जाति की गिनती परसों से शुरू हो रही है, और खाना खाली छोड़ा गया है
जनगणना का दसवाँ सवाल जाति का है। एससी-एसटी के लिए सूची तय है। बाक़ी सबके लिए कोई सूची नहीं, गणक वही लिखेगा जो आप बताएँगे। 2011 में इसी तरीक़े से 46 लाख जातियाँ निकली थीं।
आज़ाद भारत में जाति की पहली गिनती परसों शुरू हो रही है, और ज़्यादातर लोगों को यह पता नहीं है।
1 सितंबर 2026 से लद्दाख और जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल के बर्फ़ीले हिस्सों में गणक घर-घर जाएँगे। बाक़ी देश की बारी फ़रवरी 2027 में आएगी। ख़ुद अपनी जानकारी भरने की सुविधा 17 अगस्त से खुल चुकी है।
यह सोलहवीं जनगणना है और आज़ादी के बाद आठवीं। 2011 के बाद सोलह साल का अंतराल पड़ा है, जो 1881 के बाद सबसे लंबा है। सरकारी वजह कोविड बताई गई है।
पर इस लेख का सवाल तारीख़ नहीं है। सवाल यह है कि जाति दर्ज कैसे की जाएगी।
सवाल नंबर दस
चालीस सवालों की सूची में जाति दसवें नंबर पर है।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए 1950 के राष्ट्रपति आदेशों से बनी बंद सूची है। नाम उसी में से चुना जाएगा।
बाक़ी सबके लिए कोई सूची नहीं है।
"जाति" एक खुला कॉलम है, जिसमें गणक वही लिखेगा जो जवाब देने वाला बोलेगा। जैसा बोला, वैसा दर्ज। सरकारी दस्तावेज़ में साफ़ लिखा है कि यह तरीक़ा 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना जैसा ही है।
तीन बातें जो घोषित नहीं हुई हैं, और तीनों मायने रखती हैं। ओबीसी का कोई अलग ख़ाना नहीं है। कच्चे जवाबों को बाद में वर्गीकृत करने की कोई विधि नहीं बताई गई है। और नतीजे कब आएँगे, इसकी कोई तारीख़ नहीं है।
2011 में इसी तरीक़े से क्या निकला था
सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना 2011 पर ₹4,893.60 करोड़ ख़र्च हुए। काम 31 मार्च 2016 तक चला। जाति के आँकड़े आज तक जारी नहीं हुए।
वजह सरकार ने ख़ुद बताई है।
उस गिनती से 46,73,034 अलग-अलग जाति के नाम निकले।
सितंबर 2021 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल किया। उसमें कहा गया कि यह आँकड़ा सटीक नहीं है और किसी भी काम के लायक़ नहीं है। हलफ़नामे में यह भी माना गया कि गिनती शुरू करने से पहले जातियों की कोई सूची तैयार ही नहीं की गई थी।
और उसमें एक तुलना दी गई, जो सबसे साफ़ है। 1931 की जनगणना में 4,147 जातियाँ गिनी गई थीं। सरकार ने अदालत से कहा कि संख्या इस हद तक नहीं बढ़ सकती।
महाराष्ट्र का उदाहरण उसी हलफ़नामे में है। राज्य में अधिसूचित जातियाँ 494 हैं। सर्वे में दर्ज हुईं 4,28,677। और 1.17 करोड़ लोगों के आगे जाति का ख़ाना खाली रह गया।
और यहीं एक विरोधाभास है, जो दर्ज है
2016 में भारत के महापंजीयक ने संसद की स्थायी समिति को बताया था कि उसी सर्वे के जाति संबंधी आँकड़ों का 98.87 फ़ीसदी हिस्सा त्रुटिरहित है।
2021 में उसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आँकड़ा किसी काम का नहीं है।
