लद्दाख के लिए सरकार ने नया निर्वाचित निकाय प्रस्तावित किया, राज्य का दर्जा नहीं
लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने 10 सितंबर को कहा कि जो ढाँचा बनेगा वह न राज्य होगा, न विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश। जिस माँग का यह जवाब है उसमें दो अलग चीज़ें थीं, और उनमें से एक, छठी अनुसूची, किसी क्षेत्र को विधायिका देती ही नहीं।

लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने गुरुवार, 10 सितंबर को कहा कि लद्दाख के लिए जो व्यवस्था बन रही है वह न राज्य का दर्जा होगी और न विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश। उनके शब्दों में, देश में कहीं मौजूद न होने वाला एक ढाँचा गढ़ा जाएगा, जिसमें एक विधायी निकाय बनेगा। यह बयान नई दिल्ली में गृह मंत्रालय की उपसमिति के साथ हुई बैठक के अगले दिन आया।
जिस माँग का यह जवाब है, उसके भीतर दो अलग चीज़ें रही हैं। राज्य का दर्जा एक। संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाना दूसरी। अख़बारी भाषा में ये दोनों अक्सर एक ही साँस में आती हैं, पर संविधान से दोनों अलग-अलग चीज़ें माँगती हैं।
छठी अनुसूची किसी क्षेत्र को विधायिका नहीं देती।
वह गिनाए गए जनजातीय इलाक़ों को स्वायत्त ज़िला बनाती है, और हर स्वायत्त ज़िले के लिए एक ज़िला परिषद, जिसमें तीस से ज़्यादा सदस्य नहीं हो सकते। लेह और कारगिल को यह मिलता तो लद्दाख की एक संस्था नहीं बनती, दो ज़िला परिषदें बनतीं।
नौ सितंबर की बैठक और अगले दिन का बयान
बुधवार, 9 सितंबर को नई दिल्ली में जो बैठक हुई, वह गृह मंत्रालय की उच्चाधिकार समिति की उपसमिति की थी। मेज़ के दूसरी तरफ़ लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के प्रतिनिधि थे, और वे चार महीने बाद लौटी बातचीत में मसौदा देखने की उम्मीद लेकर आए थे। मसौदा नहीं मिला। कुंद्रा के मुताबिक़ केंद्र ने उसकी जगह नेतृत्व को सवालों की एक सूची सौंपी, इस मक़सद से कि आगे के रास्ते पर सहमति बने, क्योंकि क़ानूनी मसौदा लिखने के लिए बुनियादी बातों पर पहले राज़ीनामा चाहिए।
जवाब किस मंच से आया, यह ख़ुद एक तथ्य है। वह संसद में नहीं आया, गृह मंत्रालय की किसी विज्ञप्ति में नहीं आया, और दोनों संगठनों को लिखित में नहीं दिया गया। वह अगले दिन केंद्रशासित प्रदेश के मुख्य सचिव के मुँह से पत्रकारों के सामने आया, और इंडियन एक्सप्रेस ने 10 सितंबर को उसे छापा। पीआईबी की 9, 10 और 11 सितंबर की सूचियों में गृह मंत्रालय की कोई लद्दाख-संबंधी विज्ञप्ति नहीं है। इस बातचीत पर मंत्रालय की जो विस्तृत विज्ञप्ति सार्वजनिक रूप से मौजूद है, वह 24 सितंबर 2025 की है, उसी दिन की जिस दिन लेह में गोली चली थी।
कुंद्रा ने जो कहा, उसे उनके ही क्रम में रखिए। लद्दाख कभी राज्य नहीं था, वह जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था और बाद में केंद्रशासित प्रदेश बना। लोगों की आकांक्षा विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियों की है। नेतृत्व के साथ सहमति यह बनी है कि लद्दाख के लिए ऐसा ढाँचा गढ़ा जाएगा जो देश में कहीं नहीं है, और उसमें एक विधायी निकाय बनेगा। राज्य का दर्जा तो यह नहीं ही होगा, विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश भी नहीं, कोई और निकाय होगा जिसके पास ये शक्तियाँ होंगी। नाम अभी तय नहीं है।
