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सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी लेबल की समयसीमा माँगी, एफ़एसएसएआई के प्रस्ताव पर तेरह सवाल

3 अगस्त को खाद्य नियामक ने अदालत से कहा था कि पैकेट के सामने एक तालिका छाप दी जाएगी। अदालत ने वह प्रस्ताव लौटा दिया। 28 अगस्त को लाल षट्कोण का प्रस्ताव आया, और 10 सितंबर के आदेश में उस पर तेरह सवाल दर्ज हैं।

भारत में बिकने वाले एक बिस्किट पैकेट का अगला हिस्सा, फ़रवरी 2018 की तस्वीर; अभी किसी भी पैकेटबंद खाद्य के सामने चीनी, नमक या वसा की चेतावनी छापना ज़रूरी नहीं है
तस्वीर: Sahana CP, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

3 अगस्त को भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल कर कहा कि पैकेट के सामने एक तालिका छाप दी जाएगी। उसमें प्रति 100 ग्राम पोषक तत्व होंगे, सर्विंग का आकार होगा, और रोज़ की सुझाई गई सीमा भी, यानी 25 ग्राम अतिरिक्त चीनी, 10 ग्राम संतृप्त वसा और 5 ग्राम नमक। गणित पढ़ने वाले को करना था।

अदालत ने 13 अगस्त को वह प्रस्ताव लौटा दिया।

28 अगस्त के नए हलफ़नामे में एफ़एसएसएआई ने जो रखा, वह तालिका नहीं है: पैकेट के सामने लाल रंग का एक षट्कोण, जिसके भीतर "हाई फ़ैट", "हाई शुगर", "हाई सॉल्ट" या "हाइली स्वीटन्ड बेवरेज" लिखा होगा। बृहस्पतिवार, 10 सितंबर को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने माना कि एफ़एसएसएआई ने पिछली सुनवाई के बाद ठोस प्रगति की है, और उसके बाद 31 पन्नों में तेरह सवाल पूछे। पहला सवाल तारीख़ का है।

अदालत के तेरह सवाल

आदेश 2026 INSC 988 के रूप में दर्ज है। तकनीकी रूप से यह नई याचिका नहीं, 2024 की रिट याचिका (सिविल) 437 के भीतर दाख़िल विविध आवेदन 1177/2025 है। याचिकाकर्ता केरल की एक ग़ैर-लाभकारी संस्था है, 3S एंड आवर हेल्थ सोसाइटी।

एफ़एसएसएआई का प्रस्ताव दो चरणों का है। पहले चरण में लाल षट्कोण सिर्फ़ उन उत्पादों पर लगेगा जो अतिरिक्त वसा, अतिरिक्त चीनी और नमक में से दो या उससे ज़्यादा की तय सीमा पार करते हों, और कुछ ख़ास मीठे पेय पर। दूसरे चरण में वह उन उत्पादों तक फैलेगा जो इनमें से किसी एक की सीमा पार करते हों। दोनों चरणों के बीच कितना समय रहेगा, हलफ़नामे में यह नहीं लिखा।

पीठ ने इसी ख़ाली जगह पर उँगली रखी। आदेश में दर्ज है कि ऐसी किसी तारीख़ के बिना दूसरा चरण "पीछे छूट सकता है या अनिश्चित काल के लिए टल सकता है"। अदालत ने आगे कहा, "उपभोक्ता की स्वीकार्यता का आकलन या उद्योग को फ़ॉर्मूला बदलने के लिए पर्याप्त समय देना, समय की इस अनिश्चितता का पर्याप्त कारण नहीं हो सकता।"

नई दिल्ली में उच्चतम न्यायालय की मुख्य इमारत और उसके सामने का लॉन, फ़रवरी 2017 की तस्वीर; 10 सितंबर का आदेश इसी अदालत से आया
तस्वीर: Pinaki1983, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

बाक़ी सवाल लेबल की बनावट के हैं। षट्कोण कितना बड़ा होगा, हलफ़नामे में नहीं है। फ़ॉन्ट पीछे वाली पोषण तालिका से एक पॉइंट बड़ा रखने का प्रस्ताव है, जिसे याचिकाकर्ता ने बहुत छोटा बताया। अदालत ने जानना चाहा कि लोगो का आकार पैकेट के अनुपात में तय होगा या एक जैसा रहेगा, और विशेषज्ञ समिति से याचिकाकर्ता के इस सुझाव पर विचार करने को कहा कि कई देशों में लेबल मुख्य प्रदर्शन पैनल का 15 से 20 फ़ीसदी घेरते हैं।

