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1891 का बैंकर्स बुक्स साक्ष्य अधिनियम 1 अक्टूबर को हटेगा, डिजिटल रिकॉर्ड के तीन प्रमाणपत्र घटकर एक होंगे

वित्त मंत्रालय ने 11 सितंबर को बताया कि बैंकर्स बुक्स साक्ष्य अधिनियम, 2026 पहली अक्टूबर से लागू होगा। उसी दिन 1891 का अधिनियम रद्द हो जाएगा। बदलाव इस बात में नहीं है कि बैंक का रिकॉर्ड सबूत बनता है या नहीं, बदलाव इस बात में है कि उसके साथ कौन-सा काग़ज़ और किसका दस्तख़त लगेगा।

सुप्रीम कोर्ट का गलियारा और दाईं ओर कोर्ट संख्या 13 का बोर्ड, अगस्त 2018 की तस्वीर। बैंक का रिकॉर्ड ऐसे ही कमरों में असल बही की जगह प्रमाणित नक़ल की शक्ल में पहुँचता है
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अदालत में बैंक का खाता-विवरण असल बहीखाते की शक्ल में नहीं आता। उसकी प्रमाणित नक़ल आती है, और साथ में बैंक का एक काग़ज़ लगता है जिसमें लिखा होता है कि नक़ल सही है, रिकॉर्ड रोज़मर्रा के कारोबार में बना था, और किताब अब भी बैंक की हिरासत में है। यह इंतज़ाम 1891 में बना था। 1 अक्टूबर से यह काग़ज़ बदल जाएगा।

वित्त मंत्रालय ने शुक्रवार, 11 सितंबर को बताया कि बैंकर्स बुक्स साक्ष्य अधिनियम, 2026 पहली अक्टूबर से लागू होगा। तारीख़ 10 सितंबर की अधिसूचना ने तय की। उसी दिन 1891 का अधिनियम रद्द हो जाएगा, और बैंक की 'किताब' की परिभाषा में क्लाउड पर रखा रिकॉर्ड भी गिना जाने लगेगा।

बुनियादी उसूल नहीं बदल रहा। प्रमाणित नक़ल पहले भी प्राथमिक दृष्टया सबूत थी और आगे भी रहेगी, यानी वह अपने आप में देनदारी साबित नहीं करती, सिर्फ़ इतना साबित करती है कि रिकॉर्ड में ऐसी प्रविष्टि है। बदल रही है मशीनरी: कौन-सा रिकॉर्ड 'बैंकर्स बुक' गिना जाएगा, उसके साथ कौन-सा प्रमाणपत्र लगेगा, उस पर कौन दस्तख़त करेगा, और बैंक के अधिकारी को अदालत कब बुला सकेगी।

13 अगस्त का अधिनियम, 10 सितंबर की अधिसूचना

राजपत्र में इस क़ानून का नंबर 2026 का अधिनियम 15 है। भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 1, संख्या 30, गुरुवार 13 अगस्त 2026 में विधि और न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग ने उसे इस पंक्ति के साथ छापा कि संसद के इस अधिनियम को उसी दिन राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिल गई।

धारा 1(2) लागू होने की तारीख़ तय करने का काम केंद्र सरकार पर छोड़ती है। 10 सितंबर की अधिसूचना ने वह तारीख़ पहली अक्टूबर 2026 रखी। पत्र सूचना कार्यालय ने 11 सितंबर को 2:53 बजे अपराह्न यह विज्ञप्ति जारी की। उसमें लिखा है कि क़ानून तकनीक-निरपेक्ष रुख़ अपनाता है और भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल, वर्चुअल तथा क्लाउड-आधारित रिकॉर्ड को मान्यता देता है; कि प्रमाणन सरल और मानक होगा; कि बैंक अधिकारियों को बुलाने पर अदालत को लिखित में "विशेष कारण" दर्ज करने होंगे; और कि केंद्र सरकार इन प्रावधानों का विस्तार वित्तीय क्षेत्र की विनिर्दिष्ट संस्थाओं तक कर सकती है।

विज्ञप्ति के नीचे 10 सितंबर की अधिसूचना के दो लिंक छपे हैं, दोनों egazette.gov.in के, और दोनों पतों के भीतर एक सत्र-पहचान संख्या जड़ी है; बाहर से खोलने पर उनसे कोई दस्तावेज़ नहीं मिलता। इस लेख में क़ानून के पाठ के बारे में जो लिखा है, वह अधिनियम के अपने राजपत्र पाठ से और 1891 के अधिनियम के इंडिया कोड पर मौजूद पाठ से पढ़ा गया है। अधिसूचना का अपना पाठ पढ़ा नहीं जा सका, इसलिए उसमें तारीख़ के अलावा और क्या है, यह यहाँ दर्ज नहीं है।

