भारत पन्ना
सियासतनामा

रुपया एक झटके में 4.7619 से 7.50 प्रति डॉलर हुआ, 6 जून 1966 को, और एक अमेरिकी दस्तावेज़ ख़ुद अपनी दी हुई तारीख़ पर बँटा हुआ है

अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व बोर्ड की अपनी साप्ताहिक रिपोर्ट, 27 जुलाई 1966 की, इसी घटना की तारीख़ एक जगह 5 जून लिखती है और दो जगह 6 जून, एक ही दस्तावेज़ में। भारतीय रिज़र्व बैंक की अपनी आधिकारिक इतिहास-पुस्तक और उस हफ़्ते की लोकसभा-राज्यसभा बहस का पूरा पाठ यह लेख खोल नहीं सका; जो खुला और जो नहीं खुला, दोनों दर्ज हैं।

1949 में जारी शृंखला का पाँच रुपये का नोट, भारतीय रिज़र्व बैंक का छापा; उसी सितंबर 1949 में तय 4.7619 रुपये प्रति डॉलर की दर 1966 तक बिना बदले चली
तस्वीर: Reserve Bank of India, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

अमेरिका के फ़ेडरल रिज़र्व बोर्ड ने 27 जुलाई 1966 को वाशिंगटन में एक रिपोर्ट छापी। साप्ताहिक रिपोर्ट थी। विषय था भारत की मुद्रा।

उसमें एक तारीख़ तीन बार आती है। तीनों बार एक जैसी नहीं। रिपोर्ट की भूमिका कहती है कि यह बदलाव 5 जून 1966 को हुआ। आगे, तकनीकी विवरण वाले हिस्से में, वही बदलाव दो बार 6 जून 1966 का बताया गया है। यह किसी अख़बार की चूक नहीं। यह अमेरिकी सरकार के अपने काग़ज़ के भीतर की बात है, तीन हफ़्ते बाद लिखी गई एक ही रिपोर्ट में।

जो बदलाव हुआ, वह यह था: भारत सरकार ने रुपये की आधिकारिक दर 4.7619 रुपये प्रति डॉलर से बदलकर 7.50 रुपये प्रति डॉलर कर दी। पुरानी दर सितंबर 1949 से चली आ रही थी।

यह लेख इसी अमेरिकी रिपोर्ट से शुरू होता है, किसी भारतीय संस्मरण से नहीं। कारण सीधा है। यही एकमात्र समकालीन दस्तावेज़ है जो इस लेखन तक पहुँच सका। भारतीय रिज़र्व बैंक की अपनी इतिहास-पुस्तक और संसद की उस हफ़्ते की बहस, दोनों पहुँच से बाहर रहीं। क्यों, इसका पूरा ब्यौरा अंत में है।

पुरानी दर 4.7619, नई दर 7.50: एक बदलाव के दो सही हिसाब

फ़ोर्ब्स इंडिया के 11 अगस्त 2014 के लेख में 6 जून लिखा है। ज़ेनोदो पर छपे एक हालिया शोध-पत्र के सार में भी 6 जून लिखा है। इस लेख ने इसलिए 6 जून 1966 अपनाया है। साथ में एक स्वीकारोक्ति भी: घटना के तीन हफ़्ते के भीतर लिखी गई एक अमेरिकी सरकारी रिपोर्ट भी अपने ही भीतर एक जगह चूक गई थी।

नंबर पर एक और उलझन है। यह अंकगणित से सुलझ जाती है। फ़ेडरल रिज़र्व की रिपोर्ट लिखती है कि रुपये की सोने में तय समता 0.186621 ग्राम शुद्ध सोने से घटकर 0.118489 ग्राम रह गई। यह, रिपोर्ट के अपने शब्दों में, "सोने के हिसाब से रुपये में 36.5 फ़ीसदी की कटौती" थी। ठीक अगली पंक्ति में लिखा है कि इसके नतीजे में डॉलर के मुक़ाबले रुपये की दर "57.5 फ़ीसदी बढ़ गई, 4.7619 से 7.5 रुपये।"

