बैंक ऑफ़ इंडिया आज 120 साल का हुआ, और उसका सबसे मशहूर दावा जाँच में नहीं टिकता
बैंक की अपनी वेबसाइट कहती है कि यह पूरी तरह भारतीयों के स्वामित्व और प्रबंधन वाला पहला बैंक था। अवध कमर्शियल बैंक 1881 का है और पंजाब नेशनल बैंक 1894 का। दोनों पहले हैं।

आज बैंक ऑफ़ इंडिया 120 साल का हो गया।
7 सितंबर 1906 को मुंबई में एक दफ़्तर खुला। चुकता पूँजी पचास लाख रुपये थी और कर्मचारी पचास।
बैंक अपने बारे में एक बात लगातार कहता आया है, और वह उसकी वेबसाइट पर आज भी है। कि यह भारत का पहला ऐसा बैंक था जो पूरी तरह भारतीयों के स्वामित्व और प्रबंधन में था।
यह वाक्य हर सालगिरह पर दोहराया जाता है, अख़बारों में छपता है और परीक्षाओं की किताबों में चला जाता है।
जाँचने पर यह टिकता नहीं।
दो बैंक जो पहले आ चुके थे
अवध कमर्शियल बैंक 1881 में फ़ैज़ाबाद में बना।
इसके बारे में जो बात दर्ज है, वह ठीक वही है जिसका दावा बैंक ऑफ़ इंडिया करता है। यह भारत का पहला ऐसा वाणिज्यिक बैंक था जिसमें सीमित देयता थी और जिसका निदेशक मंडल पूरी तरह भारतीय था।
यह छोटा बैंक था। इसकी कोई शाखा नहीं थी और यह स्थानीय ज़रूरतें ही पूरी करता था। 1958 में यह डूब गया।
दूसरा नाम ज़्यादा जाना-पहचाना है। पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना 19 मई 1894 को लाहौर में हुई और कारोबार 12 अप्रैल 1895 को शुरू हुआ।
इसे स्वदेशी आंदोलन से जुड़े लोगों ने खड़ा किया था। संस्थापकों में सरदार दयाल सिंह मजीठिया, लाला हरकिशन लाल, लाला लाल चंद और लाला ढोलन दास थे। बैंक ख़ुद को भारतीय पूँजी से शुरू हुआ पहला स्वदेशी बैंक कहता है।
यानी 1906 से पहले दो बैंक ऐसे बन चुके थे जिनकी पूँजी और प्रबंधन भारतीय था। एक अब भी चल रहा है।
इलाहाबाद बैंक का मामला अलग है
एक तीसरा नाम अक्सर इस बहस में लाया जाता है, और उसे अलग रखना ज़रूरी है।
इलाहाबाद बैंक 24 अप्रैल 1865 को प्रयागराज में बना और 2020 में इंडियन बैंक में विलय होने तक 155 साल चला। विलय से पहले यह देश का सबसे पुराना चालू संयुक्त पूँजी बैंक था।
पर इसकी स्थापना सात भारतीयों और उन्नीस यूरोपीय लोगों ने मिलकर की थी।
इसलिए यह भारत में बना पहला संयुक्त पूँजी बैंक तो है, पर पूरी तरह भारतीयों के स्वामित्व वाला नहीं। यह फ़र्क़ इस पूरी बहस की जड़ में है, और अक्सर मिटा दिया जाता है।

दावे को उसका सबसे अच्छा मौक़ा दीजिए
किसी दावे को ख़ारिज करने से पहले उसका सबसे मज़बूत रूप देख लेना चाहिए।
बैंक ऑफ़ इंडिया के दावे को तीन तरह से बचाया जा सकता है, और तीनों को अलग-अलग तौलना होगा।
