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मतदाता सूची में नाम पर निशान लगना नाम कटना नहीं है, पर सफ़ाई देने की बारी मतदाता की ही है

कर्नाटक की विसंगति-सूची में नंदन नीलेकणि, सी.एन.आर. राव और कामथ भाइयों के नाम आने के बाद यह सवाल बड़ा हो गया कि 'अनमैप्ड' श्रेणी का मतलब क्या है। चुनाव आयोग की अपनी विज्ञप्तियाँ बताती हैं कि यह क़वायद इस समय 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में चल रही है और इसके दायरे में 36.73 करोड़ मतदाता हैं। महाराष्ट्र, दिल्ली और झारखंड से आ रहे आँकड़े और आरोप अलग-अलग दिशाओं में इशारा करते हैं।

नई दिल्ली में एक मतदान केंद्र के बाहर मेज़ पर रखी मतदाता सूची में अधिकारी नाम मिला रहे हैं और मतदाता पहचान पत्र हाथ में लिए क़तार में खड़े हैं, यह तस्वीर 29 नवंबर 2008 के दिल्ली विधानसभा चुनाव की है
तस्वीर: Election Commission of India GODL-India

बूथ स्तर के एक अधिकारी ने बेंगलुरु के मल्लेश्वरम में एक घर पर गणना प्रपत्र पहुँचाया और लौट गए। उस घर में रहने वाले रसायनशास्त्री सी.एन.आर. राव 92 साल के हैं, 2014 में उन्हें भारत रत्न मिला, और नई मतदाता सूची में उनकी प्रविष्टि पर विसंगति का निशान लग चुका था। द हिंदू ने 9 सितंबर को लिखा कि उन्हें नोटिस भेजा गया है; उसी दिन बेंगलुरु के चुनाव अधिकारियों ने इस रिपोर्ट को "तथ्यात्मक रूप से ग़लत" बताया। उसी हफ़्ते नंदन नीलेकणि, ज़ेरोधा के निखिल और नितिन कामथ तथा अभिनेता प्रकाश राज और शिवराजकुमार के नाम भी विसंगति-सूची में गिने गए।

इन नामों के साथ एक तकनीकी शब्दावली सार्वजनिक बहस में आ गई, और उसका मतलब उतना सीधा नहीं जितना दोनों तरफ़ से बताया जा रहा है।

निशान लगने और नाम कटने में फ़र्क़

आयोग के निर्देशों में विसंगति चिह्नित होना विलोपन नहीं है। कर्नाटक की प्रक्रिया समझाते हुए आयोग ने दोहराया है कि "बिना नोटिस, सुने जाने के अवसर और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी या सहायक अधिकारी के तर्कयुक्त आदेश के किसी नाम को हटाया नहीं जा सकता।" इसका उल्टा भी सही है: निशान लगने के बाद चुप बैठने पर मामला अपने आप ठीक नहीं होता। नोटिस पाने वाले को सुनवाई में ख़ुद हाज़िर होना पड़ता है, परिवार का सदस्य या वकील उसकी जगह नहीं जा सकता, और दस्तावेज़ मूल रूप में ले जाने पड़ते हैं। क़ानूनी बोझ आयोग पर है, व्यावहारिक बोझ मतदाता पर।

'अनमैप्ड विद लास्ट एसआईआर' का मतलब क्या है, और क्या नहीं

यह श्रेणी उन मतदाताओं के लिए है जिनका मौजूदा विवरण पिछले गहन पुनरीक्षण की सूची से जोड़ा नहीं जा सका। नीलेकणि, उनकी पत्नी रोहिणी और दोनों बच्चों को इसी श्रेणी में रखा गया; रिपोर्टों के मुताबिक़ उनका पंजीकरण बेंगलुरु की बीटीएम लेआउट सीट में है। इस श्रेणी में आने का मतलब न अपात्रता है, न नागरिकता पर सवाल। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक प्रश्नोत्तरी इसे साफ़ करती है: जो 2002 के बाद दूसरे राज्य से आकर बसा, उसका नाम दिल्ली की 2002 की सूची में मिलेगा ही नहीं, और उसे अपने पुराने राज्य के रिकॉर्ड से जुड़ना होगा।