दोनों नंबर सही हैं। हिसाब ख़ुद कीजिए। एक डॉलर ख़रीदने में पहले 4.7619 रुपये लगते थे। अब 7.5 लगते हैं। यह बढ़त 57.5 फ़ीसदी की है। पर एक रुपया पहले लगभग 0.21 डॉलर के बराबर था। अब सिर्फ़ 0.1333 डॉलर के बराबर है। यह गिरावट 36.5 फ़ीसदी की है। दोनों एक ही बदलाव के दो हिसाब हैं, बस नापने की दिशा अलग है। उस दौर में डॉलर ख़ुद सोने से एक तय दर पर बँधा था, इसलिए दोनों हिसाब आपस में मेल भी खाते हैं। सिर्फ़ एक संख्या बोलकर रुक जाना जवाब को अधूरा छोड़ देता है।

पुरानी दर सत्रह साल नहीं बदली, सितंबर 1949 से जून 1966 तक। सत्रह साल की एक ही दर के बाद यह बदलाव आया।

संकट की सेटिंग: दो सूखे, एक जंग, और घटती साख

फ़ेडरल रिज़र्व की रिपोर्ट संकट की जड़ भी गिनाती है, अपनी भाषा में, संख्याओं के साथ। पिछले पंद्रह साल में, यानी पहली तीन पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान, भारत में मुद्रा आपूर्ति 128 फ़ीसदी बढ़ी। यह वास्तविक राष्ट्रीय आय की बढ़त से 80 फ़ीसदी ज़्यादा थी। उपभोक्ता क़ीमतें 72 फ़ीसदी बढ़ीं। इसका ज़्यादातर हिस्सा आख़िरी सात साल में हुआ। व्यापार घाटा मार्च 1951 में ख़त्म हुए साल में महज़ 70 लाख डॉलर था। मार्च 1966 में ख़त्म हुए साल तक यह 110 करोड़ डॉलर हो चुका था। आयात दोगुने से ज़्यादा बढ़े। निर्यात सिर्फ़ 27 फ़ीसदी, और वह बढ़त भी आख़िरी पाँच साल में विशेष प्रोत्साहनों के सहारे आई।

रिज़र्व की गिरावट इसी पैटर्न का नतीजा थी। सोने और विदेशी मुद्रा भंडार 1950 के अंत में 2 अरब डॉलर से ज़्यादा थे। 1964 के अंत तक 50 करोड़ डॉलर से नीचे आ गए। जो आंशिक सुधार बाद में दिखा, वह असल सुधार नहीं था। रिपोर्ट के अपने शब्दों में, वह "बढ़ते विदेशी क़र्ज़ का, ख़ासकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से लिए गए क़र्ज़ का प्रतिबिंब" था। भंडार घटा। आयात पर पाबंदियाँ बढ़ीं। क़िल्लत बढ़ी, और क़ीमतें और तेज़ी से बढ़ीं। थोक मूल्य सूचकांक की सालाना बढ़त दर पिछले दो साल में 6.4 और 9.2 फ़ीसदी थी। 1965-66 की पहली दो तिमाहियों में यह 10.6 और 16.5 फ़ीसदी तक पहुँच गई, रिपोर्ट की अपनी तालिका के मुताबिक़।

फिर 1965 आया। पाकिस्तान से जंग हुई। अमेरिका समेत कई देशों ने विदेशी मदद रोक दी, ठीक उन्हीं दिनों जब शत्रुता शुरू हुई। साथ में सूखा पड़ा, लगातार दूसरे साल। रक्षा ख़र्च 1965-66 में कुल सरकारी ख़र्च का 24.06 फ़ीसदी हो गया। यह 1965 से 1989 के बीच का सबसे ऊँचा आँकड़ा है, सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी के एक शोध-पत्र के मुताबिक़, जो ख़ुद एक और किताब, "फ़ाउंडेशंस ऑफ़ इंडियाज़ पॉलिटिकल इकॉनमी", का हवाला देता है।

अवमूल्यन से ठीक छह दिन पहले, 31 मई 1966 को, "नेशनल डिफ़ेंस रेमिटेंस स्कीम" बंद हुई। यह स्कीम विदेश से आने वाले निजी प्रेषण पर आधिकारिक दर के ऊपर आयात-अनुज्ञप्ति का अतिरिक्त लाभ देती थी। आधिकारिक दर तब तक एक क़ानूनी कल्पना बन चुकी थी। हांगकांग के खुले बाज़ार में अवमूल्यन से पहले वाले हफ़्ते रुपये के नोट 10.03 रुपये प्रति डॉलर पर बिक रहे थे, आधिकारिक 4.7619 से 52.5 फ़ीसदी नीचे। अवमूल्यन के बाद वाले हफ़्ते यह दर 12.04 रुपये हुई, नई आधिकारिक दर से 37.6 फ़ीसदी नीचे। तीसरे हफ़्ते तक यह छूट घटकर 34.5 फ़ीसदी रह गई। बाज़ार पहले से जानता था कि असली दर 7.5 के आसपास कहीं है। सरकार ने काग़ज़ पर वही दर लिखी जो बाज़ार पहले से लगा रहा था।