संसद में यह विधेयक लंबा नहीं टिका। 3 अगस्त 2026 को लोकसभा में विधेयक संख्या 147 के रूप में पेश हुआ, 5 अगस्त को बिना चर्चा ध्वनिमत से पारित हुआ, 10 अगस्त को राज्यसभा ने पारित किया। उद्देश्यों और कारणों के कथन पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के दस्तख़त हैं, तारीख़ 28 जुलाई 2026।

1891 का क़ानून बहीखाता अदालत में लाने से बचाने के लिए बना था

पुराने क़ानून का नंबर 1891 का अधिनियम 18 है और इंडिया कोड की प्रति पर उसकी तारीख़ पहली अक्टूबर 1891 दर्ज है। उसका लंबा शीर्षक एक ही वाक्य का था: बैंकरों की किताबों के संबंध में साक्ष्य के क़ानून का संशोधन करने वाला अधिनियम।

समस्या व्यावहारिक थी। जिस मुक़दमे में बैंक ख़ुद पक्षकार नहीं, उसमें भी समन आने पर बैंक को अपनी लेजर उठाकर कचहरी भेजनी पड़ती थी और मुख्य लेखाकार को दिन भर गवाही के लिए बैठना पड़ता था। जब तक किताब अदालत में रहती, शाखा का रोज़ का हिसाब उसके बिना चलता। धारा 4 ने हल निकाला: प्रमाणित नक़ल हर क़ानूनी कार्यवाही में प्राथमिक दृष्टया सबूत मानी जाएगी, और उतनी ही हद तक जितनी हद तक असल प्रविष्टि क़ानूनन ग्राह्य होती, उससे आगे नहीं।

हैदराबाद में स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद की मुख्य शाखा का बैंकिंग हॉल और उसका तीन सौ फ़ुट लंबा संगमरमर का काउंटर, 1955 की तस्वीर। इसी दौर की लेजर कचहरी चली जाती तो शाखा का दिन उसके बिना कटता था
तस्वीर: Riaz Ahmed, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

धारा 5 ने दूसरी तरफ़ का बचाव दिया। जिस कार्यवाही में बैंक पक्षकार न हो, उसमें बैंक के अधिकारी को न किताब पेश करने के लिए बाध्य किया जा सकता है, न गवाह बनने के लिए, जब तक अदालत या कोई जज "विशेष कारण" से आदेश न दे। वह विशेष कारण क्या होगा, 1891 का क़ानून यह बताए बिना 135 साल चला।

इस ढाँचे की हद सुप्रीम कोर्ट ने 1967 में तय कर दी। चंद्रधर गोस्वामी बनाम गुवाहाटी बैंक लिमिटेड में अदालत ने कहा कि प्रमाणित नक़ल को उतना ही दर्जा मिलता है जितना असल प्रविष्टि को, उससे ज़्यादा नहीं; और खाता-बही की प्रविष्टियाँ अपने आप में किसी पर देनदारी नहीं डाल सकतीं। यही सिद्धांत नए क़ानून की धारा 5 में ज्यों का त्यों बैठा है।

धारा 3 के तहत विस्तार का अधिकार राज्य सरकार के पास था, और शर्त भी 1891 की दुनिया की थी: किसी साझेदारी या व्यक्ति की किताबों पर यह क़ानून तभी बढ़ता था जब वह कम से कम तीन साधारण खाता-किताबें रखता हो, यानी रोकड़ बही, दैनिक बही या जर्नल, और लेजर।

'बैंकर्स बुक': फ़्लॉपी-डिस्क से क्लाउड तक

परिभाषा का इतिहास तीन चरणों का है, और उसका पहला चरण वह नहीं है जो आमतौर पर बताया जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का अधिनियम 21) ने अपनी धारा 93 और तीसरी अनुसूची से, 17 अक्टूबर 2000 से, 1891 के क़ानून में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पहली बार जोड़े और धारा 2A डाली। इसके बाद परक्राम्य लिखत (संशोधन और प्रकीर्ण प्रावधान) अधिनियम, 2002 (2002 का अधिनियम 55) की धारा 11 ने 6 फ़रवरी 2003 से परिभाषा चौड़ी की।

