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लखनऊ स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में पहले नंबर पर आया, और उसकी हवा राष्ट्रीय मानक से तीन गुना गंदी है

पंद्रहवें स्थान से पहले स्थान पर, और डेढ़ करोड़ का इनाम। सर्वेक्षण के आठ में से ज़्यादातर मानक यह नापते हैं कि शहर ने क्या किया, यह नहीं कि हवा में क्या है।

लखनऊ का हज़रतगंज इलाक़ा
तस्वीर: Mohit, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

एक शहर एक साल में पंद्रहवें स्थान से पहले स्थान पर कैसे पहुँच सकता है?

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 के नतीजों में दस लाख से ऊपर आबादी वाले शहरों की श्रेणी में लखनऊ पहले नंबर पर है। इंदौर दूसरे और जबलपुर तीसरे पर। लखनऊ के नगर निगम को डेढ़ करोड़ रुपये का पुरस्कार मिला।

पिछले साल लखनऊ इसी सूची में पंद्रहवें स्थान पर था।

अख़बारों की सुर्ख़ी बनी: लखनऊ की हवा सबसे साफ़।

यह सुर्ख़ी ग़लत है, और यह जानने के लिए किसी विवाद की ज़रूरत नहीं। सर्वेक्षण ने ख़ुद कभी यह दावा किया ही नहीं।

हवा में क्या है

पीएम-10 उन कणों को कहते हैं जिनका व्यास दस माइक्रोमीटर से कम हो। ये साँस के साथ फेफड़ों तक पहुँच जाते हैं।

भारत का राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक इनके लिए वार्षिक औसत 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तय करता है।

लखनऊ पर हुए एक हालिया अध्ययन में चौबीस घंटे का औसत पीएम-10 स्तर 178 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर आँका गया, और वार्षिक स्तर राष्ट्रीय मानक से ऊपर पाया गया।

यानी जिस शहर को स्वच्छ वायु में देश का पहला स्थान मिला है, वहाँ की हवा भारत के अपने मानक पर खरी नहीं उतरती।

दोनों बातें एक साथ सच हैं। यही इस लेख का विषय है।

इसे समझने के लिए यह मान लेना ज़रूरी नहीं कि कहीं कोई गड़बड़ हुई। सर्वेक्षण ईमानदारी से किया गया मान लीजिए, नतीजे सही मान लीजिए, और लखनऊ की मेहनत भी असली मान लीजिए। फिर भी वह सुर्ख़ी ग़लत रहेगी, क्योंकि वह उस सवाल का जवाब दे रही है जो पूछा ही नहीं गया था।

सर्वेक्षण नापता क्या है

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत होता है और यह उसका पाँचवाँ संस्करण था। इसमें 130 शहर शामिल थे।

इसमें आठ मानक हैं। सड़क की धूल दबाने के उपाय। ठोस कचरे का प्रबंधन। वाहनों के उत्सर्जन पर नियंत्रण। औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण। निर्माण और विध्वंस के मलबे का निपटान। जन-जागरूकता के अभियान। और पीएम-10 तथा पीएम-2.5 में वास्तविक कमी।

इन आठ में से सात यह पूछते हैं कि नगर निगम ने क्या किया।

आठवाँ पूछता है कि हवा में क्या बदला।

अंकों का बड़ा हिस्सा पहले सात से आता है। यही वजह है कि एक शहर एक साल में पंद्रहवें से पहले स्थान पर आ सकता है, जबकि हवा की रसायन शास्त्र इतनी तेज़ी से नहीं बदलती।

किसी शहर की हवा में कणों का स्तर एक साल में चौदह पायदान के बराबर सुधर जाए, यह भौतिक रूप से लगभग असंभव है। पर उसकी फ़ाइलें, मशीनें, अनुबंध और अभियान एक साल में बहुत बदल सकते हैं। रैंकिंग दूसरी चीज़ को नाप रही थी, और उसने वही नापा जो उसे नापना था।

सर्वेक्षण की प्रक्रिया में तीन परतें बताई जाती हैं: तकनीकी जाँच, प्रदूषण में मापी गई कमी, और नागरिकों में जागरूकता। इनमें से सिर्फ़ बीच वाली परत हवा से जुड़ी है।

दो अलग चीज़ें, एक ही नाम

धुंध में यातायात। उत्तर भारत के मैदानी शहरों में सर्दियों में हवा ठहर जाती है
तस्वीर: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय GODL-India

