दिल्ली हवाई अड्डे पर 63 सोशल मीडिया हैंडल के ख़िलाफ़ एफ़आईआर हुई, पर किन धाराओं में, यह अब तक सार्वजनिक नहीं
डायल ने 9 सितंबर को दिल्ली पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराने की घोषणा की। कंपनी के बयान में जो अंग्रेज़ी शब्द है, 'public mischief', वह भारतीय न्याय संहिता की धारा 353 का शीर्षक है; उसकी पहली उपधारा असंज्ञेय है, और मानहानि पर पुलिस अपने आप मुक़दमा चला ही नहीं सकती। हवाई अड्डे ने 4 सितंबर को ख़ुद जो परामर्श जारी किया था, उसमें उड़ानों के विलंब और डायवर्जन दर्ज हैं।

टर्मिनल तीन के आगमन द्वार के सामने जमा पानी झाड़ुओं से हटाया गया। कितनी देर में, इस पर कम से कम तीन अलग आँकड़े रिकॉर्ड पर हैं। और वे बीस-तीस मिनट अब एक प्राथमिकी का विषय हैं, जिसमें 63 सोशल मीडिया हैंडल पर आरोप हैं।
दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लिमिटेड, यानी डायल, ने 9 सितंबर को बताया कि उसने दिल्ली पुलिस में यह शिकायत दर्ज करा दी है। कंपनी का कहना है कि इन खातों ने हवाई अड्डे पर बाढ़ जैसी तस्वीर पेश की और परिचालन ठप होने का झूठा दावा किया। कंपनी के मुताबिक़ एक पोस्ट में दुबई हवाई अड्डे के पुराने जलभराव का वीडियो कथित तौर पर दिल्ली का बताकर चलाया गया।
आरोप अभी आरोप हैं, और किसी हैंडल का नाम अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है।
एफ़आईआर किन धाराओं में है, यह किसी ने नहीं बताया
कंपनी की विज्ञप्ति में धाराओं का ज़िक्र नहीं है। जिन रिपोर्टों में यह ख़बर छपी, उनमें से किसी में भी धारा नहीं मिलती, और थाने का नाम भी नहीं। रिपब्लिक वर्ल्ड ने इतना लिखा कि दिल्ली पुलिस ने साइबर जाँच शुरू की है, धाराएँ वहाँ भी नहीं हैं। दिल्ली पुलिस की ओर से कोई बयान सार्वजनिक रिकॉर्ड पर नहीं मिलता, न किसी अधिकारी का उद्धरण। यानी जिस दस्तावेज़ पर पूरी ख़बर टिकी है, उसका सबसे बुनियादी हिस्सा अब तक बाहर नहीं आया।
प्राथमिकी का वेबसाइट पर आना अदालत का आदेश है
7 सितंबर 2016 को उच्चतम न्यायालय ने यूथ बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के मामले में तय किया था कि हर प्राथमिकी दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर पुलिस की वेबसाइट पर डाली जाए। दूरदराज़ के इलाक़ों में संपर्क की दिक़्क़त हो तो 48 घंटे, और अधिकतम 72 घंटे। अपवाद सिर्फ़ संवेदनशील श्रेणियों के लिए है: यौन अपराध, उग्रवाद और आतंकवाद से जुड़े मामले, पॉक्सो। न डालने का फ़ैसला उपाधीक्षक से नीचे का अधिकारी नहीं ले सकता। जलभराव के वीडियो इनमें से किसी श्रेणी में नहीं आते। दिल्ली पुलिस के पोर्टल पर यह प्राथमिकी उपलब्ध है या नहीं, इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक जाँचा नहीं जा सका।
डायल ने अपने बयान में जो शब्द चुना
कंपनी के प्रवक्ता का वाक्य यह है: "कुछ सोशल मीडिया हैंडल द्वारा भ्रामक सामग्री का प्रसार लोक अपकार पैदा करने, एक सार्वजनिक उपयोगिता सेवा की प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुँचाने और यात्रियों में अनावश्यक चिंता फैलाने की सोची-समझी कोशिश जान पड़ता है।" अंग्रेज़ी में जो शब्द इस्तेमाल हुआ, वह है "public mischief"। यही तीन शब्द भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 353 का अंग्रेज़ी शीर्षक हैं। कंपनी ने अपनी अपील इन शब्दों पर ख़त्म की: "तथ्य मायने रखते हैं। ज़िम्मेदार साझेदारी मायने रखती है।"
