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गुजरात में खेत का सबसे छोटा क़ानूनी टुकड़ा अब 10 गुंठा है, और अध्यादेश का अपना बयान खेत की नहीं, शहर के किनारे की ज़मीन के काग़ज़ की बात करता है

14 जुलाई से पूरे गुजरात में खेती की ज़मीन का मानक क्षेत्र 1,012 वर्ग मीटर है; पहले यह ज़मीन की क़िस्म के हिसाब से 20 गुंठा से 3 एकड़ तक था। उसी अध्यादेश ने 1948 से मार्च 2026 तक के क़ानून-विरुद्ध सौदे बिना जुर्माने के नियमित कर दिए। राजपत्र का कारण-कथन विकास योजना और ग़ैर-खेती अनुमति की बात करता है; अख़बार में छपा राजस्व अधिकारी का उदाहरण तीन बेटों का है।

गुजरात का दितला गाँव, 2011 की तस्वीर। नई माप ऐसे ही गाँवों के राजस्व रिकॉर्ड पर लागू होती है
तस्वीर: Emmanuel DYAN from Paris, France, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

बत्तीस मीटर लंबा, बत्तीस मीटर चौड़ा एक चौकोर टुकड़ा। नापें तो 1,012 वर्ग मीटर; गुजरात की राजस्व-भाषा में 10 गुंठा; एकड़ में चौथाई।

14 जुलाई 2026 से गुजरात में खेती की ज़मीन का इससे छोटा हिस्सा अलग सर्वे नंबर के तौर पर क़ानूनी नहीं है। पहले यह न्यूनतम माप ज़मीन की क़िस्म के हिसाब से 20 गुंठा से 3 एकड़ तक थी। अब पूरे राज्य में एक आँकड़ा है।

कोई सरकार यह क्यों तय करती है कि खेत का टुकड़ा इससे छोटा नहीं हो सकता?

जवाब का एक हिस्सा 1947 के उस क़ानून में है जिसे बंबई की विधानसभा ने बनाया था और जो 29 जनवरी 1948 से लागू है। दूसरा हिस्सा इस साल के अध्यादेश में है, जिसका अपना कारण-कथन खेत की बात कम और शहर के किनारे की ज़मीन के काग़ज़ की बात ज़्यादा करता है।

उसी अध्यादेश ने 1948 से मार्च 2026 तक के उन सारे सौदों को बिना जुर्माने के नियमित कर दिया है जो इस क़ानून के ख़िलाफ़ हुए थे।

राजपत्र की चार धाराएँ

गुजरात सरकार का असाधारण राजपत्र, अंक 11, भाग IV, मंगलवार 14 जुलाई 2026। ऊपर राजस्व विभाग, सचिवालय, गांधीनगर का नाम; शीर्षक "गुजरात अध्यादेश संख्या 2, 2026"।

पहली धारा कहती है कि यह अध्यादेश "तुरंत लागू होगा"। सबसे नीचे राज्यपाल आचार्य देवव्रत के नाम के साथ 10 जुलाई 2026 की तारीख़ है, और अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. जयंती एस. रवि का नाम। प्रस्तावना दर्ज करती है कि विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा था और संविधान के अनुच्छेद 213 के खंड (1) के परंतुक के तहत राष्ट्रपति के निर्देश ले लिए गए हैं।

पूरा अध्यादेश चार धाराओं का है। काम की दो हैं। धारा 3 मूल क़ानून की धारा 5 में एक उपधारा जोड़ती है, और तय करती है कि न्यूनतम माप कैसे घोषित होगी। धारा 4 मूल क़ानून की धारा 9 में एक उपधारा जोड़ती है, और 78 साल के उल्लंघनों को माफ़ करती है।

1947 का क़ानून, 1948 से लागू

राजपत्र क़ानून को "बॉम्बे LXII ऑफ़ 1947" लिखता है, यानी बंबई का 1947 का 62वाँ अधिनियम; गुजराती पाठ में "મુંબઇનો ૬૨મો"। नाम है गुजरात खेती की ज़मीन के टुकड़े रोकने और जोतों के एकत्रीकरण का अधिनियम, 1947। यह 29 जनवरी 1948 से लागू हुआ और आज पूरे गुजरात राज्य पर चलता है।

