रात दस बजे के बाद शोर की शिकायत में डेसिबल नापने की ज़रूरत नहीं
ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 में चार क्षेत्र हैं और हर क्षेत्र की दिन-रात की अलग सीमा। रात दस से सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकर पर सीधी रोक है, और साल में पंद्रह रातों की जो छूट राज्य सरकार दे सकती है, उसकी तारीख़ें उसे पहले से घोषित करनी होती हैं। शिकायत किसके पास जाती है, उसमें क्या लिखा होना चाहिए, नाप कौन करता है, और लिखित आदेश आने के बाद पुलिस का अधिकार कैसे बदल जाता है, नीचे उसी क्रम में है।

रात दस बजे के बाद अगर लाउडस्पीकर बज रहा है, तो शिकायत करने के लिए आपको डेसिबल मीटर की ज़रूरत नहीं है। ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 का नियम 7(1) दो अलग-अलग आधार देता है: या तो आवाज़ आपके इलाक़े के लिए तय सीमा से 10 डेसिबल या उससे ऊपर चली जाए, या रात के लिए लगाई गई किसी रोक का उल्लंघन हो। रात में दूसरा आधार अपने आप पूरा है, और घड़ी उसका सबूत है।
यह दूसरा आधार 11 जनवरी 2010 की अधिसूचना एस.ओ. 50(अ) से नियम 7(1) में जोड़ा गया था। उससे पहले शिकायत का एक ही रास्ता था, नाप।
नीचे वही क्रम है जिसमें आपको चलना है।
1. देखिए कि आपका इलाक़ा किस श्रेणी में आता है, और उस श्रेणी की दिन-रात की सीमा क्या है। 2. घड़ी देखिए। रात 10 से सुबह 6 बजे के बीच नियम अलग हैं और ज़्यादा सख़्त हैं। 3. पता कीजिए कि उस दिन आपके राज्य ने पंद्रह रातों वाली छूट दे रखी है या नहीं। 4. जाँचिए कि जगह अधिसूचित शांत क्षेत्र है या नहीं। 5. 112 पर फ़ोन कीजिए और उस कॉल का संदर्भ नंबर लिखकर रख लीजिए। 6. ज़िलाधिकारी, उपजिलाधिकारी या नामित अधिकारी के पास लिखित शिकायत दीजिए, एक प्रति राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को। 7. लिखित आदेश निकलवाइए। आदेश के बाद दोहराव संज्ञेय अपराध बन जाता है। 8. आदेश पर अमल न हो तो राष्ट्रीय हरित अधिकरण।
हर क़दम के नीचे वह नियम या फ़ैसला दर्ज है जिससे वह निकलता है।
चार क्षेत्र और उनकी डेसिबल सीमाएँ
नियम 3(1) और 4(1) के अधीन आने वाली अनुसूची पूरे देश के लिए चार श्रेणियाँ तय करती है, और हर श्रेणी के लिए दिन और रात की अलग सीमा।
| क्षेत्र | दिन में | रात में |
|---|---|---|
| औद्योगिक | 75 | 70 |
| वाणिज्यिक | 65 | 55 |
| आवासीय | 55 | 45 |
| शांत क्षेत्र | 50 | 40 |
सारे आँकड़े dB(A) Leq में हैं। अनुसूची की टिप्पणियों में दिन का मतलब सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक है और रात का मतलब रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक।
यह इकाई समझ लेना ज़रूरी है, क्योंकि आधी बहसें इसी पर अटकती हैं। अनुसूची ख़ुद बताती है कि Leq एक निश्चित अवधि में आवाज़ के स्तर का ऊर्जा-औसत है, और कोष्ठक का 'A' मानव कान की आवृत्ति-प्रतिक्रिया के हिसाब से किया गया भार। यानी यह किसी एक पल की सबसे ऊँची आवाज़ का आँकड़ा नहीं है। इसका असर आपकी शिकायत पर पड़ता है: एक ज़ोरदार धमाका अकेले मानक नहीं तोड़ता, पर तीन घंटे चलता एक समान शोर तोड़ देता है।