धारा 353 असल में क्या माँगती है

राजपत्र में यह धारा पृष्ठ 99 पर है, अधिसूचना संख्या सीजी-डीएल-ई-25122023-250883। उपधारा (1) कहती है कि जो कोई कथन, झूठी सूचना, अफ़वाह या रिपोर्ट बनाता, प्रकाशित करता या फैलाता है, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी, तो अपराध तब बनता है जब इरादा या संभावना तीन में से किसी एक नतीजे की हो। खंड (ख) वह है जो यहाँ नज़दीक बैठता है, और उसका पूरा वाक्य ज़रूरी है: जनता में या जनता के किसी हिस्से में भय या संत्रास पैदा करने के इरादे से, "जिससे कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध या लोक शांति के विरुद्ध अपराध करने को प्रेरित हो सकता है"। सज़ा तीन साल तक।
पहली पेच: यह धारा संज्ञेय नहीं है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की पहली अनुसूची में, पृष्ठ 188 पर, धारा 353(1) असंज्ञेय और अजमानतीय दर्ज है, विचारण किसी भी मजिस्ट्रेट के पास। संहिता की धारा 174(2) साफ़ है: कोई पुलिस अधिकारी असंज्ञेय मामले की जाँच उस मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना नहीं करेगा जिसे उसका विचारण करने की शक्ति है। इसी धारा की उपधारा (1) कहती है कि ऐसी सूचना मिलने पर अधिकारी शिकायतकर्ता को मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा। 353 की दूसरी और तीसरी उपधाराएँ संज्ञेय हैं, पर वे धर्म, नस्ल, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर वैमनस्य फैलाने वाले कथनों तक सीमित हैं।
दूसरी पेच: मानहानि पर पुलिस मुक़दमा चलता ही नहीं
प्रतिष्ठा को नुक़सान की बात संहिता की धारा 356 में आती है। उसका स्पष्टीकरण 2 कहता है कि किसी कंपनी या व्यक्तियों के समूह के बारे में लांछन भी मानहानि हो सकता है, तो डायल इस दरवाज़े पर खड़ी हो सकती है। दिक़्क़त प्रक्रिया में है। नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 222(1) कहती है कि धारा 356 के अपराध का संज्ञान कोई न्यायालय तब तक नहीं लेगा जब तक व्यथित व्यक्ति स्वयं परिवाद न दे। पहली अनुसूची में यह अपराध असंज्ञेय और जमानतीय है, सज़ा दो साल का सादा कारावास या जुर्माना या सामुदायिक सेवा। रास्ता थाने से नहीं, मजिस्ट्रेट की अदालत से जाता है।
'भ्रामक' पोस्ट और झूठी ख़बर में क़ानूनी फ़र्क़
धारा 353 के अंत में एक अपवाद है जिसे विज्ञप्तियों में कोई नहीं पढ़ता। यह अपराध नहीं है, अगर कथन या अफ़वाह फैलाने वाले के पास यह मानने का उचित आधार था कि वह सच है, और उसने उसे सद्भावपूर्वक फैलाया, ऊपर बताए इरादे के बिना। बारिश के दिन किसी और जगह का वीडियो सच मानकर आगे बढ़ा देना और उसी वीडियो को जानते-बूझते दिल्ली का बताकर चलाना, क़ानून की नज़र में ये दो अलग काम हैं। "भ्रामक" शब्द अपने आप में किसी धारा का घटक नहीं है। धारा पूछती है कि सूचना झूठी थी या नहीं, इरादा क्या था, और नतीजा क्या हो सकता था।
एक ही धारा है जो 'भ्रामक सूचना' शब्द इस्तेमाल करती है
वह धारा 197 है, जिसका शीर्षक है राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन और प्रतिपादन। उपधारा (1) का खंड (घ) भारतीय दंड संहिता में कहीं नहीं था; यह नई संहिता की देन है। इसमें अपराध है "ऐसी झूठी या भ्रामक सूचना बनाना या प्रकाशित करना जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता या सुरक्षा को ख़तरे में डालती हो"। पहली अनुसूची में, पृष्ठ 172 पर, यह संज्ञेय और अजमानतीय है, सज़ा तीन साल तक, विचारण प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट। शर्त संप्रभुता और सुरक्षा की है, किसी कंपनी की साख की नहीं।
