भारत पन्ना
हिसाब-किताब

हाई कोर्टों में अगस्त की 42 नियुक्तियों के बाद ख़ाली कुर्सियाँ 341 से घटकर 304 हुईं

1 जुलाई और 1 अगस्त 2026, न्याय विभाग की दोनों मासिक सूचियों में एक ही संख्या दर्ज है: 1,122 स्वीकृत पद, 781 कार्यरत जज, 341 ख़ाली कुर्सियाँ। 1 सितंबर की सूची में ख़ाली पद 304 हैं। बीच में 7, 20 और 27 अगस्त की छह अधिसूचनाएँ हैं।

प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट का मुख्य भवन। गिनती में सबसे बड़ा ख़ालीपन यहीं है, 160 स्वीकृत पदों में 53 कुर्सियाँ ख़ाली
तस्वीर: Vroomtrapit at English Wikipedia, विकिमीडिया कॉमन्स CC0

1 जुलाई 2026 को देश के 25 हाई कोर्टों में जजों के 1,122 पद स्वीकृत थे, 781 जज काम कर रहे थे, और 341 कुर्सियाँ ख़ाली पड़ी थीं।

ठीक एक महीने बाद, 1 अगस्त की सूची में तीनों संख्याएँ वही थीं। 1,122, 781, 341।

1 सितंबर की सूची में तीसरी संख्या 304 है।

ये तीनों आँकड़े न्याय विभाग की उसी मासिक सूची से हैं जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों में जजों की स्वीकृत संख्या, कार्यरत संख्या और रिक्तियाँ दर्ज करती है। हर महीने की पहली तारीख़ की स्थिति उसमें आती है। 1 सितंबर वाली अब तक की सबसे ताज़ा है।

341 में 1,122 का भाग देने पर 30.39 फ़ीसदी आता है, यानी 1 जुलाई को हर तीन में से लगभग एक कुर्सी ख़ाली थी। 304 का हिस्सा 27.09 फ़ीसदी है।

दो महीने तक जो संख्या एक अंक नहीं हिली, वह तीसरे महीने में 37 घट गई। इस लेख की शुरुआत उन्हीं 37 से है, और उसके बाद उस ढाँचे से जो बाक़ी 304 को अपनी जगह पर बनाए रखता है।

अगस्त के छह आदेश और 37 कुर्सियाँ

2026 की सात मासिक सूचियाँ साथ रखने पर ख़ाली कुर्सियों की रेखा पहले ऊपर जाती है, फिर दो महीने ठहरती है, फिर गिरती है।

सूची की तारीख़स्वीकृतकार्यरतख़ाली
1 मार्च 20261,122811311
1 अप्रैल 20261,122801321
1 मई 20261,122797325
1 जून 20261,122789333
1 जुलाई 20261,122781341
1 अगस्त 20261,122781341
1 सितंबर 20261,122818304

जुलाई और अगस्त में कुल संख्या नहीं बदली, पर उसके भीतर की बनावट बदल गई थी। स्थायी पदों पर बैठे जज 687 से घटकर 684 हुए और अतिरिक्त पदों पर बैठे जज 94 से बढ़कर 97। जोड़ दोनों महीनों में 781 रहा।

फिर अगस्त में छह अधिसूचनाएँ निकलीं, तीन अलग तारीख़ों पर।

7 अगस्त 2026 को चार आदेश जारी हुए। मद्रास हाई कोर्ट में कृष्णस्वामी गोविंदराजन समेत पंद्रह लोग जज और अतिरिक्त जज नियुक्त हुए। कलकत्ता हाई कोर्ट में आर्यक दत्त समेत आठ अधिवक्ता अतिरिक्त जज बने। कर्नाटक हाई कोर्ट में राघवेंद्र सीतारम श्रीवत्स समेत छह, और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अमित लाहोटी अकेले। 20 अगस्त को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के लिए नौ अधिवक्ताओं की अधिसूचना निकली, जिनमें पहले दो नाम मोनिका छिब्बर शर्मा और हरमीत सिंह देओल हैं। 27 अगस्त को हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में चिराग भानु सिंह जज बनाए गए और दो अन्य न्यायिक अधिकारी अतिरिक्त जज।

जोड़ने पर 42 नियुक्तियाँ बनती हैं।

ख़ाली पद 42 नहीं, 37 घटे, क्योंकि इसी महीने आंध्र प्रदेश में दो कुर्सियाँ ख़ाली हुईं, छत्तीसगढ़ में दो और गुजरात में एक। 42 में से 5 घटने पर 37, और 341 में से 37 घटने पर 304।