अब सवाल यह कि आपका इलाक़ा किस श्रेणी में है। नियम 3(2) कहता है कि राज्य सरकार इलाक़ों को औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय या शांत क्षेत्र में बाँटेगी। यह "बाँटेगी" 22 नवंबर 2000 की अधिसूचना एस.ओ. 1046(अ) से डाला गया, ताकि बँटवारा राज्य का विकल्प न रहकर कर्तव्य बने। अनुसूची की चौथी टिप्पणी मिश्रित इलाक़ों के लिए रास्ता रखती है: सक्षम प्राधिकारी उन्हें इन्हीं चार में से किसी एक श्रेणी में घोषित कर सकता है। यह घोषणा नगर निगम या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास दर्ज होती है, और शिकायत से पहले एक बार पूछ लेना उचित है।
अधिसूचना जिन आवाज़ों को गिनाती है
अधिसूचना एस.ओ. 123(अ) की भूमिका में शोर के स्रोत नाम लेकर गिनाए गए हैं: औद्योगिक गतिविधि, निर्माण गतिविधि, पटाखे और ध्वनि पैदा करने वाले यंत्र, जनरेटर सेट, लाउडस्पीकर, सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणालियाँ, संगीत प्रणालियाँ, वाहनों के हॉर्न और दूसरे यांत्रिक उपकरण। पटाखों और ध्वनि यंत्रों वाले शब्द 11 जनवरी 2010 के संशोधन से जोड़े गए। भूमिका इन सबका एक ही कारण गिनाती है: इनका मानव स्वास्थ्य और लोगों की मानसिक भलाई पर हानिकारक असर पड़ता है।
इस सूची में किसी त्योहार का नाम नहीं है, किसी समुदाय का नाम नहीं है, किसी जुलूस का नाम नहीं है। नियम आवाज़ के स्रोत और घड़ी पर चलते हैं।
दुकान के बाहर रखा जनरेटर, बारात का बैंड, रैली की गाड़ी पर लगा भोंपू, रात में चलती कंक्रीट मिक्सर मशीन और किसी भी पूजास्थल का लाउडस्पीकर, सब एक ही उपनियमों के नीचे हैं। जिस दिन आप शिकायत लिखें, स्रोत का नाम लिखिए, आयोजक का धर्म या दल नहीं।
रात दस बजे से सुबह छह बजे तक की रोक
नियम 5(2) का मौजूदा पाठ 11 जनवरी 2010 की अधिसूचना एस.ओ. 50(अ) से आया है, और वह पुराने पाठ से चौड़ा है। रोक अब सिर्फ़ लाउडस्पीकर पर नहीं है: "लाउडस्पीकर या सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली या कोई ध्वनि उत्पन्न करने वाला यंत्र या कोई वाद्य यंत्र या ध्वनि विस्तारक" रात के समय इस्तेमाल नहीं होगा। ढोल, नगाड़ा, ताशा, हारमोनियम और घर की साउंड सिस्टम, सब इसी वाक्य में आ गए।

रोक से छूट दो हालात में है, और दोनों संकीर्ण हैं। पहला, बंद परिसर में भीतर ही संवाद के लिए, जैसे सभागार, सामुदायिक भवन और बारात घर। दूसरा, सार्वजनिक आपात स्थिति में। पहली छूट का आधार जगह का नाम नहीं है; शर्त यह है कि आवाज़ भीतर ही रहे। बारात घर की दीवारों के भीतर बजता संगीत छूट में है, उसी बारात घर के गेट पर लगा स्पीकर नहीं।
रात का समय अपने आप में परिभाषित है: नियम 2(ञ), जो 2010 में जोड़ा गया, उसे रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक की अवधि बताता है।
एक बात रात और दिन दोनों पर बराबर लागू है, और वह सबसे कम पूछी जाती है। नियम 5(1) कहता है कि लाउडस्पीकर या सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली प्राधिकारी से लिखित अनुमति लिए बिना इस्तेमाल नहीं होगी। दोपहर के जुलूस पर भी यह लागू है, और यह वह काग़ज़ है जिसकी प्रति सूचना का अधिकार लगाकर निकाली जा सकती है।