पहला, पैमाना। अवध कमर्शियल बैंक छोटा था, बिना शाखाओं वाला, स्थानीय। बैंक ऑफ़ इंडिया शुरू से एक बड़े शहर का बड़ा बैंक था। अगर दावे का मतलब यह हो कि यह पहला बड़े पैमाने का भारतीय बैंक था, तो बात बदल जाती है। पर वेबसाइट पर लिखा वाक्य पैमाने की कोई शर्त नहीं लगाता।
दूसरा, टिकाऊपन। अवध कमर्शियल बैंक 1958 में ख़त्म हो गया। जो बैंक आज मौजूद हैं, उनमें पंजाब नेशनल बैंक अब भी बैंक ऑफ़ इंडिया से पुराना है। यानी यह बचाव भी पूरा काम नहीं करता।
तीसरा, बंबई। मुंबई उस दौर में देश की व्यापारिक राजधानी थी और वहाँ के बैंक ज़्यादातर यूरोपीय पूँजी वाले थे। बंबई का पहला भारतीय बैंक होना अपने आप में एक बात है। पर यह भी वेबसाइट पर नहीं लिखा।
निष्कर्ष सीधा है। दावा जिस रूप में लिखा गया है, उस रूप में ग़लत है। इसे संकुचित करके सही बनाया जा सकता है, पर वह काम बैंक को करना होगा।
1906 और 1911 के बीच जो लहर आई
बैंक ऑफ़ इंडिया अकेला नहीं था, और यही उसकी सबसे अच्छी जगह है।
1906 से 1911 के बीच भारत में घरेलू बैंकिंग में सबसे तेज़ उभार आया। स्वदेशी आंदोलन ने आत्मनिर्भरता का जो आह्वान किया, उसका एक सीधा नतीजा यह था कि व्यापारी समूहों ने अपने बैंक खोलने शुरू किए।
इसी खिड़की से निकले नाम आज भी जाने-पहचाने हैं। बैंक ऑफ़ इंडिया, केनरा बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ़ बड़ौदा, चारों अपनी शुरुआत इसी दौर से जोड़ते हैं।
पैमाना कितना बढ़ा, यह एक आँकड़े से दिखता है। 1913 तक भारत में 451 बैंकिंग कंपनियाँ थीं।
पर इन बैंकों की एक साझा कमज़ोरी थी। इनकी पूँजी का आधार यूरोपीय बैंकों के मुक़ाबले बहुत छोटा था। ये बड़े उत्साह से खुले थे, और उत्साह पूँजी की जगह नहीं ले सकता।
और फिर वे डूबने लगे
1913 से 1918 के बीच भारतीय बैंकिंग में जो हुआ, उसे संकट कहना कम है।
बैंकों की क़तार गिरी। भारतीय स्पेसी बैंक डूबा। पीपुल्स बैंक ऑफ़ इंडिया डूबा। इनके गिरने से जो घबराहट फैली, उसने और बैंकों को ले लिया।
कितने डूबे, इस पर स्रोत आपस में नहीं मिलते। एक गिनती 78 की है, दूसरी 94 की, तीसरी सौ के आसपास की। यह अपने आप में उस दौर के बारे में एक बात कहता है, कि गिनने वाला कोई एक ठिकाना नहीं था।
पर दिशा पर कोई असहमति नहीं है। 1913 की 451 कंपनियों में से एक बड़ा हिस्सा पाँच साल के भीतर ख़त्म हो गया।
इस पृष्ठभूमि में बैंक ऑफ़ इंडिया की असली उपलब्धि साफ़ दिखती है, और वह "पहला होना" नहीं है।
उपलब्धि यह है कि वह उस लहर में खुला और उस संकट में बचा। जो सैकड़ों बैंक उन्हीं वर्षों में खुले थे, उनमें से ज़्यादातर बीस साल भी नहीं चले।
अवध कमर्शियल बैंक इस मायने में एक सबक़ है। वह पहला था, और वह 1958 में ख़त्म हो गया।

संस्थापक कौन थे, और भारतीय होने का मतलब क्या था