फ़ैसला एक छोटे समूह का था, चार पद दस्तावेज़ से पुष्ट होते हैं

छह जून की घोषणा एक छोटे समूह का फ़ैसला थी। यह लगभग हर उपलब्ध विवरण में एक जैसा है। पर "लगभग हर विवरण एक जैसा है" और "यह दस्तावेज़ से सिद्ध है" दो अलग दावे हैं। सियासतनामा की अपनी शर्त है कि दोनों को गड्ड-मड्ड न किया जाए।

जो पद और तारीख़ें सार्वजनिक रिकॉर्ड से पुष्ट होती हैं, वे ये हैं। सचींद्र चौधरी उस समय केंद्रीय वित्त मंत्री थे, 1965 से 13 मार्च 1967 तक। पी.सी. भट्टाचार्य रिज़र्व बैंक के गवर्नर थे, 1 मार्च 1962 से 30 जून 1967 तक। एल.के. झा प्रधानमंत्री के सचिव थे, पहले लाल बहादुर शास्त्री के अधीन, फिर जनवरी 1966 से इंदिरा गांधी के अधीन। बी.के. नेहरू 1961 से 1968 तक वाशिंगटन में भारत के राजदूत थे। चार नाम, चार पद, चार तारीख़ें। यह चार पद इस फ़ैसले से जुड़े लगभग हर विवरण में बार-बार आते हैं।

यह तस्वीर न्यूयॉर्क की है, अवमूल्यन से पहले, 31 मार्च 1966 की; प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कार्लाइल होटल में, उसी साल जिसमें छह जून का फ़ैसला हुआ
तस्वीर: Bettmann Archive, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain :::

इससे आगे का हिस्सा दूसरी तरह का है। किस कमरे में क्या कहा गया, किसने किसे किस दिन मनाया, यह मुख्यतः इन्हीं में से कुछ लोगों के बाद के संस्मरणों से आता है। ख़ासकर आई.जी. पटेल की "ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ इंडियन इकॉनमिक पॉलिसी" और बी.के. नेहरू की "नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकंड" से। यह लेख इन दोनों किताबों को सीधे खोलकर पढ़ नहीं सका। इसलिए इनकी किसी बात को यहाँ उद्धरण की तरह पेश नहीं किया गया है। जो पेश किया जा सकता है, वह सिर्फ़ इतना है: यह दोनों किताबें मौजूद हैं, दोनों के लेखक इस फ़ैसले में सीधे भागीदार थे, और दोनों अपनी भूमिका की सफ़ाई भी हैं। सियासतनामा की अपनी शर्त यही है, कि भागीदार की याद को तटस्थ विवरण की तरह पेश न किया जाए।

जो दस्तावेज़ से पुष्ट होता है, वह विदेशी मदद के संघ का व्यवहार है। जुलाई के पहले हफ़्ते में, यानी अवमूल्यन के लगभग एक महीने बाद, "एड इंडिया कंसोर्टियम ने माँगी गई बढ़ोतरी पर सकारात्मक विचार करने पर सहमति जताई," फ़ेडरल रिज़र्व की रिपोर्ट के अपने शब्दों में। इससे इतना साबित होता है कि अवमूल्यन और मदद के बीच कोई संबंध ज़रूर था। नतीजा दर्ज है। इससे यह साबित नहीं होता कि दबाव कितना बड़ा था, या किसने किससे क्या कहा। यह अगला हिस्सा किसी दस्तावेज़ से नहीं आता। यह भागीदारों की याद से आता है। इतिहासकारों के बीच इस पर मतभेद है कि बाहरी दबाव कितना निर्णायक था। कुछ विवरण इसे मुख्य वजह बताते हैं। कुछ इसे कई वजहों में एक मानते हैं। दोनों की जड़ अंततः भागीदारों की अपनी याद में है, किसी स्वतंत्र तीसरे गवाह में नहीं।

राज्यसभा में 82 पन्नों की बहस, लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव

राज्यसभा के अपने डिजिटल पुरालेख की सूची के मुताबिक़, 22 अगस्त 1966 को सदन में "रुपये का अवमूल्यन" शीर्षक से एक प्रस्ताव पर बहस हुई। यह बहस बहस-वृत्तांत के पृष्ठ 3423 से 3505 तक चली, यानी क़रीब 82 पन्नों तक। यह लेख इस सूची तक पहुँच सका, पर पूरा पीडीएफ़ नहीं खोल सका। राज्यसभा और लोकसभा दोनों के पुरालेख इस लेखन के समय जावास्क्रिप्ट पर चलने वाले नए ढाँचे पर जा चुके हैं। यह ढाँचा सीधे पीडीएफ़ नहीं परोसता, सिर्फ़ एक ख़ाली वेब-पन्ना लौटाता है।

पुराना संसद भवन, नई दिल्ली; अगस्त 1966 में रुपये के अवमूल्यन पर राज्यसभा और लोकसभा दोनों की बहस इसी भवन में हुई थी
तस्वीर: David Castor, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain :::

लोकसभा की तरफ़ भी एक ठोस निशान मिलता है। संसद के पुरालेख में एक फ़ाइल का शीर्षक "अविश्वास प्रस्ताव" है, तारीख़ 4 अगस्त 1966। एक अलग जगह मिली एक प्रति का शीर्षक "अविश्वास प्रस्ताव और अन्य विधायी कार्य" है, तारीख़ 25 जुलाई 1966। दोनों मिलाकर इतना दिखता है कि जुलाई के आख़िर से अगस्त की शुरुआत तक लोकसभा में सरकार के ख़िलाफ़ एक अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चली, ठीक उसी मौसम-सत्र में जब राज्यसभा अवमूल्यन पर अलग से बहस कर रही थी। नतीजा क्या रहा? बहस में किसने क्या कहा? यह इस लेख के पास मौजूद जानकारी में दर्ज नहीं है। यहाँ भी सिर्फ़ फ़ाइल का शीर्षक और तारीख़ मिली, पन्नों के भीतर का पाठ नहीं।

इतना दस्तावेज़ के आधार पर सुरक्षित है: यह मामला संसद के किसी एक दिन तक सीमित नहीं रहा। दो अलग सदनों में, दो अलग मौक़ों पर, इस पर अलग से समय दिया गया। एक बहस का दर्ज आकार ही 82 पन्नों का है।

चौथी पंचवर्षीय योजना टली, तीन वार्षिक योजनाएँ आईं

दिलचस्प बात यह है कि फ़ेडरल रिज़र्व की वही रिपोर्ट, घटना के तीन हफ़्ते बाद लिखी गई, अवमूल्यन को "चौथी पंचवर्षीय योजना के शुरू होने के साथ" घटी एक नीतिगत तब्दीली बताती है। यानी 27 जुलाई 1966 तक, बाहर से देखने वालों के लिए, चौथी योजना अब भी शुरू हो रही योजना थी। टली हुई योजना नहीं।

बाद का रिकॉर्ड कुछ और कहता है, और यह लगभग हर सिंहावलोकन में एक जैसा दोहराया जाता है। योजना आयोग की मूल योजना चौथी पंचवर्षीय योजना को अप्रैल 1966 से शुरू करने की थी। सूखे, जंग और अवमूल्यन के दबाव ने पाँच साल के लिए साधनों का भरोसेमंद अनुमान लगाना असंभव बना दिया। इसकी जगह तीन अलग-अलग वार्षिक योजनाएँ आईं: 1966-67, 1967-68 और 1968-69। असली चौथी पंचवर्षीय योजना 1969 में शुरू हुई, तीन साल देर से। यह अंतराल आमतौर पर "प्लान हॉलिडे" कहलाता है।

यह लेख योजना आयोग का अपना प्रस्ताव या उस साल का आर्थिक सर्वेक्षण सीधे खोलकर यह पुष्टि नहीं कर सका कि टालने का औपचारिक फ़ैसला ठीक किस तारीख़ को लिया गया। जुलाई 1966 तक भी बाहर की भाषा में योजना "शुरू हो रही" थी। अंततः जो हुआ, वह तीन साल की योजना-रहित अवधि थी। दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं, अगर टालने का फ़ैसला धीरे-धीरे, महीनों के दौरान बना हो। पर यह एक अनुमान भर है, और इसे अनुमान की तरह ही पढ़ा जाना चाहिए।