प्रस्तावना का मक़सद एक पंक्ति में है: खेती की जोतों के टुकड़े रोकना और "उनकी बेहतर खेती के लिए" उनका एकत्रीकरण।

धारा 2 दो शब्द तय करती है। "टुकड़ा" वह प्लॉट है जिसका रक़बा इस क़ानून के तहत तय "मानक क्षेत्र" से कम हो; नदी के कटाव से छोटा हुआ प्लॉट इसमें नहीं गिना जाता। और "मानक क्षेत्र" वह क्षेत्र है जिसे राज्य सरकार समय-समय पर "लाभकारी खेती के लिए ज़रूरी न्यूनतम क्षेत्र" के तौर पर तय करे।

पूरा क़ानून इन दो परिभाषाओं पर टिका है। जो टुकड़ा है, उस पर पाबंदियाँ हैं। जो मानक क्षेत्र के बराबर या उससे बड़ा है, उस पर यह क़ानून चुप है।

मानक क्षेत्र पहले कैसे तय होता था

मूल क़ानून की धारा 4 एक पूरी प्रक्रिया लिखती है। सरकार जाँच करे, ज़िला सलाहकार समिति से मशविरा करे, फिर हर स्थानीय क्षेत्र में ज़मीन की हर क़िस्म के लिए वह न्यूनतम रक़बा अस्थायी तौर पर तय करे "जिसे अलग प्लॉट के तौर पर लाभ से जोता जा सके"। प्रस्ताव प्रकाशित हो, आपत्तियाँ माँगी जाएँ।

धारा 5 कहती है कि आपत्तियों पर विचार के बाद ही हर क़िस्म की ज़मीन के लिए मानक क्षेत्र तय हो, और उसमें बदलाव भी उसी रास्ते से हो। तय हुआ क्षेत्र राजपत्र में छपे।

इसी प्रक्रिया का नतीजा था कि गुजरात में मानक क्षेत्र एक नहीं, कई थे। जिरायत यानी बारिश पर निर्भर ज़मीन के लिए अलग, बागायत यानी सिंचित ज़मीन के लिए अलग। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह माप 20 गुंठा, यानी 2,000 वर्ग मीटर से कुछ ऊपर, से लेकर 3 एकड़ यानी 12,140 वर्ग मीटर तक जाती थी।

अब एक अधिसूचना से

अध्यादेश की धारा 3 मूल क़ानून की धारा 5 में उपधारा (4) जोड़ती है। पाठ: "धारा 4 या पूर्ववर्ती उपधाराओं में कुछ भी लिखा होने के बावजूद, राज्य सरकार समय-समय पर, राजपत्र में अधिसूचना से, किसी भी स्थानीय क्षेत्र में ज़मीन की किसी भी क़िस्म के लिए मानक क्षेत्र घोषित कर सकेगी।"

इस पंक्ति का काम करने वाला शब्द "बावजूद" है। जाँच, ज़िला समिति, प्रकाशन, आपत्तियाँ: ये सब धारा 4 और 5 में अब भी लिखे हैं, पर सरकार चाहे तो इन्हें छोड़कर सीधे अधिसूचना निकाल सकती है।

12 अगस्त को राजस्व विभाग ने यही किया। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार उस दिन दो अधिसूचनाएँ निकलीं। नतीजा: पूरे राज्य में, ज़मीन की क़िस्म से परे, मानक क्षेत्र 10 गुंठा। शहरी क्षेत्र इस माप से बाहर रखे गए हैं। अध्यादेश के अपने पाठ में शहरी क्षेत्र का ज़िक्र नहीं है; छूट का ज़िक्र अख़बार अधिसूचनाओं के साथ करता है।

गुंठा, एकड़, हेक्टेयर

अध्यादेश के बाद के आँकड़ों से इकाइयों का हिसाब सीधा है। 10 गुंठा 1,012 वर्ग मीटर है, तो एक गुंठा लगभग 101 वर्ग मीटर। 40 गुंठा का एक एकड़, लगभग 4,047 वर्ग मीटर। एक हेक्टेयर 10,000 वर्ग मीटर का होता है, यानी लगभग 99 गुंठा, या ढाई एकड़ से थोड़ा कम।

