दिल्ली की हवा में सबसे बड़ा हिस्सा सड़क की धूल का है, और यही वह वाक्य है जिसका सबसे ज़्यादा दुरुपयोग होता है
सत्रह शहरों के अध्ययनों में सड़क की धूल पीएम10 का 20 से 52 फ़ीसदी है। पर पीएम2.5 में वह 8 से 25 फ़ीसदी ही है, और फेफड़ों में गहरे तक वही जाता है। सीएसआईआर-सीआरआरआई ने शुक्रवार को दिल्ली पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरों को इसी ढाँचे पर प्रशिक्षण दिया।

शुक्रवार को नई दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ।
सीएसआईआर के केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान ने दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों को बुलाया, और विषय था वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग का वह मानक ढाँचा जो शहरी सड़कों को पक्का करने और उनके किनारे हरियाली लगाने के बारे में है।
एक दिन का कार्यक्रम था। दीप जलाया गया, भाषण हुए, तकनीकी सत्र चले।
यह ख़बर अपने-आप में छोटी है। जो बड़ी है, वह यह कि इस देश की सबसे चर्चित पर्यावरणीय समस्या का सबसे बड़ा हिस्सा एक ऐसी चीज़ है जिस पर कोई राजनीतिक विवाद नहीं है, और इसीलिए उस पर सबसे कम काम होता है।
पहले वह आँकड़ा
देश के सत्रह ग़ैर-प्राप्ति शहरों में किए गए स्रोत विभाजन अध्ययनों में सड़क की धूल पीएम10 का 20 से 52 फ़ीसदी हिस्सा बनाती है।
एनसीआर के लिए यह और ऊँचा है। इस क्षेत्र के अध्ययनों और सूचियों में सड़क की धूल के फिर से उड़ने, निर्माण गतिविधियों और मिट्टी को मिलाकर धूल पीएम10 का 58 फ़ीसदी तक बताई गई है।
यही वह वाक्य है जो हर सर्दी में दोहराया जाता है: दिल्ली की हवा में सबसे बड़ा हिस्सा धूल का है।
वाक्य ग़लत नहीं है।
पर वह पूरा भी नहीं है, और अगला आँकड़ा बताता है कि क्यों।
पीएम10 और पीएम2.5 का फ़र्क़
हवा में तैरते कणों को उनके आकार से नापा जाता है।
पीएम10 का मतलब है दस माइक्रोमीटर या उससे छोटे कण। पीएम2.5 का मतलब है ढाई माइक्रोमीटर या उससे छोटे।
आकार का यह अंतर स्वास्थ्य के लिहाज़ से सब कुछ बदल देता है।
बड़े कण नाक और गले में अटक जाते हैं। शरीर उन्हें बाहर निकालने के तरीक़े जानता है। वे भारी होते हैं, इसलिए जल्दी बैठ भी जाते हैं और दूर तक नहीं जाते।
छोटे कण फेफड़ों की गहराई तक पहुँचते हैं, वहाँ की सबसे छोटी थैलियों तक, और वहाँ से कुछ हिस्सा ख़ून में भी। यही वे कण हैं जिनका संबंध हृदय रोग, दमा और असामयिक मृत्यु से जोड़ा जाता है। वे हल्के होते हैं, इसलिए हवा में लंबे समय तक और दूर तक तैरते हैं।
अब उसी अध्ययन का दूसरा आँकड़ा देखिए। उन्हीं सत्रह शहरों में सड़क की धूल पीएम2.5 का 8 से 25 फ़ीसदी है।
यानी जिस अंश में यह सबसे बड़ा स्रोत है, वह अपेक्षाकृत कम नुक़सानदेह अंश है। और जिस अंश में यह कम है, वही अंश ज़्यादा नुक़सान करता है।
यह बात दोनों तरफ़ काटती है, और दोनों तरफ़ ईमानदारी से कहनी चाहिए।
एक तरफ़, धूल को नज़रअंदाज़ करना ग़लत है। पीएम10 का भी स्वास्थ्य पर असर है, और आठ से पच्चीस फ़ीसदी पीएम2.5 भी कोई छोटी संख्या नहीं।
दूसरी तरफ़, "सबसे बड़ा स्रोत धूल है" कहकर वाहनों, उद्योग और जलावन की बात टाल देना उससे भी ग़लत है। क्योंकि जिस अंश की सबसे ज़्यादा चर्चा होनी चाहिए, उसमें ये तीनों बड़े हैं।

"ग़ैर-प्राप्ति शहर" का मतलब
