पहला आम चुनाव: हर उम्मीदवार का अपना मतपेटी थी, और वोटर को कुछ लिखना नहीं था
सुकुमार सेन की अपनी रिपोर्ट कहती है कि देश में साक्षरता सिर्फ़ 16.6 फ़ीसदी थी, इसलिए मतपत्र पर नाम छापने का कोई मतलब नहीं था। जो तरीक़ा निकाला गया, उसमें पचीस लाख से ज़्यादा पेटियाँ लगीं।
एक मतदान कक्ष की कल्पना कीजिए, जिसमें परदे के पीछे चार पेटियाँ रखी हैं।
हर पेटी पर एक चिह्न चिपका है, और उसी चिह्न के नीचे मोटे अक्षरों में एक उम्मीदवार का नाम लिखा है।
वोटर के हाथ में जो काग़ज़ है, उस पर कुछ नहीं छपा। न नाम, न चिह्न, न ख़ाना। निर्वाचन आयोग की रिपोर्ट उसे "एक निरा टोकन, जिस पर निशान लगाने की ज़रूरत नहीं" कहती है।
वोटर को बस इतना करना है कि वह काग़ज़ उस पेटी में डाल दे जिस पर उसके उम्मीदवार का चिह्न है।
यही 1951-52 का मतदान था।
वजह एक वाक्य में लिखी है
आयोग की रिपोर्ट के नौवें अध्याय में वह वाक्य है जिससे यह पूरा ढाँचा निकला।
उसमें लिखा है कि भारत में साक्षरता की दर लगभग 16.6 फ़ीसदी ही है, इसलिए उन बहुसंख्य वोटरों के लिए, जो निरक्षर हैं, ऐसे मतपत्र पर निशान लगाना असंभव होता जिस पर उम्मीदवारों के नाम छपे हों।
16.6 फ़ीसदी साक्षर, यानी 83.4 फ़ीसदी निरक्षर।
यह आँकड़ा मायने रखता है क्योंकि आजकल हर जगह 85 फ़ीसदी छपता है। आयोग की रिपोर्ट में वह कहीं नहीं है। जो है वह 16.6 है, और यही वह संख्या है जिसने पेटियों वाला तरीक़ा गढ़ा।
पेटियाँ कितनी लगीं
हिसाब दो मान्यताओं पर लगाया गया था। हर सीट पर लगभग चार उम्मीदवार, और हर बूथ पर लगभग एक हज़ार वोटर।
उस हिसाब से 19,05,324 पेटियाँ चाहिए थीं।
राज्यों ने असल में 24,73,850 ख़रीदीं।
चार उम्मीदवार वाला अनुमान कई राज्यों में टूट गया, क्योंकि बहुत सी सीटों पर इससे ज़्यादा लोग खड़े हुए। रिपोर्ट लिखती है कि अतिरिक्त पेटियाँ लगभग हर राज्य में बहुत कम समय पर भेजनी पड़ीं।
मद्रास में एक निर्माता ने लोहे की पेटियाँ देने से हाथ खींच लिया, तो वहाँ 1,11,095 लकड़ी की पेटियाँ इस्तेमाल हुईं।
कुल लागत 1,22,87,349 रुपये।
जहाँ लोकसभा और विधानसभा का मतदान एक साथ था, वहाँ दो अलग डिज़ाइन की पेटियाँ रखी गईं ताकि गड़बड़ न हो। हर पेटी पर चिह्न की दो नक़लें चिपकाई गईं, एक बाहर और एक भीतर, ताकि बाहर वाली फट जाए तो गिनती के वक़्त पहचान बनी रहे।
आरक्षित सीट पर खड़े दल के उम्मीदवार को वही दल का चिह्न मिलता था, पर उसके चारों तरफ़ एक मोटा घेरा छपा होता। तीन सदस्यों वाली सीट पर तीसरे उम्मीदवार के लिए एक और बड़ा घेरा।
आयोग का अपना निष्कर्ष: कोई ऐसा मामला सामने नहीं आया जिसमें किसी वोटर को चिह्न ढूँढ़ने या समझने में दिक़्क़त हुई हो।
स्याही, जो सीएसआईआर ने बनाई
अमिट स्याही का प्रावधान 1951 के नियमों के नियम 22 में था, और मक़सद यह था कि कोई दूसरे के नाम पर वोट न डाल दे।
वोटर की बाईं तर्जनी पहले देखी जाती थी। निशान न हो तो मतपत्र दिया जाता और फिर उँगली पर निशान लगता।
स्याही आयोग के कहने पर वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने बनाई। लगाने के लिए काँच की एक छोटी छड़ इस्तेमाल होती थी, और निशान हफ़्ते भर या उससे ज़्यादा रहता था।