जिन चीज़ों को संवैधानिक संरक्षण देने की बात उन्होंने की, उनकी सूची भी उन्होंने ख़ुद गिनाई: ज़मीन, नौकरियाँ, खनिज संसाधन, संस्कृति और पर्यावरण। रास्ता साधारण क़ानून का नहीं, संविधान संशोधन का होगा, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत और दलों के आर-पार राजनीतिक सहमति चाहिए, और उसके बाद अमल के लिए एक विस्तृत विनियम बनाना होगा।
माँग के दो हिस्से और 2019 की सिफ़ारिश
गृह मंत्रालय ने ख़ुद जिन दो माँगों का नाम लिया है, वे 24 सितंबर 2025 की विज्ञप्ति में दर्ज हैं: छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा। सोनम वांगचुक ने 10 सितंबर 2025 को इन्हीं दो माँगों पर अनशन शुरू किया था, और मंत्रालय का काग़ज़ यही दर्ज करता है।
राज्य का दर्जा एक तरह की चीज़ माँगता है: पहली अनुसूची में नाम, अपनी विधानसभा, अपना मंत्रिपरिषद। छठी अनुसूची बिलकुल दूसरी तरह की चीज़ देती है, और वह भी क्षेत्र को नहीं, ज़िलों को।
इस माँग की सरकारी सिफ़ारिश भी मौजूद है, और वह सात साल पुरानी है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की 119वीं बैठक 11 सितंबर 2019 को अध्यक्ष नंद कुमार साय की अध्यक्षता में हुई, जिससे पहले 27 अगस्त 2019 की 118वीं बैठक में और 4 सितंबर 2019 को गृह, जनजातीय कार्य तथा विधि एवं न्याय मंत्रालयों के साथ हुई बैठक में यह मुद्दा उठ चुका था। आयोग ने लद्दाख को छठी अनुसूची में लाने की सिफ़ारिश गृह मंत्री और जनजातीय कार्य मंत्री को लिखकर भेजी। चार कारण उसने गिनाए: शक्तियों का लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, क्षेत्र की अलग संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन, ज़मीन के अधिकारों समेत कृषि-संबंधी अधिकारों की रक्षा, और लद्दाख के विकास के लिए धन के हस्तांतरण में बढ़ोतरी।
आँकड़ों पर आयोग की विज्ञप्ति ख़ुद दो पाठ देती है, और यह फ़र्क़ अख़बारों में मिट जाता है। तहसीलवार अनुसूचित जनजाति आबादी उसने इस तरह दी: लेह में 66.8 फ़ीसदी, नुब्रा में 73.35, खल्सी में 97.05, कारगिल में 83.49, संकू में 89.96 और ज़ंस्कार में 99.16। इसके बाद वह जोड़ती है कि सरकारी आँकड़ों में वे समुदाय शामिल नहीं हैं जो जनजाति का दर्जा माँग रहे हैं, जिनमें सुन्नी मुसलमान भी हैं, और उन्हें जोड़ लें तो लद्दाख क्षेत्र की जनजातीय आबादी 97 फ़ीसदी से ऊपर बैठती है। जनगणना 2011 की ज़िलेवार तालिका, जो स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र के दस्तावेज़ में छपी है, अलग संख्या देती है: लेह की 1,33,487 आबादी में 95,857 अनुसूचित जनजाति, यानी 71.8 फ़ीसदी, और कारगिल की 1,40,802 में 1,22,336, यानी 86.9 फ़ीसदी। दोनों ज़िले मिलाकर 2,74,289 में 2,18,193। 97 का आँकड़ा और जनगणना का आँकड़ा एक ही चीज़ नहीं नाप रहे, और आयोग की विज्ञप्ति यह बात ख़ुद कहती है।
छठी अनुसूची का पाठ: दस विषय और राज्यपाल की सहमति