एक सवाल भाषा का है। अदालत ने लिखा कि एफ़एसएसएआई ने पूरी तरह शब्दों पर टिका लेबल चुना है, और "शब्दों से भरा यह लेबल मान लेता है कि देश के हर राज्य, हर भाषा, हर उम्र और हर साक्षरता स्तर के उपभोक्ता में पढ़ने और समझने की एक ख़ास क्षमता है"। पीठ चाहती है कि शब्दों के साथ हर पोषक तत्व का चित्र भी हो। दूसरा सवाल रंग का है: भारतीय उपभोक्ता लाल रंग को माँसाहार से जोड़कर देखने का आदी है, इसलिए अदालत ने पूछा कि रंग पर दोबारा सोचने की ज़रूरत है या नहीं।

फिर चार और। एक षट्कोण में दो चेतावनियाँ एक साथ क्यों, हर पोषक तत्व के लिए अलग षट्कोण क्यों नहीं। ट्रांस फ़ैट का हिसाब कहाँ है। अधिसूचना के बाद अनुपालन शुरू से अनिवार्य होगा या पहले स्वैच्छिक अवधि रहेगी। और स्कूली पाठ्यक्रम में पोषण की समझ कैसे जोड़ी जाएगी, जिस पर जवाब केंद्र सरकार से माँगा गया है।

तीन हफ़्ते में मेज़ से षट्कोण तक

4 अगस्त की सुनवाई में केंद्र ने छह हफ़्ते और माँगे। उसी सुनवाई का एक हिस्सा आदेश में दर्ज है: सरकारी वकील ने बताया कि एक रिपोर्ट पिछले दिन दाख़िल हो चुकी है। पीठ ने लिखा कि उसे पता नहीं यह रिपोर्ट किस बारे में है, और याचिकाकर्ता के वकील को भी नहीं पता। अदालत ने रजिस्ट्री को प्रति जल्द से जल्द दूसरे पक्ष तक पहुँचाने का निर्देश दिया।

वह रिपोर्ट 3 अगस्त का हलफ़नामा थी। द प्रिंट ने 6 अगस्त को और बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 21 अगस्त को उसका ब्योरा छापा: चेतावनी का चिह्न नहीं, संख्याओं की तालिका। पोषण नीति पर काम करने वाली संस्था न्यूट्रिशन एडवोकेसी इन पब्लिक इंटरेस्ट के डॉ. अरुण गुप्ता ने द प्रिंट से कहा कि अदालत ने सरल चेतावनी की ओर इशारा किया था और एफ़एसएसएआई संख्यात्मक तालिका ले आया।

13 अगस्त की सुनवाई में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि अदालत के सुझाव पर चलना कठिन है, क्योंकि पैकेजिंग के अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप जाना मुश्किल है। पीठ ने वह तर्क नहीं माना। आदेश में लिखा है, "हम संघ के इस रुख़ को स्वीकार नहीं करते कि अंतरराष्ट्रीय मानकों, ख़ासकर विकसित देशों के मानकों से मेल बिठाना संभव नहीं है। क्या भारत अविकसित देश ही बना रहे? यही सवाल हम संघ के सामने रख रहे हैं।"

उसी आदेश में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 47 का हवाला दिया, और आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का एक हिस्सा ज्यों का त्यों उद्धृत किया। सर्वेक्षण के मुताबिक़ भारत का अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य बाज़ार 2009 से 2023 के बीच 150 फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़ा, और इसी अवधि में पुरुषों और महिलाओं में मोटापा दोगुना हुआ। सर्वेक्षण की नीतिगत सिफ़ारिश यह है कि प्रस्तावित इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग की जगह चेतावनी लेबल लाया जाए, बच्चों तक विज्ञापन सीमित हों, और व्यापार समझौते सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को कमज़ोर न करें।

बच्चों के आँकड़े उसी आदेश में यूनिसेफ़ की चाइल्ड न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2025 से लिए गए हैं। 5 से 19 साल के अधिक वज़न वाले बच्चों और किशोरों का अनुपात 2000 से 2022 के बीच 2 फ़ीसदी से बढ़कर 10 फ़ीसदी हुआ। रिपोर्ट का दूसरा आँकड़ा स्कूल के इर्द-गिर्द का है: स्कूल के भीतर मिलने वाले खाने-पीने का क़रीब 80 फ़ीसदी ताज़ा पका भोजन है, जबकि स्कूल के आसपास जो मिलता है उसका लगभग 80 फ़ीसदी पैकेटबंद स्नैक्स है।