2002 के संशोधन के बाद 1891 की धारा 2(3) यह पढ़ती थी कि बैंकर्स बुक में लेजर, दैनिक बही, रोकड़ बही और बैंक के साधारण कारोबार के बाक़ी सब रिकॉर्ड शामिल हैं, चाहे लिखित रूप में रखे हों या माइक्रो फ़िल्म, मैग्नेटिक टेप या किसी और यांत्रिक या इलेक्ट्रॉनिक डेटा-पुनर्प्राप्ति व्यवस्था में, चाहे परिसर में हों या बाहरी जगह पर।

2026 की धारा 2(1)(b) में माइक्रो फ़िल्म और मैग्नेटिक टेप की जगह खुली भाषा है: रिकॉर्ड चाहे लिखित या भौतिक रूप में हों, या किसी भी तरह की डेटा-भंडारण व्यवस्था में; और चाहे परिसर में हों, बाहर हों, वर्चुअल हों या क्लाउड पर।

प्रावधान1891 का अधिनियम2026 का अधिनियम
बैंकर्स बुकमाइक्रो फ़िल्म, मैग्नेटिक टेप या किसी यांत्रिक/इलेक्ट्रॉनिक डेटा-पुनर्प्राप्ति व्यवस्थाकोई भी डेटा-भंडारण व्यवस्था, इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल, वर्चुअल या क्लाउड स्थान समेत
प्रमाणपत्र का प्रारूपक़ानून में कोई छपा प्रारूप नहीं, शर्तें धारा 2(8) और 2A में बिखरीपहली और दूसरी अनुसूची में छपा प्रारूप, शर्तें धारा 3 में एक जगह
इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर दस्तख़तमुख्य लेखाकार या शाखा प्रबंधक, और अलग से कंप्यूटर सिस्टम का प्रभारीशाखा प्रमुख, कार्यालय प्रमुख या बैंक का अधिकृत अधिकारी
विस्तार का अधिकारराज्य सरकार, तीन खाता-किताबें रखने वाली साझेदारी या व्यक्ति तककेंद्र सरकार, वित्तीय क्षेत्र की किसी भी संस्था या संस्था-वर्ग तक
'विशेष कारण'क़ानून में परिभाषित नहींधारा 8(2) में तीन आधार गिनाए गए, लिखित में दर्ज करना ज़रूरी

धारा 7(2) एक और नई बात कहती है: अगर रिकॉर्ड बनाने, रखने या संसाधित करने का काम एक से ज़्यादा कंप्यूटर सिस्टम या संचार उपकरणों ने किया हो, चाहे वे अलग-थलग चल रहे हों, नेटवर्क पर हों या किसी बिचौलिए के ज़रिए, तो उन सबको एक ही कंप्यूटर सिस्टम माना जाएगा। कोर बैंकिंग सर्वर, भुगतान मंच, डेटा सेंटर और आपदा-वसूली ढाँचा मिलकर जो एक ही खाता-विवरण बनाते हैं, क़ानून अब उन्हें एक इकाई की तरह पढ़ेगा।

भारतीय रेल की 139 सेवा का सर्वर कक्ष, 2009 की तस्वीर। अलग-अलग खड़े ऐसे रैक अब क़ानून की नज़र में एक ही कंप्यूटर सिस्टम गिने जाएँगे
तस्वीर: Indrajit Das, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

प्रमाणपत्र: तीन काग़ज़ों की जगह एक

दोनों क़ानूनों का फ़र्क़ यहाँ सबसे बड़ा है, और यही हिस्सा हर उस मुक़दमे में छुआ जाएगा जिसमें बैंक का रिकॉर्ड आता है।

काग़ज़ की किताब के लिए 1891 का इंतज़ाम धारा 2(8)(a) में था। प्रमाणपत्र नक़ल के पैर में, यानी उसी काग़ज़ के निचले हिस्से पर लिखा जाना था, और उसमें चार बातें कहनी थीं: नक़ल सही है; प्रविष्टि बैंक की साधारण किताबों में से एक में है और रोज़मर्रा के कारोबार में बनी थी; किताब अब भी बैंक की हिरासत में है; और यांत्रिक प्रक्रिया से ली गई नक़ल हो तो उसका अलग प्रमाणपत्र। दस्तख़त बैंक के मुख्य लेखाकार या प्रबंधक के होते थे, नाम और पदनाम के साथ।

इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए धारा 2A अलग से तीन काग़ज़ माँगती थी। पहला, मुख्य लेखाकार या शाखा प्रबंधक का प्रमाणपत्र कि यह प्रिंटआउट उसी प्रविष्टि का है। दूसरा, कंप्यूटर सिस्टम के प्रभारी का प्रमाणपत्र, जिसमें सिस्टम का संक्षिप्त विवरण और नौ ब्योरे देने होते थे: डेटा केवल अधिकृत लोगों से भरवाने के इंतज़ाम; अनधिकृत बदलाव रोकने और पकड़ने के इंतज़ाम; सिस्टम गिरने पर खोया डेटा वापस पाने के इंतज़ाम; डेटा को हटाने-योग्य माध्यम पर ले जाने का तरीक़ा; यह जाँचने का तरीक़ा कि डेटा सही-सही पहुँचा; भंडारण उपकरणों की पहचान का तरीक़ा; उनके रखरखाव और हिरासत के इंतज़ाम; छेड़छाड़ रोकने के इंतज़ाम; और सिस्टम की अखंडता की गवाही देने वाली कोई और बात। तीसरा, उसी प्रभारी का एक और प्रमाणपत्र कि सिस्टम उस समय ठीक चल रहा था, उसे सारा संबंधित डेटा मिला था, और प्रिंटआउट उसी डेटा को सही दिखाता है।

नए क़ानून में यह सब सिमटकर धारा 3 में आ गया है और प्रमाणपत्र एक है। काग़ज़ की किताब के लिए पहली अनुसूची का प्रारूप है, इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड के लिए दूसरी अनुसूची का। धारा 3(3) कहती है कि हर प्रमाणपत्र पर जारी होने की तारीख़ होगी, वह हाथ से या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के मुताबिक़ डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित होगा, और यह काम शाखा प्रमुख, कार्यालय प्रमुख या बैंक का कोई भी ऐसा अधिकारी करेगा जिसे बैंक ने इसके लिए अधिकृत किया हो। दस्तख़त करने वाले का पूरा नाम और पदनाम प्रमाणपत्र में लिखा जाएगा। धारा 3 का परंतुक जोड़ता है कि बात अपनी जानकारी और विश्वास के अनुसार कह देना पर्याप्त होगा।

कंप्यूटर सिस्टम का प्रभारी अब अलग से हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। बैंक तय करेगा कि किसे अधिकृत करना है, और वही एक व्यक्ति सिस्टम पर भी बोलेगा और नक़ल पर भी।

धारा 2A के तीन ब्योरे नए प्रारूप में नहीं आए। खोया डेटा वापस पाने के इंतज़ाम अब प्रमाणित नहीं होते, डेटा के सही-सही पहुँचने की जाँच का तरीक़ा भी नहीं, और भंडारण उपकरणों की पहचान का तरीक़ा भी नहीं। नक़ल के पैर में प्रमाणपत्र लिखने की शर्त भी हट गई।

दूसरी तरफ़ दो शर्तें नई हैं। दूसरी अनुसूची का आख़िरी मद कहता है कि नेटवर्क, उपकरण और उनमें रखा डेटा सुरक्षित थे और साइबर ख़तरों से निपटने के लिए तैयार थे; यह वाक्य 1891 के क़ानून में कहीं नहीं था। और धारा 7(1) का आख़िरी खंड जोड़ता है कि केंद्र सरकार अधिसूचना से और शर्तें भी तय कर सकती है।

धारा 12 इस प्रारूप को हिलाने का अधिकार भी केंद्र सरकार को देती है: वह अधिसूचना से अनुसूचियों में छपे प्रमाणपत्र समय-समय पर बदल सकती है, और संसद को दोबारा क़ानून छूने की ज़रूरत नहीं होगी। धारा 15 इतना ज़रूर कहती है कि इस क़ानून के तहत जारी हर अधिसूचना संसद के दोनों सदनों के सामने रखी जाएगी।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 अलग प्रमाणपत्र माँगती है

बैंक के रिकॉर्ड पर सिर्फ़ यही क़ानून लागू नहीं होता। इलेक्ट्रॉनिक सबूत का आम क़ानून भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में है, जिसकी धारा 62 कहती है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की अंतर्वस्तु धारा 63 के मुताबिक़ साबित होगी। धारा 63 पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65B की जगह आई है।