अनुसूची का पैराग्राफ़ 1 कहता है कि पैराग्राफ़ 20 की तालिका में गिनाया गया हर जनजातीय इलाक़ा एक स्वायत्त ज़िला होगा। पैराग्राफ़ 2(1) हर स्वायत्त ज़िले के लिए एक ज़िला परिषद बनाता है, जिसमें तीस से ज़्यादा सदस्य नहीं होंगे, चार से ज़्यादा नामज़द नहीं, और बाक़ी वयस्क मताधिकार से चुने जाएँगे। क़ानून बनाने का अधिकार पैराग्राफ़ 3(1) में है और उसकी सूची गिनी हुई है: आरक्षित वन के अलावा ज़मीन का आवंटन, अधिभोग या उपयोग; आरक्षित वन के अलावा किसी जंगल का प्रबंधन; खेती के लिए नहर या जलधारा का उपयोग; झूम या दूसरी स्थानांतरित खेती का नियमन; गाँव या क़स्बे की समितियों और परिषदों की स्थापना तथा उनकी शक्तियाँ; गाँव या क़स्बे के प्रशासन का कोई भी और विषय, जिसमें गाँव की पुलिस, जन-स्वास्थ्य और सफ़ाई शामिल हैं; मुखिया या सरदार की नियुक्ति और उत्तराधिकार; संपत्ति का उत्तराधिकार; विवाह और विवाह-विच्छेद; तथा सामाजिक रीति। दस विषय, और दसों के ऊपर पैराग्राफ़ 3(3) की शर्त: इनके तहत बना हर क़ानून तुरंत राज्यपाल के पास भेजा जाएगा और उनकी सहमति मिलने तक निष्प्रभावी रहेगा।
पैराग्राफ़ 4 परिषद को गाँव की परिषदें या अदालतें गठित करने देता है, उन मुक़दमों के लिए जिनके सभी पक्ष अनुसूचित जनजातियों के हों; परिषद ख़ुद अपील की अदालत बनती है, और हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट को छोड़कर किसी अदालत का अधिकार क्षेत्र उन मुक़दमों पर नहीं रहता। पैराग्राफ़ 6 प्राथमिक स्कूल, औषधालय, बाज़ार, कांजी हाउस, घाट, मत्स्य पालन, सड़कें, सड़क परिवहन और जलमार्ग बनाने और चलाने की शक्ति देता है, और उसी में यह भी कि परिषद तय कर सकती है कि प्राथमिक शिक्षा किस भाषा में और किस ढंग से दी जाएगी।
पैसे का हिस्सा पैराग्राफ़ 8 में है। परिषद भू-राजस्व का निर्धारण और वसूली करती है, ज़मीन और इमारतों पर कर लगाती है, अपने इलाक़े के निवासियों पर पथकर लगाती है, और व्यवसाय, व्यापार, वृत्ति तथा नियोजन पर, पशुओं, वाहनों और नावों पर, बाज़ार में बिक्री के लिए माल के प्रवेश पर तथा स्कूलों, औषधालयों और सड़कों के रखरखाव के लिए कर वसूलती है। इस पाठ में रुपये की कोई अधिकतम सीमा नहीं लिखी है। पैराग्राफ़ 9 खनिज के अन्वेषण या निष्कर्षण के पट्टों से मिलने वाली रॉयल्टी का वह हिस्सा परिषद को देता है जो राज्य सरकार से तय हो जाए, और विवाद होने पर राज्यपाल का निर्णय अंतिम है। पैराग्राफ़ 10 ग़ैर-जनजातीय लोगों की महाजनी और व्यापार पर नियंत्रण के विनियम बनाने देता है, पर उसके लिए परिषद की कुल सदस्य संख्या के तीन-चौथाई का समर्थन चाहिए।
असली ताला पैराग्राफ़ 12 में है। असम, त्रिपुरा और मिज़ोरम के लिए वह कहता है कि पैराग्राफ़ 3 के विषयों पर राज्य विधानमंडल का कोई अधिनियम उस स्वायत्त ज़िले पर लागू नहीं होगा जब तक ज़िला परिषद सार्वजनिक अधिसूचना से ऐसा निर्देश न दे, और निर्देश देते समय वह अधिनियम को अपवादों या संशोधनों के साथ लागू कर सकती है। राज्यपाल बाक़ी राज्य-अधिनियमों को ज़िले से हटा सकते हैं, और राष्ट्रपति संसद के किसी अधिनियम को, भूतलक्षी प्रभाव से भी। मेघालय का पैराग्राफ़ 12A उल्टा चलता है: परिषद का क़ानून और राज्य विधानमंडल का क़ानून टकराएँ तो राज्य का क़ानून चलेगा। और पैराग्राफ़ 15 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि परिषद का कोई भी कार्य या संकल्प, जिसके बारे में उनका समाधान हो जाए कि वह भारत की सुरक्षा के लिए ख़तरा है या लोक व्यवस्था के लिए हानिकर, वे रद्द या निलंबित कर दें और परिषद की सारी शक्तियाँ ख़ुद ले लें। पैराग्राफ़ 16 के तहत परिषद भंग तो हो सकती है, पर पैराग्राफ़ 14 के तहत बने आयोग की सिफ़ारिश पर।