अदालत ने दो हफ़्ते दिए थे। पंद्रहवें दिन षट्कोण आ गया।

आठ साल का चक्कर: लाल रंग से सितारों तक और वापस

पैकेट के सामने चेतावनी का विचार नया नहीं है। अप्रैल 2018 के मसौदा विनियमों में वह मौजूद था, और शब्द लगभग वही थे जो आज हैं। एफ़एसएसएआई की अपनी वेबसाइट पर रखी उस समय की कतरन में मसौदे का पाठ उद्धृत है: "हाई फ़ैट, शुगर एंड सॉल्ट (एचएफ़एसएस) खाद्य के लिए पोषक तत्वों का ब्लॉक 'लाल' रंग में होगा", यदि कुल चीनी से मिलने वाली ऊर्जा उत्पाद के प्रति 100 ग्राम या 100 मिलीलीटर की कुल ऊर्जा के 10 फ़ीसदी से ज़्यादा हो, ट्रांस फ़ैट से मिलने वाली ऊर्जा 1 फ़ीसदी से ज़्यादा हो, और कुल वसा या सोडियम तय सीमा से ऊपर हो। उसी मसौदे में बच्चों तक ऐसे उत्पादों के विज्ञापन पर रोक भी प्रस्तावित थी।

जून 2019 की एफ़एसएसएआई प्रेस विज्ञप्ति में लाल कोडिंग तब भी प्रस्ताव में थी, और तीन साल में चरणबद्ध ढंग से लागू होनी थी। उसी विज्ञप्ति के आख़िरी वाक्य में एक और बात है: "उद्योग संघ ने ख़ासकर पैकेट के सामने वाले लेबल पर जो मुख्य मुद्दे उठाए हैं, उन पर भी इन विनियमों को अंतिम रूप देते समय विचार किया जाएगा।"

अंतिम रूप 17 नवंबर 2020 को आया। खाद्य सुरक्षा और मानक (लेबलिंग एवं प्रदर्शन) विनियम, 2020 में "फ़्रंट ऑफ़ पैक" की परिभाषा है, लेकिन उसमें कोई चेतावनी नहीं, कोई रंग-कोडिंग नहीं, कोई रेटिंग नहीं। 9 सितंबर 2025 को जारी उसका आठवाँ समेकित संस्करण आज भी वैसा ही है।

13 सितंबर 2022 को नया मसौदा अधिसूचित हुआ, और उसमें चेतावनी की जगह सितारे थे। इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग हर पैकेटबंद उत्पाद को आधे से पाँच सितारे तक आँकती। इस मसौदे पर 17 सितंबर 2022 से 17 अप्रैल 2023 के बीच 14,000 से ज़्यादा आपत्तियाँ और सुझाव आए, जिनमें खाद्य कारोबारी, उपभोक्ता संगठन और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थाएँ शामिल थे। उन्हें देखने के लिए 17 फ़रवरी 2023 को विशेषज्ञ समिति बनी, जिसका कार्यकाल 30 अक्टूबर 2023 को बढ़ाया गया और जिसकी पाँच बैठकें हुईं।

समिति क्या तय कर पाई, यह एफ़एसएसएआई के 30 जनवरी 2026 के अनुपालन हलफ़नामे में दर्ज है, जिसे अदालत ने उद्धृत किया: "2022 में एफ़एसएसएआई की ओर से अधिसूचित आईएनआर प्रारूप पर हितधारकों के बीच कोई सहमति नहीं है।" फ़रवरी 2026 में द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक़, 9 अक्टूबर 2025 को सचिवों की समिति ने उसी विशेषज्ञ रिपोर्ट को देखकर पाया कि मसौदा अधिसूचनाएँ अपने मौजूदा रूप में अंतिम रूप देने लायक़ नहीं हैं, और उन्हें वापस लेने की सिफ़ारिश की।

10 फ़रवरी 2026 को पीठ ने लिखा कि वह अनुपालन हलफ़नामे से संतुष्ट नहीं है। आदेश का वाक्य सीधा है: "अब तक जो कवायद हुई है, उससे कोई सकारात्मक या अच्छा नतीजा नहीं निकला है।"

सितारों का गणित और चेतावनी का गणित

2022 के मसौदे का पूरा पाठ एफ़एसएसएआई के अपने टिप्पणी पोर्टल पर मौजूद है, और उसमें रेटिंग निकालने का सूत्र लिखा है। हर उत्पाद को चार जोखिम कारकों पर अंक मिलते हैं: ऊर्जा, संतृप्त वसा, कुल चीनी और सोडियम। ठोस खाद्य के लिए आधार संदर्भ मान प्रति 100 ग्राम 400 किलो कैलोरी, 21 ग्राम कुल चीनी, 5 ग्राम संतृप्त वसा और 450 मिलीग्राम सोडियम हैं; ग़ैर-डेयरी तरल के लिए प्रति 100 मिलीलीटर 30 किलो कैलोरी, 6 ग्राम चीनी, 3 ग्राम संतृप्त वसा और 100 मिलीग्राम सोडियम।