कर्नाटक में आधार वर्ष 2002 ही क्यों है

पिछला गहन पुनरीक्षण जिस साल हुआ, वही उस राज्य का आधार वर्ष है। दिल्ली की प्रश्नोत्तरी में लिखा है कि वहाँ पिछला एसआईआर 2002 में हुआ था और उस साल की पूरी सूची वेबसाइट पर डाल दी गई है। महाराष्ट्र की प्रेस नोट आधार वर्ष 2002 से 2004 के बीच बताती है, और आयोग के पोर्टल पर 2002, 2003 तथा 2005 तीनों साल दर्ज हैं। कर्नाटक में तुलना 2002 की सूची से हो रही है। चौबीस साल पुरानी उस सूची में वर्तनी, उपाधि और अंग्रेज़ी-कन्नड़ लिप्यंतरण की जो असंगतियाँ हैं, वही अब विसंगति गिनी जा रही हैं।

माता-पिता के नाम का मिलान: यह जाँच क्यों जुड़ी

आयोग "तार्किक विसंगति" नाम की अलग श्रेणी चलाता है। इसमें माता-पिता के नाम का मेल न खाना, संतान और माता-पिता की उम्र में असामान्य रूप से कम अंतर, और एक ही अभिभावक के नाम पर छह से ज़्यादा संतानें दर्ज होना आता है। मक़सद फ़र्ज़ी प्रविष्टियाँ पकड़ना है। कामथ परिवार पर निशान इसी वजह से लगा; रिपोर्टों में निखिल कामथ, नितिन कामथ और उनकी माँ रेवती कामथ के नाम बेंगलुरु दक्षिण सीट में चिह्नित बताए गए। मणिपुर में इस श्रेणी का पैमाना दिखता है: 5 जुलाई की मसौदा सूची के 19,34,399 मतदाताओं में से 11,30,655 को तार्किक विसंगति के नोटिस गए।

सी.एन.आर. राव की प्रविष्टि 8 सितंबर को मंज़ूर हो चुकी थी

बेंगलुरु के अतिरिक्त ज़िला निर्वाचन अधिकारी, बीबीएमपी उत्तर की ओर से कहा गया कि प्रोफ़ेसर राव या उनके परिवार को कोई नोटिस नहीं दिया गया। अधिकारियों के मुताबिक़ भाग संख्या 59 के बूथ स्तर अधिकारी ने घर जाकर प्रपत्र सौंपा और नोटिस भेजने के बजाय रिकॉर्ड को सीधे अंतिम मंज़ूरी के लिए सिफ़ारिश किया। 8 सितंबर 2026 को अतिरिक्त निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी ने वह प्रविष्टि अंतिम सूची के लिए मंज़ूर कर दी। तारीख़ मायने रखती है, क्योंकि जिस दिन यह ख़बर देश भर में चली, उससे एक दिन पहले फ़ाइल बंद हो चुकी थी।

एक ही प्रविष्टि पर दो अलग विवरण

विसंगति क्या थी, इस पर दोनों पक्षों का बयान मेल नहीं खाता। द हिंदू के हवाले से छपी रिपोर्ट कहती है कि पुरानी सूची में "Prof CNR Rao" था और नई प्रविष्टि में "Proff CNR Rao", यानी उपाधि में एक अक्षर ज़्यादा, और इसे "सेल्फ़ मिसमैच" कहा गया। अधिकारियों का विवरण अलग है: उनके अनुसार मसौदा सूची में नाम "Proff C.N.R. Rao S/O Nagesh Rav. H" है, जबकि 2002 की प्रविष्टि "Rama S/O H. Nagesh" थी। स्क्रॉल यह भी दर्ज करता है कि खंडन के बावजूद राव का नाम जारी नोटिसों की सूची में मौजूद था।

कर्नाटक की मसौदा सूची से बाहर हुए एक करोड़ से ज़्यादा नाम

एक मतदान केंद्र के बाहर मेज़ पर बिछे मतदाता सूची के छपे पन्नों में अपना नाम खोजते लोग, नई दिल्ली की यह तस्वीर 7 फ़रवरी 2015 की है; कर्नाटक की 24 अगस्त वाली मसौदा सूची में अपना नाम है या नहीं, यह हर मतदाता को ख़ुद देखना है
तस्वीर: Election Commission of India GODL-India