फ़र्क़ उपधारा (4) में है। वह कहती है कि रिकॉर्ड के साथ हर उस मौक़े पर प्रमाणपत्र देना होगा जब उसे ग्राह्यता के लिए पेश किया जाए, और वह प्रमाणपत्र उस व्यक्ति के दस्तख़त से होगा जो कंप्यूटर या संचार उपकरण का, या संबंधित गतिविधियों के प्रबंधन का, प्रभारी है, "और एक विशेषज्ञ" के दस्तख़त से।

साक्ष्य अधिनियम की अनुसूची इसे और ठोस कर देती है। उसके भाग क को पक्षकार भरता है और भाग ख को विशेषज्ञ। दोनों भागों में उपकरण का मेक, मॉडल, सीरियल नंबर और आईएमईआई या क्लाउड आईडी भरनी होती है, और रिकॉर्ड की हैश वैल्यू भी, यानी फ़ाइल से निकाला गया वह निशान जो उसमें एक बिंदु भी बदलने पर बदल जाता है। बताना होता है कि वह SHA1, SHA256, MD5 या किस और तरीक़े से निकाली गई, और हैश रिपोर्ट साथ नत्थी होती है।

बैंकों वाली दूसरी अनुसूची में इनमें से कुछ भी नहीं है। न हैश वैल्यू, न हैश रिपोर्ट, न विशेषज्ञ का भाग। उसमें बैंक अधिकारी की दस शपथ-पंक्तियाँ हैं, जिनमें पहली सिस्टम का संक्षिप्त ब्योरा है।

दोनों क़ानूनों को जोड़ने वाली कड़ी धारा 6 है, और वह असाधारण भाषा में शुरू होती है: "तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य क़ानून में कुछ भी अंतर्विष्ट होने के बावजूद"। आगे वह कहती है कि बैंकर्स बुक के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की ग्राह्यता इस आधार पर नहीं नकारी जाएगी कि वह इलेक्ट्रॉनिक है, और धारा 7 की शर्तें पूरी होने पर वह बाक़ी सबूतों की तरह ग्राह्य, वैध और प्रवर्तनीय होगा।

पर अधिनियम कहीं यह नहीं कहता कि बैंक का प्रमाणपत्र धारा 63(4) वाले प्रमाणपत्र की जगह ले लेगा। विधि-फ़र्म इकॉनॉमिक लॉज़ प्रैक्टिस ने अगस्त में विधेयक पर अपने विश्लेषण में यही बिंदु उठाया था; वरिष्ठ काउंसल मुकेश चंद ने लिखा कि क़ानून में साफ़ लिख देना उपयोगी होता कि बैंकों के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए इस अधिनियम का प्रमाणन पर्याप्त है और साक्ष्य अधिनियम के तहत दोबारा प्रमाणन की ज़रूरत नहीं। धारा 2(2) उलझन और बढ़ाती है: इस क़ानून में जो शब्द परिभाषित नहीं, उनके अर्थ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 समेत चार क़ानूनों से लिए जाएँगे।

यह सवाल कोरी तकनीकी बात नहीं है। 14 जुलाई 2020 को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने, जिसमें जस्टिस आर. एफ. नरीमन, जस्टिस एस. रवींद्र भट और जस्टिस वी. रामसुब्रमणियन थे, अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंट्याल में तय किया कि धारा 65B(4) का प्रमाणपत्र अनिवार्य है। अदालत ने शफ़ी मोहम्मद वाले फ़ैसले को पलटा और अनवर पी. वी. बनाम पी. के. बशीर में तय क़ानून बहाल किया। उस लकीर में प्रमाणपत्र की कमी छोटी चूक नहीं मानी जाती, रिकॉर्ड सबूत में आता ही नहीं।

बैंक अधिकारी को अदालत कब बुला सकेगी

1891 की धारा 5 का बचाव नए क़ानून की धारा 8(1) में लगभग उन्हीं शब्दों में है, दो जोड़ के साथ। पहला यह कि विशेष कारण लिखित में दर्ज करना होगा। पुराने क़ानून में सिर्फ़ "विशेष कारण से किए गए आदेश" लिखा था, दर्ज करने की शर्त नहीं थी।