2010 में ही नियम 5क जोड़ा गया, जो तीन चीज़ों पर रोक लगाता है: शांत क्षेत्र में या रात को आवासीय इलाक़े में हॉर्न, सिवाय सार्वजनिक आपात स्थिति के; शांत क्षेत्र में या रात को ध्वनि करने वाले पटाखे; और रात को आवासीय इलाक़ों तथा शांत क्षेत्रों में ध्वनि करने वाले निर्माण उपकरण।
नाप कहाँ ली जाएगी, यह नियम 5(4) और 5(5) तय करते हैं, और यहीं ज़्यादातर लोग चूक जाते हैं। नियम 5(4) के मुताबिक़ जिस सार्वजनिक जगह पर लाउडस्पीकर या कोई दूसरा ध्वनि स्रोत चल रहा है, उसकी सीमा पर आवाज़ उस इलाक़े के मानक से 10 डेसिबल ऊपर या 75 dB(A), इनमें से जो कम हो, उससे ज़्यादा नहीं होगी। आवासीय इलाक़े में यह दिन में 65 बैठता है और रात में 55; औद्योगिक इलाक़े में दिन में 85 नहीं, 75, क्योंकि नियम कम वाला आँकड़ा उठाता है। नियम 5(5) निजी साउंड सिस्टम के लिए यह गुंजाइश घटाकर 5 डेसिबल करता है, और नाप निजी जगह की सीमा पर होगी। क़ानूनी कसौटी आपके कमरे का पाठ नहीं, आयोजन स्थल की सीमा का पाठ है।
पंद्रह रातों की छूट और उसकी शर्तें
नियम 5(3) वह प्रावधान है जिसके सहारे हर त्योहार में आधी रात तक की इजाज़त निकलती है। इसका मौजूदा पाठ 10 अगस्त 2017 की अधिसूचना एस.ओ. 2555(अ) से आया, और उसने एक शर्त जोड़ दी जो पाठक के काम की है।
प्रावधान कहता है: नियम 5(2) में जो कुछ हो, राज्य सरकार शोर घटाने के लिए ज़रूरी शर्तों के अधीन, रात 10 से 12 बजे के बीच लाउडस्पीकर और उस जैसी चीज़ों की अनुमति किसी सांस्कृतिक, धार्मिक या उत्सव के अवसर पर दे सकती है, जो एक कैलेंडर वर्ष में कुल मिलाकर पंद्रह दिन से ज़्यादा न हो। और फिर वह शर्त: राज्य सरकार या उससे प्राधिकृत ज़िला प्राधिकारी "सामान्यतः पहले से उन दिनों की संख्या और ब्योरा निर्दिष्ट करेगा" जिन पर यह छूट चलेगी।
छूट चार चीज़ें नहीं करती, और यह गिन लेना शिकायत के समय काम आता है। वह रात 12 बजे से आगे नहीं जाती। वह डेसिबल की सीमाएँ नहीं बढ़ाती, सिर्फ़ समय बढ़ाती है। वह शांत क्षेत्रों तक नहीं पहुँचती। और वह नियम 5(1) की लिखित अनुमति की ज़रूरत को ख़त्म नहीं करती।
प्रावधान के साथ लगा स्पष्टीकरण एक और बात जोड़ता है: "उत्सव का अवसर" में सरकार से अधिसूचित कोई राष्ट्रीय या राज्य समारोह भी शामिल है, और उसमें गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, राज्य दिवस या अधिसूचित कोई दूसरा दिन। यानी गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस भी उन्हीं पंद्रह में से गिने जाते हैं।
राज्य यह सूची कैसे निकालते हैं, इसके दो ताज़ा उदाहरण हैं। गोएंकारपोन्न की रिपोर्ट के मुताबिक़ गोवा के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने 3 अप्रैल 2026 को पंद्रह तारीख़ें अधिसूचित कीं: ईस्टर के दो दिन, गणेश विसर्जन के दो दिन, अनंत चतुर्दशी, नवरात्र का आख़िरी दिन, दिवाली की पूर्वसंध्या, क्रिसमस के दो दिन और 26 से 31 दिसंबर तक के छह दिन; उसी अधिसूचना में यह भी है कि अनुमति अपने आप नहीं मिलेगी, उपसमाहर्ता या उपजिलाधिकारी से लेनी होगी। फ़्री प्रेस जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक़ मुंबई उपनगर के ज़िलाधिकारी ने 2 फ़रवरी 2026 को नियम 5(3) के तहत 15, 18, 19 और 25 सितंबर 2026 को सुबह 6 से रात 12 बजे तक की अनुमति दी, जो राज्य की पंद्रह में से चार हैं, और शांत क्षेत्रों को उससे अलग रखा।