फिर दूसरी तरफ़ से अंक घटते हैं। फल-सब्ज़ी, मेवे-दलहन-मोटे अनाज, आहार फ़ाइबर और प्रोटीन के अंक जोड़कर आधार अंकों में से घटाए जाते हैं, और जो बचता है वही सितारों में बदलता है। मसौदे में इस छूट पर सीमा भी है: 20 से कम आधार अंक वाला ठोस उत्पाद प्रोटीन से 15 अंक तक कटवा सकता है, 20 से ऊपर वाला सिर्फ़ 7 तक।

ढाँचे का असर सीधा है। सितारों वाली व्यवस्था में चीनी की मात्रा को प्रोटीन या फ़ाइबर से संतुलित किया जा सकता है, और अंतिम अंक एक ही संख्या में सबकुछ समेट देता है। चेतावनी में ऐसा कोई संतुलन नहीं होता: सीमा पार हुई तो चिह्न लगेगा, चाहे उत्पाद में और जो भी हो।

मसौदे की दो और शर्तें ध्यान देने लायक़ हैं। पहली, अनुपालन अंतिम अधिसूचना के 48 महीने तक स्वैच्छिक रहता और उसके बाद अनिवार्य होता; अदालत ने अपने आदेश में इसी उपबंध को उद्धृत करते हुए पूछा है कि इस बार स्वैच्छिक अवधि रहेगी या नहीं। दूसरी, दुग्ध उत्पादों के लोगो वाले उत्पाद एचएफ़एसएस की परिभाषा से ही बाहर रखे गए थे।

लेबल का प्रकार कितना फ़र्क़ डालता है, इस पर भारत में एक नापा हुआ प्रयोग हो चुका है। असम, दिल्ली, गुजरात, ओडिशा, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के 2,869 वयस्कों पर जनवरी से मार्च 2022 के बीच हुए यादृच्छिक क्षेत्र परीक्षण में, जिसके नतीजे Nutrients पत्रिका में छपे, चेतावनी लेबल देखने वाले 60.8 फ़ीसदी लोगों ने ज़्यादा पोषक तत्व वाले सभी उत्पाद सही पहचाने। जीडीए लेबल पर यह 55.0 फ़ीसदी रहा, ट्रैफ़िक लाइट पर 54.8, सितारा रेटिंग पर 45.0, और बारकोड वाले नियंत्रण समूह में 39.1 फ़ीसदी। उसी अध्ययन का दूसरा नतीजा कम सुविधाजनक है: ख़रीदने के इरादे पर किसी भी लेबल का असर सांख्यिकीय रूप से सार्थक नहीं निकला।

नमक, चीनी और वसा की प्रस्तावित सीमाएँ

सीमाएँ एफ़एसएसएआई ने ख़ुद नहीं बनाईं। 28 अगस्त के हलफ़नामे में लिखा है कि आधार आईसीएमआर-राष्ट्रीय पोषण संस्थान की डाइटरी गाइडलाइंस फ़ॉर इंडियंस, 2024 होगी। उसके दिशानिर्देश 15 की तालिका 15.1 में प्रति 100 ग्राम ठोस भोजन के लिए 250 किलो कैलोरी ऊर्जा, 625 मिलीग्राम नमक, 3 ग्राम अतिरिक्त चीनी और 4.2 ग्राम अतिरिक्त वसा की सीमा दर्ज है। प्रति 100 मिलीलीटर तरल के लिए ये आँकड़े 70 किलो कैलोरी, 175 मिलीग्राम नमक, 2.0 ग्राम चीनी और 1.5 ग्राम वसा हैं।

तालिका 15.2 इससे आगे जाती है और भोजन को प्रसंस्करण के स्तर पर तीन समूहों में बाँटती है: समूह A न्यूनतम प्रसंस्कृत, समूह B मध्यम, समूह C अत्यधिक प्रसंस्कृत और योजकों से भरा हुआ। हर समूह फिर कैलोरी के आधार पर तीन उपवर्गों में बँटता है। A2, A3, B2, B3, C2 और C3 को दस्तावेज़ एचएफ़एसएस मानता है, और पूरे समूह C को अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य।

अदालत ने इसी जगह दो दस्तावेज़ों के बीच टकराव पकड़ा। 2024 की गाइडलाइंस एचएफ़एसएस को ऐसा भोजन बताती हैं जो "अत्यधिक खाना पकाने के तेल या वसा के साथ, या ज़्यादा अतिरिक्त चीनी और नमक के साथ तैयार किया गया हो", जबकि 2022 का मसौदा उसे "ऐसा प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद जिसमें संतृप्त वसा या कुल चीनी या सोडियम की मात्रा अधिक हो" कहता है। एक जगह "और", दूसरी जगह "या"। आदेश में पीठ ने लिखा कि दोनों दस्तावेज़ों में इन शब्दों का अलग-अलग इस्तेमाल भ्रम दिखाता है और इसे प्राथमिकता के आधार पर सुलझाना ज़रूरी है, क्योंकि चरणों का पूरा ढाँचा इसी परिभाषा पर टिका है।