अब उस हिस्से पर आइए जो दावे से ज़्यादा दिलचस्प है।
बैंक के पहले निदेशक नौ थे।
सर सैसून जे. डेविड, जो मुख्य प्रवर्तक थे और बैंक के पहले अध्यक्ष बने। सर कावसजी जहाँगीर। रतनजी दादाभाई टाटा, जो जे.आर.डी. टाटा के पिता थे। गोरधनदास खटाऊ। जे.एच. दानी। लालूभाई सामलदास। खेतसी खियासी। रामनारायण हुरनंदराय। और नूरदीन एब्राहिम नूरदीन।
इन नामों को एक साथ पढ़िए।
सैसून परिवार बग़दाद से आकर बंबई में बसे यहूदी व्यापारी थे। कावसजी जहाँगीर और रतनजी दादाभाई टाटा पारसी थे। खटाऊ और सामलदास गुजराती। खेतसी खियासी कच्छी। नूरदीन एब्राहिम मुसलमान।
यानी जिस बैंक के बारे में कहा जाता है कि वह पूरी तरह भारतीयों का था, उसके संस्थापक मंडल में कम से कम पाँच अलग समुदाय थे, और उनमें से एक परिवार दो पीढ़ी पहले बग़दाद से आया था।
यह दावे का खंडन नहीं है। ये सब भारतीय थे, बंबई में रहते थे, यहीं कारोबार करते थे और यहीं मरे। यह इस बात की याद है कि 1906 के बंबई में भारतीय होने का मतलब क्या था।
1906 का साल संयोग नहीं है
बैंक की स्थापना का साल अपने आप में एक तारीख़ है।
बंगाल का विभाजन अक्तूबर 1905 में लागू हुआ था और उसके ख़िलाफ़ चला स्वदेशी आंदोलन विदेशी माल के बहिष्कार तक सीमित नहीं रहा। उसका एक हिस्सा यह था कि भारतीय पूँजी से भारतीय संस्थाएँ खड़ी की जाएँ।
उन्हीं वर्षों में कई वाणिज्यिक बैंक बने। बैंक ऑफ़ इंडिया उनमें से एक है।
इस सिलसिले का निशान बैंक के प्रतीक चिह्न में आज भी है। उसमें भारत माता की आकृति है, जो उस दौर की संस्थाओं में आम थी।
नाम पर भी ध्यान दीजिए। 1906 में "बैंक ऑफ़ इंडिया" रख देना अपने आप में एक बयान था।
उस समय भारत एक राष्ट्र-राज्य नहीं था। वह ब्रिटिश भारत था, जिसमें प्रांत, रियासतें और एजेंसियाँ शामिल थीं। बंबई के नौ व्यापारियों की एक निजी कंपनी अपने नाम में पूरे देश को रख ले, यह उस दौर में सामान्य बात नहीं थी।
इससे पहले के बड़े बैंकों के नाम शहर या प्रांत के थे। बैंक ऑफ़ बंगाल, बैंक ऑफ़ बॉम्बे, बैंक ऑफ़ मद्रास। नाम भूगोल बताता था।
"इंडिया" रखना दायरा बताना नहीं था, इरादा बताना था।
यानी बैंक की असली कहानी यह नहीं है कि वह पहला था। कहानी यह है कि वह उस लहर का हिस्सा था जिसमें बैंक खोलना एक राजनीतिक काम भी था।
एक भारतीय व्यापारी को 1906 में बैंक की ज़रूरत क्यों थी
यह सवाल आज अजीब लगता है, इसलिए इसका जवाब देना ज़रूरी है।
उस दौर की बैंकिंग तीन परतों में बँटी थी।
सबसे ऊपर प्रेसीडेंसी बैंक थे, बंगाल, बंबई और मद्रास के, जो सरकारी कामकाज और बड़े लेनदेन संभालते थे। इनका दायरा तय था।