पुरानी ऊपरी माप 3 एकड़ यानी 120 गुंठा थी। नई माप उससे बारह गुना छोटी है, और पुरानी निचली माप की आधी।

कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार गुजरात की औसत जोत 1.88 हेक्टेयर है, यानी लगभग 186 गुंठा, साढ़े चार एकड़ से कुछ ऊपर। देश की औसत जोत 1.08 हेक्टेयर, यानी लगभग 107 गुंठा। नई न्यूनतम माप गुजरात की औसत जोत का अठारहवाँ हिस्सा है।

सर्वे नंबर किसे कहते हैं

गाँव के राजस्व रिकॉर्ड में हर खेत का एक नंबर है। यही सर्वे नंबर है। ज़मीन के हक़ का रिकॉर्ड, जिसे क़ानून "रिकॉर्ड ऑफ़ राइट्स" कहता है, इसी नंबर के आगे लिखा जाता है। कृषि जनगणना अपनी परिभाषा में ख़ुद मिसाल देती है कि एक जोत में चार सर्वे नंबर हो सकते हैं, जिनमें से एक ग़ैर-खेती काम में हो।

1947 का क़ानून धारा 6 में कहता है कि जब किसी स्थानीय क्षेत्र के लिए मानक क्षेत्र अधिसूचित हो, तो वहाँ के सारे टुकड़े रिकॉर्ड ऑफ़ राइट्स या गाँव के रिकॉर्ड में दर्ज किए जाएँ और तय प्रक्रिया से सूचना दी जाए। टुकड़ा होना रिकॉर्ड में एक निशान है, जो हर सौदे के वक़्त सामने आता है।

अलग सर्वे नंबर का मतलब है कि ज़मीन का वह हिस्सा काग़ज़ पर एक स्वतंत्र इकाई है, जिसका अपना रक़बा, अपनी क़िस्म और अपना मालिक दर्ज है।

तीन बेटे, तीस गुंठा

गुजरात के दितला गाँव का एक और दृश्य। बँटवारे का सवाल ऐसे ही गाँवों के राजस्व रिकॉर्ड में उठता है
तस्वीर: Emmanuel DYAN from Paris, France, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

इंडियन एक्सप्रेस ने एक राजस्व अधिकारी का उदाहरण छापा है। एक किसान के पास 30 गुंठा ज़मीन है और तीन बेटे। 20 गुंठा की पुरानी माप पर यह ज़मीन तीन क़ानूनी हिस्सों में बँट ही नहीं सकती थी: हर हिस्सा 20 गुंठा से छोटा होता, इसलिए टुकड़ा कहलाता। 10 गुंठा की माप पर तीनों बेटों को 10-10 गुंठा का अलग सर्वे नंबर मिल सकता है।

अधिकारी के अनुसार अलग सर्वे नंबर होने पर उस हिस्से को बेचना और उस पर कर्ज़ लेना आसान है।

पुरानी माप पर ऐसे बँटवारे का क्या होता था, यह क़ानून की धारा 8AA में लिखा है। साझेदारों के बीच बँटवारा ऐसे होना चाहिए कि टुकड़ा न बने। अदालत या कलेक्टर बँटवारा करे, तो जिस साझेदार को बिना टुकड़ा बनाए हिस्सा नहीं मिल सकता, उसे ज़मीन नहीं, पैसा मिलता है, और रक़म भूमि अधिग्रहण क़ानून के सिद्धांतों पर तय होती है। कौन ज़मीन लेगा और कौन पैसा, यह आपसी सहमति से तय हो; सहमति न हो तो पर्ची से। ज़मीन पाने वाला क़ब्ज़ा लेने से पहले रक़म चुकाए; न चुकाए तो उसका हिस्सा नीलाम हो और रक़म बाँटी जाए। साझेदार आपस में कोई और तरीक़ा चुन लें जिससे टुकड़ा न बने, तो वह भी चल सकता है।

सबसे छोटे हिस्से वाला वारिस पुराने क़ानून में ज़मीन का मालिक नहीं, लेनदार बनता था।