श्रेया सिंघल के बाद ऑनलाइन पोस्ट पर मुक़दमे किन धाराओं में चलते हैं

24 मार्च 2015 को न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन की पीठ ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए को असंवैधानिक घोषित किया। रिट याचिका (आपराधिक) 167/2012 में अदालत ने लिखा कि जो सूचना इंटरनेट पर भेजी जा सकती है, उस पर 66ए का प्रतिबंध अनुच्छेद 19(2) के आठ आधारों में से किसी से नहीं जुड़ता, इसलिए वह अनुच्छेद 19(1)(क) के विरुद्ध है। धारा 69ए, जो सामग्री रोकने से जुड़ी है, बची रही। उसके बाद ऑनलाइन पोस्ट पर मुक़दमे सामान्य दंड विधि की धाराओं में चलते हैं, इंटरनेट के लिए बनी किसी अलग धारा में नहीं।
अदालत ने जो रेखा खींची
निर्णय के पैरा 13 में पीठ ने तीन चीज़ों को अलग किया और शब्द ये थे: "किसी बात पर चर्चा, या किसी कारण की वकालत, चाहे वह कितनी ही अलोकप्रिय हो, अनुच्छेद 19(1)(क) के केंद्र में है। अनुच्छेद 19(2) तभी लागू होता है जब ऐसी चर्चा या वकालत उकसावे के स्तर तक पहुँच जाए।" किसी सार्वजनिक सुविधा की हालत पर टिप्पणी और लोगों को अपराध के लिए उकसाना, अदालत की इस रेखा के दो अलग-अलग तरफ़ पड़ते हैं। यह रेखा 353(1)(ख) की शब्दावली में भी दिखती है।
रद्द हो चुकी धारा जो थानों में ज़िंदा रही
पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ ने 2021 में उच्चतम न्यायालय के सामने आँकड़े रखे कि 10 मार्च 2021 तक ग्यारह राज्यों की ज़िला अदालतों में 66ए के 745 मुक़दमे लंबित और सक्रिय थे। 5 जुलाई 2021 की सुनवाई में न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा, "हैरान करने वाला है। श्रेया सिंघल 2015 का फ़ैसला है। जो हो रहा है वह भयावह है।" और फिर, "यह चौंकाने वाला है। हम नोटिस जारी कर रहे हैं।" अदालत ने केंद्र से जवाब माँगा। धाराओं का सार्वजनिक न होना इसी वजह से मामूली बात नहीं रहती।
निजी कंपनी की शिकायत पर सरकारी एफ़आईआर: डायल की हैसियत क्या है
डायल में जीएमआर एयरपोर्ट्स की हिस्सेदारी 74 फ़ीसदी है और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण की 26 फ़ीसदी। जीएमआर पहले 64 फ़ीसदी पर था; सितंबर 2024 में हुए शेयर ख़रीद समझौते के तहत उसने जर्मन कंपनी फ़्रापोर्ट की 10 फ़ीसदी हिस्सेदारी ख़रीदी और सौदा 6 मार्च 2025 को पूरा हुआ। मतलब यह कि शिकायत करने वाली इकाई एक कंपनी है, जिसमें सरकारी प्राधिकरण अल्पमत साझेदार है, और जो रियायत समझौते के तहत एक सार्वजनिक संपत्ति चलाती है। शिकायत निजी है; प्राथमिकी राज्य की।
'सार्वजनिक उपयोगिता' कहने से धारा नहीं बदलती
आपराधिक क़ानून में शिकायतकर्ता का दर्जा यह तय नहीं करता कि कौन सी धारा लगेगी। असर उलटी दिशा में दिखता है। धारा 356 का अपवाद 3 कहता है कि किसी सार्वजनिक प्रश्न से जुड़े व्यक्ति के आचरण पर सद्भावपूर्वक कोई भी राय व्यक्त करना मानहानि नहीं है। अपवाद 1 कहता है कि सच बात, अगर उसका प्रकाशन लोक कल्याण के लिए हो, मानहानि नहीं, और यह तथ्य का प्रश्न है। जो कंपनी अपने को "एक अहम सार्वजनिक उपयोगिता सेवा" कहती है, वह ख़ुद को सार्वजनिक प्रश्न के दायरे में ले आती है।
जो वीडियो पुराने थे और जो उसी दिन के