राज्यों को 3,89,816 शीशियाँ भेजी गईं, 2,27,460 रुपये में।
शिकायतें आईं कि निशान रगड़कर या रसायन से मिटाया जा सकता है। जाँच हुई और आयोग ने उन्हें निराधार पाया, यह कहते हुए कि असल में उँगलियों पर ठीक से निशान लगाया ही नहीं गया था।
जो कहानी आमतौर पर नहीं सुनाई जाती
रोल बनाते वक़्त आयोग को पता चला कि कुछ राज्यों में बहुत सी महिलाएँ अपने नाम से दर्ज नहीं हुई थीं।
वे "फ़लाँ की माँ" या "फ़लाँ की पत्नी" लिखी गई थीं। रिपोर्ट वजह भी बताती है: स्थानीय रिवाज़ के मुताबिक़ उन इलाक़ों की महिलाएँ अजनबियों को अपना नाम बताने से हिचकती थीं।
आयोग ने निर्देश जारी किया कि जो महिला अपना सही नाम न बताए उसे वोटर के रूप में दर्ज न किया जाए, और अगर पहले से दर्ज हो चुकी है तो वह प्रविष्टि हटा दी जाए।
नतीजा रिपोर्ट अपने ही शब्दों में लिखती है। इसका दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम यह हुआ कि बहुत सी महिला वोटरों के नाम काट दिए गए और वे आम चुनाव में वोट नहीं डाल सकीं, क्योंकि उनके नाम रोल पर थे ही नहीं।
संख्या भी वहीं है। देश की लगभग आठ करोड़ महिला वोटरों में से लगभग 28 लाख ने आख़िर तक अपना सही नाम नहीं बताया, और उनसे जुड़ी प्रविष्टियाँ हटानी पड़ीं।
रिपोर्ट कहती है कि ऐसे लगभग सारे मामले बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत, राजस्थान और विंध्य प्रदेश के थे।
बिहार को अर्ज़ी देने के लिए एक महीने का अतिरिक्त समय मिला और आयोग लिखता है कि उसका अच्छा इस्तेमाल हुआ और वहाँ रोल बड़ी हद तक सुधर गए। राजस्थान को भी उतना ही समय मिला, पर वहाँ प्रतिक्रिया कमज़ोर रही और बड़ी संख्या में नाम हटाने पड़े।
आयोग की क़ानूनी दलील यह थी कि नाम किसी वोटर की पहचान का ज़रूरी हिस्सा है, इसलिए वह रोल में होना ही चाहिए।
रोल, जो संविधान से पहले बनने लगा
राज्यों से रोल की तैयारी की योजना बनाने को नवंबर 1947 में ही कह दिया गया था। संविधान तब बना नहीं था।
पंजीकरण घर-घर जाकर होना था, और गिनती 1941 की जनगणना में दिए गए मकान नंबरों के आधार पर चलनी थी। नए मकानों को पूरक नंबर मिले।
फिर 1950 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम आया और उसने पात्रता की तारीख़ बदल दी। आयोग लिखता है कि इससे वह आधार ही बदल गया जिस पर पिछले ढाई साल में मसौदा रोल तैयार हुए थे, वे बड़े पैमाने पर ग़लत और पुराने पड़ गए, और भारी मात्रा में नया काम करना पड़ा।
1,652 निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी नियुक्त हुए। रोल छापने में 3,84,215 रीम काग़ज़ लगा।
और एक ब्योरा जो पूरी कवायद का मिज़ाज बता देता है। रोल गाँव-गाँव करके छापे गए थे, पर निर्वाचन क्षेत्र उसके बाद तय हुए। तो 16,523 क्लर्क लगभग छह महीने तक बैठकर उन छपे हुए रोल को क्षेत्रवार सेट में जोड़ते रहे।
मतदान आठ महीने चला, और वजह मानसून नहीं थी