टुकड़ा बेचने पर क्या रोक थी

धारा 7 कहती है कि जिस टुकड़े की सूचना धारा 6 के तहत दी जा चुकी है, वह सिर्फ़ किसी किसान को बेचा जा सकता है, जैसी किसान की परिभाषा किरायेदारी क़ानून में है। अगर ख़रीदार बग़ल के सर्वे नंबर का मालिक है, तो टुकड़ा उसी में मिला दिया जाएगा।

दूसरा परंतुक कर्ज़ का है। टुकड़े का मालिक उसे राज्य सरकार, भूमि बंधक बैंक या किसी सहकारी समिति के पास ही ज़मानत के तौर पर गिरवी रख सकता है। किसी और कर्ज़दाता का रास्ता क़ानून में नहीं है।

पट्टे पर भी पाबंदी है। किसी भी दूसरे क़ानून में कुछ भी लिखा हो, टुकड़ा सिर्फ़ उसी को पट्टे पर दिया जा सकता है जो उससे सटी ज़मीन जोत रहा हो।

और धारा 8 एक वाक्य की है: किसी स्थानीय क्षेत्र में कोई ज़मीन इस तरह न हस्तांतरित होगी, न बँटेगी कि टुकड़ा बने।

उल्लंघन की क़ीमत

धारा 9 कहती है कि इस क़ानून के ख़िलाफ़ किया गया हस्तांतरण या बँटवारा शून्य है। ज़मीन का मालिक शहरी क्षेत्र में 5,000 रुपये या ज़मीन के बाज़ार मूल्य का 10 फ़ीसदी, जो ज़्यादा हो, और बाक़ी क्षेत्र में 2,000 रुपये या 10 फ़ीसदी, जो ज़्यादा हो, जुर्माना देगा, जैसा कलेक्टर तय करे। जुर्माना भू-राजस्व के बक़ाये की तरह वसूला जाएगा।

इससे आगे भी है। ऐसी ज़मीन पर बिना अधिकार क़ाबिज़ या ग़लत क़ब्ज़े वाले व्यक्ति को कलेक्टर संक्षिप्त कार्यवाही से बेदख़ल कर सकता है।

शहर के किनारे की ज़मीन पर बाज़ार मूल्य का 10 फ़ीसदी छोटी रक़म नहीं है। यही जुर्माना और यही बेदख़ली वह चीज़ है जिसे अध्यादेश की दूसरी उपधारा 78 साल पीछे तक हटाती है।

एक उपधारा, 78 साल

अध्यादेश की धारा 4 मूल क़ानून की धारा 9 में उपधारा (4) जोड़ती है। उसका पाठ, हिंदी में: "इस अधिनियम में कुछ भी लिखा होने के बावजूद, इस अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत ज़मीन का ऐसा हस्तांतरण या बँटवारा, जो 29 जनवरी 1948 को या उसके बाद, पर 31 मार्च 2026 को या उससे पहले किया गया हो, बिना किसी जुर्माने या प्रीमियम के नियमित किया गया माना जाएगा, और उक्त हस्तांतरण या बँटवारे के संबंध में किसी अधिकारी या प्राधिकरण के समक्ष लंबित सारी कार्यवाहियाँ समाप्त हो जाएँगी।"

अंग्रेज़ी मूल के शब्द हैं "deemed to have been regularised without charging any penalties or premium", और लंबित कार्यवाहियों के लिए "shall abate"।

तारीख़ें देखने लायक़ हैं। शुरुआत 29 जनवरी 1948, यानी क़ानून लागू होने का पहला दिन। अंत 31 मार्च 2026, अध्यादेश से साढ़े तीन महीने पहले। 1 अप्रैल से 13 जुलाई 2026 के बीच पुरानी माप के ख़िलाफ़ हुआ कोई सौदा इस माफ़ी के दायरे में नहीं है; उस पर पुरानी धारा 9 ही चलती है।

राजपत्र यह नहीं बताता कि ऐसे कितने सौदे हैं, कितनी कार्यवाहियाँ लंबित हैं, या कितना जुर्माना छोड़ा जा रहा है। पूरे दस्तावेज़ में एक भी आँकड़ा नहीं है।