24 अगस्त की मसौदा सूची में 4.46 करोड़ मतदाता हैं, जबकि क़वायद से पहले राज्य में 5.55 करोड़ थे। मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबुकुमार के हवाले से छपी श्रेणीवार गिनती यह है: 65.4 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित, 15.1 लाख अनुपस्थित, 12.3 लाख मृत, सात लाख दोहरी प्रविष्टि और 3.8 लाख से ज़्यादा अन्य। इन पाँचों को जोड़ने पर लगभग 1.04 करोड़ बनता है, घोषित कुल एक करोड़ सात लाख से क़रीब तीन लाख कम।

43.81 लाख नोटिस और सुनवाई का तरीक़ा

कर्नाटक में 43.81 लाख मतदाताओं को नोटिस भेजे गए हैं। इनमें 23.45 लाख वे हैं जिनका मिलान नहीं हो सका और 20.35 लाख वे जिनके रिकॉर्ड में तार्किक विसंगति मिली। सुनवाई 5 से 23 सितंबर तक चलेगी। आयोग के ताज़ा निर्देश के मुताबिक़ अधिकारी आधार समेत तीन से ज़्यादा दस्तावेज़ नहीं माँग सकते। नोटिस पर सुनवाई की जगह, तारीख़ और दस्तावेज़ ऑनलाइन चढ़ाने का क्यूआर कोड छपा होता है, पर ऑनलाइन जमा करने के बाद भी हाज़िरी ज़रूरी है।

बिहार से शुरू हुई क़वायद अब तक कहाँ-कहाँ पहुँची

पहला चरण 2025 में बिहार में हुआ। दूसरा चरण 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक गया: पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, पुडुचेरी, लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार। 14 मई 2026 की प्रेस नोट से तीसरा चरण शुरू हुआ, जिसमें 16 राज्य और तीन केंद्रशासित प्रदेश हैं: ओडिशा, मिज़ोरम, सिक्किम, मणिपुर, दादरा नगर हवेली तथा दमन दीव, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, तेलंगाना, पंजाब, कर्नाटक, मेघालय, महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली, नगालैंड और त्रिपुरा। प्रेस नोट संख्या ECI/PN/086/2026 के मुताबिक़ इस चरण में 3,94,541 बूथ स्तर अधिकारी घर-घर जाएँगे, दलों के नियुक्त 3,42,409 एजेंट साथ रहेंगे, और दायरे में 12 मई 2026 तक के 36,73,87,831 मतदाता हैं। पहले दो चरणों में 13 राज्यों के लगभग 59 करोड़ मतदाता आए थे।

आयोग की अपनी समय-सारणी 20 से 28 दिन खिसकी

उसी प्रेस नोट के अनुलग्नक-1 में कर्नाटक, मेघालय, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली के लिए मसौदा प्रकाशन की तारीख़ 5 अगस्त 2026 और अंतिम सूची की तारीख़ 7 अक्टूबर 2026 तय थी। असल में कर्नाटक की मसौदा सूची 24 अगस्त को आई और अंतिम 27 अक्टूबर को आएगी; महाराष्ट्र तथा दिल्ली की मसौदा सूची 31 अगस्त को आई और अंतिम 4 नवंबर को। मई में छपे कैलेंडर से कर्नाटक 20 दिन और महाराष्ट्र तथा दिल्ली 28 दिन पीछे चल रहे हैं। मसौदे से अंतिम सूची तक का समय उतना का उतना ही रहा।

बिहार का हिसाब, आयोग की अपनी विज्ञप्ति से

30 सितंबर 2025 की पत्र सूचना कार्यालय विज्ञप्ति में पूरा गणित छपा है। 24 जून 2025 को राज्य में 7.89 करोड़ मतदाता थे। मसौदा सूची से 65 लाख नाम बाहर हुए और 1 अगस्त 2025 की सूची में 7.24 करोड़ बचे। इसके बाद 3.66 लाख अपात्र नाम हटाए गए और फ़ॉर्म-6 भरकर आए 21.53 लाख पात्र नाम जोड़े गए। अंतिम सूची में लगभग 7.42 करोड़ मतदाता रहे, यानी शुद्ध कमी 47 लाख। उसी विज्ञप्ति में 243 निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी और दलों के नियुक्त 1.6 लाख एजेंट गिनाए गए।