दोनों सूचियों की तारीख़ें आपस में नहीं मिलतीं। गोवा की सूची में अनंत चतुर्दशी 24 सितंबर लिखी है, मुंबई उपनगर के आदेश में विसर्जन के दिनों में 25 सितंबर है। आपके लिए मायने वह तारीख़ रखती है जो आपके अपने राज्य या ज़िले की अधिसूचित सूची में है, और वह सूची साल की शुरुआत में निकल चुकी होती है।
सौ मीटर का शांत क्षेत्र अपने आप नहीं बनता
नियम 3(5) कहता है कि अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और अदालतों के चारों ओर कम से कम 100 मीटर का इलाक़ा शांत क्षेत्र घोषित किया जा सकता है। 10 अगस्त 2017 की अधिसूचना ने इस वाक्य में तीन शब्द जोड़े, "राज्य सरकार द्वारा", और नीचे एक परंतुक भी जोड़ दिया: कोई इलाक़ा शांत क्षेत्र की श्रेणी में तब तक नहीं आएगा जब तक राज्य सरकार उसे नियम 3(2) के अनुसार अधिसूचित न करे। उसी अधिसूचना से अनुसूची की तीसरी टिप्पणी हटा दी गई।
सौ मीटर अब उस न्यूनतम का नाप है जो अधिसूचित किया जा सकता है, अपने आप बन जाने वाला घेरा नहीं। स्कूल के सामने खड़े होकर यह मान लेना कि जगह शांत क्षेत्र है, ग़लती है।
महाराष्ट्र ने अपनी नामित प्राधिकारी सूची में यह ज़िम्मेदारी शहरी स्थानीय निकायों पर डाली है: नगर निकाय शांत क्षेत्रों का सीमांकन करेंगे और उन्हें पर्याप्त रूप से प्रदर्शित भी करेंगे, यानी बोर्ड लगेंगे। उसी दस्तावेज़ में उनसे कहा गया है कि सालाना पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट में शोर नियंत्रण की कार्ययोजना और शोर मानचित्रण भी शामिल हों।
अधिसूचित शांत क्षेत्र के भीतर नियम 6 पाँच काम गिनाता है, और हर एक पर अधिनियम के तहत शास्ति लगती है: संगीत बजाना या ध्वनि विस्तारक इस्तेमाल करना; ढोल या तमटम बजाना, या हॉर्न बजाना चाहे वह वाद्य हो या दबाव वाला, या तुरही या कोई भी वाद्य बजाना; भीड़ खींचने वाला कोई अनुकरण, संगीत या दूसरा प्रदर्शन दिखाना; ध्वनि करने वाले पटाखे छोड़ना; और लाउडस्पीकर या सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली का इस्तेमाल करना। आख़िरी दो 2010 में जोड़े गए थे।
पटाखों का मानक 125 डेसिबल पर बँधा है
पटाखों की सीमा ध्वनि नियम 2000 में नहीं, पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 की अनुसूची एक में है। 5 अक्टूबर 1999 की अधिसूचना जी.एस.आर. 682(अ) ने वहाँ क्रम संख्या 89 जोड़ी, और 16 अक्टूबर 2006 की जी.एस.आर. 640(अ) ने उसमें संशोधन किया।
मानक यह है: ऐसे पटाखों का निर्माण, बिक्री या इस्तेमाल प्रतिबंधित है जो फूटने के स्थान से 4 मीटर की दूरी पर 125 dB(AI) या 145 dB(C)pk से ज़्यादा आवाज़ पैदा करें। लड़ी में जुड़े पटाखों के लिए यह सीमा 5 log10(N) डेसिबल घटा दी जाती है, जहाँ N जुड़े हुए पटाखों की संख्या है। सौ की लड़ी पर यह कटौती दस डेसिबल की बैठती है।