ये 37 कुर्सियाँ किस तरह के पदों पर भरीं, यह भी सूची में दिखता है। 1 अगस्त को स्थायी पदों पर 684 जज बैठे थे और 1 सितंबर को 688, यानी शुद्ध बढ़त चार की। अतिरिक्त पदों पर उसी दौरान 97 से 130, यानी तैंतीस की। अगस्त में जो कुर्सियाँ भरीं, उनमें ज़्यादातर दो-दो साल की नियुक्तियाँ हैं।

37 की यह उछाल 2026 की सबसे बड़ी हलचल है। उससे पहले सबसे बड़ा बदलाव मार्च से अप्रैल के बीच था, जब कार्यरत संख्या दस घटी थी।

हर अधिसूचना के सिरे पर उसकी फ़ाइल संख्या छपी है, और उसमें एक साल दर्ज होता है। पंजाब एवं हरियाणा वाले आदेश पर K-13029/04/2025, मद्रास वाले पर K-13026/05/2025, कलकत्ता वाले पर K-11015/03/2025 और हिमाचल वाले पर K-13020/01/2025। कर्नाटक वाले पर 2026 है, K-13023/01/2026। और मध्य प्रदेश में अकेले अमित लाहोटी की नियुक्ति जिस फ़ाइल से निकली, उसकी संख्या K-13025/02/2024 है। फ़ाइल का साल यह नहीं बताता कि कोई नाम कितने दिन चला। इतना ज़रूर बताता है कि 7 अगस्त 2026 को एक ही दिन निकले चार आदेशों की फ़ाइलें तीन अलग सालों में खुली थीं। सभी अधिसूचनाएँ जयसलमेर हाउस, मान सिंह रोड से भारत सरकार प्रेस, मिंटो रोड के प्रबंधक को भेजी गई हैं, राजपत्र के भाग 1, खंड 2 में छपने के लिए।

नई दिल्ली के जयसलमेर हाउस का एक गलियारा, अक्टूबर 2014 में स्वच्छता निरीक्षण के दौरान ली गई तस्वीर। न्याय विभाग इसी इमारत में बैठता है, और हर नियुक्ति अधिसूचना यहीं से राजपत्र में जाती है
तस्वीर: Ministry of Home Affairs, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

सबसे ख़ाली अदालतें

1 सितंबर की सूची में सबसे ख़ाली अदालत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट है। वहाँ 25 पद स्वीकृत हैं और 12 जज बैठते हैं, यानी 13 कुर्सियाँ ख़ाली। हिस्सा ठीक 52 फ़ीसदी।

यह प्रतिशत हमारा निकाला हुआ नहीं है। 1 जुलाई और 1 अगस्त की सूचियों में न्याय विभाग ने रिक्ति के प्रतिशत का एक कॉलम ख़ुद जोड़ा था, और उसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सामने 52 छपा है। 2026 की जो पाँच और सूचियाँ हमने पढ़ीं, मार्च, अप्रैल, मई, जून और सितंबर, उनमें वह कॉलम नहीं है।

हाई कोर्टस्वीकृतकार्यरतख़ालीख़ाली का हिस्सा
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख25121352.00%
छत्तीसगढ़22111150.00%
ओडिशा33171648.48%
झारखंड25131248.00%
मणिपुर53240.00%
मद्रास7566912.00%
हिमाचल प्रदेश1715211.76%
मेघालय4400.00%

छत्तीसगढ़ में 22 में से 11 पद ख़ाली हैं, ठीक आधे। ओडिशा में 33 में 16 और झारखंड में 25 में 12। दूसरे सिरे पर मेघालय है, जहाँ चारों पद भरे हुए हैं, और हिमाचल प्रदेश, जहाँ 27 अगस्त की तीन नियुक्तियों के बाद 17 में सिर्फ़ 2 ख़ाली बचे।

बिलासपुर में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का भवन, अक्टूबर 2013 की तस्वीर। 1 सितंबर की सूची में यह दूसरी सबसे ख़ाली अदालत है, और सबसे ख़ाली जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट है
तस्वीर: swap, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

गिनती में सबसे बड़ा ख़ालीपन इलाहाबाद हाई कोर्ट का है। 160 स्वीकृत पदों में 53 ख़ाली हैं। यह अकेली संख्या सिक्किम, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, इन छह हाई कोर्टों की कुल स्वीकृत संख्या से ज़्यादा है, जो 45 बैठती है।