एक और पुराना फ़ैसला उलटता दिख रहा है। 29 अक्टूबर 2021 की हितधारक बैठक के जो कार्यवृत्त अदालत ने उद्धृत किए, उनमें सहमति "कुल चीनी" और "संतृप्त वसा" पर बनी थी, अतिरिक्त चीनी और अतिरिक्त वसा पर नहीं। बैठक में तर्क यह था कि ऊर्जा की गणना कुल चीनी पर होती है, और जाँच की दृष्टि से भी वही आसान है। 2026 का प्रस्ताव "अतिरिक्त" चीनी और "अतिरिक्त" वसा पर लौट आया है, और अदालत ने पूछा है कि रुख़ बदला है या नहीं, और अगर बदला है तो पुरानी चिंताएँ कैसे दूर होंगी। ट्रांस फ़ैट प्रस्ताव में कहीं नहीं है, जबकि 2018 का मसौदा उसे शामिल करता था।

उद्योग की दलील: प्रति सर्विंग बनाम प्रति सौ ग्राम

मुक़दमे में हस्तक्षेपकर्ता ऑल इंडिया फ़ूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन की दलील आदेश में दर्ज है। संघ का कहना है कि लेबल प्रति 100 ग्राम के हिसाब से नहीं, बल्कि पोषक संदर्भ मान पर आधारित प्रति सर्विंग के हिसाब से तय होना चाहिए, यानी उतनी मात्रा पर जितनी एक बार में खाई जाती है।

पीठ ने इस दलील को पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया। आदेश कहता है कि यह वैज्ञानिक रूप से ठोस और उपभोक्ता को सक्षम बनाने वाला मॉडल है और कुछ पश्चिमी देशों में चलता है। इसके बाद वाक्य पलट जाता है: ऐसी जानकारी "हानिकारक तत्वों को लेकर लाल संकेत नहीं दे पाती", और अक्सर वह नज़र में आने के बजाय अनदेखी रह जाती है।

संघ का एक अनुमान भी चर्चा में है। द लॉजिकल इंडियन ने 10 सितंबर को लिखा कि उसके आकलन में प्रस्तावित तरीक़े से क़रीब 80 फ़ीसदी पैकेटबंद उत्पाद एचएफ़एसएस श्रेणी में आ जाएँगे। यह उद्योग का अपना अनुमान है, किसी सरकारी दस्तावेज़ का आँकड़ा नहीं।

किससे बात हो, यह सवाल नियामक के भीतर भी उठ चुका है। 7 मार्च 2025 की 46वीं खाद्य प्राधिकरण बैठक के कार्यवृत्त, जो याचिकाकर्ता ने अदालत में पेश किए, बताते हैं कि अध्यक्ष और स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने निर्देश दिया था कि कोई भी मसौदा या अंतिम विनियम प्रकाशित करने से पहले व्यापक परामर्श हो, जिसमें ज़मीनी स्तर की भागीदारी और एमएसएमई शामिल हों, और जो "सिर्फ़ सीआईआई, फ़िक्की जैसे बड़े उद्योग संघों तक सीमित न रहे"। उसी बैठक के एजेंडे में पैकेजिंग सामग्री की जाँच सूची, लाइसेंस प्रक्रिया और ई-कॉमर्स के मद थे। लेबल का कोई मद नहीं था।

चिली और मेक्सिको का नापा हुआ नतीजा

चिली का क़ानून जून 2016 में लागू हुआ, और उसकी सीमाएँ 2018 तथा 2019 में दो बार और कसी गईं। अदालत ने अपने 13 अगस्त के आदेश में यही उदाहरण रखा: 2016 में कोई उत्पाद तब "उच्च चीनी" कहलाता था जब उसमें प्रति 100 ग्राम 22.5 ग्राम से ज़्यादा चीनी हो, और 2019 तक यह सीमा घटकर 10 ग्राम रह गई।

नतीजा मापा गया है। PLOS Medicine में 2020 में छपे अध्ययन ने 2,383 शहरी परिवारों की ख़रीद 2015 से 2017 तक देखी और पाया कि चेतावनी वाले पेय की ख़रीद पूर्वानुमान के मुक़ाबले 23.7 फ़ीसदी गिरी, यानी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 22.8 मिलीलीटर। उसी अवधि में बिना चेतावनी वाले पेय से मिलने वाली कैलोरी 10.8 फ़ीसदी बढ़ी। Lancet Planetary Health के 2021 के अध्ययन में चेतावनी वाले उत्पादों की ख़रीद में सोडियम 36.7 फ़ीसदी और चीनी 26.7 फ़ीसदी घटी; सभी ख़रीद को मिलाकर देखें तो चीनी 10.2 फ़ीसदी कम हुई।