जिन सत्रह शहरों के अध्ययनों का हवाला ऊपर है, उनके आगे एक शब्द लगा है जिसका अर्थ खोलना ज़रूरी है।
ग़ैर-प्राप्ति शहर वह है जिसकी हवा 2011 से 2015 के बीच राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी। यह सूची राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के आँकड़ों से बनी थी।
ऐसे शहरों की संख्या 131 है, और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम इन्हीं के लिए चलता है।
इस कार्यक्रम का लक्ष्य बदला जा चुका है। पहले तय हुआ था कि 2024 तक कणों की मात्रा में 20 से 30 फ़ीसदी की कमी लाई जाएगी। बाद में इसे संशोधित करके 2026 तक 40 फ़ीसदी कर दिया गया।
यानी लक्ष्य का साल भी यही है, जिसमें हम खड़े हैं।
131 की संख्या ख़ुद एक बात कहती है। यह समस्या दिल्ली की नहीं है। दिल्ली उसका सबसे ज़्यादा नापा जाने वाला और सबसे ज़्यादा छपने वाला हिस्सा है, क्योंकि वहाँ निगरानी केंद्र सबसे ज़्यादा हैं और अख़बार भी।
जिन शहरों में एक भी निगरानी केंद्र नहीं है, उनकी हवा किसी सूची में नहीं आती। न ख़राब, न अच्छी।
"फिर से उड़ना" का मतलब
अब उस शब्द पर आइए जो हर स्रोत विभाजन अध्ययन में मिलता है और जिसका अर्थ कम लोग खोलते हैं: पुनरुत्थान, यानी धूल का फिर से उड़ना।
इसका मतलब यह है कि यह धूल उस समय नहीं बनती जब वह हवा में आती है। वह पहले से सड़क पर पड़ी होती है।
वह वहाँ आई कहीं और से। कच्चे किनारे से, निर्माण स्थल से, गाड़ियों के टायर और ब्रेक के घिसने से, खुले मैदान से उड़कर।
फिर एक गाड़ी उस पर से गुज़रती है और उसे उठा देती है। कुछ देर बाद वह फिर बैठ जाती है। अगली गाड़ी उसे फिर उठाती है।
इससे एक बात निकलती है जो स्रोतों की सूची पढ़ते समय भुला दी जाती है। सड़क की धूल और वाहन दो अलग-अलग स्रोत नहीं हैं। सूची में वे अलग लिखे जाते हैं, पर धूल को हवा में लाने का काम वही वाहन करते हैं जिन्हें अलग गिना गया है।
इसलिए यह कहना कि "गाड़ियों का हिस्सा तो सिर्फ़ इतना है, असली समस्या धूल है", गिनती की एक तकनीकी बात को कारण बना देना है।
और यही वजह है कि किनारा सबसे अहम है
अगर धूल पहले से सड़क पर पड़ी है, तो सवाल यह है कि वह वहाँ पहुँचती कैसे है।
सबसे बड़ा रास्ता सड़क का किनारा है।
एक सड़क जिसका बीच का हिस्सा पक्का हो और किनारा कच्चा, वहाँ हर बार जब कोई पहिया किनारे को छूता है, मिट्टी सड़क पर आती है। मोड़ पर, बस रुकने की जगह पर, दुकान के सामने रुकती गाड़ी के नीचे, यह लगातार होता है।
यही कारण है कि आयोग का ढाँचा "पक्का करने" पर इतना ज़ोर देता है, और वह पक्का करना बीच की सड़क का नहीं, किनारों और खुली जगहों का है।
दूसरा रास्ता हरियाली से जुड़ा है। जो ज़मीन नंगी हो, वहाँ से मिट्टी उड़ती है। घास या पौधे लगाने से वह मिट्टी बँध जाती है। इसीलिए ढाँचे में केंद्रीय डिवाइडर और खुली जगहों पर पौधे लगाने की बात है।
तीसरा रास्ता गड्ढे हैं। गड्ढे वाली सड़क पर गाड़ियाँ धीमी होती हैं, ब्रेक लगता है, टायर घिसता है, और सड़क की सतह ख़ुद टूटकर धूल बनती है। इसीलिए सलाहों में सड़कों को गड्ढा-मुक्त रखना भी शामिल है।

ढाँचा है क्या
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने धूल नियंत्रण पर एक समिति बनाई थी, जिसकी रिपोर्ट जनवरी 2025 की है। उसी से शहरी सड़कों को पक्का करने और हरा करने का मानक ढाँचा निकला।