डायल ने एक ही ठोस उदाहरण दिया है: दुबई का पुराना वीडियो, दिल्ली का बताकर। बाक़ी 62 हैंडल ने क्या डाला, यह कहीं दर्ज नहीं है। कंपनी के मुताबिक़ हवाई अड्डे पर 2:30 से 5:30 के बीच 72.2 मिलीमीटर बारिश हुई, टर्मिनल तीन के आगमन फ़ोरकोर्ट में पानी जमा हुआ, और टीमों ने उसे लगभग 20 मिनट में हटा दिया; परिचालन प्रभावित नहीं हुआ। न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने उसी दिन लिखा कि तीन में से दो टर्मिनलों के फ़ोरकोर्ट और सबवे में पानी भरा, और एक सूत्र के अनुसार झाड़ू लिए कर्मचारियों को पानी हटाने में 45 मिनट से ज़्यादा लगे।
हवाई अड्डे ने ख़ुद उस दिन क्या कहा था
4 सितंबर को दिनभर जारी परामर्शों में आईजीआईए का वाक्य यह था: "हवाई अड्डे पर आज दोपहर भारी वर्षा हुई। इसके परिणामस्वरूप पहुँच मार्ग और फ़ोरकोर्ट क्षेत्रों में पानी जमा हुआ। जमा पानी कुछ ही समय में हटा दिया गया। ख़राब मौसम ने उड़ान संचालकों को भी प्रभावित किया, जिससे कुछ उड़ानों में विलंब और डायवर्जन हुआ।" पाँच दिन बाद की विज्ञप्ति कहती है कि पोस्ट में परिचालन बाधित होने का दावा झूठा था। दोनों वाक्य कंपनी के अपने हैं। यह अंतर यहाँ दर्ज किया जा रहा है, सुलझाया नहीं।
जिन उड़ानों का रास्ता बदला

दिल्ली आ रही ग्यारह उड़ानें दूसरे हवाई अड्डों पर उतारी गईं, और उनकी सूची छपी हुई है। लखनऊ गईं लुधियाना से एयर इंडिया की एआई 484, इंदौर से एआई 2516, हैदराबाद से एआई 2541 और बेंगलुरु से अकासा की क्यूपी 1821। जयपुर गईं श्रीनगर से एआई 1818, पूर्णिया से इंडिगो की 6ई 6560, बेंगलुरु से 6ई 869, पुणे से क्यूपी 1872 और राँची से आईएक्स 1052। एझोऊ से आ रही कार्गो उड़ान ओ3157 अहमदाबाद गई, हैदराबाद से 6ई 711 चंडीगढ़। सैकड़ों उड़ानें देर से चलीं।
एक ही एफ़आईआर में 63 लोग: यह कैसे होता है
प्राथमिकी अज्ञात व्यक्तियों के ख़िलाफ़ दर्ज होती है और हैंडल की सूची उसके साथ नत्थी रहती है। नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(1) के तहत सूचना मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक संचार से दी जा सकती है; इलेक्ट्रॉनिक हो तो तीन दिन के भीतर हस्ताक्षर ज़रूरी हैं। धारा 174(4) वह कड़ी है जो ऐसे मामलों को चलाती है: अगर एक मामले में दो या अधिक अपराध हैं और उनमें से एक भी संज्ञेय है, तो पूरा मामला संज्ञेय माना जाएगा, बाक़ी अपराधों के असंज्ञेय होने के बावजूद। साथ में न्याय संहिता की धारा 3(5), जो साझा इरादे से किए काम के लिए हर व्यक्ति को अकेले करने जैसा उत्तरदायी बनाती है।
हैंडल से इंसान तक पहुँचने का रास्ता
नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 94 पुलिस अधिकारी को काग़ज़ पर या इलेक्ट्रॉनिक रूप में लिखित आदेश जारी करने की शक्ति देती है, जिससे कोई दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक संचार, जिसमें डिजिटल साक्ष्य होने की संभावना हो, पेश कराया जा सके। मंच को यही नोटिस जाता है। इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन ने 4 अप्रैल 2026 को एक अलग मामले में दर्ज किया कि दिल्ली पुलिस ने एक्स से पंजीकरण का मोबाइल नंबर और ईमेल, खाता बनने के बाद के सभी सत्रों के आईपी लॉग पोर्ट सहित, और "कोई भी अन्य जानकारी" माँगी थी। वह प्राथमिकी संख्या 135/2026 थी, थाना आईपी एस्टेट, दिनांक 24 मार्च 2026, धाराएँ 316(4) सहपठित 3(5) और आईटी अधिनियम की 72ए।
ऐसी एफ़आईआर का पिछला रिकॉर्ड क्या रहा है