इलाहाबाद की उन 53 ख़ाली कुर्सियों में 41 अतिरिक्त जजों के पद हैं और 12 स्थायी जजों के। 2026 की जो सात मासिक सूचियाँ अब तक निकली हैं, मार्च से सितंबर तक, सातों में इलाहाबाद के कार्यरत अतिरिक्त जजों की संख्या शून्य दर्ज है। इकतालीस पद स्वीकृत हैं और सात महीने से उन पर कोई नहीं बैठा। इलाहाबाद के 119 स्थायी पदों में से 107 भरे हुए हैं।

275 अस्थायी पद, जो स्थायी तौर पर ख़ाली रहते हैं

1,122 स्वीकृत पदों में सब एक तरह के नहीं हैं। 847 स्थायी जजों के पद हैं और 275 अतिरिक्त जजों के। यानी हर चार में से लगभग एक पद अतिरिक्त श्रेणी का है, ठीक-ठीक 24.51 फ़ीसदी।

अतिरिक्त जज संविधान के अनुच्छेद 224 से आते हैं, और उस अनुच्छेद की भाषा नाप-तौलकर लिखी गई है। वह कहता है कि अगर किसी हाई कोर्ट के कामकाज में अस्थायी बढ़ोतरी हो, या वहाँ काम के बकाया की वजह से राष्ट्रपति को लगे कि जजों की संख्या फ़िलहाल बढ़नी चाहिए, तो वे योग्य व्यक्तियों को अतिरिक्त जज नियुक्त कर सकते हैं, और वह भी दो साल से ज़्यादा की अवधि के लिए नहीं। उसी अनुच्छेद का खंड (3) कहता है कि कोई अतिरिक्त या कार्यकारी जज 62 साल की उम्र के बाद पद पर नहीं रहेगा।

अब वही दो श्रेणियाँ आँकड़े में रखिए। 1 जुलाई को स्थायी पदों में 847 में से 159 ख़ाली थे, यानी 18.77 फ़ीसदी। उसी दिन अतिरिक्त पदों में 275 में से 181 ख़ाली थे, यानी 65.82 फ़ीसदी।

1 सितंबर को स्थायी पदों का आँकड़ा हूबहू वही है, 847 में 159। अतिरिक्त पदों में 275 में 145, यानी 52.73 फ़ीसदी।

275 में से 1451 सितंबर 2026 को ख़ाली पड़े अतिरिक्त जजों के पद। उसी दिन स्थायी पदों में यह अनुपात 847 में 159 था

7 अगस्त का मद्रास वाला आदेश दोनों अनुच्छेदों का इस्तेमाल एक ही अधिसूचना में करता है। पाँच नाम अनुच्छेद 217 के खंड (1) के तहत स्थायी जज बनाए गए हैं। दस नाम अनुच्छेद 224 के खंड (1) के तहत अतिरिक्त जज, दो साल के लिए। उन दस में से दो की अवधि पूरे दो साल की नहीं है। एस. अल्ली की नियुक्ति 10 जून 2028 तक है और तिरुमगल चंद्रशेखर की 4 अगस्त 2028 तक। कारण अधिसूचना में नहीं लिखा, पर अनुच्छेद 224 के खंड (3) की उम्र-सीमा ठीक उन्हीं दो तारीख़ों पर जाकर पड़ती है।

1998 का ज्ञापन इस श्रेणी पर एक वाक्य में साफ़ है। उसका पैराग्राफ़ 22 कहता है कि जिस हाई कोर्ट में स्थायी जज का पद ख़ाली पड़ा हो, वहाँ का मुख्य न्यायाधीश अतिरिक्त जज की सिफ़ारिश न करे।

अस्थायी नियुक्ति का हिसाब आगे भी अलग रहता है। ज्ञापन के पैराग्राफ़ 13 और 21 के मुताबिक़ किसी अतिरिक्त जज को स्थायी करने या उसका कार्यकाल बढ़ाने की सिफ़ारिश भेजते समय मुख्य न्यायाधीश को उस जज के महीनेवार निपटान के आँकड़े, उसके दिए गए फ़ैसले, विधि पत्रिकाओं में छपे मामलों की संख्या, कुल कार्यदिवस, कितने दिन वे अदालत में बैठे और कितने दिन ग़ैरहाज़िर रहे, यह सब प्रमाणित करके भेजना होता है। पहली बार स्थायी जज बनाने के लिए ऐसी कोई सूची नहीं माँगी जाती।