मतदान 25 अक्टूबर 1951 को हिमाचल प्रदेश में शुरू हुआ और 21 फ़रवरी 1952 को उत्तर प्रदेश में ख़त्म हुआ। पूरा कार्यक्रम, पहली अधिसूचना से आख़िरी परिषद तक, आठ महीने से ज़्यादा चला।
ज़्यादातर मतदान दिसंबर 1951 और जनवरी 1952 में हुआ।
रिपोर्ट फैलाव की दो वजहें बताती है, और उनमें बारिश नहीं है।
पहली, कर्मचारी। जितने लोग जुटाए जा सकते थे उन्हीं से तय होता था कि मतदान कितने दिन में होगा। जहाँ लोग कम पड़े वहाँ इसे कई दिनों में बाँटना पड़ा। राज्यों ने ख़ुद भी बीच में अंतराल माँगे ताकि उनके साधनों पर बोझ न पड़े।
दूसरी, बर्फ़। हिमाचल के कुछ हिस्से महीनों बर्फ़ में बंद रहते हैं, इसलिए चीनी और पांगी में मतदान बर्फ़बारी से पहले जल्दी कराना पड़ा। यही वजह है कि पूरा चुनाव अक्टूबर में हिमाचल से शुरू होता है। उत्तर प्रदेश ने इसके उलट कहा कि वह जनवरी-फ़रवरी 1952 से पहले मतदान नहीं करा सकता।
126 लोकसभा और 1,846 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान एक ही दिन पूरा हुआ। सबसे लंबा पंजाब के होशियारपुर में चला, पचीस दिन।
पहुँचने का सवाल
रिपोर्ट का वह हिस्सा जहाँ यह लिखा है कि चुनाव कर्मी वहाँ तक पहुँचे कैसे, सबसे पढ़ने लायक़ है।
बाहरी मणिपुर में कोई साधन नहीं था। कुली तभी मिले जब पहाड़ी मुखियाओं को मनाया गया, और मदद करने वालों से वादा किया गया कि उन्हें लाल कंबल का एक टुकड़ा और बंदूक़ का लाइसेंस मिलेगा।
त्रिपुरा में कुछ जगह हाथी इस्तेमाल हुए। ज़्यादातर जगह दल पैदल चले, दिन में लगभग चालीस मील।
राजस्थान के बाड़मेर और जालोर में साधारण गाड़ियाँ बेकार साबित हुईं और सेना की गाड़ियाँ मँगानी पड़ीं, जो अक्सर रेत में फँस जाती थीं। रिपोर्ट लिखती है कि एक वक़्त डर था कि मतदान की सारी व्यवस्था ही ढह जाएगी। राज्य भर की जीपें इकट्ठा करके उन दो ज़िलों में भेजी गईं। जैसलमेर और जोधपुर में दल ऊँटों पर गए, हर दल किसी क़ाफ़िले की तरह चलता हुआ। जयपुर में एक नियंत्रण कक्ष तीन पालियों में चौबीसों घंटे चला।
असम में दल कई दिन तक बिना रास्ते वाले जंगलों से गुज़रे। एक अग्रिम टुकड़ी आगे जाकर पेड़ों के तनों पर सबसे छोटा रास्ता निशान लगाती जाती थी, ताकि पीछे आने वाले भटक न जाएँ।
आयोग इस अध्याय के आख़िर में एक बात दर्ज करता है। एक भी ऐसा मामला नहीं हुआ जिसमें मतदान इसलिए टालना पड़ा हो कि दल समय पर मतदान केंद्र तक नहीं पहुँच सका।
और एक कोशिश जो नाकाम रही
लक्षद्वीप, मिनिकॉय और अमीनदीवी के रोल द्वीपों तक भेजे ही नहीं जा सके। वे तट से 123 से 240 मील दूर हैं, और वहाँ के जहाज़ों में इंजन नहीं थे, इसलिए वे चक्रवात के मौसम में नहीं चल सकते थे।
राज्य सरकार ने अच्छी ख़ासी क़ीमत देकर एक निजी जहाज़ किराए पर लिया। उसने दो बार कोशिश की और दोनों बार लौट आया। बड़ा जहाज़ और फिर नौसेना का जहाज़ लेने की कोशिश भी नाकाम रही।
19 मार्च 1951 को आयोग ने हार मान ली और तय किया कि उन द्वीपों के रोल मुख्य भूमि पर ही प्रकाशित कर दिए जाएँ, कोझीकोड और मंगलौर के तहसीलदार दफ़्तरों में, और यही क़ानून का पालन माना जाएगा।
जो आँकड़ा सब ग़लत पढ़ते हैं
