद एक जैसे नहीं हैं
पहले चरण की पूरी भाषा आबादी और पलायन की है। उत्तरी सीमा पर गाँव ख़ाली हो रहे थे और उन्हें भरा रखना ही मक़सद था।
दूसरे चरण की भाषा में एक चीज़ जुड़ जाती है जो पहले में नहीं थी। टिप्पणी साफ़ लिखती है कि दूसरा चरण मज़बूत सीमावर्ती समुदायों के ज़रिए सीमा पार अपराधों की रोकथाम और नियंत्रण पर विशेष बल देता है।
यह फ़र्क़ भूगोल से आता है। दूसरे चरण में पंजाब, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम, मणिपुर, नगालैंड, बिहार और उत्तर प्रदेश हैं, यानी पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल की सीमाएँ। इन सीमाओं पर तस्करी, नशा और अवैध आवाजाही अलग तरह की समस्या है, और वह चीन की सीमा वाली आबादी की समस्या नहीं है।
एक ही नाम की योजना दो अलग समस्याओं के लिए चल रही है। यह बात दस्तावेज़ में लिखी नहीं है, पर उसकी शब्दावली में साफ़ दिखती है।
यह पहली ऐसी योजना नहीं है
टिप्पणी ख़ुद बताती है कि सीमावर्ती गाँवों पर सरकारी ख़र्च चार दशक पुराना है, और यह हिस्सा शायद सबसे कम पढ़ा जाएगा।
सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम 1986-87 में पश्चिमी सीमा पर शुरू हुआ था। बाद में इसका दायरा अंतरराष्ट्रीय सीमा की पहली बस्ती से 10 किलोमीटर के भीतर के गाँवों तक बढ़ा।
इसने 16 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों के 111 ज़िले कवर किए, और 2004-05 से अब तक 39,000 से ज़्यादा विकास कार्य मंज़ूर किए।
वह कार्यक्रम अब अपने आख़िरी चरण में है।
दो बातें इससे निकलती हैं। पहली, 39,000 कामों के बाद भी सीमावर्ती गाँवों में सड़क, बिजली और मोबाइल सिग्नल की वही कमी बची थी जिसके लिए नई योजना बनानी पड़ी। दूसरी, नई योजना का चयन पुराने से अलग है: बीएडीपी सीमा से 10 किलोमीटर की पट्टी के सब गाँवों को छूता था, वाइब्रेंट विलेजेज कुछ चुने हुए गाँवों पर पूरा ज़ोर लगाता है और वहाँ हर लागू योजना पहुँचाने का दावा करता है।
इसे सरकारी भाषा में परिपूर्णता दृष्टिकोण कहा गया है। सीधे शब्दों में: कम गाँव, ज़्यादा गहराई।
लौटते हुए लोग, और जो गिना नहीं जाता
टिप्पणी में एक दावा है जिसकी जाँच सबसे मुश्किल है और जो सबसे ज़्यादा दोहराया जाएगा। कहा गया है कि अरुणाचल प्रदेश के कुरुंग कुमे, दिबांग घाटी और शी-योमी ज़िलों के सीमावर्ती गाँवों में लोग वापस लौट रहे हैं।
रिवर्स माइग्रेशन योजना का घोषित मक़सद है, इसलिए यह दावा महत्वपूर्ण है। पर टिप्पणी में इसके साथ कोई संख्या नहीं है। कितने परिवार, किस साल, किस गाँव में, यह नहीं बताया गया।
पलायन की गिनती वैसे भी भारत में कमज़ोर है। जनगणना 2021 में हुई नहीं, और सीमावर्ती गाँवों की आबादी का ताज़ा आधिकारिक आँकड़ा कहीं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
इसका मतलब यह नहीं कि दावा ग़लत है। इसका मतलब यह है कि अभी वह दावा ही है।

किसका काम, और अड़चन कहाँ आती है
योजना गाँव कार्य योजनाओं से चलती है, यानी हर गाँव के लिए अलग सूची बनती है और ज़िला प्रशासन उसे कई विभागों से लागू कराता है।
सड़कें प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के चौथे चरण से बन रही हैं, यानी पैसा वाइब्रेंट विलेजेज का है पर तंत्र ग्रामीण विकास मंत्रालय का।
नोडल मंत्रालय गृह मंत्रालय है। और एक बात टिप्पणी में ऐसी है जो सामान्य सरकारी योजनाओं में नहीं दिखती: कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति योजनाओं के दिशानिर्देशों में ढील की सिफ़ारिश कर सकती है।
यह प्रावधान बताता है कि दिक़्क़त कहाँ आती है। सामान्य योजनाओं के मानक मैदानी इलाक़ों के हिसाब से बने होते हैं, और 4,000 मीटर की ऊँचाई पर आबादी के जो मानदंड लगते हैं उन पर कोई स्कूल या स्वास्थ्य केंद्र मंज़ूर ही नहीं होता। इसीलिए छूट देने वाली समिति बनानी पड़ी।
जो टिप्पणी नहीं बताती
पाँच बातें ऐसी हैं जो इस पूरे दस्तावेज़ में नहीं हैं और जिनके बिना हिसाब अधूरा है।
पहली, 953.47 करोड़ में दूसरे चरण का हिस्सा कितना है। दूसरा चरण फ़रवरी 2026 में शुरू हुआ है, इसलिए यह लगभग पूरा पैसा पहले चरण का होना चाहिए, पर यह लिखा नहीं है।
दूसरी, 283 पूरी हुई परियोजनाओं का राज्यवार ब्योरा नहीं है, न यह कि वे किस तरह की परियोजनाएँ हैं।
तीसरी, पहले चरण के 4,800 करोड़ में से अब तक कुल कितना ख़र्च हुआ, यह अलग से नहीं दिया गया।
चौथी, 1,655 अतिरिक्त परियोजनाएँ जो दूसरे मंत्रालयों ने मंज़ूर कीं, उनका पैसा कहाँ से आ रहा है और वह इन आँकड़ों में गिना गया है या नहीं।
पाँचवीं, पहले चरण की समयसीमा 2026-27 पर ख़त्म हो रही है। उसके बाद क्या होगा, इस पर एक वाक्य भी नहीं है।
ये पाँचों सवाल संसद में पूछे जाने लायक़ हैं, और गृह मंत्रालय ने मार्च 2026 में राज्यसभा के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए इनमें से कुछ आँकड़े दिए भी थे। अगली बार जब यह योजना ख़बर में आए, तो देखने की चीज़ यही रहेगी: मंज़ूरी नहीं, जारी रक़म।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम पर पृष्ठभूमि टिप्पणी, 6 सितंबर 2026, प्रधानमंत्री कार्यालय, वीवीपी-दो की कैबिनेट मंज़ूरी, गृह मंत्रालय, राज्यसभा प्रश्न 3744 का उत्तर, 25 मार्च 2026, द ट्रिब्यून, पहले चरण की मंज़ूरी पर रिपोर्ट