दूसरी परत विनिमय बैंकों की थी। ये विदेशी व्यापार का पैसा संभालते थे, यानी आयात-निर्यात के बिल, विदेशी मुद्रा और जहाज़ी माल के भुगतान। ये लगभग सारे ब्रिटिश स्वामित्व वाले थे और इनके ग्राहक मुख्य रूप से यूरोपीय कंपनियाँ थीं।
तीसरी परत देसी थी। शराफ़, सेठ और महाजन, जो हुंडी के ज़रिए पैसा चलाते थे। हुंडी एक लिखित आदेश होता था, जिस पर एक शहर में पैसा जमा करके दूसरे शहर में निकाला जा सकता था। यह व्यवस्था सदियों पुरानी थी और भरोसे तथा जाति-बिरादरी के नेटवर्क पर टिकी थी।
इस बीच में एक ख़ाली जगह थी।
एक भारतीय व्यापारी जो कपास या सूत का कारोबार बड़े पैमाने पर करता था, उसे आधुनिक बैंक जैसी सुविधाएँ चाहिए थीं, पर विनिमय बैंकों के दरवाज़े उसके लिए खुले नहीं थे या शर्तें भारी थीं। और हुंडी का जाल उस पैमाने के लिए बहुत छोटा पड़ता था।
स्वदेशी दौर के बैंक इसी ख़ाली जगह को भरने के लिए खुले।
इसीलिए बैंक ऑफ़ इंडिया के संस्थापक व्यापारी थे, बैंकर नहीं। कपड़ा, रेशम, अफ़ीम, जहाज़रानी और मिलों का कारोबार करने वाले लोग, जिन्हें अपने कारोबार के लिए ऋण और भुगतान की व्यवस्था चाहिए थी।
बैंक उनका औज़ार था, उनका पेशा नहीं।

एक दावा जो पूरी तरह सही है
बैंक के पास एक और दावा है, और वह कम दोहराया जाता है।
1946 में बैंक ऑफ़ इंडिया ने लंदन में शाखा खोली, यानी आज़ादी से एक साल पहले। यूरोप की मुख्य भूमि पर पहली भारतीय शाखा भी इसी बैंक की थी, 1974 में पेरिस में।
लंदन वाली बात पूरी तरह सही है, और यह उस दावे से ज़्यादा बड़ी बात है जिसे बैंक अपनी पहचान बनाता है। 1946 में भारत आज़ाद नहीं हुआ था, और एक भारतीय बैंक का लंदन में शाखा खोलना उस समय की परिस्थिति में मामूली बात नहीं थी।
पर यहाँ एक शर्त लगानी पड़ेगी, और वही ईमानदारी है।
बैंक अपने बारे में यह बात दो तरह से कहता है। एक रूप में वह कहता है कि उसने यूरोप में अपनी पहली विदेशी शाखा 1946 में लंदन में खोली। यह वाक्य सही है और इसमें "यूरोप" शब्द ही उसे बचाता है।
दूसरे रूप में यह बात व्यापक होकर दोहराई जाती है, कि वह देश के बाहर शाखा खोलने वाला पहला भारतीय बैंक था। यह रूप टिकता नहीं।
इंडियन ओवरसीज़ बैंक 10 फ़रवरी 1937 को खुला, और उसने पहले ही दिन तीन शाखाएँ शुरू कीं। मद्रास, कराईकुडी और रंगून। कुछ महीनों में पेनांग भी जुड़ गया। इसे बनाया ही इसीलिए गया था कि दक्षिण-पूर्व एशिया में कारोबार करने वाले भारतीय व्यापारियों को विदेशी मुद्रा की सेवाएँ मिल सकें।
एक बारीकी यहाँ भी है, और उसे छोड़ना ठीक नहीं होगा। जिस दिन यह बैंक खुला, उस दिन रंगून तकनीकी रूप से विदेश नहीं था। बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग हुए 1 अप्रैल 1937 को हुआ, यानी बैंक खुलने के क़रीब सात हफ़्ते बाद।