दूसरा जोड़ बड़ा है। धारा 8(2) पहली बार बताती है कि विशेष कारण का मतलब क्या है, और तीन आधार गिनाती है: जहाँ बैंकर्स बुक की प्रविष्टि या जानकारी की सटीकता या असलियत संदिग्ध हो; जहाँ कोई ऐसी घटना हुई हो जिससे लगे कि बैंक में रिकॉर्ड रखने की नियमितता या साधारण प्रकृति में व्यवधान आया है; या जहाँ बैंक धारा 9 के तहत दिए आदेश का पालन न करे।

असर दोनों तरफ़ जाता है। बैंक अधिकारी को रोज़मर्रा के मुक़दमों में गवाही के लिए घसीटना और मुश्किल होगा, क्योंकि अदालत को कारण लिखना पड़ेगा। पर जिस पक्ष को रिकॉर्ड पर शक है, उसके पास अब तीन नामज़द दरवाज़े हैं, जबकि पहले एक अपरिभाषित शब्द के भरोसे बहस करनी पड़ती थी।

एक बदलाव पाठ पढ़ने पर ही दिखता है। 1891 की धारा 8 कहती थी कि जाँच या अन्वेषण के दौरान अदालत के आदेश का मतलब पुलिस अधीक्षक के रैंक से नीचे न होने वाले उस अधिकारी का आदेश होगा जिसे उपयुक्त सरकार निर्दिष्ट करे। 2026 की धारा 11(1) में वही वाक्य है, एक विकल्प जुड़ जाने के साथ: "पुलिस अधीक्षक के रैंक से नीचे न होने वाले अधिकारी या ऐसे अन्य अधिकारी का, जिसे उपयुक्त सरकार इस निमित्त निर्दिष्ट करे"। पुराने पाठ में सरकार केवल यह चुन सकती थी कि उस रैंक के किस अधिकारी को यह अधिकार मिले। नए पाठ में "ऐसे अन्य अधिकारी" वाला विकल्प किसी रैंक से बँधा नहीं लिखा गया। यह अभी शब्दों का पाठ भर है; किसी अदालत ने इस पर कुछ नहीं कहा और केंद्र या किसी राज्य ने ऐसा अधिकारी अब तक निर्दिष्ट नहीं किया।

चेक बाउंस और धोखाधड़ी की सुनवाई पर असर

पैमाना बड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 2/2020 में 16 अप्रैल 2021 के आदेश में, न्याय मित्रों की प्रारंभिक रिपोर्ट के हवाले से, दर्ज किया कि 31 दिसंबर 2019 तक देश में 2.31 करोड़ आपराधिक मुक़दमे लंबित थे, जिनमें 35.16 लाख परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के थे।

सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट संख्या 3 के बाहर खड़े वकील और बेंच पर रखे मिसिल के बस्ते, दिसंबर 2018 की तस्वीर। चेक बाउंस के मुक़दमे निचली अदालतों में चलते हैं, पर काग़ज़ का रास्ता हर जगह यही है
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

पर चेक बाउंस के मुक़दमे में बैंक के रिकॉर्ड की भूमिका उतनी सीधी नहीं जितनी लगती है। अनादर का तथ्य साबित करने के लिए बैंकर्स बुक्स साक्ष्य अधिनियम की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 146 कहती है कि बैंक की ऐसी पर्ची या ज्ञापन पेश होने पर जिस पर चेक के अनादर का सरकारी निशान लगा हो, अदालत अनादर का तथ्य मान लेगी, जब तक वह ग़लत साबित न कर दिया जाए।

बैंकर्स बुक्स वाला क़ानून उससे आगे काम आता है: खाते में उस दिन कितना पैसा था, कब आया, कहाँ गया, किश्तें कब रुकीं। धोखाधड़ी के मुक़दमों में तो पूरा अभियोजन अक्सर खाता-विवरण की क़तारों पर खड़ा होता है।

यहीं प्रमाणपत्र की कमी घातक साबित होती रही है। दिल्ली हाई कोर्ट ने ओम प्रकाश बनाम केंद्रीय जाँच ब्यूरो में कहा कि अगर खाता-विवरण धारा 2A के ज़रूरी प्रमाणपत्र के बिना प्रदर्श के तौर पर चिह्नित कर दिए गए हों, तो वे सबूत में पढ़े ही नहीं जा सकते, चाहे सुनवाई के दौरान किसी ने आपत्ति न की हो; और प्रमाणपत्र मौजूद हो तो दस्तावेज़ को कौन साबित कर रहा है, यह प्रमाण के तरीक़े पर आपत्ति है, जो प्रदर्श बनाते वक़्त ही उठानी होगी। उसी अदालत ने आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड बनाम कामिनी शर्मा में, 31 जनवरी 2018 को, ध्यान दिलाया कि आज के खाते सर्वर पर रहते हैं और हर वसूली मुक़दमे में सर्वर मँगवाना व्यावहारिक नहीं।