अनुच्छेद 244 की शर्त, और मिज़ोरम वाली नज़ीर
अनुच्छेद 244 दो वाक्यों का है और दोनों में एक ही शब्द दुहराया गया है। खंड (1) कहता है कि पाँचवीं अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम से भिन्न किसी भी राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन पर लागू होगी। खंड (2) कहता है कि छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन पर लागू होगी। दोनों खंड 'राज्य' कहते हैं। आज किसी केंद्रशासित प्रदेश का नाम इनमें नहीं है।
पर हमेशा ऐसा नहीं था, और सबूत उसी सरकारी पाठ के फ़ुटनोट में है। खंड (2) में आज जो शब्द हैं वे 20 फ़रवरी 1987 से लागू हुए, और जिन शब्दों की जगह वे आए वे थे: "मेघालय और त्रिपुरा तथा मिज़ोरम संघ राज्यक्षेत्र"। यह बदलाव मिज़ोरम राज्य अधिनियम, 1986 (1986 का 34) की धारा 39 से हुआ। पंद्रह साल छठी अनुसूची एक केंद्रशासित प्रदेश में चली।
उसके निशान छपे हुए संविधान में आज भी मौजूद हैं। पैराग्राफ़ 20A मिज़ो ज़िला परिषद के विघटन की बात करता है और "मिज़ोरम संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक" को अधिकार देता है। पैराग्राफ़ 20B का शीर्षक ही आज तक यही है कि मिज़ोरम संघ राज्यक्षेत्र के स्वायत्त क्षेत्र स्वायत्त ज़िले माने जाएँगे। तालिका के भाग तीन में चकमा, मारा और लाई ज़िलों की प्रविष्टियाँ मिज़ोरम ज़िला परिषद (प्रकीर्ण उपबंध) आदेश, 1972 से आईं, जो मिज़ोरम राजपत्र में 5 मई 1972 को छपा था।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने 2019 में ठीक इसी नज़ीर का सहारा लिया था। उसकी विज्ञप्ति कहती है कि आयोग की राय में तत्कालीन मिज़ोरम संघ राज्यक्षेत्र की स्वायत्त ज़िला परिषदों ने लोगों की वाजिब आकांक्षाएँ पूरी करने में मदद की थी। साथ में उसने दो और सहारे गिनाए: पैराग्राफ़ 21, जिसके तहत संसद साधारण क़ानून से इस अनुसूची में जोड़, बदलाव या निरसन कर सकती है और ऐसा क़ानून अनुच्छेद 368 के लिहाज़ से संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा; और साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 3(58), जिसके अनुसार 'राज्य' में संघ राज्यक्षेत्र शामिल है।
यह दूसरा सहारा संविधान तक अनुच्छेद 367(1) के रास्ते पहुँचता है, और उस अनुच्छेद की शुरुआत ही इन शब्दों से होती है कि जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो। अनुच्छेद 244(2) में चार राज्यों के नाम लिखे हुए हैं। सरकार ने इस बिंदु पर अपनी क़ानूनी राय कभी प्रकाशित नहीं की।