यहाँ एक बुनियादी फ़र्क़ है जो सारी ग़लतफ़हमी की जड़ है।

एक चीज़ है प्रयास: शहर ने कितनी सड़कें साफ़ कीं, कितनी मशीनें ख़रीदीं, कितने निर्माण स्थलों पर पर्दे लगवाए, कितने अभियान चलाए।

दूसरी चीज़ है नतीजा: हवा में कण कितने कम हुए।

दोनों जुड़े हुए हैं पर एक नहीं हैं। एक शहर पूरी ईमानदारी से सब कुछ कर सकता है और फिर भी उसकी हवा ख़राब रह सकती है, क्योंकि प्रदूषण का बड़ा हिस्सा उसकी सीमा के बाहर से आता है।

उत्तर भारत के मैदानी शहरों में यही होता है। सर्दियों में हवा ठहर जाती है, आसपास के इलाक़ों से धुआँ आता है, और शहर के अपने किए का असर उसमें दब जाता है।

तो प्रयास को नापना ग़लत नहीं है। वह उचित है, क्योंकि नगर निगम पर वही ज़िम्मेदारी डाली जा सकती है जो उसके बस में है।

ग़लत यह है कि उस पैमाने पर मिले पहले स्थान को "सबसे साफ़ हवा" कहकर छापा जाए।

इसी तरह की एक मिसाल स्वच्छता सर्वेक्षण की है, जिसमें इंदौर लगातार पहले आता रहा है। वहाँ भी पैमाना कचरा प्रबंधन की व्यवस्था है, और वहाँ भी लोग उसे शहर के साफ़ होने का प्रमाणपत्र मान लेते हैं। फ़र्क़ यह है कि कचरे की सफ़ाई आँखों से दिख जाती है, इसलिए दावे की जाँच आसान है।

हवा नहीं दिखती। इसलिए हवा वाली रैंकिंग की जाँच सिर्फ़ आँकड़ों से हो सकती है, और वे आँकड़े अलग जगह छपते हैं।

पूरे देश की तस्वीर

अकेले लखनऊ को देखना अन्याय होगा। पूरी सूची देखिए तो तस्वीर और साफ़ होती है।

एक आकलन के मुताबिक़ देश के जिन 229 शहरों के पास पीएम-10 का पर्याप्त आँकड़ा था, उनमें से 190 राष्ट्रीय मानक से बाहर थे।

सिर्फ़ 39 शहर मानक पर खरे उतरे।

यानी दस में से आठ से ज़्यादा शहरों की हवा उस स्तर से ख़राब है जिसे भारत ने ख़ुद स्वीकार्य माना है।

इस पृष्ठभूमि में किसी शहर का पहला आना यह नहीं बताता कि वहाँ की हवा अच्छी है। वह बताता है कि उस शहर ने बाक़ी शहरों के मुक़ाबले ज़्यादा काम किया या कम से कम ज़्यादा दर्ज कराया।

रैंकिंग सापेक्ष होती है। मानक निरपेक्ष होता है। दोनों को एक साथ पढ़ना चाहिए, और अक्सर सिर्फ़ पहला छपता है।

इस अंतर का एक व्यावहारिक नतीजा है। किसी कक्षा में पहला आने वाला बच्चा पास हुआ है या नहीं, यह उसकी रैंक से पता नहीं चलता। अगर पूरी कक्षा फ़ेल हुई हो, तो पहला आने वाला भी फ़ेल है।

वायु गुणवत्ता में यही स्थिति है। कक्षा में 229 शहर हैं और 190 पास नहीं हुए।

कार्यक्रम का लक्ष्य क्या था

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम 2019 में शुरू हुआ था। उसका संशोधित लक्ष्य यह है कि 2026 तक पीएम-10 में चालीस फ़ीसदी की कमी हो, या शहर 60 माइक्रोग्राम वाले राष्ट्रीय मानक तक पहुँच जाए।

ध्यान दीजिए कि यह लक्ष्य विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देश का नहीं है। वह इससे बहुत नीचे है।

भारत का अपना मानक 60 है और उसे पाना ही चुनौती बना हुआ है।

2026 वह साल है जिसमें यह लक्ष्य पूरा होना था। और यही वह साल है जिसमें 229 में से 190 शहर मानक से बाहर हैं।

तो लखनऊ ने किया क्या

सड़क की सफ़ाई करने वाली मशीनें। सर्वेक्षण के आठ मानकों में सड़क की धूल दबाना पहला है
तस्वीर: आवास एवं शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय GODL-India