बेंगलुरु का मामला सबसे नज़दीक है। सीआईएसएफ़ की शिकायत पर, 23 साल के विकास गौड़ा को अप्रैल 2024 में हवाई अड्डा पुलिस ने गिरफ़्तार किया। शिकायत के मुताबिक़ वह 7 अप्रैल को दोपहर 12:06 पर एयर इंडिया की एआई 585 का टिकट लेकर भीतर गया, उड़ान नहीं पकड़ी, चार-पाँच घंटे घूमकर वीडियो बनाया और 12 अप्रैल को उसे अपने यूट्यूब चैनल पर डाला, जिसके लगभग 1.13 लाख सब्सक्राइबर थे। शिकायत 15 अप्रैल को बीआईएएल थाने में दर्ज हुई, धाराएँ भारतीय दंड संहिता की 505 और 448। गौड़ा को थाने से ही ज़मानत मिली, उसने वीडियो ख़ुद हटा लिया, फ़ोन जाँच के लिए ज़ब्त हुआ।
और रेलवे का तरीक़ा
अक्टूबर 2025 में त्योहारी भीड़ के दौरान रेल मंत्रालय ने चार दिनों में बीस से ज़्यादा ऐसे मामले चिह्नित किए जिनमें पुराने या असंबद्ध वीडियो को मौजूदा भीड़ का बताकर चलाया गया, और प्राथमिकी दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की। रिपोर्ट के मुताबिक़ अधिकारियों ने कहा कि मुक़दमे रेल अधिनियम की धारा 145(बी) में दर्ज हो रहे हैं, जिसमें छह महीने तक की सज़ा है। फ़र्क़ ध्यान देने लायक़ है: रेलवे ने अपने ही अधिनियम की एक धारा का नाम लिया, जबकि डायल की विज्ञप्ति में विमानन क़ानून की किसी धारा का ज़िक्र नहीं है।
आईटी नियम, 2021 का दूसरा रास्ता
एफ़आईआर के बग़ैर सामग्री हटवाने का एक रास्ता 2021 के नियमों में पहले से है। नियम 3(1)(ख)(v) मंच से अपेक्षा करता है कि वह उचित प्रयास करे कि उपयोगकर्ता ऐसी सामग्री न डालें जो "पताकर्ता को संदेश के स्रोत के बारे में धोखा दे या जानबूझकर कोई ग़लत सूचना या ऐसी सूचना दे जो पूरी तरह झूठी या भ्रामक हो"। शिकायत का समय भी तय है: नियम 3(2)(क) के तहत शिकायत अधिकारी 24 घंटे में पावती देगा और 15 दिन में निपटारा करेगा, और सामग्री हटाने की माँग वाली शिकायत, कुछ उपखंडों को छोड़कर, 72 घंटे में निपटानी होगी।
और सरकार का रास्ता: छत्तीस घंटे
नियम 3(1)(घ) अलग है। किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से या अधिनियम की धारा 79(3)(ख) के तहत उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसी की सूचना से जब मंच को वास्तविक जानकारी मिलती है, तो उसे ऐसी सामग्री हटानी होती है, और आदेश मिलने से 36 घंटे के भीतर। जिन श्रेणियों का ज़िक्र इस खंड में है, उनमें भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और मानहानि शामिल हैं। मानहानि इस सूची में है, तो प्रतिष्ठा के मामले में सामग्री हटवाने का रास्ता आपराधिक मुक़दमे के बिना भी मौजूद है।
जिस नियम को अदालत रद्द कर चुकी, वह सरकारी पाठ में अब भी है
6 अप्रैल 2023 की अधिसूचना जीएसआर 275(ई) ने इसी नियम 3(1)(ख)(v) में एक टुकड़ा जोड़ा था, जिसके तहत केंद्र सरकार के कामकाज से जुड़ी सूचना को सरकार की अधिसूचित तथ्य-जाँच इकाई फ़र्ज़ी या भ्रामक क़रार दे सकती थी। कुणाल कामरा बनाम भारत संघ, रिट याचिका (एल) 9792/2023 में बंबई उच्च न्यायालय की खंडपीठ 31 जनवरी 2024 को बँट गई और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की निर्णायक राय के बाद सितंबर 2024 में यह संशोधन असंवैधानिक ठहराया गया। मंत्रालय की वेबसाइट पर आज भी जो समेकित पाठ है, उसमें वह टुकड़ा ज्यों का त्यों छपा है।
जिस हैंडल पर एफ़आईआर हुई, वह अब क्या कर सकता है