सीमाएँ कसने का असर अलग से दिखता है। PLOS Medicine के 2024 के अध्ययन में दूसरे चरण के बाद चेतावनी वाले उत्पादों की ख़रीद में चीनी 36.8 फ़ीसदी और ऊर्जा 23.0 फ़ीसदी गिरी, यानी पहले चरण से ज़्यादा। BMC Medicine में 2025 में छपे अध्ययन ने दुकानों का माल गिना: चेतावनी की सीमा पार करने वाले उत्पादों का हिस्सा 70.8 फ़ीसदी से घटकर 52.5 फ़ीसदी रह गया, और लेखकों ने दर्ज किया कि जैसे-जैसे सीमाएँ कसीं, बदलाव बढ़ता गया। जैम जैसे मीठे स्प्रेड में चीनी वाली चेतावनी 44.3 प्रतिशत अंक गिरी। टॉफ़ी-कैंडी में गिरावट सिर्फ़ 4.5 अंक रही और वह सांख्यिकीय रूप से सार्थक नहीं थी।

इस साल The Lancet में छपा अध्ययन पहली बार ख़रीद के बजाय सेहत नापता है। चिली के 3,21,597 बच्चों के राष्ट्रीय रिकॉर्ड में, 18 महीने तक क़ानून के असर में रहने के बाद अधिक वज़न की आशंका लड़कियों में 2.85 प्रतिशत अंक और लड़कों में 2.40 प्रतिशत अंक कम पाई गई।

एक चेतावनी इन आँकड़ों के साथ चलती है, और वह ख़ुद शोधकर्ताओं की है। चिली ने लेबल अकेले लागू नहीं किया था; उसी क़ानून ने बच्चों तक विज्ञापन पर और स्कूलों में बिक्री पर भी रोक लगाई। 2020 के अध्ययन में लेखक साफ़ लिखते हैं कि इन तीनों का असर अलग करके नहीं नापा जा सकता।

मेक्सिको का मामला इस लिहाज़ से साफ़ है, क्योंकि वहाँ स्कूल में बिक्री पर रोक साथ नहीं आई। अष्टकोणीय चेतावनी 1 अक्टूबर 2020 से अनिवार्य हुई। Social Science & Medicine में इस साल छपे अध्ययन ने 2017 से 2022 तक की मासिक बिक्री देखी: बिकने वाले पैकेटबंद खाद्य से कैलोरी 15 फ़ीसदी, अतिरिक्त चीनी 25 फ़ीसदी, संतृप्त वसा 12 फ़ीसदी और सोडियम 7 फ़ीसदी घटा, जबकि कुल बिक्री की मात्रा नहीं बदली। लोगों ने कम नहीं ख़रीदा; सामान बदल गया।

मेक्सिको में ख़रीदे गए अनाज के एक डिब्बे पर कैलोरी और शर्करा की अधिकता बताने वाले दो काले अष्टकोण, 3 अक्टूबर 2020 की तस्वीर, यानी वहाँ लेबल अनिवार्य होने के दो दिन बाद
तस्वीर: ProtoplasmaKid, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

भारत का प्रस्ताव आकार में भी अकेला है। चिली, पेरू, उरुग्वे, मेक्सिको, अर्जेंटीना और कोलंबिया अष्टकोण इस्तेमाल करते हैं, इसराइल लाल गोला, कनाडा और ब्राज़ील आवर्धक लेंस। षट्कोण किसी देश में नहीं है।

पैकेट पर अभी की अनिवार्य जानकारी

2020 की नियमावली के विनियम 5(3) के तहत हर पैकेट पर प्रति 100 ग्राम या 100 मिलीलीटर पोषण जानकारी अनिवार्य है, और उसके साथ प्रति सर्विंग यह भी कि वह मात्रा दिन भर की अनुशंसित मात्रा का कितना फ़ीसदी है। यह फ़ीसदी जिन आँकड़ों पर निकलता है, वे नियमावली में दर्ज हैं: एक औसत वयस्क के लिए रोज़ 2000 किलो कैलोरी ऊर्जा, 67 ग्राम कुल वसा, 22 ग्राम संतृप्त वसा, 2 ग्राम ट्रांस फ़ैट, 50 ग्राम अतिरिक्त चीनी और 2000 मिलीग्राम सोडियम, यानी 5 ग्राम नमक। सर्विंग का आकार और पैकेट में कितनी सर्विंग हैं, यह भी देना होता है।