यह सवाल भी ईमानदारी से पूछा जाना चाहिए, क्योंकि पंद्रहवें से पहले स्थान पर आना अपने आप में कुछ बताता है।

सर्वेक्षण जिन कामों को अंक देता है, वे असली काम हैं। सड़क की धूल दबाने के लिए मशीनी सफ़ाई और पानी का छिड़काव सचमुच कणों को कम करता है। निर्माण स्थलों को ढँकना कम करता है। कचरा जलाने पर रोक कम करती है।

लखनऊ ने इन मोर्चों पर काम बढ़ाया, यह मानने की वजह है। सर्वेक्षण में तकनीकी जाँच भी होती है, इसलिए यह सिर्फ़ काग़ज़ी दावा नहीं होता।

पर इन कामों का असर हवा पर दिखने में सालों लगते हैं, और वह असर दूसरे कारकों के साथ मिलकर आता है। मौसम बदल जाए तो एक साल की मेहनत छिप जाती है, और मौसम साथ दे तो बिना कुछ किए भी आँकड़े सुधर जाते हैं।

साल दर साल की उछल-कूद

एक और चीज़ है जो इन रैंकिंग में बार-बार दिखती है और जिसे शक की नज़र से देखना चाहिए।

शहर हर साल बड़ी छलाँगें लगाते हैं। कोई पंद्रहवें से पहले पर आ जाता है, कोई तीसरे से बीसवें पर चला जाता है। अगर पैमाना वही है और शहर वही हैं, तो इतनी उछल-कूद अपने आप में एक जानकारी है।

इसका मतलब यह है कि रैंकिंग उन चीज़ों के प्रति बहुत संवेदनशील है जो साल भर में बदल जाती हैं: कौन सा नगर आयुक्त तैनात था, किसने कितने अच्छे से दस्तावेज़ जमा किए, किस शहर ने किस मद में कितना ख़र्च दिखाया।

जो चीज़ें धीरे बदलती हैं, यानी हवा में कणों का असली स्तर, उनका असर इस उछल-कूद में दब जाता है।

इसलिए किसी शहर का इस साल पहला आना अगले साल की कोई गारंटी नहीं देता, और यह बात हर साल के नतीजों से साबित होती रहती है।

एक और चीज़ जो रैंकिंग नहीं बताती

इस पूरे ढाँचे में एक और कमी है जिस पर कम बात होती है।

शहर की हवा नापने के लिए निगरानी केंद्र लगे होते हैं, और यह अपने आप में तय करता है कि आँकड़ा क्या आएगा। केंद्र कहाँ लगा है, कितने लगे हैं, और उनमें से कितने पूरे साल चले, इन तीनों से औसत बदल जाता है।

जिन शहरों में केंद्र कम हैं, वहाँ का औसत कम जगहों से बनता है। जिनमें कोई केंद्र किसी व्यस्त चौराहे पर है और किसी शहर में पार्क के पास, दोनों की तुलना सीधी नहीं होती।

इसीलिए वह आकलन "जिन शहरों के पास पर्याप्त आँकड़ा था" कहकर शुरू होता है। जिनके पास नहीं था, वे गिनती से बाहर रह गए, और उनकी हवा इससे साफ़ नहीं हो गई।

एक सवाल जो पूछा जाना चाहिए

इस सर्वेक्षण में जो शहर हिस्सा लेते हैं, वे अपने आँकड़े ख़ुद जमा करते हैं और उनकी जाँच होती है। यहाँ एक स्वाभाविक सवाल बनता है।

जिस शहर के पास दस्तावेज़ बनाने और जमा करने की बेहतर क्षमता है, उसे इसमें फ़ायदा मिलेगा या नहीं।

बड़े नगर निगमों के पास अलग विभाग हैं, सलाहकार हैं, और ऐसे लोग हैं जिनका काम ही इस तरह की रिपोर्ट तैयार करना है। छोटे शहरों के पास यह सब नहीं होता।

इसका मतलब यह नहीं कि नतीजे बेईमानी से बनते हैं। इसका मतलब यह है कि जो पैमाना प्रयास को नापता है, वह प्रयास को दर्ज करने की क्षमता को भी नाप रहा होता है, और ये दोनों एक चीज़ नहीं हैं।