यह रास्ता कम इस्तेमाल नहीं होता। सरकार ने 19 मार्च 2026 को राज्यसभा में बताया कि 1 मई 2014 से 28 फ़रवरी 2026 के बीच हाई कोर्टों में 1,164 नए जज नियुक्त हुए और 820 अतिरिक्त जजों को स्थायी किया गया।

1998 के ज्ञापन में लिखी घड़ियाँ

हाई कोर्ट के जज की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 और 224 से होती है, और जिस प्रक्रिया से होती है वह 1998 में बने एक ज्ञापन में लिखी है। मंत्रालय अपने हर जवाब में उसे एक ही वाक्य में परिभाषित करता है: यह ज्ञापन 6 अक्टूबर 1993 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले (दूसरा जजेज़ केस) और 28 अक्टूबर 1998 की सलाहकारी राय (तीसरा जजेज़ केस) के बाद तैयार हुआ।

बीस पन्ने के उस दस्तावेज़ में स्थायी जज की नियुक्ति के पड़ाव पैराग्राफ़ 11 से 18 तक फैले हैं, और लगभग हर पड़ाव पर एक घड़ी बँधी है।

पैराग्राफ़ 12 शुरुआत तय करता है। जब किसी साल जज का कोई स्थायी पद ख़ाली होने वाला हो, तो हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश जितनी जल्दी हो सके, पर रिक्ति की तारीख़ से कम से कम छह महीने पहले, राज्य के मुख्यमंत्री को अपनी राय भेजेगा कि किन लोगों को चुना जाए। भेजने से पहले उसे अपने दो सबसे वरिष्ठ साथी जजों से नामों की उपयुक्तता पर सलाह लेनी होगी, और वह सलाह लिखित होगी और सिफ़ारिश के साथ ही मुख्यमंत्री तक जाएगी।

पैराग्राफ़ 14 अगली घड़ी बाँधता है। सिफ़ारिश की एक प्रति उसी वक़्त राज्यपाल को जाएगी, और देरी से बचने के लिए एक-एक प्रति भारत के मुख्य न्यायाधीश और केंद्रीय क़ानून मंत्री को भी। राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर, पूरे काग़ज़ात के साथ अपनी सिफ़ारिश क़ानून मंत्री को भेजेगा, जितनी जल्दी हो सके, पर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का प्रस्ताव मिलने से छह हफ़्ते के भीतर। इसके बाद का वाक्य असामान्य है: अगर छह हफ़्ते में टिप्पणी न आए, तो क़ानून मंत्री यह मानकर आगे बढ़ेगा कि राज्यपाल यानी मुख्यमंत्री को प्रस्ताव में कुछ जोड़ना नहीं है।

पैराग्राफ़ 15 पर घड़ी टूट जाती है। वहाँ लिखा है कि क़ानून मंत्री सिफ़ारिशों पर उन दूसरी रिपोर्टों की रोशनी में विचार करेगा जो नामों के बारे में सरकार के पास उपलब्ध हों, और फिर पूरी सामग्री भारत के मुख्य न्यायाधीश को सलाह के लिए भेजी जाएगी। इस पड़ाव के लिए ज्ञापन कोई अवधि नहीं देता। मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के दो सबसे वरिष्ठ जजों के साथ मिलकर राय बनाएगा।

पैराग्राफ़ 15.1 में घड़ी लौट आती है। परामर्श के बाद मुख्य न्यायाधीश चार हफ़्ते के भीतर अपनी सिफ़ारिश क़ानून मंत्री को भेजेंगे। क़ानून मंत्री उसे जितनी जल्दी हो सके, बेहतर हो कि तीन हफ़्ते के भीतर, प्रधानमंत्री के सामने रखेगा, और प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सलाह देंगे। मंज़ूरी के बाद पैराग्राफ़ 17 के तहत चुने गए व्यक्ति से शारीरिक स्वस्थता का प्रमाणपत्र और जन्मतिथि का प्रमाणपत्र लिया जाता है, और पैराग्राफ़ 18 के तहत राजपत्र में अधिसूचना निकलती है।

लिखी हुई घड़ियों को जोड़िए। छह हफ़्ते राज्यपाल के, चार हफ़्ते मुख्य न्यायाधीश के, तीन हफ़्ते क़ानून मंत्री के, कुल तेरह हफ़्ते। जो प्रस्ताव रिक्ति से छह महीने पहले चला हो, वह इन घड़ियों के हिसाब से कुर्सी ख़ाली होने से लगभग तीन महीने पहले राष्ट्रपति तक पहुँच जाना चाहिए।