मुख्य सचिव ने 10 सितंबर को छठी अनुसूची को इस तरह समझाया कि वह मुख्यतः पूर्वोत्तर का संवैधानिक ढाँचा है, जहाँ राज्य के भीतर कुछ ज़िलों में अल्पसंख्यक जनजातियाँ हैं जिन्हें बहुसंख्यक से संरक्षण चाहिए, इसलिए अलग ज़िला परिषद बनाई जाती है। जनगणना 2011 की राज्यवार तालिका इस तस्वीर को पूरा नहीं करती। मेघालय की 29,66,889 आबादी में 25,55,861 अनुसूचित जनजाति है, यानी 86.1 फ़ीसदी, और वहाँ खासी हिल्स, जयंतिया हिल्स और गारो हिल्स की तीन परिषदें लगभग पूरे राज्य को ढकती हैं। मिज़ोरम में यह हिस्सा 94.4 फ़ीसदी है। त्रिपुरा में 31.8। कारगिल का 86.9 फ़ीसदी मेघालय के राज्यव्यापी आँकड़े से ऊपर बैठता है।
1997 के क़ानून की चार धाराएँ
लेह और कारगिल की मौजूदा परिषदों का क़ानून 1997 का है। धारा 4 के तहत 26 सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव से आते हैं और सरकार ज़िले के प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं में से चार तक नामज़द कर सकती है। धारा 25 के तहत चुने हुए सदस्य अपने में से एक को अध्यक्ष चुनते हैं, और धारा 29 के तहत वही अध्यक्ष मुख्य कार्यकारी पार्षद होता है, जो चार सदस्यों को कार्यकारी परिषद में लेता है, जिनमें कम से कम एक ज़िले के प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यकों से होगा।
इतना पढ़कर ढाँचा किसी छोटी सरकार जैसा लगता है। चार धाराएँ उसे वापस अपनी जगह ले आती हैं।
धारा 38(1) कहती है कि ज़िले का उपायुक्त परिषद का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होगा। परिषद का सबसे बड़ा अफ़सर वह है जिसे परिषद न चुनती है न हटा सकती है। धारा 51 कहती है कि अपने कामकाज में परिषद उन अनुदेशों और निर्देशों से निर्देशित होगी जो सरकार समय-समय पर उसे दे। धारा 55 कहती है कि इस अधिनियम या इसके नियमों की व्याख्या पर कोई सवाल उठे तो वह सरकार को भेजा जाएगा और सरकार का निर्णय अंतिम होगा। परिषद अपने ही क़ानून का अर्थ आख़िरी तौर पर नहीं लगा सकती।

चौथी धारा 58 है, और वही सबसे दूर तक जाती है। वह कहती है कि इस अधिनियम में कुछ भी ज़िले पर किसी भी क़ानून के लागू होने पर असर नहीं डालेगा, चाहे वह क़ानून इससे पहले बना हो या बाद में, जब तक वह क़ानून ख़ुद ज़िले को अपने दायरे से बाहर न रखे। स्पष्टीकरण जोड़ता है कि 'क़ानून' में अधिनियम, अध्यादेश, विनियम, आदेश, नियम, स्कीम और अधिसूचना सब आते हैं। छठी अनुसूची का पैराग्राफ़ 12 ठीक उल्टा लिखा है। वहाँ बाहर का क़ानून तब तक नहीं आता जब तक परिषद उसे बुलाए नहीं; लद्दाख में वह तब तक आता रहता है जब तक ख़ुद अपवाद न बनाए।
पैसे और ज़मीन का हाल भी इसी दिशा में है। धारा 42 के तहत पहली परिषद के गठन पर ज़िले की सारी ज़मीन परिषद को अंतरित मानी गई, पर उपधारा (3) सरकार की वह शक्ति बचा लेती है जिससे वह लोक प्रयोजन या देश की रक्षा के लिए उसी ज़मीन का अर्जन या अधिग्रहण कर सके। धारा 43(2) के तहत परिषद कोष सरकारी ख़ज़ानों से संचालित होता है। धारा 44(1) के तहत सरकार योजना और ग़ैर-योजना मद में उतना धन देती है जितनी बजट-ज़रूरत सरकार ख़ुद मंज़ूर करे। धारा 45(2) के तहत अतिरिक्त सचिव से नीचे के दर्जे का न होने वाला कोई अधिकारी परिषद के दफ़्तर और उसके किसी काम का निरीक्षण कर सकता है और उससे रिकॉर्ड तलब कर सकता है। और धारा 52 के तहत राज्यपाल परिषद को भंग कर सकते हैं यदि उनकी राय में उसने अक्षमता दिखाई, चूक की, या अपनी शक्तियों का अतिक्रमण या दुरुपयोग किया। छठी अनुसूची में इस जगह पर एक आयोग खड़ा है; यहाँ नहीं है।