पश्चिम बंगाल: अपीलें किसके ख़िलाफ़ थीं

बंगाल में 6 अप्रैल तक लगभग 91 लाख नाम हट चुके थे, पहले की सूची का 11.9 फ़ीसदी। 25 अगस्त को उच्चतम न्यायालय को बताया गया कि अधिकरणों के सामने लंबित 38 लाख अपीलों में से केवल सात लाख नाम हटाए जाने के ख़िलाफ़ थीं; बाक़ी 31 लाख आवेदन किसी नाम को सूची में शामिल किए जाने को चुनौती दे रहे थे। जो लगभग 83,000 अपीलें निपटीं, उनमें 75,000 से ज़्यादा में अधिकरणों ने मतदाता को शामिल करने का आदेश दिया।

महाराष्ट्र: 30 फ़ीसदी का दावा और उसका आधार

मुंबई के धारावी में सटे हुए मकानों की छतें और पीछे शहर की ऊँची इमारतें, यह तस्वीर नवंबर 2011 की है; इसी विश्लेषण में कोलाबा और कोथरुड जैसी घनी शहरी सीटों पर बहिष्करण दर 46 फ़ीसदी से ऊपर दर्ज हुई
तस्वीर: YGLvoices, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

इंडियन एक्सप्रेस के विश्लेषण के हवाले से 9 सितंबर को छपी रिपोर्ट कहती है कि जिन 38 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी का हिस्सा एक-पाँचवें से ज़्यादा है, वहाँ 37 लाख से ज़्यादा मतदाताओं के गणना प्रपत्र "असंग्रहणीय" चिह्नित हुए, जो पिछली सूची का 29.7 फ़ीसदी है। राज्य का औसत 21.1 फ़ीसदी है, अनुसूचित जाति की 29 आरक्षित सीटों पर 19.6 और अनुसूचित जनजाति की 25 सीटों पर 13.2 फ़ीसदी। रिपोर्ट ख़ुद जोड़ती है कि ये संख्याएँ यह नहीं बतातीं कि मुसलमानों को असमान रूप से बाहर किया गया, और उसी विश्लेषण में उलटी दिशा के उदाहरण हैं: मालेगाँव सेंट्रल में मुस्लिम आबादी का हिस्सा सबसे ज़्यादा 78.4 फ़ीसदी है पर बहिष्करण दर 23.4 फ़ीसदी रही, और 53 सीटें ऐसी हैं जहाँ दर उन 38 सीटों के औसत से भी ऊँची रही, जिनमें कोलाबा 46.9 और कोथरुड 46.1 फ़ीसदी हैं।

महाराष्ट्र की प्रेस नोट में क्या दर्ज है

राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की 31 अगस्त की प्रेस नोट के मुताबिक़ पुनरीक्षण से पहले महाराष्ट्र में 9,78,54,049 मतदाता थे, मसौदा सूची में 7,71,65,562 यानी 78.86 फ़ीसदी शामिल हुए और 2,06,88,487 यानी 21.14 फ़ीसदी बाहर रह गए। अनुलग्नक-2 में ज़िलेवार गिनती है: पुणे 28,66,481, ठाणे 28,59,377, मुंबई उपनगर 26,58,202 और नागपुर 14,43,267। इसी क़वायद में 394 नए मतदान केंद्र जुड़े, 431 हटे और 1,403 की जगह बदली।

दो सरकारी दस्तावेज़, दो अलग शुरुआती संख्याएँ

आयोग की 14 मई की प्रेस नोट महाराष्ट्र के मतदाता 12 मई 2026 तक 9,86,64,413 बताती है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की 31 अगस्त की प्रेस नोट पुनरीक्षण से पहले की संख्या 9,78,54,049 बताती है। दोनों में लगभग 8.1 लाख का अंतर है, और वह अंतर घटने की दिशा में है। किस आधार पर यह कमी हुई, इसका ब्योरा किसी दस्तावेज़ में नहीं मिलता।

महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का जवाब

एस. चोकलिंगम ने कहा है कि 2.07 करोड़ मतदाता स्थायी रूप से हटाए नहीं गए; यह मसौदा सूची से बाहर होना है, तत्काल विलोपन नहीं। उनके मुताबिक़ इस संख्या में 76.80 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित, 75.52 लाख अनुपस्थित या न मिलने वाले, 34.81 लाख मृत, 17.63 लाख दोहरे या दूसरी जगह दर्ज और 2.23 लाख अन्य कारण हैं। उन्होंने यह भी माना कि कुछ असली मतदाता ग़लती से इस श्रेणी में आ सकते हैं, ख़ासकर शहरों में जहाँ लोग दफ़्तर के समय घर पर नहीं मिलते।

दिल्ली: राघव चड्ढा का नाम जुड़ने पर विवाद

पंजाब से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा, जो 2026 में आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में गए, का नाम दिल्ली की राजिंदर नगर सीट की सूची में जुड़ा। आप का आरोप है कि 31 अगस्त की मसौदा सूची में उस भाग में 746 मतदाता थे और चड्ढा की प्रविष्टि 747वीं है, जबकि सूची उस समय स्थिर हो चुकी थी। प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने माँग की कि आयोग यह प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से समझाए, ताकि जिन 47 लाख लोगों के नाम काटे गए वे भी उसी रास्ते का इस्तेमाल कर सकें। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ़्तर के मुताबिक़ सूची स्थिर रहने की अवधि में लगभग 2.14 लाख फ़ॉर्म-6 आए थे; मंगलवार तक 70 विधानसभा क्षेत्रों में अधिकारियों ने नाम जोड़ने के 700 फ़ॉर्म मंज़ूर किए, जिनमें चड्ढा का नाम था। चड्ढा ने कहा कि उन्होंने आयोग के सभी लागू दिशानिर्देशों और प्रक्रियाओं का पालन किया।

दिल्ली के आँकड़े, एक अध्ययन और एक जन सुनवाई

दिल्ली में मसौदा सूची से 47.7 लाख नाम बाहर हुए, जो मतदाताओं का 33 फ़ीसदी है; इनमें 43.3 लाख अनुपस्थित या स्थानांतरित, 2.8 लाख मृत और 1.4 लाख एक से ज़्यादा जगह दर्ज हैं। सबर इंस्टिट्यूट के अध्ययन के मुताबिक़ 70 में से 68 सीटों पर हटाए गए नामों की संख्या 2025 की जीत के अंतर से ज़्यादा है, पर उसी अध्ययन ने दर्ज किया है कि किरायेदार और प्रवासी बहुल बस्तियों में ऊँची दर स्वाभाविक आबादी-हलचल से भी आ सकती है, और इन आँकड़ों से कारण-संबंध नहीं निकाला जा सकता। मंगोलपुरी के वाई ब्लॉक में 5 सितंबर को उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर की अध्यक्षता में चार घंटे की जन सुनवाई हुई।

झारखंड: गोड्डा में फ़ॉर्म-7 का मामला

गोड्डा ज़िले में भाजपा के एक बूथ स्तर एजेंट विनय कुमार मंडल को 3 सितंबर को गिरफ़्तार किया गया और कुछ घंटों में ज़मानत मिल गई। शिकायतकर्ता मुकर्रम अंसारी का आरोप है कि मंडल ने एक ही बूथ पर क़रीब 200 फ़ॉर्म-7 जमा किए, जो नाम हटाने के लिए भरे जाते हैं। उस बूथ की बूथ स्तर अधिकारी सजीदा बीबी का कहना है कि उन आवेदनों में उनका और उनके पति का नाम भी था। मंडल का कहना है कि उन्हें ऐसा करने को कहा गया था; अदालत में अभी कुछ तय नहीं हुआ।