पर पेनांग पर यह छूट नहीं मिलती। वह मलाया में था और भारत का हिस्सा कभी नहीं था।
इसलिए सही वाक्य यह बनता है: बैंक ऑफ़ इंडिया यूरोप में शाखा खोलने वाला पहला भारतीय बैंक था। देश के बाहर पहला नहीं।
यह भी अपने आप में बड़ी बात है। उसे और बड़ा करने की ज़रूरत नहीं थी।
बैंक स्विफ़्ट का संस्थापक सदस्य भी है, यानी उस अंतरराष्ट्रीय संदेश व्यवस्था का जिससे आज दुनिया भर के बैंक एक-दूसरे को पैसे भेजने के निर्देश देते हैं।
1969 में मालिक बदल गया
19 जुलाई 1969 को बैंक ऑफ़ इंडिया का राष्ट्रीयकरण हुआ, तेरह अन्य बैंकों के साथ।
कसौटी एक ही थी। जिन बैंकों की जमा राशि पचास करोड़ रुपये से ज़्यादा थी, वे इस दायरे में आए। चौदह बैंक इस शर्त पर खरे उतरे, और उनके पास देश की कुल बैंक जमा का क़रीब 85 फ़ीसदी था।
तरीक़ा अध्यादेश का था। इस पर काम 17 जुलाई को शुरू हुआ और दो दिन में तैयार हो गया। कार्यवाहक राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने 19 जुलाई की देर शाम उस पर दस्तख़त किए।
वजह जो गिनाई गई, वह ऋण की दिशा से जुड़ी थी। बैंकिंग शहरों में सिमटी हुई थी और बड़े उद्योगों तथा व्यापारिक घरानों की तरफ़ झुकी थी। खेती, छोटे उद्योग और गाँव संस्थागत ऋण से लगभग बाहर थे।
इसके बाद बैंक का स्वामित्व निजी हाथों से सरकार के पास चला गया। आज इसकी शाखाएँ पाँच हज़ार तीन सौ से ज़्यादा हैं।
यह तथ्य दावे पर एक और तरह से असर डालता है। 1906 का बैंक भारतीय व्यापारियों का था। 1969 के बाद का बैंक भारत सरकार का है। दोनों को एक ही वाक्य में समेटना इतिहास को थोड़ा चपटा कर देता है।
इस तरह के दावों को कैसे पढ़ें
बैंकों, कंपनियों और संस्थाओं के अपने बारे में लिखे इतिहास एक ख़ास तरह के दस्तावेज़ होते हैं। वे झूठ नहीं बोलते, पर वे विज्ञापन भी होते हैं।
"पहला" शब्द इनमें सबसे ज़्यादा फिसलता है, क्योंकि उसके साथ लगी शर्तें अक्सर हटा दी जाती हैं। पहला किस चीज़ में, किस इलाक़े में, किस पैमाने पर, यह सब लिखने पर वाक्य कमज़ोर लगने लगता है, इसलिए नहीं लिखा जाता।
बैंक ऑफ़ इंडिया के मामले में असली कहानी दावे से कमज़ोर नहीं, ज़्यादा मज़बूत है। नौ आदमी, पाँच समुदाय, एक दफ़्तर, पचास कर्मचारी, और चालीस साल बाद लंदन में शाखा।
इसे "पहला" कहलाने की ज़रूरत नहीं थी।
स्रोतबैंक ऑफ़ इंडिया की स्थापना और संस्थापक निदेशकों का विवरण, अवध कमर्शियल बैंक, 1881, पंजाब नेशनल बैंक, अपनी स्थापना पर, इलाहाबाद बैंक, 1865, स्क्रोल, 1969 के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया पर, द इंडिया फ़ोरम, 1913-18 के बैंकिंग संकट पर, इंडियन ओवरसीज़ बैंक, अपनी स्थापना और पहली शाखाओं पर