नाप की शर्तें भी उसी अधिसूचना में हैं, और वे बताती हैं कि क़ानूनी नाप कितनी बारीक चीज़ है: कम से कम 5 मीटर व्यास की कठोर कंक्रीट सतह पर, मुक्त क्षेत्र की स्थिति में, यानी फूटने के स्थान से 15 मीटर तक कोई परावर्तक सतह न हो, और मापन अनुमोदित ध्वनि स्तर मीटर से हो। इन्हें लागू कराने का काम विस्फोटक विभाग को सौंपा गया है। निर्यात के पटाखे इनसे बाहर हैं, पर उनके डिब्बे पर लिखा होना चाहिए कि वे भारत में बिक्री के लिए नहीं हैं।
समय की रोक अदालत से आई और बाद में नियमों में चली गई। सुप्रीम कोर्ट ने 18 जुलाई 2005 के फ़ैसले में निर्देश दिया कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच ध्वनि करने वाले पटाखे छोड़ने पर पूरी रोक रहेगी, और यह भी कि रंग या रोशनी वाले पटाखों पर समय की पाबंदी ज़रूरी नहीं। 2010 से यह रोक नियम 5क(2) के रूप में ध्वनि नियमों का हिस्सा है।
अदालतें इस खिड़की को और छोटा करती रही हैं। अक्टूबर 2025 में मुख्य न्यायाधीश भूषण आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हरित पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल 18 से 21 अक्टूबर तक सीमित किया, वह भी सुबह 6 से 7 और रात 8 से 10 बजे के बीच, इस शर्त के साथ कि बिकने वाले पटाखों पर अधिकृत क्यूआर कोड हो। त्योहार से पहले अपने शहर का ताज़ा आदेश देख लेना नियम पढ़ लेने जितना ही ज़रूरी है।
शिकायत किसके पास जाती है
नियम 2(ग) की "प्राधिकारी" वाली परिभाषा खुली है: इसमें केंद्र या राज्य सरकार से प्राधिकृत कोई भी अधिकारी शामिल है, और उसके भीतर ज़िला मजिस्ट्रेट, पुलिस आयुक्त, या ऐसा कोई अधिकारी जो पुलिस उपाधीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो। आपके राज्य में कौन नामित है, यह राज्य की अपनी अधिसूचना से तय होता है, और वे अधिसूचनाएँ अलग-अलग दिशा में गई हैं।

दिल्ली में पर्यावरण विभाग के 29 नवंबर 2022 के आदेश से पाँच तरह के अधिकारी नामित हैं: सभी उपायुक्त यानी ज़िला मजिस्ट्रेट, सभी उपजिलाधिकारी, पुलिस नियंत्रण कक्ष के सहायक पुलिस आयुक्त और रेलवे तथा हवाई अड्डों समेत सभी उपमंडल पुलिस अधिकारी, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के अध्यक्ष और सदस्य सचिव, तथा यातायात के सहायक पुलिस आयुक्त।
उत्तर प्रदेश में यह रास्ता मजिस्ट्रेट से होकर जाता है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पत्र के मुताबिक़ पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के 11 जनवरी 2018 के कार्यालय ज्ञाप से हर जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी, सिटी मजिस्ट्रेट और उनके सहायकों को प्राधिकृत किया गया, और 25 जनवरी 2018 के दूसरे ज्ञाप से हर कार्यपालक मजिस्ट्रेट को।
महाराष्ट्र ने काम तीन विभागों में बाँटा है। राजस्व विभाग के ज़िला मजिस्ट्रेट और उपजिलाधिकारी अपने क्षेत्र में नियमों का पालन कराएँगे; गृह विभाग की पुलिस उल्लंघन पर आगे की क़ानूनी कार्रवाई शुरू करेगी; और नगर विकास विभाग के नगर आयुक्त तथा नगर परिषद के मुख्य अधिकारी निर्माण, एसी और डीजी सेट जैसे इमारती उपकरणों तथा घरेलू उपकरणों के शोर पर स्रोत के स्तर पर नियंत्रण रखेंगे।