अध्यादेश का अपना बयान

राजपत्र में अध्यादेश के नीचे "स्टेटमेंट" शीर्षक से चार अनुच्छेद हैं। यह सरकार का अपना कारण-कथन है, और इसमें न किसान का ज़िक्र है, न वारिस का, न तीन बेटों का।

पहला अनुच्छेद क़ानून का मक़सद दोहराता है: "कृषि दक्षता" और खेती की ज़मीन का "व्यवस्थित प्रबंधन"। दूसरा कहता है कि क़ानून सात दशक से ज़्यादा पुराना है और इस बीच राज्य की "सामाजिक-आर्थिक स्थितियों, ज़मीन के इस्तेमाल के तरीक़ों और खेती की पद्धतियों" में बड़े बदलाव हुए हैं।

तीसरा अनुच्छेद असली वजह बताता है। उसका अनुवाद: शहरी और नगरपालिका क्षेत्रों के विस्तार के साथ, ऐसे क्षेत्रों और उनके किनारे की खेती की ज़मीनें विकास योजनाओं के तहत आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक ज़ोन में शामिल कर ली गई हैं, जिससे वे ग़ैर-खेती इस्तेमाल के लिए "पात्र और ज़्यादा उपयुक्त" हो गई हैं। इसके बावजूद, क़ानून के ख़िलाफ़ हुए हस्तांतरण और बँटवारों से इन ज़मीनों के टुकड़े बने हैं; ये सौदे रिकॉर्ड ऑफ़ राइट्स में उल्लंघन के तौर पर दर्ज हैं, और इसी वजह से क़ाबिज़ लोग "ग़ैर-खेती इस्तेमाल शुरू करने की ज़रूरी अनुमतियाँ" नहीं ले पा रहे।

चौथा अनुच्छेद कहता है कि इसी समस्या को सुलझाने के लिए धारा 5 और 9 में संशोधन ज़रूरी है, ताकि "कृषि हितों और राज्य की विकास ज़रूरतों में संतुलन" बने।

शहर कहाँ तक पहुँच गया है

अहमदाबाद के एसजी हाईवे के किनारे की इमारतें। अध्यादेश का बयान जिस ज़मीन की बात करता है, वह ऐसे ही शहरों के किनारे है
तस्वीर: Kushagra140, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार 2011 की जनगणना में गुजरात की 42 फ़ीसदी आबादी शहरी थी; अख़बार के मुताबिक़ यह हिस्सा अब 50 फ़ीसदी से ऊपर है, और राज्य का लक्ष्य 2047 तक 75 फ़ीसदी का है। राज्य में 17 नगर निगम हैं।

शहर का किनारा वही ज़मीन है जिसकी बात अध्यादेश का बयान करता है: विकास योजना में आवासीय या औद्योगिक ज़ोन में आ चुकी, पर राजस्व रिकॉर्ड में खेती की, और टुकड़ों में बँटी। 12 अगस्त की अधिसूचनाओं ने शहरी क्षेत्रों को 10 गुंठा की माप से बाहर रखा है; 1947 का क़ानून ख़ुद धारा 9 के जुर्माने में शहरी और बाक़ी क्षेत्र का फ़र्क़ करता है।

यह अध्यादेश इस साल ज़मीन के क़ानूनों में हुए बदलावों में अकेला नहीं है। गूगल न्यूज़ की सूची में 2 अप्रैल 2026 की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का शीर्षक है कि गुजरात सरकार ने ज़मीन के सौदों के पंजीकरण के लिए 30 दिन के नोटिस की शर्त हटाई और अध्यादेश लाने की बात कही। 3 अप्रैल की अहमदाबाद मिरर की रिपोर्ट का शीर्षक है कि राज्य खेती की ज़मीन के "अत्यधिक विभाजन" को रोकना चाहता है। अप्रैल में जो इरादा सुर्ख़ी में था, जुलाई में वह राजपत्र में है।

गुजरात की जोत का नक़्शा

गुजरात के दितला गाँव के बाहर की ज़मीन। कृषि जनगणना ऐसी ही ज़मीन को परिचालन जोतों में गिनती है
तस्वीर: Emmanuel DYAN from Paris, France, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