बीस पन्नों के इस ज्ञापन में नाम लौटाने और सिफ़ारिश दोहराने का ज़िक्र एक बार भी नहीं है। सरकार किसी नाम को कॉलेजियम के पास वापस भेज सकती है और कॉलेजियम उसे दोहरा सकता है, यह व्यवस्था 1993 और 1998 के फ़ैसलों से निकली है। ज्ञापन में न वापसी की कोई प्रक्रिया लिखी है, न दोहराव की, और न उन पर कोई घड़ी बँधी है।

अनुच्छेद 217 में आज भी उस आयोग का नाम छपा है

विधायी विभाग जो संविधान छापता है, उसमें अनुच्छेद 217 का खंड (1) आज भी यह पढ़ता है कि हाई कोर्ट का हर जज राष्ट्रपति अनुच्छेद 124क में उल्लिखित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की सिफ़ारिश पर नियुक्त करेंगे।

वह आयोग मौजूद नहीं है।

पन्ने के नीचे पाद-टिप्पण में पूरी कहानी दर्ज है। ये शब्द संविधान के निन्यानबेवें संशोधन अधिनियम, 2014 की धारा 6 से आए, 13 अप्रैल 2015 से लागू हुए, और सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 के फ़ैसले में उस संशोधन को रद्द कर दिया। जो शब्द असल में चल रहे हैं, भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद, वे मुख्य पाठ में नहीं, उसी पाद-टिप्पण में मिलते हैं।

उसी पाद-टिप्पण में उस मुक़दमे का नाम भी दर्ज है जिसमें यह तय हुआ, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड असोसिएशन और एक अन्य बनाम भारत संघ, और फ़ैसले का पत्रिका-हवाला भी।

अनुच्छेद 224 और 224क में भी यही हुआ है। तीनों जगह छपा हुआ पाठ एक ऐसी संस्था का नाम लेता है जो छह महीने और तीन दिन चली, और तीनों जगह असली नियम दस साल से पन्ने के नीचे है।

देरी पर संसद के छह सवाल और विभाग के जवाब

12 मार्च 2026 को राज्यसभा में सस्मित पात्रा और मोहम्मद नदीमुल हक़ ने अतारांकित प्रश्न 2359 में पूछा कि पिछले पाँच साल में कॉलेजियम से कितनी सिफ़ारिशें आईं, उनमें से कितनी मंज़ूर हुईं, कितनी लौटाई गईं, कितनी सरकार के पास लंबित हैं, और प्रक्रिया के हर पड़ाव पर औसतन तथा अधिकतम कितना समय लगा।

क़ानून राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल के जवाब में 6 मार्च 2026 की स्थिति है, ज्ञापन की प्रक्रिया का वही पैराग्राफ़ है, और अंत में एक जोड़ा आँकड़ा है। 1 जनवरी 2020 से 6 मार्च 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में 37 और हाई कोर्टों में 660 जज नियुक्त हुए, और इसी अवधि में 381 नाम हाई कोर्टों को वापस भेजे गए। किसी पड़ाव का कोई औसत समय जवाब में नहीं है।

19 मार्च को पी. विल्सन ने प्रश्न 3154 में उन सिफ़ारिशों का ब्योरा माँगा जो एक साल से ज़्यादा से सरकार के पास पड़ी हैं, नामों, तारीख़ों और देरी के कारणों समेत। ब्योरा नहीं आया। जवाब में एक वाक्य ज़रूर जुड़ गया। अंग्रेज़ी में लिखा है कि ज्ञापन के मुताबिक़ हाई कोर्टों को रिक्ति से कम से कम छह महीने पहले सिफ़ारिश भेजनी होती है, पर इस समय-सीमा का पालन कम ही होता है। यह वाक्य 12 मार्च के दोनों जवाबों में नहीं था और उसके बाद के जवाबों में बार-बार लौटता है।

23 जुलाई को सस्मित पात्रा ने प्रश्न 594 में दो चीज़ें पूछीं। हर हाई कोर्ट की कुर्सियाँ कब से ख़ाली हैं, और सरकार हर पड़ाव पर औसतन कितना समय लेती है। जवाब के साथ जो अनुलग्नक लगा, वह 1 जुलाई की वही रिक्ति तालिका है, जिसमें स्वीकृत, कार्यरत और ख़ाली के तीन कॉलम हैं। कोई अवधि नहीं, कोई औसत नहीं।