मणिपुर, त्रिपुरा और वे तीन जगहें जहाँ अभी नहीं हुआ

मणिपुर की अंतिम सूची 6 सितंबर को आई, जिसमें 19,60,620 मतदाता हैं, जबकि मसौदे से पहले 20,93,076 थे; तीन अलग गिनतियों का जो झगड़ा वहाँ खड़ा हुआ, उस पर 8 सितंबर को हमने अलग से लिखा था। त्रिपुरा में 28 सितंबर के ग्राम समिति चुनावों के कारण क़वायद टाल दी गई है; अब घर-घर सर्वेक्षण 6 नवंबर से 5 दिसंबर तक चलेगा और अंतिम सूची 15 फ़रवरी 2027 को छपेगी। आयोग की मई की प्रेस नोट में लिखा है कि तीसरे चरण के बाद हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को छोड़कर पूरा देश इस क़वायद के दायरे में आ जाएगा, और इन तीनों की अनुसूची बाद में घोषित होगी।

क़ानूनी आधार: धारा 21(3) और नियम 25

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(2) साधारण पुनरीक्षण की व्यवस्था है और धारा 21(3) उससे अलग। उच्चतम न्यायालय के 27 मई 2026 के निर्णय में इसे "स्वायत्त और सक्षमकारी प्रावधान" कहा गया, जिसकी चार बातें अदालत ने गिनाईं: "किसी भी समय", जो समय की बंदिश हटाता है; "किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके भाग के लिए", जो क्षेत्रीय लचीलापन देता है; "कारण दर्ज करते हुए", जो न्यायिक जाँच का दरवाज़ा खुला रखता है; और "जिस रीति से वह उचित समझे"। मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 का नियम 25 धारा 21(2) पर लागू होता है, और अदालत ने माना कि उसे 21(3) पर थोपना क़ानून को उलट देना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई को क्या तय किया

नई दिल्ली में उच्चतम न्यायालय का परिसर; 27 मई 2026 का 124 पृष्ठ का फ़ैसला यहीं से आया, जिसमें इस क़वायद को वैध ठहराते हुए कहा गया कि आयोग की जाँच नागरिकता का निर्धारण नहीं है
तस्वीर: सुभाशीष पाणिग्रही, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने 124 पृष्ठ के फ़ैसले में इसे वैध ठहराया और कहा कि यह "स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाती है।" नागरिकता पर पीठ ने अलग लकीर खींची: "ऐसी जाँच कड़े अर्थ में नागरिकता का निर्धारण नहीं है और उसके आधार पर की गई कार्रवाई केवल निर्वाचन संबंधी परिणामों तक सीमित है।" अदालत ने आयोग को निर्देश दिया कि बिहार में संदिग्ध नागरिकता के आधार पर हटाए गए नामों की सूची चार हफ़्तों में केंद्र सरकार को भेजी जाए। याचिकाकर्ताओं में एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स, योगेंद्र यादव और महुआ मोइत्रा थे।

दावे और आपत्ति की तारीख़ें

कर्नाटक में दावे और आपत्ति 24 अगस्त से 23 सितंबर तक दाख़िल हो सकते हैं, अपीलें 22 अक्टूबर तक सुनी जाएँगी और अंतिम सूची 27 अक्टूबर को छपेगी। महाराष्ट्र और दिल्ली में यह अवधि 31 अगस्त से 30 सितंबर तक है, निपटान 29 अक्टूबर तक चलेगा और अंतिम सूची 4 नवंबर को आएगी। तेलंगाना तथा पंजाब की अंतिम सूची 1 अक्टूबर की है और नगालैंड की 22 नवंबर की। खिड़की हर राज्य में एक महीने की है, पर नोटिस के निपटान का चरण उससे लंबा चलता है।

कौन-सा फ़ॉर्म किस काम का

नाम जुड़वाने के लिए फ़ॉर्म-6, विदेश में रहने वाले भारतीय नागरिक के लिए फ़ॉर्म-6ए, किसी और का नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति के लिए फ़ॉर्म-7 और अपनी प्रविष्टि में सुधार के लिए फ़ॉर्म-8 है; फ़ॉर्म-8 में एक ही आवेदन से चार तक बदलाव माँगे जा सकते हैं। महाराष्ट्र की प्रेस नोट याद दिलाती है कि इनमें झूठा घोषणापत्र देने पर धारा 31 के तहत एक साल तक की क़ैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। दस्तावेज़ की माँग जन्म की तारीख़ से बदलती है: 1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे के लिए अपना एक दस्तावेज़, उसके बाद और 2 दिसंबर 2004 से पहले जन्मे के लिए अपना तथा एक अभिभावक का, और उसके बाद जन्मे के लिए माता और पिता दोनों का।