कृषि जनगणना 2015-16 गुजरात में 53.2 लाख जोतधारक गिनती है, जिनके पास 99.7 लाख हेक्टेयर परिचालन क्षेत्र है। औसत जोत 1.88 हेक्टेयर, जो 2010-11 में 2.03 हेक्टेयर थी। पाँच साल में औसत जोत 0.15 हेक्टेयर, यानी लगभग 15 गुंठा, छोटी हुई।

बँटवारा ऊपर पतला और नीचे चौड़ा है। बड़ी जोतें राज्य के 0.75 फ़ीसदी धारकों के पास हैं, और उनके पास 5.91 फ़ीसदी ज़मीन है। अर्ध-मध्यम जोतें 21 फ़ीसदी धारकों के पास हैं, और उनके पास 31.7 फ़ीसदी ज़मीन है।

जनगणना की सार-तालिका में गुजरात एक और जगह दिखता है। जिन जोतों को जनगणना "लघु" कहती है, उनके हिस्से में गुजरात देश में दूसरे नंबर पर है: उसकी 30.4 फ़ीसदी जोतें इस श्रेणी में हैं, मणिपुर के 32.4 फ़ीसदी के बाद और महाराष्ट्र के 29.3 फ़ीसदी से आगे।

देश की 14.6 करोड़ जोतें

2015-16 की कृषि जनगणना इस शृंखला की दसवीं है। वह देश में 14.6 करोड़ परिचालन जोतें गिनती है; 2010-11 में 13.8 करोड़ थीं, यानी 5.33 फ़ीसदी की बढ़त। परिचालन क्षेत्र इसी बीच 15.96 करोड़ हेक्टेयर से घटकर 15.71 करोड़ हेक्टेयर रह गया, 1.53 फ़ीसदी की गिरावट। ज़्यादा जोतें, कम ज़मीन: औसत 1.15 से 1.08 हेक्टेयर।

2 हेक्टेयर से नीचे की लघु और सीमांत जोतें, जनगणना की सार-पुस्तिका के अनुसार, 2015-16 में कुल जोतों का 86.21 फ़ीसदी थीं और उनके पास 47.34 फ़ीसदी परिचालन क्षेत्र था; 2010-11 में 84.97 और 44.31 फ़ीसदी। इसी जनगणना का एक और सारांश, जिसका हवाला हमारी शोध-टिप्पणी देती है, यही आँकड़े 86.08 और 46.94 फ़ीसदी बताता है। फ़र्क़ एक फ़ीसदी से कम है, पर दोनों दस्तावेज़ एक ही जनगणना के नाम पर अलग संख्या देते हैं।

2 से 10 हेक्टेयर की अर्ध-मध्यम और मध्यम जोतें 13.22 फ़ीसदी थीं और उनके पास 43.61 फ़ीसदी ज़मीन। 10 हेक्टेयर और ऊपर की बड़ी जोतें 0.57 फ़ीसदी, ज़मीन 9.04 फ़ीसदी; 2010-11 में 0.71 और 10.59 फ़ीसदी।

चौदह राज्य, जिनमें गुजरात है, देश की 91.03 फ़ीसदी जोतों और 88.08 फ़ीसदी परिचालन क्षेत्र के धारक हैं।

औसत के पीछे की श्रेणियाँ

सार-पुस्तिका श्रेणीवार औसत भी देती है। सीमांत जोत औसतन 0.38 हेक्टेयर की है, लघु 1.41, अर्ध-मध्यम 2.70, मध्यम 5.72 और बड़ी 17.10 हेक्टेयर। सबसे बड़ी श्रेणी की औसत जोत सबसे छोटी श्रेणी की औसत से 45 गुना है।

गुंठे में 0.38 हेक्टेयर लगभग 38 गुंठा हुआ। देश की औसत सीमांत जोत गुजरात की नई न्यूनतम माप से चार गुना है। 38 गुंठा तीन हिस्सों में बँटे तो हर हिस्सा 12 या 13 गुंठा का; उन तीनों में से किसी का भी अगला बँटवारा 10 गुंठा से नीचे जाता है।