नए क़ानून के बाद भी यह दूरी बनी रहेगी। धारा 5 के शब्द 1891 की धारा 4 से लिए गए हैं, "प्राथमिक दृष्टया सबूत" से लेकर "उससे आगे नहीं" तक। प्रमाणित खाता-विवरण अदालत में आ जाएगा; उससे देनदारी अपने आप साबित नहीं होगी। बदलाव इतना है कि बचाव पक्ष के पास अब धारा 8(2) के नामज़द आधार हैं, जिन पर वह असल रिकॉर्ड और बैंक अधिकारी की माँग कर सकता है।

नक़ल, ख़र्च और बैंक की नई ज़िम्मेदारी

नेट बैंकिंग से डाउनलोड की गई पीडीएफ़ वह चीज़ नहीं है जिसे अदालत पढ़ती है। रास्ता धारा 9 से होकर जाता है। किसी पक्षकार के आवेदन पर अदालत आदेश दे सकती है कि वह पक्षकार प्रविष्टियाँ देख ले और नक़ल ले ले, या बैंक को आदेश दे सकती है कि तय अवधि में सारी संबंधित प्रविष्टियों की प्रमाणित नक़लें पेश करे, और साथ में एक और प्रमाणपत्र लगाए कि विवादित मुद्दों से जुड़ी और कोई प्रविष्टि उसकी किताबों में नहीं मिलती।

धारा 9(2) कहती है कि यह आदेश बैंक को बुलाकर या बिना बुलाए दिया जा सकता है, और पालन की तारीख़ से तीन साफ़ दिन पहले, बैंक की छुट्टियों को छोड़कर, बैंक पर तामील होगा। धारा 9(3) में बैंक के पास दो विकल्प हैं: सुनवाई के दिन किताबें पेश करने की पेशकश, या आदेश के ख़िलाफ़ कारण बताने की सूचना। इसके बाद के शब्द बदले हैं। 1891 में लिखा था कि तब वह आदेश "आगे के आदेश के बिना" लागू नहीं होगा; 2026 में लिखा है कि बैंक को सुने बिना वह लागू नहीं होगा।

ख़र्च का हिसाब भी एकतरफ़ा नहीं रहा। 1891 की धारा 7(1) में अदालत बैंक को यह आदेश दे सकती थी कि वह किसी पक्षकार का ख़र्च उठाए, अगर वह ख़र्च बैंक की ग़लती या अनुचित देरी से हुआ हो। 2026 की धारा 10(1) में पहले उल्टी दिशा लिखी है: ख़र्च या उसका कोई हिस्सा पक्षकार बैंक को दे, या बैंक पक्षकार को दे जहाँ ख़र्च बैंक की ग़लती या देरी से हुआ हो। धारा 10(3) में शब्द भी सख़्त हुआ: पुराने क़ानून में ऐसा आदेश निर्दिष्ट सिविल अदालत "निष्पादित कर सकती थी", नए में वह उसे धन-डिक्री की तरह "निष्पादित करेगी"।

धारा 13 नई है: इस अधिनियम के तहत सद्भावपूर्वक किए गए किसी काम के लिए किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई वाद, अभियोजन या अन्य क़ानूनी कार्यवाही नहीं चलेगी। 1891 के क़ानून में इसका कोई जोड़ा नहीं था।

यह व्यवस्था सिर्फ़ बैंकों तक रुकी नहीं रहेगी। धारा 4 केंद्र सरकार को अधिकार देती है कि वह अधिसूचना से इस अधिनियम का विस्तार वित्तीय क्षेत्र की किसी भी संस्था या संस्था-वर्ग की किताबों तक कर दे, अपनी तय शर्तों, अपवादों या फेरबदल के साथ।