दोनों बयान आज भी रिकॉर्ड पर हैं। कोई वापस नहीं लिया गया।
दो तरीक़े मौजूद थे, चुना गया वही जो पहले ढह चुका था
बिहार ने 2023 में जो सर्वे किया, उसमें बंद सूची इस्तेमाल हुई। 214 जातियाँ पहले से कोडित, और एक "अन्य" का ख़ाना। 17 सवाल, 3.04 लाख गणक, लगभग ₹500 करोड़ ख़र्च।
नौ महीने में इस्तेमाल लायक़ प्रतिशत सामने आ गए। अत्यंत पिछड़ा वर्ग 36.01, पिछड़ा वर्ग 27.13, अनुसूचित जाति 19.65, अनुसूचित जनजाति 1.68 और अनारक्षित 15.52 फ़ीसदी।
तेलंगाना ने भी अपनी राज्य सूची इस्तेमाल की।
जनगणना 2027 खुले कॉलम पर लौट रही है।
एक नज़र में
- गिनती 1 सितंबर 2026 से, बाक़ी देश में फ़रवरी 2027 से
- संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027, बर्फ़ीले इलाक़ों के लिए 1 अक्टूबर 2026
- योजना 12 दिसंबर 2025 को मंज़ूर, लागत ₹11,718.24 करोड़
- एससी-एसटी बंद सूची से, बाक़ी जातियाँ खुले कॉलम में
- ओबीसी का अलग ख़ाना नहीं है
52 फ़ीसदी वाला आँकड़ा कहाँ से आया
ओबीसी आबादी के लिए जो संख्या हर बहस में दोहराई जाती है, वह गिनी नहीं गई थी। वह घटाकर निकाली गई थी।
मंडल आयोग की अपनी तालिका, जो इंद्रा साहनी फ़ैसले में ज्यों की त्यों दर्ज है, ऐसे बनी। अगड़ी जातियाँ, अनुसूचित जाति-जनजाति और ग़ैर-हिंदू मिलाकर 56.30 फ़ीसदी। बचा 43.70 फ़ीसदी हिंदू ओबीसी। रिपोर्ट में इसके आगे ख़ुद आयोग का फ़ुटनोट लगा है कि यह व्युत्पन्न आँकड़ा है, यानी सौ में से बाक़ी सब घटाकर निकाला गया।
ग़ैर-हिंदू 8.40 फ़ीसदी इस मान्यता पर जोड़ा गया कि धार्मिक समूहों का 52 फ़ीसदी हिस्सा भी ओबीसी माना जा सकता है।
रिपोर्ट का पैरा 12.19 यह भी बताता है कि पूरी गणना इस मान्यता पर खड़ी है कि पचास साल तक भारत की हर जाति एक ही रफ़्तार से बढ़ी।
और 27 फ़ीसदी आरक्षण इस 52 से नहीं निकला। वह छत से निकला: 50 में से 22.5 घटाकर।
अदालतें कहाँ खड़ी हैं
इंद्रा साहनी में नौ जजों की पीठ ने 16 नवंबर 1992 को 50 फ़ीसदी की सीमा तय की थी, इस तर्क के साथ कि संविधान बनाने वालों ने बहुसंख्यक सीटों के आरक्षण की कल्पना नहीं की थी।
पटना हाई कोर्ट ने 1 अगस्त 2023 को बिहार के सर्वे को सही ठहराया, और 20 जून 2024 को उसी राज्य के 65 फ़ीसदी आरक्षण को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट इस साल तीन बार जाति जनगणना में दख़ल देने से इनकार कर चुका है, 2 फ़रवरी, 10 अप्रैल और 20 मई को।
किसी भी सरकार को यह जानना ही चाहिए कि कितने लोग पिछड़े हैं। यह नीति का मामला है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत
असल में देखने लायक़ क्या है
गिनती हो जाएगी। यह तय है।
जो तय नहीं है, वह यह कि 46 लाख कच्चे नामों को 4,000 जातियों में बदलने का काम कौन करेगा, किस नियम से करेगा, और वह नियम सार्वजनिक होगा या नहीं।
पिछली बार यह काम कभी हुआ ही नहीं। इसीलिए आँकड़ा कभी नहीं छपा।
स्रोतप्रेस सूचना ब्यूरो, भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त