गोवा की सूची अलग कारण से पढ़ने लायक़ है। वहाँ नामित अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर तक छापे जाते हैं, और यह अपने आप नहीं हुआ: विभाग का आदेश दर्ज करता है कि बॉम्बे हाई कोर्ट की पणजी पीठ ने स्वप्रेरणा रिट याचिका 4/2006 में निर्देश दिया था कि यह सूची फ़ोन नंबरों सहित जनता के लिए प्रकाशित हो।
यहीं इस ढाँचे का सबसे कमज़ोर जोड़ दिखता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का जो पृष्ठ राज्यों की ये अधिसूचनाएँ रखता है और 29 दिसंबर 2025 को अद्यतन हुआ है, उस पर नौ नाम हैं: दिल्ली, गोवा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, पुडुचेरी, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड। बाक़ी राज्यों में नामित अधिकारी कौन है, यह ज़िला प्रशासन से पूछकर ही तय होगा; केंद्र का पन्ना उसका जवाब नहीं देता। दिल्ली के किलोकरी में 6 सितंबर 2026 की रात शोर पर आपत्ति करने नीचे उतरे एक संगीतकार की मौत हो गई थी (उस मामले पर हमारा लेख), और यही वह जगह है जहाँ नियम की भाषा और गली की हक़ीक़त अलग हो जाती है: आमने-सामने कहने के बजाय 112 पर कॉल कीजिए।
लिखित आदेश आने के बाद मामला संज्ञेय हो जाता है
नियम 8 वह धारा है जिस तक आपको पहुँचना है। प्राधिकारी अगर थानाध्यक्ष की रिपोर्ट से या दूसरी सूचना से, जिसमें शिकायतकर्ता से मिली सूचना भी शामिल है, यह संतुष्ट हो जाए कि जनता या आसपास रहने वालों को परेशानी या चोट से बचाना ज़रूरी है, तो वह लिखित आदेश से निर्देश दे सकता है। "शिकायतकर्ता से मिली सूचना" वाले शब्द 19 सितंबर 2006 की अधिसूचना एस.ओ. 1569(अ) से जोड़े गए, और वे मायने रखते हैं: उनसे पहले रास्ता पुलिस की रिपोर्ट से होकर जाता था। आदेश संगीत, लाउडस्पीकर, हॉर्न, निर्माण उपकरण, पटाखों और शोर वाले किसी व्यापार पर हो सकता है।
नियम 8(2) का परंतुक शिकायतकर्ता को एक हक़ देता है जिसका इस्तेमाल कम होता है। आदेश से प्रभावित व्यक्ति उसे रद्द या संशोधित कराने की अर्ज़ी दे, तो प्राधिकारी को अर्ज़ीदार को और "यथास्थिति मूल शिकायतकर्ता को" भी सुनवाई का मौक़ा देना होगा, और अर्ज़ी ख़ारिज करने पर कारण लिखने होंगे। ये शब्द भी 2006 में जोड़े गए। यानी शिकायत देकर आप मामले से बाहर नहीं हो जाते।
इसी तरह का अधिकार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 152 में है: ज़िला मजिस्ट्रेट, उपजिलाधिकारी या विशेष रूप से सशक्त कार्यपालक मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट या दूसरी सूचना पर सशर्त आदेश निकालकर ऐसे किसी व्यापार को रोकने या विनियमित करने को कह सकता है जो समुदाय के स्वास्थ्य या शारीरिक सुविधा के लिए हानिकारक हो।