बैंक के हिस्से में जो आया है, वह दस्तख़त से ज़्यादा है। धारा 7 में दस शर्तें हैं, और उनमें से ज़्यादातर सिस्टम के बारे में हैं: वह उस दौर में नियमित इस्तेमाल में था; जानकारी रोज़मर्रा के कारोबार में उसमें भरी जाती थी; वह ठीक चल रहा था; डेटा केवल अधिकृत लोगों ने भरा और कोई अनधिकृत बदलाव पकड़ में नहीं आया; सिस्टम से छेड़छाड़ नहीं हुई; और नेटवर्क, उपकरण तथा डेटा साइबर ख़तरों से निपटने लायक़ सुरक्षित थे। शाखा का एक अधिकारी अब इन सब पर अपने नाम और पदनाम के साथ हस्ताक्षर करेगा।

लंबित मुक़दमे, और 1 अक्टूबर की तारीख़

1891 का क़ानून 1 अक्टूबर को ग़ायब नहीं हो जाएगा। धारा 16(2)(e) कहती है कि इस अधिनियम के लागू होने की तारीख़ से पहले, उस दिन, या उसके बाद भी, निरसित अधिनियम के तहत शुरू की गई कोई कार्यवाही, अपील और पुनर्विलोकन समेत, उसी पुराने अधिनियम के तहत जारी रहेगी, मानो नया क़ानून लागू ही न हुआ हो। जिन फ़ाइलों में 1891 का प्रमाणपत्र लग चुका है, वे उसी रास्ते चलती रहेंगी।

धारा 16(2)(f) कहती है कि किसी और क़ानून या दस्तावेज़ में 1891 के अधिनियम का जो हवाला है, वह नए अधिनियम का हवाला पढ़ा जाएगा, जहाँ तक वह उससे असंगत न हो। धारा 16(3) साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6 को भी लागू रखती है। धारा 14 केंद्र सरकार को कठिनाई दूर करने का अधिकार देती है, जो लागू होने के दो साल बाद ख़त्म हो जाएगा।

तारीख़ पर एक बात दर्ज करने लायक़ है। इंडिया कोड पर 1891 के अधिनियम की प्रति के मुख पृष्ठ पर उसकी तारीख़ पहली अक्टूबर 1891 छपी है। नया क़ानून ठीक 135 साल बाद, उसी तारीख़ को चलना शुरू करेगा। पहली अक्टूबर वित्त वर्ष की दूसरी छमाही का पहला दिन भी है। अधिसूचना का पाठ पढ़ा नहीं जा सका और वित्त मंत्रालय की विज्ञप्ति तारीख़ चुनने की वजह नहीं बताती।

स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, वित्त मंत्रालय, 11 सितंबर 2026, 2:53 बजे अपराह्न: 'बैंकर्स बुक्स साक्ष्य अधिनियम, 2026, 1 अक्टूबर 2026 से लागू होगा', भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 1, संख्या 30, 13 अगस्त 2026, विधि और न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग): बैंकर्स बुक्स साक्ष्य अधिनियम, 2026 (2026 का अधिनियम 15) का पूरा पाठ, इंडिया कोड पर (हैंडल 123456789/620111), इंडिया कोड (विधायी विभाग): बैंकर्स बुक्स साक्ष्य अधिनियम, 1891 (1891 का अधिनियम 18) का पूरा पाठ, संशोधनों के पाद-टिप्पणों सहित (हैंडल 123456789/496428), इंडिया कोड: भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (2023 का अधिनियम 47), धारा 62, धारा 63 और अनुसूची का राजपत्र पाठ, लोकसभा में पेश रूप में बैंकर्स बुक्स साक्ष्य विधेयक, 2026 (विधेयक संख्या 147, 2026), उद्देश्यों और कारणों का कथन 28 जुलाई 2026, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की प्रति, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, विधेयक ट्रैक: पेश होने और दोनों सदनों में पारित होने की तारीख़ें, लाइवलॉ, 5 अगस्त 2026: लोकसभा में विधेयक बिना चर्चा, ध्वनिमत से पारित, सुप्रीम कोर्ट, स्वत: संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 2/2020, 'In Re: Expeditious Trial of Cases Under Section 138 of N.I. Act 1881', आदेश 16 अप्रैल 2021, पैरा 5, अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंट्याल, सुप्रीम कोर्ट, 14 जुलाई 2020: धारा 65B(4) का प्रमाणपत्र अनिवार्य, इंडिया कोड: परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 146 का पाठ (बैंक की पर्ची पर अनादर की उपधारणा), इकॉनॉमिक लॉज़ प्रैक्टिस, अगस्त 2026, लेखक वरिष्ठ काउंसल मुकेश चंद: विधेयक पर विधि-फ़र्म का विश्लेषण और दोहरे प्रमाणन का सवाल

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