निर्यात 1966 में गिरा, बढ़त 1968 के बाद शुरू हुई

अवमूल्यन का बुनियादी तर्क यह था कि सस्ता रुपया निर्यात को सस्ता करेगा और आयात को महँगा, जिससे व्यापार घाटा सिकुड़ेगा। सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी के शोध-पत्र में दी गई तालिका, जो "इंडिया एंड इंटरनेशनल मॉनेटरी मैनेजमेंट" नाम की किताब से आँकड़े लेती है, दिखाती है कि यह जवाब तुरंत नहीं आया।

सालनिर्यात (करोड़ रुपये)आयात (करोड़ रुपये)घाटा (करोड़ रुपये)
19651,2642,194930
19661,1532,078925
19671,1932,008815
19681,3541,909555
19691,4091,567158
19701,5241,624100

अवमूल्यन के साल, यानी 1966 में ही, निर्यात पिछले साल से नीचे गिर गया, 1,264 करोड़ से 1,153 करोड़ रुपये। 1967 में भी यह 1965 के स्तर से नीचे रहा। घाटा फिर भी धीरे-धीरे सिकुड़ा। वजह आयात का घटना था। निर्यात की असली बढ़त अभी दूर थी। असली मोड़ 1968 के बाद दिखता है, अवमूल्यन के दो साल बाद, जब निर्यात लगातार बढ़ना शुरू होता है और घाटा तेज़ी से सिकुड़ता है।

यह तस्वीर 1948 की है, 1966 की नहीं; बॉम्बे बंदरगाह पर लंगर डाले दो अमेरिकी मालवाहक जहाज़, उसी आयात-निर्भर दौर का दृश्य जो 1966 तक चला
तस्वीर: Photo Division, Ministry of Information & Broadcasting, Government of India, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain :::

इसकी एक वजह ख़ुद अवमूल्यन के साथ आई नीतियों में है। सरकार ने रुपये को सस्ता करने के साथ-साथ पुरानी निर्यात-सब्सिडी हटा दी। यह पहला झटका था। 12 प्रमुख जिंसों पर, जो कुल निर्यात का लगभग 60 फ़ीसदी थे, 40 फ़ीसदी तक निर्यात-शुल्क भी लगा दिया। यह दूसरा झटका था। एक हाथ से जो दिया, दूसरे से आंशिक रूप से वापस लिया गया। फ़ेडरल रिज़र्व की रिपोर्ट ख़ुद, अवमूल्यन के तीन हफ़्ते के भीतर, यह दर्ज करती है कि अख़बारों की ख़बरों के मुताबिक़ सरकार पहले से ही निर्यात-शुल्क घटाने और सब्सिडी लौटाने पर विचार कर रही थी। जो नीति अभी लागू हुई थी, उसका आंशिक उलटाव उसी महीने शुरू हो चुका था। अर्थशास्त्री टी.एन. श्रीनिवासन, जिन्हें यह शोध-पत्र उद्धृत करता है, इसे "बाहरी दबाव के आगे झुकना" कहते हैं। उनके मुताबिक़ इसी झुकाव ने उदारीकरण को राजनीतिक रूप से संदिग्ध बना दिया। यह श्रीनिवासन का अपना आकलन है, इस शोध-पत्र में उद्धृत। इस लेख ने ख़ुद यह आकलन नहीं किया।

आत्मनिर्भरता का सबक़, और 1991 से एक फ़र्क़

फ़ैसले के राजनीतिक ख़र्च और निर्यात के धीमे जवाब का मेल एक सबक़ में बदला जो अगले पच्चीस साल की नीति पर छाया रहा: बाहरी मदद पर निर्भरता ख़तरनाक है, इसलिए आत्मनिर्भरता प्राथमिकता होनी चाहिए। यह सबक़ बैंक राष्ट्रीयकरण जैसे बाद के फ़ैसलों की पृष्ठभूमि में बार-बार दिखता है। वह एक अलग, अपनी दस्तावेज़ी बुनियाद वाली कहानी है। इस लेख का विषय कुछ और है।