इनाम किस बात का है

डेढ़ करोड़ रुपये का पुरस्कार नगर निगम को मिला, और यह ठीक है।

पुरस्कार का मक़सद नगर निगमों को उस काम के लिए प्रोत्साहित करना है जो उनके अधिकार क्षेत्र में है। कचरा उठाना, सड़क साफ़ करना, निर्माण पर नियम लगवाना। ये सब निगम के काम हैं।

समस्या तब बनती है जब यह पुरस्कार जन-संवाद में बदलकर यह बन जाता है कि शहर की हवा ठीक हो गई। तब उस शहर के लोगों को एक ग़लत भरोसा मिलता है, और अगले साल के लिए दबाव कम हो जाता है।

पुरस्कार का नाम "स्वच्छ वायु सर्वेक्षण" है। अगर उसका नाम "वायु प्रबंधन सर्वेक्षण" होता, तो शायद यह ग़लतफ़हमी बनती ही नहीं।

जिनके फेफड़ों का सवाल है

निर्माण स्थल पर मज़दूर। दिन भर बाहर रहने वालों के पास हवा से बचने का कोई विकल्प नहीं होता
तस्वीर: जिम कार्टर, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

इस बहस को आँकड़ों तक छोड़ देना आसान है, इसलिए एक बात याद रखनी चाहिए।

पीएम-10 और पीएम-2.5 का असर सबसे ज़्यादा उन लोगों पर पड़ता है जो दिन भर बाहर रहते हैं। रिक्शा और ठेला चलाने वाले, निर्माण मज़दूर, यातायात पुलिसकर्मी, सफ़ाईकर्मी, सब्ज़ी बेचने वाले।

इनके लिए हवा से बचने का कोई विकल्प नहीं होता। न शुद्धिकरण यंत्र, न बंद दफ़्तर, न वह छूट कि ख़राब दिनों में घर से काम कर लिया जाए।

बच्चों और बुज़ुर्गों पर असर अलग तरह का पड़ता है। बढ़ते फेफड़ों पर पड़ा असर उम्र भर रहता है, और यह उन आँकड़ों में नहीं दिखता जो साल दर साल की तुलना करते हैं।

इसलिए जब कोई शहर पहले स्थान पर आता है और लोग यह मान लेते हैं कि हवा ठीक हो गई, तो जो चीज़ कम होती है वह सिर्फ़ चिंता नहीं होती। दबाव भी कम होता है, और दबाव ही वह चीज़ है जिससे यह काम आगे बढ़ता है।

पाठक इसे कैसे पढ़े

इस तरह की हर रैंकिंग के साथ तीन सवाल पूछे जा सकते हैं, और वे किसी भी क्षेत्र में काम आते हैं।

पहला: यह किसे नाप रही है, प्रयास को या नतीजे को।

दूसरा: यह सापेक्ष है या निरपेक्ष। यानी क्या पहला स्थान पाने वाला किसी तय मानक पर खरा उतरा है, या सिर्फ़ बाक़ियों से बेहतर है।

तीसरा: जो आँकड़ा इसमें लगा है, वह कहाँ से और कितनी जगहों से आया है।

इन तीनों के जवाब लगभग हमेशा उसी दस्तावेज़ में मिल जाते हैं जिससे सुर्ख़ी बनी होती है।

इस मामले में तीनों के जवाब मौजूद थे। सर्वेक्षण ने अपने आठों मानक गिनाए, कार्यक्रम ने अपना लक्ष्य बताया, और मानक बोर्ड की वेबसाइट पर छपा है।

जो नहीं छपा वह इनका जोड़ था।

और यह कोई मामूली चूक नहीं है। जिस देश के दस में से आठ शहर अपने ही मानक से बाहर हों, वहाँ हर साल एक शहर का ताज पहनाया जाना और उसे साफ़ हवा का प्रमाणपत्र मान लिया जाना एक ऐसी कहानी बनाता है जो आँकड़ों से मेल नहीं खाती।

लखनऊ ने काम किया और उसका इनाम मिला। यह ख़बर है। लखनऊ की हवा साफ़ हो गई, यह ख़बर नहीं है, क्योंकि वह हुई नहीं।

स्रोतपर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विज्ञप्ति, 7 सितंबर 2026, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक, ऊर्जा एवं स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र, एनसीएपी प्रगति रिपोर्ट 2026, एटमॉस्फ़ेरिक एनवायरनमेंट, एनसीएपी के दौरान वायु गुणवत्ता का आकलन

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