आदेश इतना अहम क्यों है, यह भारतीय न्याय संहिता, 2023 की तीन धाराओं से समझ आता है। धारा 270 लोक न्यूसेंस को परिभाषित करती है। धारा 292 उस पर एक हज़ार रुपये तक का जुर्माना रखती है, और यह अपराध असंज्ञेय है; पुलिस मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना ख़ुद आगे नहीं बढ़ सकती। धारा 293 उसके लिए है जो लोक न्यूसेंस दोहराता या जारी रखता है, जबकि क़ानूनी अधिकार वाले किसी लोक सेवक ने उसे ऐसा न करने का आदेश दे दिया हो; इसमें छह महीने तक का सादा कारावास, या पाँच हज़ार रुपये तक जुर्माना, या दोनों हैं, और यह अपराध संज्ञेय है। पहली शिकायत और आदेश के बाद वाली शिकायत में यही फ़र्क़ है।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम की तरफ़ भी एक बदलाव हुआ है जो अभी पूरा नहीं उतरा। जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2023 ने धारा 15 नए सिरे से लिखी: हर उल्लंघन पर दस हज़ार से पंद्रह लाख रुपये तक की शास्ति, जारी रहने पर हर दिन दस हज़ार अतिरिक्त, कंपनी के लिए एक लाख से पंद्रह लाख, शास्ति तय करने के लिए एक न्यायनिर्णायक अधिकारी, और नब्बे दिन में भुगतान न करने पर तीन साल तक की क़ैद। इसी पर 23 अक्टूबर 2024 को जस्टिस अभय एस. ओका, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि भारत सरकार की निष्क्रियता से यह प्रावधान निष्प्रभावी हो गया है; लाइव लॉ के अनुसार अदालत के शब्द थे कि तंत्र खड़ा न होने से संशोधित धारा 15 "दंतविहीन" हो गई है।
नाप, रिकॉर्डिंग और काग़ज़
शिकायत लिखने से पहले सात चीज़ें उसी रात लिख लीजिए: तारीख़; घड़ी का समय मिनट तक, क्योंकि पूरी व्यवस्था 10 बजकर 00 मिनट पर पलटती है; जगह और पास का कोई पहचाना हुआ ठिकाना; इलाक़े की श्रेणी; आवाज़ का स्रोत, नाम लेकर; आयोजन स्थल की सीमा से आपकी दूरी; और 112 वाली कॉल का संदर्भ नंबर तथा थाने में दर्ज प्रविष्टि का नंबर।
फ़ोन की रिकॉर्डिंग इनमें से एक काम करती है और एक नहीं करती। वह तय कर देती है कि फ़लाँ समय पर फ़लाँ जगह आवाज़ हो रही थी। वह यह तय नहीं करती कि आवाज़ कितने डेसिबल थी, क्योंकि नियमों की अपनी इकाई dB(A) Leq है, जो एक अवधि का ऊर्जा-औसत है और अनुमोदित ध्वनि स्तर मीटर से ली जाती है। पटाखों वाला मानक दिखा देता है कि क़ानूनी नाप की शर्तें कितनी कड़ी हैं, और फ़ोन उनमें से कोई शर्त पूरी नहीं करता।
पर रात के लिए यह कमी आड़े नहीं आती, क्योंकि नियम 7(1) का दूसरा आधार समय पर चलता है, स्तर पर नहीं।
अदालतें व्यवहार में फ़ोन को पूरी तरह ख़ारिज भी नहीं करतीं। बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस श्याम सी. चंदक की पीठ ने 23 जनवरी 2025 को जागो नेहरू नगर रेज़िडेंट्स वेलफ़ेयर एसोसिएशन बनाम पुलिस आयुक्त में पुलिस को डेसिबल नापने वाले मोबाइल ऐप इस्तेमाल करने की छूट दी। वर्डिक्टम की रिपोर्ट के मुताबिक़ उसी फ़ैसले में दो और बातें शिकायत करने वाले के काम की हैं: पुलिस कार्रवाई करते समय शिकायतकर्ता की पहचान बताने पर ज़ोर न दे; और कई लाउडस्पीकर एक साथ बज रहे हों तो उनकी सम्मिलित आवाज़ देखी जाए।
नाप काग़ज़ पर कैसे आए, इसका रास्ता नियम 4(3) से खुलता है, जो 19 सितंबर 2006 में जोड़ा गया। उसके मुताबिक़ राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केंद्रीय बोर्ड के परामर्श से शोर के तकनीकी और सांख्यिकीय आँकड़े इकट्ठा, संकलित और प्रकाशित करेंगे। इसलिए लिखित शिकायत में यह माँग अलग से जोड़िए कि मौक़े पर नाप ली जाए और उसकी प्रति आपको दी जाए। फिर सूचना का अधिकार दो जगह लगता है: बोर्ड के पास उस तारीख़ और जगह की निगरानी रिपोर्ट के लिए, और थाने के पास अपनी शिकायत की प्रविष्टि तथा नियम 5(1) की अनुमति की प्रति के लिए।