30 जुलाई को विवेक के. तनखा के तारांकित प्रश्न 131 का जवाब सदन के पटल पर रखा गया। उन्होंने पूछा था कि एक साल से ज़्यादा से कितनी कुर्सियाँ ख़ाली हैं, उन पर कॉलेजियम की सिफ़ारिशों की स्थिति क्या है, और उन्हें भरने की अपेक्षित समय-सीमा क्या है। पटल पर रखे बयान में 23 जुलाई 2026 की स्थिति दी गई, 1,122 में 781 कार्यरत। उसके बाद का वाक्य अंग्रेज़ी में है।

इसलिए, हाई कोर्टों में जजों की रिक्तियाँ भरने में लगने वाला समय बताया नहीं जा सकता।

राज्यसभा के तारांकित प्रश्न 131 के जवाब में 30 जुलाई 2026 को सदन के पटल पर रखा गया बयान, अंग्रेज़ी मूल से अनुवाद

अगले दिन, 31 जुलाई को, लोकसभा में राधाकृष्ण के अतारांकित प्रश्न 2144 ने वही सवाल अदालतवार पूछा, और साथ में यह भी कि छह महीने से ज़्यादा से कितनी सिफ़ारिशें लंबित हैं और जहाँ कारण बताए गए हों वे क्या हैं। जवाब में एक संख्या है: पिछले पाँच साल में हाई कोर्टों में 608 जज नियुक्त हुए।

13 अगस्त को हारिस बीरान ने प्रश्न 2990 में 1 जनवरी 2026 के बाद कॉलेजियम से आई सिफ़ारिशों की अदालतवार सूची माँगी, यह भी कि कितनी अधिसूचित हुईं, कितनी लंबित हैं और हर लंबित मामले का कारण क्या है। जवाब यह है कि जनवरी 2026 से 10 अगस्त 2026 तक विभिन्न हाई कोर्टों में 52 जज नियुक्त हुए, और केरल हाई कोर्ट में एक।

12 मार्च से 13 अगस्त के बीच, पाँच महीनों में छह बार, दोनों सदनों में यह पूछा गया कि कितना समय लगता है या कुर्सी कब से ख़ाली है। छहों बार जवाब में नियुक्तियों की गिनती है और अवधि कोई नहीं। छहों जवाब विधि और न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग से आए हैं।

180 पदों के लिए सिफ़ारिश अभी आई ही नहीं

12 मार्च 2026 को ही राज्यसभा में एक दूसरा प्रश्न भी लगा था। जॉन ब्रिटास ने अतारांकित प्रश्न 2357 में पूछा कि हाई कोर्टों की कितनी रिक्तियों पर हाई कोर्ट कॉलेजियमों की सिफ़ारिश अब तक सरकार के पास आई ही नहीं। इसका जवाब संख्या में मिला।

6 मार्च 2026 को हाई कोर्टों में 1,122 स्वीकृत पदों पर 810 जज काम कर रहे थे और 312 पद ख़ाली थे। उनमें से 132 पदों के प्रस्ताव सरकार और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बीच किसी न किसी पड़ाव पर थे। बाक़ी 180 पदों के लिए हाई कोर्ट कॉलेजियमों से सिफ़ारिश आनी बाक़ी थी।

180, 312 का 57.69 फ़ीसदी है।

हर ख़ाली कुर्सी सरकार की मेज़ पर पड़ी फ़ाइल नहीं है। 6 मार्च की तारीख़ पर आधे से ज़्यादा ख़ाली पदों के लिए कोई नाम कहीं से चला ही नहीं था, और ज्ञापन के पैराग्राफ़ 12 के हिसाब से उनमें से हर एक के लिए नाम कुर्सी ख़ाली होने के छह महीने पहले हाई कोर्ट से निकल जाना चाहिए था।

नियुक्ति की रफ़्तार भी इसी जवाब-श्रृंखला से निकलती है। 19 मार्च के जवाब में दर्ज है कि 2025 में विभिन्न हाई कोर्टों में 157 जज नियुक्त हुए, यानी औसतन हर 2.3 दिन में एक। 13 अगस्त के जवाब में दर्ज है कि जनवरी 2026 से 10 अगस्त 2026 तक 52 जज नियुक्त हुए। वे 222 दिन हैं, यानी औसतन हर 4.3 दिन में एक, पिछले साल की रफ़्तार से क़रीब आधी।