एक मतदाता अपनी श्रेणी कैसे जाँचे

पहला क़दम मसौदा सूची में अपना नाम देखना है, जो voters.eci.gov.in, ईसीआईनेट ऐप, बूथ स्तर अधिकारी और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर उपलब्ध है। नाम न मिलने पर उसी वेबसाइट पर बूथवार बाहर हुए मतदाताओं की सूची देखिए, जिसमें कारण दर्ज होता है। नोटिस आया है या नहीं, यह डाक का इंतज़ार किए बिना कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर जारी नोटिसों की सूची में देखा जा सकता है। पुराने रिकॉर्ड से जुड़ने के लिए आयोग के सर्च पोर्टल पर राज्य, ज़िला, विधानसभा क्षेत्र और पिछली सूची में दर्ज अपना तथा रिश्तेदार का पूरा नाम भरना होता है।

अगर अंतिम सूची में भी नाम न आए

निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी का फ़ैसला आख़िरी नहीं है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 24 के तहत पहली अपील ज़िला मजिस्ट्रेट या उपायुक्त के सामने आदेश के 15 दिन के भीतर दायर होती है, और उस पर आए फ़ैसले के ख़िलाफ़ दूसरी अपील राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के सामने 30 दिन के भीतर। बिहार की विज्ञप्ति में आयोग ने यह भी दर्ज किया था कि कोई भी पात्र व्यक्ति नामांकन की आख़िरी तारीख़ से दस दिन पहले तक नाम जुड़वाने का आवेदन दे सकता है।

स्रोतभारत निर्वाचन आयोग, प्रेस नोट संख्या ECI/PN/086/2026, 14 मई 2026, एसआईआर चरण-3 की अनुसूची और अनुलग्नक, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, महाराष्ट्र: मसौदा मतदाता सूची पर प्रेस नोट, 31 अगस्त 2026, ज़िलेवार अनुलग्नक सहित, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, दिल्ली: एसआईआर 2026 पर आधिकारिक प्रश्नोत्तरी, पत्र सूचना कार्यालय, विज्ञप्ति 2173316, 30 सितंबर 2025: बिहार एसआईआर के अंतिम आँकड़े, उच्चतम न्यायालय, 2026 INSC 564, 27 मई 2026 का 124 पृष्ठ का निर्णय, स्क्रॉल, 9 सितंबर 2026: महाराष्ट्र की 38 सीटों पर बहिष्करण दर की रिपोर्ट, स्क्रॉल, 9 सितंबर 2026: सी.एन.आर. राव की प्रविष्टि और विसंगति की श्रेणियाँ, स्क्रॉल, 5 सितंबर 2026: सबर इंस्टिट्यूट के दिल्ली अध्ययन पर रिपोर्ट, स्क्रॉल, 6 सितंबर 2026: मणिपुर की अंतिम सूची के आँकड़े, स्क्रॉल, 6 सितंबर 2026: गोड्डा में फ़ॉर्म-7 के थोक आवेदनों का मामला, द न्यूज़ मिनट: कर्नाटक की मसौदा सूची के बाद मतदाता के लिए क़दम-दर-क़दम प्रक्रिया, ऑर्गनाइज़र, 9 सितंबर 2026: चुनाव अधिकारियों का खंडन और 8 सितंबर की मंज़ूरी, मुंबई प्रेस: महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम का बयान, इंडिया टीवी, 9 सितंबर 2026: राघव चड्ढा की प्रविष्टि पर आप का सवाल और दिल्ली मुख्य निर्वाचन अधिकारी का जवाब, काउंटरव्यू, सितंबर 2026: मंगोलपुरी की नागरिक जाँच और दिल्ली सीईओ की 9 सितंबर की प्रेस नोट

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