मतदान का प्रतिशत हर जगह 45.7 छपता है, और उसे यह कहकर छापा जाता है कि इतने वोटरों ने वोट डाला।
रिपोर्ट में यह दो अलग संख्याएँ हैं।
खंड दो की चौथी सारणी में 45.7 दर्ज है, और वह डाले गए वैध वोटों का, उपलब्ध कुल वोटों से अनुपात है। 10,59,44,495 वैध वोट, 23,19,96,701 कुल वोटों में से।
खंड एक में आयोग अलग से लिखता है कि 51.15 फ़ीसदी वोटरों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया।
दोनों में फ़र्क़ क्यों है, यह दोहरी सीटों से आता है। 86 दो सदस्यों वाली और एक तीन सदस्यों वाली लोकसभा सीट थी, और वहाँ एक वोटर के पास एक से ज़्यादा वोट थे। इसीलिए कुल वोट 23.2 करोड़ हैं जबकि कुल वोटर 17,32,13,635।
यानी 45.7 का हर वोटों का है, लोगों का नहीं। लोगों वाला आँकड़ा 51.15 है।
दोनों आयोग के अपने हैं। बस उन्हें एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
आयोग अपने बारे में क्या लिखता है
रिपोर्ट पर सुकुमार सेन के दस्तख़त 4 फ़रवरी 1955 के हैं। आयोग का दफ़्तर 25 जनवरी 1950 को बना और सेन ने 21 मार्च 1950 को कार्यभार सँभाला।
वे आयोग के इकलौते सदस्य थे। रिपोर्ट लिखती है कि अब तक कोई दूसरा सदस्य नियुक्त करने का अवसर नहीं आया।
1948 से 1952 तक कुल ख़र्च लगभग 10.4 करोड़ रुपये रहा, जिसका लगभग आधा केंद्र का था। आयोग इसे प्रति वोटर नौ आने छह पाई बताता है, दोनों चुनावों को मिलाकर, और लिखता है कि यह किसी भी तरह ज़्यादा नहीं लगता।
"विश्व का सबसे बड़ा चुनाव" वाला वाक्य आयोग की रिपोर्ट में नहीं है। जो है वह यह है कि यह आस्था का एक कार्य था, आम भारतीय और उसकी व्यावहारिक समझ पर आस्था।
और वह तरीक़ा गया कब
पेटियों वाली व्यवस्था एक दिन में ख़त्म नहीं हुई।
1957 के दूसरे आम चुनाव में वह ज्यों की त्यों चली। चार राष्ट्रीय दलों में से तीन तुरंत बदलाव के ख़िलाफ़ थे।
उसके बाद उपचुनावों में निशान लगाने वाली व्यवस्था आज़माई गई। 1960 में केरल विधानसभा चुनाव में उसे बड़े पैमाने पर आज़माया गया, जहाँ साक्षरता ज़्यादा होने के कारण आयोग उसे पूरी तरह सफल बताता है।
1962 के तीसरे आम चुनाव में नई व्यवस्था लगभग पूरे देश में लागू हुई। 1967 तक पुरानी व्यवस्था सिर्फ़ अंडमान निकोबार और हिमाचल की तीन बर्फ़ से घिरी विधानसभा सीटों में बची, लाहौल-स्पीति, भरमौर और किन्नौर।
आयोग ने छोड़ने की वजहें भी लिखीं। इतनी पेटियाँ सँभालना बोझिल था, उम्मीदवारों के मन में छेड़छाड़ का शक़ पैदा होता था, और एक बेईमान वोटर कोरा टोकन जेब में डालकर बाहर ले जा सकता था और किसी एजेंट को बेच सकता था।
नई व्यवस्था में एक ही मतपत्र पर सब उम्मीदवार और उनके चिह्न छपे होते, और एक ही साझा पेटी होती।
चिह्न फिर भी नहीं हटे। 1957 की रिपोर्ट इसे एक वाक्य में कहती है, कि चिह्न निरक्षर वोटर की सुविधा के लिए अब भी रखे गए हैं, बस वे पेटियों की जगह मतपत्रों पर छपते हैं।
स्रोतभारत निर्वाचन आयोग, पहले आम चुनाव की रिपोर्ट, खंड एक, भारत निर्वाचन आयोग, पहले आम चुनाव की रिपोर्ट, खंड दो, भारत निर्वाचन आयोग, 1957, 1962 और 1967 की रिपोर्टें