2025 के विनियम: भाषा, आरक्षण और भर्ती
बातचीत के इन तीन बरसों में जो कुछ ठोस हुआ है, वह विनियमों की शक्ल में हुआ है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लद्दाख राजभाषा विनियम, 2025 प्रख्यापित किया और विधि एवं न्याय मंत्रालय ने उसे 3 जून 2025 को अधिसूचित किया। आकाशवाणी समाचार की 4 जून 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक़ इससे अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, भोटी और पुर्गी को केंद्रशासित प्रदेश के सरकारी कामकाज की राजभाषाएँ माना गया, और अंग्रेज़ी का इस्तेमाल पहले की तरह जारी रहेगा।

गृह मंत्रालय ने अपनी 24 सितंबर 2025 की विज्ञप्ति में इस पूरी बातचीत का हिसाब चार पंक्तियों में दिया: लद्दाख की अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण 45 से बढ़ाकर 84 फ़ीसदी, परिषदों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण, भोटी और पुर्गी को राजभाषा का दर्जा, और 1,800 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू।
लद्दाख प्रशासन का अपना काग़ज़ इसके नीचे एक नहीं, दो संख्याएँ रखता है। पीटीआई की 29 जून 2025 की रिपोर्ट के अनुसार प्रशासन ने उसी दिन लद्दाख आरक्षण (संशोधन) नियम, 2025 अधिसूचित किए, जो जम्मू-कश्मीर आरक्षण अधिनियम, 2004 की उस धारा 23 के तहत बने हैं जिसे लद्दाख आरक्षण (संशोधन) विनियम, 2025 ने संशोधित किया। सीधी भर्ती में आरक्षण इस तरह है: अनुसूचित जातियों के लिए 1 फ़ीसदी, अनुसूचित जनजातियों के लिए 80, वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे इलाक़ों के निवासियों के लिए 4 और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लिए 10। इसके ऊपर क्षैतिज आरक्षण है, पूर्व सैनिकों के लिए 6 फ़ीसदी और बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए 4। पदोन्नति में संशोधित नियम 9 के तहत अनुसूचित जातियों को 1 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजातियों को 84 मिलता है। गृह मंत्रालय जिस 84 का हवाला देता है, वह पदोन्नति वाला आँकड़ा है; सीधी भर्ती का आँकड़ा 80 है।
इन सबके नीचे एक ही क़िस्म की ज़मीन है। भाषा, आरक्षण और परिषदों में महिलाओं का हिस्सा, तीनों राष्ट्रपति के विनियम से आए हैं, और जो विनियम से आता है उसे दूसरा विनियम बदल सकता है। कुंद्रा ने 10 सितंबर को जिस वाक्य में कहा कि अनुच्छेद 371 में संरक्षण जड़ जाने के बाद वे पत्थर की लकीर हो जाएँगे, वह वाक्य इसी फ़र्क़ की तरफ़ इशारा है।
पूर्वोत्तर की दस परिषदें और 2021 का समझौता
पैराग्राफ़ 20 की तालिका में आज दस नाम हैं। भाग एक में असम के तीन: उत्तरी कछार पहाड़ी ज़िला, कार्बी आंगलोंग ज़िला और बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र ज़िला। भाग दो में मेघालय के तीन: खासी हिल्स, जयंतिया हिल्स और गारो हिल्स। भाग दो-क में त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र ज़िला। भाग तीन में मिज़ोरम के तीन: चकमा, मारा और लाई।