उन 52 में से 30 एक ही दिन के हैं। मद्रास, कलकत्ता, कर्नाटक और मध्य प्रदेश वाले चारों आदेश 7 अगस्त 2026 के हैं, और उनमें कुल तीस नाम हैं। 2026 के पहले सात महीने और दस दिन में हुई हाई कोर्ट नियुक्तियों में से आधे से ज़्यादा उसी एक तारीख़ पर हुए।

स्वीकृत पद बारह साल में 906 से 1,122

19 मार्च 2026 को ए. ए. रहीम के प्रश्न 3153 के जवाब में सरकार ने एक लंबी अवधि का हिसाब दिया। 1 मई 2014 से 28 फ़रवरी 2026 के बीच सुप्रीम कोर्ट में 72 जज नियुक्त हुए। इसी अवधि में हाई कोर्टों में 1,164 नए जज नियुक्त हुए और 820 अतिरिक्त जजों को स्थायी किया गया। और हाई कोर्टों की स्वीकृत संख्या मई 2014 के 906 से बढ़कर 1,122 हो गई।

216 पद बढ़े, यानी 23.8 फ़ीसदी, लगभग बारह साल में।

सुप्रीम कोर्ट के साथ इसी साल दूसरा हिसाब चला। न्याय विभाग की 1 मई 2026 की सूची में सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत संख्या 34 दर्ज है और 1 जून की सूची में 38। एक महीने के भीतर वहाँ चार पद जुड़ गए।

हाई कोर्टों की स्वीकृत संख्या 2026 में एक बार भी नहीं बदली। मार्च की सूची में 1,122 है, और अप्रैल, मई, जून, जुलाई, अगस्त तथा सितंबर की सूचियों में भी 1,122। इस साल जो कुछ हिला, कार्यरत जजों वाले कॉलम में हिला।

ख़ाली कुर्सी और लंबित मुक़दमों का रिश्ता

19 मार्च 2026 को ए. ए. रहीम के उसी प्रश्न के अनुलग्नक में हर हाई कोर्ट के लंबित मुक़दमे दर्ज हैं, 9 मार्च 2026 की स्थिति के अनुसार, स्रोत राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड। कुल 63,61,340। उसी दौर की रिक्ति सूची, 1 मार्च वाली, 811 कार्यरत जज दिखाती है। भाग देने पर हर जज के हिस्से क़रीब 7,844 मुक़दमे आते हैं।

एक सरकारी दफ़्तर की अलमारियों में बँधे फ़ाइलों के बस्ते, नागपुर, दिसंबर 2015 की तस्वीर। यह अदालत का रिकॉर्ड कक्ष नहीं है, पर 63 लाख लंबित मुक़दमे काग़ज़ पर इसी शक्ल में रखे रहते हैं
तस्वीर: Ganesh Dhamodkar from Nagpur, India, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

औसत यहाँ सबसे कम काम का आँकड़ा है। सबसे ऊपर वाली अदालत का अनुपात सबसे नीचे वाली से सौ गुना से ज़्यादा है, और बड़ी अदालतों के आपस में भी पाँच गुने तक का फ़र्क़ मिलता है।

हाई कोर्टलंबित (9 मार्च 2026)कार्यरत जज (1 मार्च 2026)प्रति जज
राजस्थान6,71,8423917,227
मध्य प्रदेश4,78,7614211,399
इलाहाबाद11,93,34610910,948
मद्रास5,53,1445210,637
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख43,190143,085
मेघालय1,7834446

राजस्थान हाई कोर्ट में 6,71,842 मुक़दमे लंबित हैं और 39 जज बैठते हैं। हर जज के हिस्से क़रीब 17,227, जो देश में सबसे ऊँचा अनुपात है। राजस्थान में 50 में से 39 पद भरे हुए हैं, यानी रिक्ति 22 फ़ीसदी। अगर वहाँ सभी 50 पद भर जाएँ, तब भी हर जज के हिस्से 13,437 मुक़दमे रहेंगे, जो उसी दौर के राष्ट्रीय औसत से क़रीब 1.7 गुना है।

अब उसे सबसे ख़ाली अदालत के साथ रखिए। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट में 1 मार्च को 14 जज काम कर रहे थे और 43,190 मुक़दमे लंबित थे, यानी हर जज के हिस्से क़रीब 3,085। यह राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है और राजस्थान के अनुपात के पाँचवें हिस्से से भी कम। सितंबर तक वहाँ कार्यरत जज 12 रह गए और रिक्ति 52 फ़ीसदी पर पहुँच गई, जो देश में सबसे ऊँची है।