जनगणना की जोत और रिकॉर्ड का सर्वे नंबर

कृषि जनगणना जिसे जोत कहती है, वह राजस्व रिकॉर्ड की इकाई नहीं है। उसकी परिभाषा: वह सारी ज़मीन जो पूरी या आंशिक रूप से खेती के उत्पादन में हो और जिसे एक व्यक्ति अकेले या दूसरों के साथ "एक तकनीकी इकाई" के तौर पर जोतता हो, "मालिकाना हक़, क़ानूनी रूप, आकार या स्थान से परे"।

इसलिए 1.88 हेक्टेयर की औसत जोत का मतलब यह नहीं कि गुजरात का औसत सर्वे नंबर 1.88 हेक्टेयर का है। एक जोत में कई सर्वे नंबर हो सकते हैं, और क़ानून की धारा 8AA जिस अविभाजित ज़मीन की बात करती है, उसके एक सर्वे नंबर में कई साझेदार। 1947 का क़ानून सर्वे नंबर और उसके टुकड़े पर चलता है; जनगणना जोतने वाले की इकाई गिनती है।

दोनों आँकड़े एक ही ज़मीन को दो अलग खिड़कियों से देखते हैं, और इस लेख के सामने कोई ऐसा दस्तावेज़ नहीं है जो बताए कि गुजरात में 10 गुंठा से छोटे सर्वे नंबर कितने हैं।

उत्पादकता का दावा किसका है

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि जोत के टुकड़े होने से उत्पादकता घटती है। यह अख़बार का उद्धरण है, इस लेख की जाँच नहीं; जो दस्तावेज़ इस लेख के सामने हैं, उनमें उत्पादकता का कोई आँकड़ा नहीं है।

क़ानून का अपना दावा शब्दों में है, संख्या में नहीं। प्रस्तावना "बेहतर खेती" कहती है; मानक क्षेत्र की परिभाषा "लाभकारी खेती के लिए ज़रूरी न्यूनतम क्षेत्र" कहती है; अध्यादेश का बयान "कृषि दक्षता" कहता है। तीनों जगह यह मान लिया गया है कि छोटा टुकड़ा कम लाभ देता है। कहीं यह नहीं लिखा कि कितना छोटा, या कितना कम।

10 गुंठा का आँकड़ा किस जाँच से निकला, यह भी राजपत्र में नहीं है। धारा 5 की नई उपधारा ने जाँच की शर्त ही हटा दी है।

महाराष्ट्र पहले से चौथाई एकड़ पर

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार पड़ोसी महाराष्ट्र में टुकड़े की न्यूनतम माप बागायत ज़मीन के लिए 0.25 एकड़ और जिरायत के लिए 0.5 एकड़ है। गुजरात की नई माप महाराष्ट्र की बागायत माप के बराबर है, और गुजरात ने इसे ज़मीन की क़िस्म से परे सब पर लागू किया है; जिरायत पर यह महाराष्ट्र से आधी है।

महाराष्ट्र भी अपने क़ानून में ढील दे रहा है। गूगल न्यूज़ की सूची में 9 जुलाई 2025 की इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट का शीर्षक है कि महाराष्ट्र सरकार टुकड़े रोकने वाले क़ानून में ढील देगी और 1 जनवरी तक बँटे हुए प्लॉट क़ानूनी हो जाएँगे; शीर्षक में साल नहीं है। पुराने बँटवारों को क़ानूनी बनाने का क़दम दोनों राज्यों में एक जैसा है; फ़र्क़ कट-ऑफ़ तारीख़ का है, गुजरात में 31 मार्च 2026।

वारिस के हाथ में अलग नंबर

अध्यादेश और अधिसूचना के बाद 10 गुंठा का हिस्सा टुकड़ा नहीं है, इसलिए धारा 7 की पाबंदियाँ उस पर नहीं चलतीं। राजस्व अधिकारी ने अख़बार से जो कहा, उसका क़ानूनी आधार यही है।

कर्ज़ का पहलू क़ानून में साफ़ है। टुकड़े को सिर्फ़ सरकार, भूमि बंधक बैंक या सहकारी समिति के पास गिरवी रखा जा सकता था। 10 गुंठा का पूरा सर्वे नंबर इस सूची से बँधा नहीं है।