इनके लिए अनुसूची को बार-बार दोबारा लिखा गया है। संविधान की छठी अनुसूची (संशोधन) अधिनियम, 1995 (1995 का 42) ने पैराग्राफ़ 3A जोड़ा, जिससे उत्तरी कछार पहाड़ी और कार्बी आंगलोंग परिषदों को पंद्रह और विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार मिला, जिनमें उद्योग, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा, कृषि, मत्स्य पालन और ज़मीन का हस्तांतरण शामिल हैं। संविधान की छठी अनुसूची (संशोधन) अधिनियम, 2003 (2003 का 44) ने पैराग्राफ़ 3B जोड़ा और बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद को चालीस विषय दिए, ज़मीन और राजस्व से लेकर पर्यटन और सांख्यिकी तक। उसी अधिनियम ने परिषद का आकार तय किया: छियालीस से ज़्यादा सदस्य नहीं, जिनमें चालीस चुने जाएँगे, तीस सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित, पाँच ग़ैर-जनजातीय समुदायों के लिए, पाँच सबके लिए खुली, और बाक़ी छह राज्यपाल उन समुदायों में से नामज़द करेंगे जिनका प्रतिनिधित्व नहीं है, जिनमें कम से कम दो महिलाएँ होंगी। उसी संशोधन ने गाँव की अदालतों वाला पैराग्राफ़ 4 और महाजनी-नियंत्रण वाला पैराग्राफ़ 10 इस परिषद पर से हटा दिया।
इसके बाद भी बात ख़त्म नहीं हुई। कार्बी आंगलोंग समझौता 4 सितंबर 2021 को नई दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हुआ, और उसमें एक हज़ार से ज़्यादा हथियारबंद लोगों ने हिंसा छोड़ी। गृह मंत्रालय की उसी दिन की विज्ञप्ति के अनुसार समझौता कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद को और अधिक स्वायत्तता देने, कार्बी लोगों की पहचान, भाषा और संस्कृति की रक्षा करने और परिषद क्षेत्र के विकास के लिए था, असम की प्रादेशिक और प्रशासनिक अखंडता को छुए बिना। उसमें लिखा है कि समझौता परिषद को और अधिक विधायी, कार्यकारी, प्रशासनिक तथा वित्तीय शक्तियाँ देने का प्रस्ताव करता है, पाँच साल में क़रीब 1,000 करोड़ रुपये का विशेष विकास पैकेज देता है, और परिषद के संसाधन बढ़ाने के लिए राज्य की संचित निधि को पूरक धन मिलेगा। जिस परिषद के लिए यह 2021 में लिखना पड़ा, वह छठी अनुसूची के तहत पहले से चल रही थी; उसका ज़िला 1976 तक मिकिर हिल्स कहलाता था और परिषद को कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद नाम 1995 के संशोधन से मिला।

इन परिषदों को और मज़बूत करने वाला एक विधेयक भी है, और वह सात साल से अटका है। संविधान (125वाँ संशोधन) विधेयक, 2019 गृह मंत्रालय ने 6 फ़रवरी 2019 को राज्यसभा में पेश किया था। उसमें ज़िला परिषदों के नीचे गाँव और नगर परिषदें बनाने, राज्य वित्त आयोग गठित करने, चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग से कराने और दल-बदल पर अयोग्यता के नियम बनाने की बात थी। स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट 5 मार्च 2020 को दी। विधेयक आज तक पारित नहीं हुआ है।
अक्टूबर की बैठक तक
आगे की तारीख़ें अभी इतनी हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 10 सितंबर की दो रिपोर्टों में दो बातें दर्ज हैं: सोनम वांगचुक ने 19 सितंबर से नए आंदोलन की चेतावनी दी है, और मुख्य सचिव ने अक्टूबर तक मसौदा तैयार हो जाने की उम्मीद जताई है। उपसमिति की अगली बैठक भी अक्टूबर में होनी है।