1991 का अवमूल्यन अक्सर 1966 के साथ जोड़कर देखा जाता है। सतही समानता सच है: दोनों बार भंडार संकट में थे, दोनों बार बाहरी मदद की शर्तें जुड़ी थीं। पर असली फ़र्क़ बाद के पच्चीस साल के रिकॉर्ड में दिखता है, सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी के इसी शोध-पत्र के मुताबिक़। 1966 में उदारीकरण अवमूल्यन का साथी था, और मदद वापस पूरी तरह न मिलने पर उसे पीछे खींच लिया गया, जैसा ऊपर निर्यात-शुल्क के मामले में दिखा। 1991 में ऐसा नहीं हुआ। उदारीकरण जारी रहा, भले ही उसकी शुरुआती वजहों में बाहरी शर्तें भी शामिल थीं।

पाँच दस्तावेज़ नहीं खुल सके

यह सूची जान-बूझकर यहाँ है।

भारतीय रिज़र्व बैंक की अपनी "हिस्ट्री ऑफ़ द रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया, वॉल्यूम तीन, 1967-81" की विषय-सूची यह लेख खोल सका, rbi.org.in के ज़रिए। इस हद तक कि किताब के पंद्रह अध्यायों के नाम पता हैं, पहला "The Defining Event", यानी "वह घटना जिसने बाक़ी सब तय किया।" पर हर अध्याय का असली पीडीएफ़ rbidocs.rbi.org.in पर एक बॉट-सुरक्षा दीवार के पीछे है। हर बार सादी फ़ाइल की जगह एक जावास्क्रिप्ट चुनौती-पन्ना लौटा। कई अलग तरीक़ों से कोशिश हुई, अलग यूज़र-एजेंट और रेफ़रर के साथ भी। हर बार वही नतीजा।

दूसरा: 1966-67 का आर्थिक सर्वेक्षण नहीं खुला। तीसरा: संसद के दोनों सदनों की उस हफ़्ते की बहस का पूरा पाठ नहीं खुला, सिर्फ़ शीर्षक और पन्ना-संख्या मिली, जैसा ऊपर दर्ज है। चौथा: योजना आयोग का अपना कोई दस्तावेज़ नहीं खुला। पाँचवाँ: आई.जी. पटेल और बी.के. नेहरू के संस्मरण नहीं खुले, इसलिए इस लेख में उनकी कोई बात उद्धरण-चिह्न में नहीं है, सिर्फ़ उनके पद और भूमिका का ज़िक्र है।

एक व्यापक रूप से बताई जाने वाली बात इसी वजह से यहाँ नहीं है: कि उन हफ़्तों में रिज़र्व बैंक के भंडार एक ख़ास आँकड़े से गिरकर ठीक दूसरे आँकड़े पर आ गए थे। यह दावा कई जगह अलग-अलग रूपों में मिला। किसी एक जगह भी किसी प्राथमिक दस्तावेज़ से पुष्ट नहीं हुआ। इसलिए वह आँकड़ा यहाँ नहीं है, चाहे वह कितना भी दोहराया जाता हो।

यह सूची कमी नहीं, दायरा है। जो दस्तावेज़ से साबित हो सका, वह ऊपर है। जो नहीं हो सका, वह यहाँ है।

स्रोतUS Federal Reserve Board of Governors, Selected Interest and Exchange Rates (H.13), साप्ताहिक चार्ट सीरीज़, 27 जुलाई 1966, भारतीय रिज़र्व बैंक, History of the Reserve Bank of India, Volume III (1967-1981), विषय-सूची पृष्ठ, Devika Johri और Mark Miller, 'Devaluation of the Rupee: Tale of Two Years, 1966 and 1991', Centre for Civil Society शोध-पत्र, Forbes India, 11 अगस्त 2014, 'India's 1966 Rupee Devaluation and Reserve Currency Status: A Critical Analysis', Partners Universal International Innovation Journal के शोध-पत्र का सार, Zenodo पर, विकिपीडिया, पी.सी. भट्टाचार्य (रिज़र्व बैंक गवर्नर के कार्यकाल की तारीख़ों के लिए), विकिपीडिया, सचींद्र चौधरी (वित्त मंत्री के कार्यकाल की तारीख़ों के लिए), विकिपीडिया, बी.के. नेहरू (राजदूत के कार्यकाल की तारीख़ों के लिए), विकिपीडिया, एल.के. झा (प्रधानमंत्री के सचिव पद के लिए), राज्यसभा डिजिटल पुरालेख की सूची, 22 अगस्त 1966 की बहस का शीर्षक और पृष्ठ-संख्या (पूरा पाठ नहीं खुल सका)

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।