बेचने का पहलू भी। टुकड़ा सिर्फ़ किसान को, और बग़ल वाले को बेचो तो उसी में विलय। पूरा सर्वे नंबर इस क़ानून की इन शर्तों से बाहर है। ख़रीदार की पात्रता के जो दूसरे नियम हैं, वे इस अध्यादेश का विषय नहीं हैं।

अस्थायी क़ानून, तीन दिन का सत्र

अध्यादेश की धारा 2 का शीर्षक ही "अस्थायी रूप से संशोधित" है: "इस अध्यादेश के प्रवर्तन की अवधि के दौरान" मूल क़ानून धारा 3 और 4 के संशोधनों के साथ प्रभावी रहेगा। स्थायी बदलाव के लिए विधानसभा से विधेयक पास होना है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह विधेयक 9 सितंबर से शुरू हो रहे तीन दिन के मानसून सत्र में आ रहा है।

विधानसभा की वेबसाइट पर 8 सितंबर की सूचना तक पंद्रहवीं विधानसभा का नौवाँ सत्र "शुरू नहीं" दिखाया गया था। राज्यपाल की सिफ़ारिश वाले विधेयकों की जो सूची उस पन्ने पर थी, उसमें तीन नाम थे: गुजरात माल और सेवा कर (संशोधन) विधेयक 2026, गुजरात ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस विधेयक 2026, और गुजरात माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (संशोधन) विधेयक 2026। टुकड़े वाले क़ानून का विधेयक उस सूची में नहीं था। पन्ने पर कुल 14 सरकारी विधेयक लंबित बताए गए थे।

जो राजपत्र नहीं कहता

अध्यादेश में 10 गुंठा का आँकड़ा नहीं है; वह अधिसूचना में है। शहरी क्षेत्र की परिभाषा नहीं है। टुकड़ों की संख्या, लंबित कार्यवाहियों की संख्या, छोड़े गए जुर्माने की रक़म, इनमें से कुछ नहीं है। राष्ट्रपति के निर्देश लिए गए, यह दर्ज है; क्यों ज़रूरी थे, यह नहीं।

और बयान में वह उदाहरण नहीं है जो अख़बार में राजस्व अधिकारी ने दिया। अधिकारी का उदाहरण विरासत का है: तीन बेटे, एक खेत। सरकार का लिखित कारण विकास योजना का है: ज़ोन बदल चुकी ज़मीन, जिसके काग़ज़ में उल्लंघन दर्ज है। दोनों में विरोध नहीं है; पर राजपत्र सिर्फ़ दूसरे को लिखता है।

सत्र 9 सितंबर से है, तीन दिन का।

स्रोतगुजरात सरकार का असाधारण राजपत्र, भाग IV, 14 जुलाई 2026: गुजरात अध्यादेश संख्या 2/2026 और उसका कारण-कथन, गुजरात विधानसभा के NeVA पोर्टल पर, गुजरात खेती की ज़मीन के टुकड़े रोकने और जोतों के एकत्रीकरण का अधिनियम, 1947 का पाठ, इंडियन कानून, कृषि जनगणना 2015-16 की 'हाइलाइट्स' सार-पुस्तिका, कृषि मंत्रालय के दस्तावेज़ की प्रति, CEIC डेटा, कृषि जनगणना के आधार पर गुजरात की औसत परिचालन जोत, 2010-11 और 2015-16, इंडियन एक्सप्रेस, 8 सितंबर 2026, परिमल दाभी की रिपोर्ट 'New law in Gujarat limits size of agricultural land to 0.25 acre; here's why', गूगल न्यूज़ फ़ीड में सूचीबद्ध; उसी फ़ीड में अहमदाबाद मिरर (3 अप्रैल 2026) और इकोनॉमिक टाइम्स (9 जुलाई 2025) के शीर्षक, गुजरात विधानसभा का NeVA पोर्टल, 8 सितंबर 2026 की सूचना: नौवाँ सत्र और राज्यपाल की सिफ़ारिश वाले विधेयक

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।