ख़ुद कहीं से आँकड़ा उठा लेना फ़िलहाल आसान नहीं है। सीपीसीबी की परिवेशी शोर निगरानी सात महानगरों के 70 स्थानों पर होती है, पर उसका वास्तविक समय वाला पन्ना सितंबर 2026 में खोलने पर उपयोगकर्ता नाम और पासवर्ड माँगता है। आख़िरी पड़ाव राष्ट्रीय हरित अधिकरण है: आवेदन फ़ॉर्म एक में, शुल्क एक हज़ार रुपये, और मुआवज़ा माँगने पर दावे का एक फ़ीसदी; आवेदन उसी पीठ के रजिस्ट्रार के पास जाता है जिसके क्षेत्र में मामला बना, और ग़रीबी रेखा से नीचे के आवेदकों का शुल्क माफ़ है।
स्रोतध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 का संशोधित पाठ, हर संशोधन की गजट संख्या और तारीख़ के पाद-टिप्पणों के साथ (हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की प्रति), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अधिसूचना एस.ओ. 123(अ), 14 फ़रवरी 2000 का पाठ, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों की नामित प्राधिकारी अधिसूचनाएँ, पृष्ठ 29 दिसंबर 2025 को अद्यतन, दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग का 29 नवंबर 2022 का आदेश, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के उत्तर के साथ, सीपीसीबी की फ़ाइल में, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का पत्र: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के 11 और 25 जनवरी 2018 के कार्यालय ज्ञाप, महाराष्ट्र की नामित प्राधिकारी सूची: राजस्व, गृह और नगर विकास विभागों के बीच काम का बँटवारा, गोवा सरकार, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग का आदेश, बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ के निर्देश पर नाम और फ़ोन नंबर सहित, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पटाखों के ध्वनि मानक: जी.एस.आर. 682(अ), 5 अक्टूबर 1999 और जी.एस.आर. 640(अ), 16 अक्टूबर 2006, सुप्रीम कोर्ट, इन रे: नॉइज़ पॉल्यूशन, 18 जुलाई 2005 का फ़ैसला और उसके निर्देश (इंडियन कानून पर पूरा पाठ), जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम, 2023, अधिनियम संख्या 18, 2023, भारत का राजपत्र: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम की धाराएँ 15 से 15एफ़, लाइव लॉ, सुप्रीम कोर्ट की 23 अक्टूबर 2024 की सुनवाई: संशोधित धारा 15 पर टिप्पणी, वर्डिक्टम, बॉम्बे हाई कोर्ट का 23 जनवरी 2025 का फ़ैसला, जागो नेहरू नगर रेज़िडेंट्स वेलफ़ेयर एसोसिएशन बनाम पुलिस आयुक्त, एससीसी ऑनलाइन, एस.ओ. 2555(अ), 10 अगस्त 2017 के संशोधन का ब्योरा, फ़्री प्रेस जर्नल, मुंबई उपनगर ज़िलाधिकारी के 2 फ़रवरी 2026 के आदेश पर रिपोर्ट, गोएंकारपोन्न, गोवा की 3 अप्रैल 2026 की अधिसूचना में तय पंद्रह तारीख़ें, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (कार्यप्रणाली और प्रक्रिया) नियम, 2011: फ़ॉर्म, शुल्क और दाख़िले की जगह, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएँ 270, 292 और 293 का पाठ और वर्गीकरण