इलाहाबाद इसी रिश्ते का तीसरा रूप दिखाता है। वहाँ 11,93,346 मुक़दमे और 109 जज हैं, यानी 10,948 प्रति जज। सभी 160 पद भर जाएँ तो यह अनुपात 7,458 पर आ जाएगा, जो राष्ट्रीय औसत से नीचे है। इलाहाबाद में सारे पद भरने से प्रति जज बोझ 32 फ़ीसदी घटता है, राजस्थान में 22 फ़ीसदी।

ताज़ा गिनती भी लगभग उसी जगह खड़ी है। 13 सितंबर 2026 को इसी डेटा ग्रिड के हाई कोर्ट डैशबोर्ड पर 45,15,730 दीवानी और 19,80,758 फ़ौजदारी मुक़दमे दर्ज थे, कुल 64,96,488। 1 सितंबर की कार्यरत संख्या 818 से भाग देने पर 7,942 प्रति जज।

ख़ाली कुर्सी और मुक़दमों का ढेर एक ही दिशा में नहीं चलते। देश की सबसे ख़ाली अदालत पर प्रति जज बोझ राष्ट्रीय औसत के आधे से कम है, और जिस अदालत पर सबसे भारी बोझ है उसकी पाँच में से लगभग चार कुर्सियाँ भरी हुई हैं।

स्रोतन्याय विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों में जजों की स्वीकृत संख्या, कार्यरत संख्या और रिक्तियाँ, 1 सितंबर 2026 की स्थिति, न्याय विभाग: रिक्ति विवरण, 1 जुलाई 2026 की स्थिति, जिसमें हर हाई कोर्ट के सामने रिक्ति का प्रतिशत भी छपा है, न्याय विभाग: रिक्ति विवरण, 1 अगस्त 2026 की स्थिति, न्याय विभाग: रिक्ति विवरण, 1 जून 2026 की स्थिति, न्याय विभाग: रिक्ति विवरण, 1 मई 2026 की स्थिति, न्याय विभाग: रिक्ति विवरण, 1 अप्रैल 2026 की स्थिति, न्याय विभाग: रिक्ति विवरण, 1 मार्च 2026 की स्थिति, न्याय विभाग, नियुक्ति प्रभाग: मद्रास हाई कोर्ट में पाँच स्थायी और दस अतिरिक्त जजों की अधिसूचना, 7 अगस्त 2026, न्याय विभाग: कलकत्ता हाई कोर्ट में आठ अतिरिक्त जजों की अधिसूचना, 7 अगस्त 2026, न्याय विभाग: कर्नाटक हाई कोर्ट में छह अतिरिक्त जजों की अधिसूचना, 7 अगस्त 2026, न्याय विभाग: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अमित लाहोटी की अतिरिक्त जज के रूप में नियुक्ति, 7 अगस्त 2026, न्याय विभाग: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में नौ अतिरिक्त जजों की अधिसूचना, 20 अगस्त 2026, फ़ाइल संख्या K-13029/04/2025-US.I, न्याय विभाग: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में एक जज और दो अतिरिक्त जजों की अधिसूचना, 27 अगस्त 2026, न्याय विभाग: बजट सत्र 2026 के दूसरे भाग के राज्यसभा उत्तरों का संकलन, जिसमें अतारांकित प्रश्न 2357 और 2359 (12 मार्च 2026) तथा 3153 और 3154 (19 मार्च 2026) के उत्तर हैं, न्याय विभाग: मानसून सत्र 2026 के राज्यसभा उत्तरों का संकलन, जिसमें अतारांकित प्रश्न 594 (23 जुलाई), तारांकित प्रश्न 131 (30 जुलाई), अतारांकित प्रश्न 1398 (30 जुलाई), तारांकित प्रश्न 197 (6 अगस्त) और अतारांकित प्रश्न 2990 (13 अगस्त 2026) के उत्तर हैं, लोकसभा, अतारांकित प्रश्न 2144, 31 जुलाई 2026: कॉलेजियम की सिफ़ारिश और नियुक्ति के बीच का समय, विधि एवं न्याय मंत्रालय का उत्तर, न्याय विभाग: हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों और जजों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण की प्रक्रिया दिखाने वाला ज्ञापन (1998 का एमओपी), बीस पन्ने, विभाग की पुरानी वेबसाइट की संग्रहित प्रति, विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय: भारत का संविधान, अनुच्छेद 217, 224 और 224क तथा उनके पाद-टिप्पण, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, हाई कोर्ट डैशबोर्ड, 13 सितंबर 2026 को पढ़ा गया

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