एक पैकेट पर छपी पोषण तालिका, जिसमें प्रति 100 ग्राम और प्रति सर्विंग दोनों ख़ाने हैं और आख़िरी ख़ाने में रोज़ की अनुशंसित मात्रा का फ़ीसदी; यह तस्वीर जर्मनी में बिकने वाले एक पैकेट की है
तस्वीर: Faldrian, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

छूट की सूची लंबी है। एक ही सामग्री वाले अप्रसंस्कृत उत्पाद, पानी, मसाले, नमक, टेबल टॉप स्वीटनर, चाय और कॉफ़ी, चुइंग गम और मादक पेय अनिवार्य पोषण लेबलिंग से बाहर हैं।

राज्यसभा की अधीनस्थ विधान समिति ने इसी नियमावली की समीक्षा की और 16 दिसंबर 2025 को संसद में रिपोर्ट रखी। डेक्कन हेराल्ड के मुताबिक़ शिवसेना सांसद मिलिंद देवड़ा की अध्यक्षता वाली समिति ने लिखा कि पीछे छपी पोषण तालिकाएँ अक्सर इतने छोटे फ़ॉन्ट में होती हैं कि कई उपभोक्ताओं के लिए उन्हें पढ़ना कठिन या असंभव हो जाता है। समिति ने स्वीटनर, मादक पेय और चुइंग गम की छूट को चिंताजनक बताया और सुझाव दिया कि पैकेट के सामने पोषण पैनल आसानी से पढ़ी जा सकने वाली तालिका के रूप में हो, जिसके लिए न्यूनतम फ़ॉन्ट आकार तय किया जाए।

पैकेट के सामने चेतावनी छापने की मशीनरी नियामक के पास पहले से है। इसी नियमावली के तहत पान मसाले के हर पैकेट पर आयताकार डिब्बे में "पान मसाला चबाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है" लिखना ज़रूरी है, और यह चेतावनी लेबल के सामने वाले हिस्से का 50 फ़ीसदी घेरनी चाहिए। मिश्रित खाद्य तेल के हर पैकेट पर ब्रांड नाम के ठीक नीचे मोटे अक्षरों में "मल्टी-सोर्स एडिबल ऑयल" और "खुला बेचने के लिए नहीं" छापना पड़ता है।

फ़ॉन्ट पर एक अलग मसौदा भी अटका पड़ा है। 17 फ़रवरी 2025 को अधिसूचित संशोधन मसौदे में अतिरिक्त चीनी, संतृप्त वसा और सोडियम के आरडीए हिस्से को मोटे अक्षरों में और बड़े आकार में देने की बात थी। उस पर 20 अप्रैल 2025 तक टिप्पणियाँ माँगी गईं, वैज्ञानिक पैनल और वैज्ञानिक समिति ने उन्हें देखा, और 24 नवंबर 2025 की 49वीं खाद्य प्राधिकरण बैठक में मद रखा गया। प्राधिकरण ने उसे अगली बैठक के लिए टाल दिया।

आगे की तारीख़ें

एफ़एसएसएआई को तेरह सवालों का जवाब हलफ़नामे के रूप में 10 सितंबर से दस दिन के भीतर दाख़िल करना है, और उसकी प्रति याचिकाकर्ता को दी जाएगी, ताकि वह सुनवाई से पहले अपना जवाब रख सके। सुनवाई सोमवार, 28 सितंबर को है।

इस मुक़दमे में समयसीमाओं का रिकॉर्ड ख़ुद एक जवाब है। 9 अप्रैल 2025 को अदालत ने तीन महीने दिए थे। 15 जुलाई 2025 को "एक आख़िरी बार" कहकर तीन महीने और दिए, और विशेषज्ञ समिति की अंतिम रिपोर्ट जनवरी 2026 में जाकर दाख़िल हुई।

जो तय नहीं हुआ उसकी सूची लंबी है: षट्कोण का आकार, पैकेट पर उसकी जगह, उसका रंग, हर पोषक तत्व के लिए अलग चिह्न होगा या नहीं, चीनी कुल गिनी जाएगी या अतिरिक्त, ट्रांस फ़ैट जुड़ेगा या नहीं, स्वैच्छिक अवधि कितनी होगी, और दोनों चरणों के बीच कितना समय।

क़ानूनी स्थिति भी ध्यान देने लायक़ है। मूल रिट याचिका अप्रैल 2025 में निपट चुकी है; जो चल रहा है वह उसी याचिका के भीतर दाख़िल एक आवेदन है, जिसमें अदालत अपने आदेश का अनुपालन देख रही है। राजपत्र में अब तक कुछ भी अधिसूचित नहीं हुआ है।