63 में से एक का भी नाम सार्वजनिक नहीं है, इसलिए ज़्यादातर को पता तब चलेगा जब मंच के पास धारा 94 का नोटिस पहुँचेगा। इसके बाद जो रास्ते संहिता में लिखे हैं, वे दो हैं। धारा 482 अग्रिम ज़मानत का है, जो यहाँ इसलिए मायने रखता है कि 353(1) अजमानतीय है। धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति है, जिसके शब्द हैं "किसी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने या अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने" के लिए आवश्यक आदेश। एक बात जो नहीं है: धारा 173(2) प्राथमिकी की मुफ़्त प्रति सूचना देने वाले और पीड़ित को देती है, आरोपी को नहीं।
किसने क्या कहा, और किसने कुछ नहीं कहा
तीनों पक्षों का दर्ज हाल यह है। डायल का बयान लिखित है और उसकी भाषा ऊपर है। दिल्ली पुलिस की ओर से न पुष्टि आई है, न धाराएँ। जिन 63 हैंडलों पर मुक़दमा है, उनमें से किसी का नाम किसी रिपोर्ट में नहीं छपा, इसलिए किसी का पक्ष भी रिकॉर्ड पर नहीं है। सोशल मीडिया पोस्ट पर एफ़आईआर के इस तरीक़े पर एक दर्ज आपत्ति इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन की उस अलग मामले वाली टिप्पणी है, जिसमें उसने गुमनाम खातों की भूमिका और अनुच्छेद 19(1)(क) का हवाला दिया था।
अगला क़दम किस तारीख़ पर टिका है
नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(3) एक नई व्यवस्था लाई है। जिस संज्ञेय अपराध में सज़ा तीन साल या उससे ज़्यादा पर सात साल से कम है, उसमें थानाध्यक्ष, पुलिस उपाधीक्षक या उससे वरिष्ठ अधिकारी की पूर्व अनुमति लेकर, अपराध की प्रकृति और गंभीरता देखते हुए दो में से एक रास्ता चुन सकता है: चौदह दिन के भीतर प्रारंभिक जाँच करके देखे कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, या प्रथम दृष्टया मामला बनने पर सीधे अन्वेषण शुरू करे। धारा 353 और धारा 197, दोनों की अधिकतम सज़ा तीन साल है। दोनों इसी खिड़की में आती हैं।
स्रोतन्यूज़ड्रम, डायल की एफ़आईआर पर पीटीआई रिपोर्ट और कंपनी का बयान, 9 सितंबर 2026, बिज़नेस टुडे, डायल प्रवक्ता का बयान और बारिश के आँकड़े, 9 सितंबर 2026, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, 4 सितंबर की बारिश, आईजीआईए का परामर्श और डायवर्ट उड़ानों की सूची, 5 सितंबर 2026, भारत का राजपत्र असाधारण, भारतीय न्याय संहिता, 2023 का पूर्ण पाठ, सीजी-डीएल-ई-25122023-250883, भारत का राजपत्र असाधारण, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, धाराएँ 94, 173, 174, 222, 482, 528 और पहली अनुसूची, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, आईटी नियम 2021 का 6 अप्रैल 2023 तक अद्यतन पाठ, श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ, उच्चतम न्यायालय का 24 मार्च 2015 का निर्णय, यूथ बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया बनाम भारत संघ, उच्चतम न्यायालय, 7 सितंबर 2016, लाइवलॉ, धारा 66ए पर पीयूसीएल के आवेदन और 5 जुलाई 2021 की सुनवाई की रिपोर्ट, इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन, दिल्ली पुलिस के एक्स को भेजे नोटिसों पर बयान, 4 अप्रैल 2026, डेक्कन हेराल्ड, बेंगलुरु हवाई अड्डे के वीडियो पर गिरफ़्तारी की रिपोर्ट, 18 अप्रैल 2024, पुणेकर न्यूज़, रेल मंत्रालय की सोशल मीडिया कार्रवाई पर रिपोर्ट, 19 अक्टूबर 2025, अपस्टॉक्स, जीएमआर के फ़्रापोर्ट हिस्सेदारी ख़रीदने और डायल के शेयरहोल्डिंग पैटर्न की रिपोर्ट, मार्च 2025, रिपब्लिक वर्ल्ड, एफ़आईआर की रिपोर्ट जिसमें साइबर जाँच का ज़िक्र है, 9 सितंबर 2026, कुणाल कामरा बनाम भारत संघ, बंबई उच्च न्यायालय, रिट याचिका (एल) 9792/2023 का विवरण