इसमें जो उपाय गिनाए गए हैं, वे नए नहीं हैं। सड़कों की नियमित और यांत्रिक सफ़ाई, सड़कों तथा खुली जगहों पर पानी का छिड़काव, कच्ची सड़कों को पक्का करना, सड़कों को गड्ढा-मुक्त रखना, केंद्रीय डिवाइडर और खुली जगहों पर हरियाली, और वृक्षारोपण।
नया जो है, वह यह है कि इन्हें एक मानक के रूप में लिखा गया है, ताकि हर सड़क बनाने वाली एजेंसी एक ही तरीक़े से काम करे।
पहले चरण में आयोग ने एनसीआर के नौ अत्यधिक शहरीकृत और औद्योगिक शहर लिए हैं: दिल्ली, फ़रीदाबाद, गुरुग्राम, सोनीपत, ग़ाज़ियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, भिवाड़ी और नीमराना।
इस सूची में तीन राज्य हैं और यही इस समस्या की सबसे बड़ी प्रशासनिक अड़चन है। दिल्ली की हवा में जो धूल है, उसका हिस्सा हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सड़कों से भी आता है, और वहाँ की सड़कें दिल्ली सरकार नहीं बनाती।
आयोग इसी वजह से बना था। उसका दायरा राज्य की सीमा से नहीं, हवा की सीमा से तय होता है।
शुक्रवार को जो हुआ
अब उस कार्यक्रम पर लौटिए जिससे यह ख़बर बनी।
सीआरआरआई के निदेशक डॉ. चालुमूरी रवि शेखर ने उद्घाटन भाषण दिया। दिल्ली पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर-इन-चीफ़ नवीन बंसल और विशेष सचिव रवि झा ने भी बात रखी।
तकनीकी और क्षेत्र-स्तरीय नियोजन के सत्र सीआरआरआई के वैज्ञानिकों ने चलाए, जिनमें डॉ. संपत कुमार, डॉ. के. रविंदर, डॉ. ई. मधु, डॉ. मुक्ति आडवाणी, डॉ. मिनल चंद्र, डॉ. चिंतामन बारी और डॉ. निश्चल गुप्ता शामिल थे।
सत्र का समापन एक चर्चा से हुआ जिसमें ज़मीन पर लागू करने का रोडमैप तय किया गया।
यह जिस तरह का काम है, उसकी ख़बर कम बनती है। एक शोध संस्थान अपनी सिफ़ारिशें उन इंजीनियरों को समझा रहा है जो सचमुच सड़क बनाते हैं। नीति और ज़मीन के बीच का यह हिस्सा आमतौर पर अनुपस्थित रहता है, और उसकी अनुपस्थिति ही सबसे आम वजह है कि अच्छी सिफ़ारिशें काग़ज़ पर रह जाती हैं।
आयोग, सीएसआईआर-सीआरआरआई और स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के बीच शहरी सड़कों के पुनर्विकास पर एक समझौता भी हुआ है, जिसमें निर्माण की गुणवत्ता, हरियाली और सड़क बुनियादी ढाँचे के प्रबंधन पर ज़ोर है।
ये आँकड़े निकाले कैसे जाते हैं
एक बात और, जिसके बिना ऊपर दिया गया हर प्रतिशत अधूरा रहेगा।
स्रोत विभाजन का अध्ययन हवा को छानकर उसमें जमा कणों का रासायनिक विश्लेषण करता है। हर स्रोत की अपनी रासायनिक छाप होती है। मिट्टी में सिलिकॉन और एल्युमिनियम मिलते हैं, डीज़ल के धुएँ में काला कार्बन, जलावन में पोटैशियम, उद्योग में भारी धातुएँ।
फिर एक सांख्यिकीय विधि से यह हिसाब लगाया जाता है कि इस मिश्रण में किस छाप का कितना योगदान है।
यहीं से वह चौड़ाई आती है जो हर आँकड़े में दिखती है। 20 से 52 फ़ीसदी कोई मापी हुई संख्या नहीं है, वह सत्रह अलग-अलग शहरों में निकले सत्रह अलग नतीजों का दायरा है।
और वह दायरा इतना चौड़ा क्यों है, इसके कारण साफ़ हैं। नमूना कहाँ से लिया गया, सड़क के किनारे से या छत से। किस मौसम में लिया गया, सर्दी में या बरसात के बाद। और कौन-सी छापों की सूची इस्तेमाल हुई।