स्रोतसुप्रीम कोर्ट, 2026 INSC 988: विविध आवेदन संख्या 1177/2025 बनाम रिट याचिका (सिविल) 437/2024, 3S एंड आवर हेल्थ सोसाइटी बनाम भारत संघ, आदेश 10 सितंबर 2026 (31 पन्ने), सुप्रीम कोर्ट, दैनिक आदेश 13 अगस्त 2026: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का उद्धरण, यूनिसेफ़ चाइल्ड न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2025, चिली और कनाडा के उदाहरण, सुप्रीम कोर्ट, दैनिक आदेश 4 अगस्त 2026: समय बढ़ाने का आवेदन, और 10 फ़रवरी 2026 के आदेश का पूरा पाठ, सुप्रीम कोर्ट, दैनिक आदेश 10 फ़रवरी 2026: एफ़एसएसएआई का 30 जनवरी 2026 का अनुपालन हलफ़नामा, पैरा 8, 9.5 और 9.7, सुप्रीम कोर्ट, दैनिक आदेश 9 अप्रैल 2025: रिट याचिका का निपटारा, विशेषज्ञ समिति को तीन महीने, सुप्रीम कोर्ट, दैनिक आदेश 15 जुलाई 2025: 'एक आख़िरी बार' तीन महीने और, सुप्रीम कोर्ट, दैनिक आदेश 20 जनवरी 2026: विशेषज्ञ समिति की अंतिम रिपोर्ट दाख़िल, खाद्य सुरक्षा और मानक (लेबलिंग एवं प्रदर्शन) विनियम, 2020, समेकित पाठ संस्करण VIII, 9 सितंबर 2025: विनियम 5(3) पोषण जानकारी, विनियम 6(3) फ़ॉन्ट आकार, पान मसाला और मिश्रित खाद्य तेल की अनिवार्य घोषणाएँ, एफ़एसएसएआई ई-प्लेटफ़ॉर्म फ़ॉर कमेंट: मसौदा खाद्य सुरक्षा और मानक (लेबलिंग एवं प्रदर्शन) संशोधन विनियम, 2022 का पूरा पाठ, अनुसूची III की तालिका 1 से 6, एफ़एसएसएआई प्रेस विज्ञप्ति, जून 2019: लाल रंग की कोडिंग तीन साल में चरणबद्ध, और उद्योग संघों की आपत्तियों पर विचार का वादा, एफ़एसएसएआई की अपनी वेबसाइट पर रखी बिज़नेसलाइन की कतरन, 13 अप्रैल 2018: मसौदा विनियम 2018 में लाल ब्लॉक की शर्तों का उद्धरण, आईसीएमआर-राष्ट्रीय पोषण संस्थान, डाइटरी गाइडलाइंस फ़ॉर इंडियंस 2024: दिशानिर्देश 15, तालिका 15.1 और 15.2, Taillie LS और अन्य, PLOS Medicine 2020;17(2):e1003015: चिली में लेबल के बाद पेय ख़रीद का मापा गया बदलाव, Taillie LS और अन्य, Lancet Planetary Health 2021;5(8):e526-e533: चिली में कैलोरी, चीनी और सोडियम की ख़रीद में बदलाव, Taillie LS और अन्य, PLOS Medicine 2024;21(9):e1004463: चिली के दूसरे चरण के बाद तीन साल का आकलन, Rebolledo N और अन्य, BMC Medicine 2025;23:46: तीनों चरणों के बाद चिली में उत्पादों के फ़ॉर्मूले में बदलाव, Paraje G और अन्य, The Lancet 2026;407(10548):2630-2640: चिली के 3,21,597 बच्चों में अधिक वज़न की आशंका पर मापा गया असर, Garduño-Alanis A और अन्य, Social Science & Medicine 2026;399:119209: मेक्सिको में लेबल के बाद बिक्री और पोषक तत्वों का बदलाव, Singh SK, Taillie LS और अन्य, Nutrients 2022;14(15):3128: छह भारतीय राज्यों में 2,869 वयस्कों पर लेबल के प्रकारों का यादृच्छिक क्षेत्र परीक्षण, द प्रिंट, 6 अगस्त 2026: 3 अगस्त के हलफ़नामे में तालिका का प्रस्ताव और डॉ. अरुण गुप्ता की आपत्ति, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 21 अगस्त 2026: 3 अगस्त के हलफ़नामे की पुष्टि और देशों की लेबल प्रणालियों की तुलना, द प्रिंट, फ़रवरी 2026: 9 अक्टूबर 2025 की सचिवों की समिति की बैठक और 2022 के मसौदे को वापस लेने का प्रस्ताव, डेक्कन हेराल्ड, 16 दिसंबर 2025: राज्यसभा की अधीनस्थ विधान समिति की रिपोर्ट, अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा, द लॉजिकल इंडियन, 10 सितंबर 2026: ऑल इंडिया फ़ूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन की दलील और उसका अपना अनुमान, इंडियन एक्सप्रेस, 11 सितंबर 2026: आदेश की पहली रिपोर्ट

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