तब तक जो तय नहीं है, उसकी सूची छोटी नहीं है: नए निकाय का नाम, सीटों की संख्या, परिसीमन, पुलिस और नौकरशाही पर अधिकार, और लेह तथा कारगिल की मौजूदा पहाड़ी परिषदों का भविष्य। संसद में कोई संशोधन विधेयक अभी पेश नहीं हुआ है, और कुंद्रा के अपने हिसाब से उसे दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत तथा दलों के आर-पार सहमति चाहिए होगी। विधि कार्य विभाग और विधायी विभाग के अधिकारी इस उपसमिति की बैठकों में मार्च 2024 से बैठ रहे हैं।
गृह मंत्रालय ने दिसंबर 2023 में अपनी उच्चाधिकार समिति को जो पाँच काम सौंपे थे, उनमें संस्कृति और भाषा की रक्षा है, ज़मीन और रोज़गार की रक्षा है, समावेशी विकास और रोज़गार सृजन है, लेह तथा कारगिल की पहाड़ी परिषदों का सशक्तीकरण है, और संवैधानिक संरक्षण की जाँच है। उस सूची में राज्य का दर्जा कभी नहीं था।
स्रोतभारत का संविधान, पूर्ण पाठ (सरकारी पीडीएफ़): अनुच्छेद 244, 244A, 367(1) और छठी अनुसूची के पैराग्राफ़ 1, 2, 3, 3A, 3B, 4, 6, 8, 9, 10, 12, 12A, 15, 16, 20, 20A, 20B और 21, फ़ुटनोट सहित, जनजातीय कार्य मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति, 11 सितंबर 2019: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की 119वीं बैठक और लद्दाख को छठी अनुसूची में लाने की सिफ़ारिश, गृह मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति, 4 दिसंबर 2023: लद्दाख के लिए उच्चाधिकार समिति का पाँच-सूत्री कार्यादेश, गृह मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति, 4 मार्च 2024: उपसमिति की दूसरी बैठक और विधि कार्य विभाग तथा विधायी विभाग की मौजूदगी, गृह मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति, 24 सितंबर 2025: लद्दाख पर मंत्रालय का बयान, आरक्षण 45 से 84 फ़ीसदी, 1,800 पद, और लेह की घटना पर सरकारी विवरण, गृह मंत्रालय, पीआईबी विज्ञप्ति, 4 सितंबर 2021: कार्बी आंगलोंग समझौते की मुख्य बातें, लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद अधिनियम, 1997 (1997 का XXXI): धारा 4, 25, 29, 38, 42, 43, 44, 45, 51, 52, 55 और 58, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय: जनगणना 2011 पर आधारित अनुसूचित जनजाति जनसंख्या की ज़िलेवार और राज्यवार तालिकाएँ, इंडियन एक्सप्रेस, 10 सितंबर 2026: मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा का बयान, नवीद इक़बाल की रिपोर्ट, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: संविधान (125वाँ संशोधन) विधेयक, 2019 का ब्योरा और स्थायी समिति की तारीख़, पीटीआई, 29 जून 2025 (द प्रिंट पर प्रकाशित): लद्दाख आरक्षण (संशोधन) नियम, 2025 के आँकड़े, आकाशवाणी समाचार, 4 जून 2025: लद्दाख राजभाषा विनियम, 2025 और पाँच राजभाषाएँ, जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 (2019 का अधिनियम 34), राजपत्र प्रति, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 10 सितंबर 2026: बैठक पर दोनों संगठनों की नाराज़गी और वांगचुक की 19 सितंबर से आंदोलन की चेतावनी, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 10 सितंबर 2026: मुख्य सचिव का यह कहना कि मसौदा अक्टूबर तक तैयार होने की उम्मीद है