इसलिए जब कोई एक सटीक संख्या बोलता है, जैसे "अड़तीस फ़ीसदी", तो पहला सवाल यह होना चाहिए कि वह किस शहर के किस अध्ययन से है और किस मौसम का है।
जो इस रास्ते की सीमा है
धूल कम करने के इन उपायों की अपनी सीमाएँ हैं, और उन्हें भी दर्ज करना चाहिए।
पानी का छिड़काव सबसे तात्कालिक उपाय है और सबसे कम टिकाऊ। पानी सूखते ही धूल वापस उड़ने लगती है, और सर्दी में जब समस्या सबसे बड़ी होती है, तब पानी सबसे धीरे सूखता है पर छिड़कने की व्यवस्था सबसे मुश्किल होती है। इसके अलावा यह पानी भी कहीं से आता है।
यांत्रिक स्वीपर बेहतर हैं, क्योंकि वे धूल हटाते हैं, गीली करके बिठाते नहीं। पर वे महँगे हैं और उनकी संख्या सड़क की लंबाई के मुक़ाबले हमेशा कम रहती है। एक स्वीपर एक रात में कितने किलोमीटर साफ़ कर सकता है, यह उस शहर की कुल सड़क लंबाई के सामने रखकर देखने लायक़ आँकड़ा है।
पक्का करना और पौधे लगाना सबसे टिकाऊ है, और सबसे धीमा भी। एक बार पक्का किया गया किनारा सालों काम करता है, पर उसे बनाने में महीने लगते हैं और वह हर मरम्मत के बाद फिर टूटता है।
और सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह पूरा ढाँचा पीएम10 पर काम करता है। जो कण सबसे ज़्यादा नुक़सान करते हैं, उनका बड़ा हिस्सा जलने से आता है, और उसके लिए यह ढाँचा बना ही नहीं है।
धूल वाली बात राजनीति में क्यों सुविधाजनक है
एक आख़िरी बात, जो आँकड़ों की नहीं, उनके इस्तेमाल की है।
हवा के हर दूसरे स्रोत का एक मालिक है, और उस मालिक का विरोध है।
पराली का सवाल किसानों तक जाता है और वहाँ मुआवज़े तथा फ़सल चक्र की बात आती है। वाहनों का सवाल गाड़ी मालिकों और वाहन उद्योग तक जाता है। उद्योग का सवाल कारख़ानों तक। जलावन का सवाल उन घरों तक जहाँ रसोई गैस का सिलेंडर भरवाना महँगा पड़ता है।
इनमें से हर एक पर कोई नाराज़ होता है।
धूल पर कोई नाराज़ नहीं होता।
धूल का कोई संगठन नहीं है, कोई वोट बैंक नहीं है, कोई उद्योग संघ नहीं है। धूल कम करने की घोषणा से किसी की आमदनी नहीं घटती।
इसलिए यह हर सर्दी में सबसे पहले बोला जाने वाला वाक्य है, और सबसे आसानी से मान लिया जाने वाला भी।
इसका मतलब यह नहीं कि धूल पर काम नहीं होना चाहिए। होना चाहिए, और शुक्रवार का प्रशिक्षण उसी दिशा का काम है।
मतलब सिर्फ़ इतना है कि जब कोई मुद्दा सबसे कम विवादित हो, तो उसके सबसे ज़्यादा बोले जाने की एक वजह उसका सबसे बड़ा होना हो सकती है, और दूसरी वजह उसका सबसे सुविधाजनक होना।
आख़िर में
सर्दी आने में तीन महीने हैं, और तब यह बहस फिर शुरू होगी।
उस बहस में यह लेख एक ही चीज़ जोड़ना चाहता है। जब कोई कहे कि दिल्ली की हवा में सबसे बड़ा हिस्सा धूल का है, तो अगला सवाल यह पूछा जाए कि किस अंश में।
पीएम10 में, यह सही है।
पीएम2.5 में, जो फेफड़ों में गहरे तक जाता है, धूल का हिस्सा 8 से 25 फ़ीसदी है।
दोनों वाक्य साथ बोले जाएँ तो कोई गुमराह नहीं होता। अलग-अलग बोले जाएँ तो दोनों में से कोई भी किसी काम आ जाता है।

स्रोतसीएसआईआर-सीआरआरआई की विज्ञप्ति, 5 सितंबर 2026, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग, धूल नियंत्रण के मानक ढाँचे पर समिति रिपोर्ट, जनवरी 2025, सीएक्यूएम, सीएसआईआर-सीआरआरआई और एसपीए के त्रिपक्षीय समझौते की रिपोर्ट, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम का संशोधित लक्ष्य